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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Mere Jeevan ka Udeshya ”, ”मेरे जीवन का उद्देश्य” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

मेरे जीवन का उद्देश्य

Mere Jeevan ka Udeshya 

4 Best Essay on “Mere Jeevan ka Uddeshya”

निबंध नंबर :- 01

आधुनिक युग योजनाओं का है। बिना योजना के हम दिशाहीन भटकते रहते हैं। यदि हमने कोई योजना बनाई तो हम निरन्तर उसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं। हर प्रकार से अपनी शक्ति एक बिन्दु पर केन्द्रित रखें तो उद्देश्य की प्राप्ति में सफलता मिलती है। उचित साधनों को एकत्रित करके हम उद्देश्य की ओर सुगमता से चरण बढाते रहते हैं।

मैंने पर्याप्त सोच विचार करके अपने जीवन का उद्देश्य सफल वकील बनना निश्चित कर लिया है। इसकी प्रेरणा मुझे पिता जी से मिली है। वे भी एक सफल वकील है। उनके पास प्रति दिन अनेकों मुवक्किल आते रहते है। मैं भी उनके सम्पर्क में आता हूं। उनका व्यवहार एवं आचारण देखता रहता हूं। मेरे पिता जी जिस प्रकार अनेकों मुवक्किलों को आकर्षित करते है, मैं भी उसी प्रकार का प्रयत्न करूंगा।

मैं अभी दशवीं कक्षा का विद्यार्थी हूँ। कठोर परिश्रम से अच्छे अंक प्राप्त कर उत्तीर्ण होने का प्रयत्न कर रहा हूं। इसके पश्चात तीन वर्ष स्नातक बनने में व्यतीत होंगे। मुझे समाज संसार को समझने परखने का अवकाश मिलेगा, बुद्धि में भी परिपक्वता आ जाएगी।

बी.ए. पास करने बाद वकालत की शिक्षा प्राप्त करूंगा। इसमे दो वर्ष लग जाएंगे। वकालत उत्तीर्ण करके सर्व प्रथम पिता जी के साथ रहकर अनुभव प्राप्त करूंगा। थोड़ा अनुभव प्राप्त हो जाने पर मैं स्वतंत्र वकील बन जाऊंगा।

मेरे पिताजी के पास बहुत से मुकद्दमें आते है। मैं देखता हूं कि उनमें से बहुत से झूठे होते हैं। किसी को सताने के लिए, किसी की सम्पत्ति पर अधिकार करने के लिए झूठी कहानियां गढ कर लोग जीतना चाहते हैं। पर मैंने निश्चय कर लिया है कि ऐसे मुकद्दमे मैं नहीं लूंगा। मैं तो केवल सच्चाई का वकील बनना चाहता हूं। वकील बनकर, सताए गए लोगों की सहायता करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य रहेगा।

कुछ वकील अपने धन लाभ के लिए मुकद्दमों को अधिक से अधिक समय तक चलाने में ही अपनी सफलता मानते हैं। यह उनके लालच के कारण ही होता है। इससे मुवक्किल परेशान हो जाते हैं। कहते हैं कि न्याय मिलने में देरी भी अन्याय कहलाता है। मेरा प्रयत्न होगा कि किसी भी मुकद्दमें के निर्णय में अनावश्यक विलम्ब न हो।

ऐसे भी मामले सामने आए हैं कि धनवान एवं सम्पन्न लोग गरीबों पर अत्याचार करते है। उनकी सम्पत्ति हड़प लेते हैं। वे बेचारे इस स्थिति में नहीं होते कि वकील को फीस देकर खडा कर सकें। अन्याय को सहन करने के अतिरिक्त उनका कोई विकल्प नही रहता। ऐसे लोगों के लिए मैं निशुल्क वकालत करूंगा। अन्यायी और अत्याचारियों के विरुद्ध मैं लडकर उनको उचित कठोर दण्ड दिलवाऊंगा।

जीविका निर्वाह के लिए धन की आवश्यक्ता होती है। इसलिए अन्य मुकद्दमें तो लिए ही जाएंगे, जिसकी फीस से मेरा और परिवार का निर्वाह होता रहे। कुछ प्रतिशत मुकद्दमें गरीब असहायों के होंगे जिनसे कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।

