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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Dhwani Pradushan”, ”ध्वनि-प्रदूषण” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

ध्वनि-प्रदूषण

Dhwani Pradushan 

 

मनुष्य को प्रकृति का वह वरदान प्राप्त है कि वह बोल सकता है। उसके पास एक उन्नत भाषा है। उस भाषा में वह बातचीत कर सकता है। विचारों को समझ-समझा या उनका आदान-प्रदान कर सकता है। प्रकृति को वरदान और भाषा अर्जित बल पर मनुष्य गनगना सकता है। स्वर-लय में गा सकता है। चाहने और पड़न पर रो भी सकता है, चिल्ला भी सकता है। इस प्रकार और स्थिति के अनुसार मनुष्य को अपनी तथा अपने जैसे अन्य मनुष्यों की ध्वनियाँ सुननी पड़ती है। इस प्रकार की ध्वनियाँ सामान्य रूप से सुनना किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं कहा जा सकता। स्वाभाविक ही कहा जाता एवं कहा जाएगा।

मनुष्यों की ध्वनियों के अतिरिक्त प्रकृति और प्राकृतिक वातावरण से सुनाई देने वाली कुछ ध्वनियाँ हुआ करती हैं। पक्षियों का चहचहाना, पत्तों का टकरा कर मरमर करना, धारा का सरसर करते हुए सरकना या बहना। बादलों और समुद्र की हल्की गर्जना आदि। इस प्रकार की ध्वनियों को प्रकृति का संगीत मान कर इन सब का स्वाभाविक आनन्द लिया जाता है। लेकिन जब बादल तुमुल स्वरों में गर्जन, सागर ऊँची लहरें उठा कर हुँकारने और बादलों में बिजलियाँ कड़क कर कानों के पर्दे फाडने लगती हैं, तब किसे अच्छा लगता है ? इसी प्रकार जब कई मनुष्य चिल्ला-चिल्ला कर गाने या बातें करने लगते हैं, दहाडे मार कर सब को दहला देना चाहते हैं, तब भी कानों पर बुरा असर पड़ता है। वे फटने लगते हैं। जब भूकम्प आता और पृथ्वी गड़गड़ाहट के साथ हिलने और फटने लगती है- ये सब प्राकृतिक व्यापार होते हुए भी किसी को अच्छे नहीं लगते, इस प्रकार के प्राकृतिक ध्वनि-विकारों से कानों के पदे फट जाने, व्यक्ति के बहरा हो जाने का भय बना रहता है। इसी प्रकार की भयप्रद ध्वनियों के प्रभाव को ही वास्तव में ध्वनि-प्रदक्षण कहा जाता है। यह चाहे हमें हर कदम पर और भी कई प्रकार की विकराल ध्वनियों से दो-चार होना पड़ता है। सड़कों-बाजारों पर गूंजती और सुनाई देती रहने वाली ध्वनियों की बात तो जाने दीजिए: वह तो घर से बाहर निकलने पर ही सुनने को मिलेगी: पर आजकल तो कई बार व्यक्ति अपने घर तक में शान्त नहीं बैठ पाता। वहाँ भी चारों ओर से सुनाई देने वाली ध्वनियाँ उसके कानों के पर्दो और श्रवण-शक्ति के लिए चुनौती बनी रहती हैं। आप शान्त बैठे अपना पूजा-पाठ कर रहे हैं या कुछ पढ़ लिख रहे हैं आपस में कोई आवश्यक घरेलू बात ही कर रहे हैं कि आस-पड़ोस से कहीं कोई टेंपरिकार्डर उच्च स्वरों में, कानों के पर्दे फाड़ देने वाले स्वरों में गूंज उठा। अब कर लीजिए पूजा-पाठ, पढ़-लिख लीजिए या कर लीजिए जरूरी घरेलू बात-चीत ! ‘ही गया सब। उस गूंजते रिकार्ड के कारण जब अपनी आवाज़ आप सुन पाना संभव नहीं, तो दूसरे कैसे सुनेंगे? कैसे लग सकता है मन पूजा-पाठ या पढ़ने-लिखने में आप ने परीक्षा देनी है सुबह, किसी साक्षात्कार की तैयारी कर रहे हैं आप। भाड़ में जाए साल, बजाने वाले को तो बस अपना मन बहलाना है। अपनी पसन्द का गाना न चाहते हुए भी आप को सुनाना ही है। अब आपने यदि जाकर कह दिया कि धीरे बजाइये, तो जानते हैं न क्या उत्तर मिलता है? यही न कि अपना घर है, घर में बजा रहे हैं, आप मत सुनिये। आप कान और किवाड बन्द कर लीजिए। हम आप का क्या ले रहे हैं ? अब ऐसे लोगों को कौन समझाए कि यह एक प्रकार का ध्वनि-प्रदूषण है। इससे दूसरों की श्रवण-शक्ति के साथ-साथ आप की अपनी श्रवण-शक्ति को भी हानि पहुँच सकती है। बहरेपन का बढ़ता रोग इस बात का प्रमाण है; पर नहीं, उन्हें तो नहीं ही समझना है।

