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Jansankhya aur Paryavaran “जनसंख्या और पर्यावरण” Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 9, 10, 12 Students.

जनसंख्या और पर्यावरण

Jansankhya aur Paryavaran

परि’ का अर्थ होता है – चारों ओर तथा आवरण का अर्थ होता है – घेरा। इस तरह पर्यावरण का अर्थ है – हमारे चारों ओर जो भी चीजें हैं, वे हमारा पर्यावरण बनाती हैं। हवा, पानी, भूमि, खनिज, पेड़-पौधे तथा विभिन्न प्रकार के जीव मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। समस्त जीवधारी पर्यावरण के जैविक घटक हैं।

पृथ्वी पर किसी भी जैविक घटक की संख्या में बहुत ज्यादा वृद्धि हो जाना सबके लिए हानिकारक होता है। इसी तरह पर्यावरण में किसी भी अजैविक घटक के अनावश्यक जमाव से अनेक तरह की समस्याएँ पनपती हैं।

पृथ्वी पर मनुष्यों की जनसंख्या में बड़ी तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। जनसंख्या बढ़ने से मनुष्य-समाज की जरूरतें बढ़ रही हैं। मनुष्य अपने भोजन, वस्त्र, मकान, उद्योग धन्धों के लिए वनस्पतियों पर निर्भर है।

अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनुष्य वनों को नुकसान पहुंचा रहा है। वनों के कटने से हवा में दूषित गैसें बढ़ती हैं। प्राणवायु आक्सीजन कम होती है, वर्षा अनियमित हो जाती है। कहीं बाढ़ आती है; तो कहीं सूखा पड़ता है।

भमि में जमा खनिज, कोयला तथा तेल (पेट्रोलियम) के साधन धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। इसके साथ ही जरूरी सामानों की पूर्ति के लिए नये-नये कारखाने और उदयोग लग रहे हैं। ये साधन स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ उगलते हैं। ये दूषित पदार्थ हवा, पानी तथा भूमि को नुकसान पहुंचाते हैं।

पर्यावरण के प्रदूषण से कैंसर, हेपेटाइटिस, एड्स, हैजा, पेचिस जैसे अनेक घातक रोगों के फैलने की संभावना बढ़ती है। परिवार में अधिक लोग होने से घर तथा समाज में अव्यवस्था बढ़ती है। सबकी शिक्षा, भोजन और स्वास्थ्य का ध्यान रखना संभव नहीं हो पाता।

हम सभी का यह कर्तव्य हो जाता है कि पर्यावरण को संतुलित बनाये रखने में समाज और सरकार का सहयोग करें। आसपास स्वच्छता बनाये रखने में स्वयं पहल करें। अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगायें।

जनसंख्या में हो रही वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए हर संभव उपाय करें। मानव समाज के एक जुट प्रयासों से ही जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के प्रदूषण जैसी समस्याओं से निपटा जा सकता है।

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