मैं अपने मुकद्दमों का पूरा अध्ययन करके ही अदालतों में जाया करूंगा। सरदार पटेल एवं पंडित जवाहर लाल नेहरू का आदर्श मेरे सामने होगा। सरदार पटेल को मुकद्दमें की बहस करते समय अपनी पत्नी के निधन का तार मिला। उन्होंने उसे पढा और बहस में लग गए। कर्तव्य निष्ठा का कैसा अनुपम उदाहरण है। आजाद हिन्द के सैनिकों पर जब मुकद्दमा चलाया जाने लगा तो राजनीति से अवकाश लेकर नेहरूजी ने उनकी पैरवी की, उनका उदाहरण भी भारत के इतिहास की थाती है। मैं भी एक वकील के रूप में ऐसे ही आदर्श स्थापित करना चाहता हूं। भगवान मेरी कामना पूरी करें।

निबंध नंबर :- 02 

मेरे जीवन का उद्देश्य

Mere Jeevan ka Uddeshya 

 

लक्ष्य जीवन को एक उद्देश्य तथा दिशा प्रदान करता है। जीवन में उद्देश्य का न होना बिना पतवार के नाव चलाने के बराबर है। बिना उद्देश्य सोचे कुछ भी प्राप्त करना आसान नहीं है। बिना उद्देश्य का व्यक्ति सदा हालातों पर ही निर्भर रहता है। इस प्रकार का व्यक्ति अक्सर गुमराह हो जाता है। उसका जीवन भ्रम में ही खत्म हो जाता है। इस लिए हर व्यक्ति के पास कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होना चाहिए।

जीवन में उद्देश्य का होना बहुत ज़रूरी है। यह भी उतना ही आवश्यक है कि वह उद्देश्य सही भी होना चाहिए। गलत उद्देश्य व्यक्ति को बरबाद कर सकता है। उसकी सारी मेहनत व्यर्थ हो सकती है। उसका समय तथा मेहनत का कोई फल नहीं मिलता। व्यक्ति को छोटी आयु में ही अपने जीवन का लक्ष्य सोच लेना चाहिए। उद्देश्य का चयन अपने शौक तथा पसंद के अनुसार करना चाहिए। इसके लिए व्यक्ति किसी समझदार से सलाह भी कर सकता

विभिन्न व्यक्तियों के अलग-अलग उद्देश्य होते हैं। कई लोग उद्योगपति बनना पसंद करते हैं। वे ऐसा सोचते हैं कि इससे उनके पास हर चीज़ अधिक होगी। उनका जीवन आसान एवं आरामदायक होगा। इसी प्रकार कुछ लोग डाक्टर तथा इंजीनियर बनना भी पसंद करते हैं। उनके अनुसार डाक्टर तथा इंजीनियर बनने से उनको समाज में नाम तथा इज्जत मिलेगी। कुछ लोग आई.ए.एस. या पी.सी.एस. अफसर बनना भी पसंद करते हैं। उन्हें जीवन में ताकत तथा शोहरत प्राप्त करना पसंद है।

मैंने जीवन में एक अध्यापक बनने का फैसला किया है। एक अध्यापक देश का निर्माता होता है। मेरा उद्देश्य पैसा बनाना नहीं है। मैं गरीब बच्चों की सहायता करना चाहता हूँ। मैं उन्हें मुफ्त शिक्षा देना चाहता हूँ। मैं उनके अंदर अनुशासन पैदा करूंगा। मैं उनके लिए एक मददगार, दोस्त तथा उनकी देखभाल करने वाला व्यक्ति बनूंगा। मैं उनके लिए ऊँची सोच तथा ऊँचा उद्देश्य रखूगा। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि जीवन में यह लक्ष्य प्राप्त कर सकू।

निबंध नंबर :- 03

मेरा उद्देश्य

Mera Uddeshya

सभी लोगों का अपने जीवन में कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। ईश्वर ने सभी लोगों को इस संसार में किसी न किसी उद्देश्य के साथ अवश्य जन्म दिया है। हर आदमी अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष भी करता है। बिना उद्देश्य तथा संघर्ष के यह जीवन बेकार है तथा उस रास्ते की तरह है जिसकी कोई मंजिल नहीं होती। उद्देश्य को प्राप्त करने में होने वाले संघर्ष में जीवन का असली आनंद है तथा प्रगति के लिए उद्देश्य का होना अत्यधिक आवश्यक है।

