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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Mahila Suraksha” , “महिला-सुरक्षा” Complete Essay for Class 10, Class 12 and Graduation Classes.

महिलासुरक्षा

Mahila Suraksha

 

नारी का दुखद जीवनमैथिलीशरण गुप्त ने नारी की असहाय अवस्था पर आँसू बहाते हुए कहा था-

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी।

आँचल में है दूध, और आँखों में पानी।।

सौ वर्ष पहले कही गई यह उक्ति आज भी ज्यों-की-त्यों सच है। कहने को भारत की नारी ने बहुत प्रगति की है। दीखने में वह पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही है। किंतु सच्चाई एकदम विपरीत है। साँझ का झुटपुटा होते ही उसे अपने ‘अबला’ होने का अहसास होने लगता है। सड़क पर चलने वाला हर शख्स उसे दबोच लेना चाहता है। सूनी सड़कें ही नहीं, आन-बान-शान से जगमगाते नगर भी उसकी अस्मत लूट लेना चाहते हैं। पहले भारत की राजधानी दिल्ली बदनाम हुई, अब सुरक्षित मानी जाने वाली मुंबई की भी पोल खुल रही है। ऐसा लगता है कि भारतीय नारी कहीं भी सुरक्षित नहीं है। न घर में, न बाहर; न कार्यालय में, न परिवार में।

असुरक्षा के कारणप्रश्न उठता है कि नारी-सुरक्षा के सभी उपाय होते हुए भी वह असुरक्षित क्यों है? क्या भारत में नारी को सुरक्षा और सम्मान देने वाले कानूनों की कमी है? नहीं। क्या हमारी पुलिस कमज़ोर है? नहीं। कानून और पुलिस चाहे तो नारी के साथ होने वाला दुराचार समाप्त हो सकता है। हमारी न्यायपालिका भी असमर्थ नहीं है। फिर भी नारी पीड़ित है तो इसके गहरे सामाजिक कारण हैं।

समाज की धारणासर्वेक्षण बताते हैं कि नारी का शोषण घर-परिवार और मुहल्ले में अधिक होता है, बाहर सूने प्रदेश में कम। जब नारी के संबंधी, रिश्तेदार, मित्र और परिचित ही उस पर बुरी नज़र रखते हैं तो बात चिंतनीय हो जाती है। यहाँ न पुलिस कुछ कर सकती है, न कानून । यहाँ समाज के संस्कार ही काम आ सकते हैं। यहाँ भाई-बहन के संबंधों की पवित्रता काम आ सकती है। ‘मातृवत परदारेषु’ की भावना ही अचूक उपाय हो सकती है। राम और लक्ष्मण का शुर्पणखा की नाक काटना हमें परनारी संबंधी संदेश दे सकता है। आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को आरंभ से ही नारी-सम्मान, यौन-पवित्रता के संस्कार दें। जो भी इन सीमाओं का अतिक्रमण करे उसका घर-परिवार में बहिष्कार करें।

कानूनपुलिसनारी-असुरक्षा का दूसरा पहलू कानून और पुलिस की लापरवाही से जुड़ा है। दुर्भाग्य से पुलिस और कानून में पुरुषों का बोलबाला है। वहाँ पुरुषों की मनमानी चलती है। अतः जब भी कोई पुरुष किसी नारी के साथ यौनाचार करता है तो उसका समाज उसे निर्मम होकर दंड नहीं देता, बल्कि बीच-बचाव करने की कोशिशु करता है। इतनी शह पाकर दुष्ट और ढीठ बलात्कारियों का साहस बढ़ जाता है। समाज में ऐसे उदाहरण कम दिखाई देते हैं कि किसी बलात्कारी को सजा मिली हो। ऐसे उदाहरण अधिक हैं, जहाँ पुरुष किसी परनारी पर यौन-आक्रमण करके अपनी मर्दानगी की शेखी बघारते हैं। ऐसे समाज में बलात्कारी और ढीठ पुरुष गर्व से चलते हैं। जब तक उनकी यह शेखी नहीं टूटती, तब तक नारी असुरक्षित रहेगी। इसका एक ही उपाय है कि संसद, कानून और पुलिस में नारी को बराबर का प्रतिनिधित्व मिले। नारी कानून बनाए, सुरक्षा में भागीदार हो और न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे। तब जाकर इस समस्या से कुछ सीमा तक छुटकारा मिल सकता है।

अश्लीलता का प्रचार-नारी पर होने वाले बल-प्रयोग को प्रोत्साहन देने वाले कुछ अन्य कारण भी हैं। आज हर हाथ में मोबाइल है। मोबाइल में इंटरनेट है और इंटरनेट पर नाना कामकतापूर्ण साइटस हैं। इन पर किसी का नियंत्रण नहीं है। करोड़ों-करोड़ों युवक घर बैठे-बैठे इन्हीं गंदी नग्न साइट्स को देखते-देखते विकत हो जाते हैं। इन पर रोक लगाना बेहद जरूरी है। इनसे संबंधित प्रभावी कानून होने चाहिए। जब तक अबोध युवक-युवतियों को यौन-दुष्कर्म के लिए उभाड़ा जाता रहेगा, तब तक यह दुराचार बढ़ता रहेगा।

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