मन्दिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, जगरातों, कीर्तन-मण्डलियों द्वारा लाऊड स्पीकर लगा कर अपने भजन-कीर्तन, आज़ान आदि का विस्तार करना भी ध्वनि-प्रदूषण का एक बहुत बड़ा हानिप्रद कारण है। हालाँकि कानूनी तौर पर ऐसा करना गलियों-बाजारों में टैण्ट लगा कर उच्च स्वरों में लाउड स्पीकर बजाना वर्जित और दण्डनीय अपराध है, किन्तु कौन किस को रोके?

धर्म जो आड़े आ जाता है। सो बेचारे कानून के रखवाले भी अनसुनी कर के रह जाते हैं। इस सब के अतिरिक्त मोटरों-कारों, ट्रको, बसों, स्कूटरों आदि के जोर-शोर के बजते हॉर्न, धड़धड़ा कर चलते उनके पहिए, दौडती रेलें और उनकी ऊँची सीटियाँ, कल-कारखानों के बजते घुघू और धड-धड़ करते मशीनों के पहिए-उफ। कितना शोर होता है इन सब के कारण। कई बार कानों पर हाथ रख लेने को विवश हो जाना पड़ता है। कानों में ठूसने के लिए रूई तक खोजनी पड़ती है।   और भी तरह-तरह के शोर-शराबे हमारे चारों ओर गूंज कर हमें व्यथित और पीड़ित करते रहते हैं। इस प्रकार आज अन्य प्रकार के प्रदूषणों की तरह ध्वनि-प्रदूषण ने भी मानवता को त्रस्त कर रखा है।

ध्वनि-प्रदूषण कानों की श्रवण-शक्ति के लिए तो हानिकारक है ही, तन-मन की शांति भी हरण करने वाला प्रमाणित हुआ करता या हो सकता है। ध्वनि-प्रदषण अपनी अधिकता के कारण कई बार व्यक्ति के सूक्ष्म स्नायु-तन्तुओं में तनाव पैदा कर नींद को भगा दिया करता है। नींद न आने से व्यक्ति सुस्त हो जाता है। कोई भी काम कर पाने में समर्थ नहीं हो पाता। ध्वनि प्रदूषण व्यक्तियों को चिड़चिड़ा और असहिष्णु भी कर दिया करता है। इससे और भी कई प्रकार की शारीरिक-मानसिक बीमारियाँ उत्पन्न हो सकती एवं हो जाया करती हैं। इन्हीं सब कारणों से व्यक्ति को एकान्त एव शान्त वातावरण में रहने की प्रेरणा दी जाती है। प्राकृतिक वातावरण में रहने को कहा जाता है। ज्यादा बोलने और बातों द्वारा हर समय चपर-चपर करते रहने वालों को अच्छा नहीं समझा जाता । ऐसी दशा में अपने ही हित के लिए हमें जितना भी सम्भव हो सके शान्त वातावरण में शान्त मौन भाव से रहने का प्रयास करना चाहिए।

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