मेरा नाम रोहित राय है। मैं राजकीय विद्यालय का कक्षा सात का छात्र हूँ। मेरे जीवन का भी एक उद्देश्य है। मैं बड़ा होकर एक योग्य डॉक्टर बनना चाहता हूँ तथा समाज की सेवा करना चाहता हूँ। डाक्टर का पेशा अत्यंत सम्मानीय है। लोग डॉक्टर को धरती पर भगवान का दूसरा रूप मानते हैं। मेरे माता-पिता दोनों चिकित्सक हैं। वे दोनों अत्यंत मेहनत तथा सेवा-भाव से निर्धन और धनी लोगों का इलाज करते हैं। चिकित्सक बनकर बीमार लोगों की सेवा करने में एक विचित्र आनंद प्राप्त होता है। इस पेशे की सादगी तथा सेवा-भाव को देखते हुए ही मैंने भी एक चिकित्सक बनने का निश्चय कर लिया है तथा इसे ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लिया है। मैं बीमार लोगों की सेवा करने के लिए चिकित्सक बनना चाहता हूँ।

चिकित्सक बनकर धन कमाना ही मेरा एकमात्र उद्देश्य नहीं है। अपने जीवन-उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए मैं मन लगाकर पढ़ाई करता हूँ। नियमित रूप से विद्यालय जाता हूँ। गृहकार्य भी नियमपूर्वक करता हूँ। इसके अलावा मन लगाकर अपने विषयों की पुस्तकों का अध्ययन करता हूँ। मैं चिकित्सक बनने के लिए संघर्ष करने को तैयार हूँ। मेरे माता-पिता मुझे चिकित्सक बनने के लिए प्रेरित करते हैं। वे सदा मुझसे कहते हैं कि अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए मेहनत तथा लगन अत्यंत आवश्यक है। उनका जीवन मेरे लिए प्रेरणादायक है। वे दोनों मुझे अपने उद्देश्य में सफल होने का आशीर्वाद देते हैं।

 

निबंध नंबर :- 04

जीवन का उद्देश्य

The Aim of Life

‘इस पथ का उद्देश्य नही है, श्रांत भवन में टिके रहना, किंतु पहुँचना उस सीमा तक, जिसके आगे राह नही।”

सृष्टि के समस्त चराचरों में मानव सर्वोत्कृष्ट है क्योंकि केवल उसी में बौद्धिक क्षमता, चेतना, महत्वाकांश होती है। केवल मनष्य ही अपने भविष्य के लिए अपने सपने संजो सकता है, अपने जीवन के लक्ष्य का निर्धारण कर सकता है तथा उसे पाने के लिए सतत् प्रयत्न करने में सक्षम होता है।

मैंने भी अपने जीवन के बारे में एक लक्ष्य निर्धारित किया है, और वह है-एक डाक्टर बनने का ।

विश्व में कई प्रकार के व्यवसाय हैं, उद्योग-धंधे हैं, नौकरियाँ और कार्य-व्यापार हैं। उनमें से कई बड़े ही मानवीय दृष्टि से बड़ी ही संवेदनशील हुआ करती है। उसका सीधा संबंध मनुष्य के प्राणों

और सारे जीवन के साथ हुआ करते है। डाक्टर का धंधा कुछ इसी प्रकार का पवित्र, मानवीय संवेदनाओं से युक्त प्राण-दान और जीवन रक्षा की दृष्टि से ईश्वर के बाद दूसरा, बल्कि कुछ लोगों की दृष्टि में ईश्वर के समान ही हुआ करता है। मेरे विचार में ईश्वर तो केवल जन्म देकर विश्व में भेज दिया करता है। उसके बाद मनुष्य-जीवन की रक्षा का सारा उत्तरदायित्व वह डाक्टरों के हाथ में सौंप दिया करता है। इस कारण बहुधा मन-मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा करता है कि यदि मैं डाक्टर होता तो?

यह सच है कि डाक्टर का व्यवसाय बड़ा ही पवित्र हुआ करता है, कमाई करने के लिए नहीं। मैने ऐसे कई डाक्टरों की कहानियाँ सुन रखी हैं जिन्होंने मानव-सेवा करने में खुद सारा जीवन खुद भूखे-प्यासे रहकर बिता दिया, पर किसी बेचारे मरीज को इसलिए नही मरने दिया कि उसके पास फीस देने या दवाई खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। यदि मैं डॉक्टर होता तो ऐसा ही करने की कोशिश करता। किसी भी मनुष्य को बिना उपचार, बिना दवाई के मरने नहीं देता। मैंने यह भी सुन रखा है कि कुछ ऐसे डाक्टर भी हुए हैं, जिन्होंने अपने बाप-दादा से प्राप्त की गई सारी संपति लोगों की सेवा-सहायता में खर्च दी। यदि मैं बाप-दादा से प्राप्त की गई संपतिवाला डॉक्टर होता, तो एक-एक पैसा जन-साधारण की सेवा-सहायता में खर्च करता, इसमें शक नहीं।

मैंने सुना है कि भारत के दूर-दराज के गांवों में डाक्टरी-सेवा का अभाव है, जब कि वहाँ तरह-तरह की बीमारियाँ फैलकर लोगों को भयभीत किए रहती हैं, क्योंकि पढ़े-लिखे वास्तविक डाक्टर वहाँ जाना नहीं चाहते, इस कारण वहाँ नीमहकीमों की बन आती है या फिर झाड़-फूंक करने वाले ओझा लोग बीमारों का भी इलाज करते हैं। इस तरह नीमहकीम और ओझा बेचारे अनपढ़-अशिक्षित गरीब देहातियों को उल्लू बनाकर दोनो हाथों से लूटा तो करते ही हैं, उनके प्राण लेने से बाज नहीं आते और उनका कोई कुछ बिगाड़ भी नहीं पाता। यदि मैं डॉक्टर होता तो आवश्यकता पड़ने पर ऐसे ही दूर-दराज के गांवों में जाकर लोगों के प्राणों की तरह-तरह की बीमारियों से तो रक्षा करता ही; लोगों को ओझाओं, नमी-हकीमों और तरह-तरह के अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने का प्रयास भी करता। मेरे विचार में अंधविश्वास भी एक प्रकार का भयानक रोग ही है। इनसे लोगों को छुटकारा दिलाना भी एक बड़ा महत्वपूर्ण पुण्य कार्य ही है।

यह ठीक है कि डॉक्टर भी मनुष्य होता है। अन्य सभी लोगों के समान उसके मन में भी धन-संपति जोड़ने जीवन की सभी प्रकार की सुविधाएँ पाने और जटाने, भौतिक सुख भोगने की इच्छा हो सकती है। इच्छा होनी ही चाहिए और ऐसा होना उसका भी अन्य लोगों की तरह बराबर का अधिकार है। लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि वह अपने पवित्र कर्त्तव्य को भुलाए। यह बस पाने के लिए बेचारे रोगियों के रोगों पर परीक्षण करने रहकर दोनों हाथों से उन्हें लूटना और धन बटोरना आरंभ कर दें। यदि मैं डॉक्टर होता तो इस दृष्टि से न तो कभी सोचता और व्यवहार करता। सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ पाने का प्रयास अवश्य करता पर पहले अपने रोगियों को ठीक करने का उचित निदान कर, उन पर तरह-तरह के परीक्षण करके नहीं कि जैसा आजकल बडे-बड़े डिग्रीधारी डॉक्टर किया करते हैं। अफसोस उस समय और भी बढ़ जाता है, जब यह देखता हूँ कि रोग की वास्तविक स्थिति की अच्छी-भली पहचान हो जाने पर भी जब लोग कई प्रशिक्षणों के लिए जोर देकर रोगियों को इसलिए तथाकथित विशेषज्ञों के पास भेजते हैं कि ऐसा करने पर उन परिचितों-मित्रों – की आय तो बढे ही भेजने वाले डॉक्टरों को भी अच्छा कमीशन मिल सके। मैं यदि डॉक्टर होता तो इस प्रकार की बातों को कभी भूलकर भी बढ़ावा न देता।

मैंने निश्चय कर लिया कि आगे पढ़-लिख कर डॉक्टर ही बनूँगा। डॉक्टर बनकर उपर्युक्ट सभी प्रकार के इच्छित कार्य तो करूँगा ही, साथ ही जिस प्रकार से कुछ स्वार्थी लोगों ने इस मानवीय तथा पवित्र व्यवसाय को कलंकित कर रखा है। उस कलंक को भी धोने का हर संभव प्रयास करूंगा।

एक चिकित्सक रोगियों को जीवनदान देता है। जीवनदान सर्वोपरि है। इस प्रकार का कृत्य आत्मसंतुष्टि प्रदान करता है। मानव-जीवन के उद्देश्य को पूरा करता है-सर्वेसुखिनः संतु सर्वे संतुनिरामया केवल धन कमाना ही मानव जीवन का लक्ष्य नहीं, परोपकार करना भी इसका उद्देश्य है जिसे एक चिकित्सक बनकर पूरा किया जा सकता है। इसीलिए मैंने डाक्टर बनने का जीवन लक्ष्य निर्धारित किया है।

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