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Hindi Essay-Paragraph on “Rakesh Sharma –  Pratham Bharatiya Antriksh Yatri” “राकेश शर्मा – प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री” 600 words Complete Essay.

राकेश शर्मा – प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री

Rakesh Sharma –  Pratham Bharatiya Antriksh Yatri

 

महाकाय में स्थापित भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट, भास्कर, रोहिणी, स्टेप्ल एवं इनसेट 1 बी. भारत की अंतरिक्ष विजय के साक्षी हैं। प्रथम भारतीय महाकायचारी राकेश शर्मा ने अंततः अनन्त आकाश के महाशून्य में हस्ताक्षर अंकित कर विश्व को भारतीय प्रतिभा का सशक्त परिचय दिया है।

राकेश शर्मा भारतीय वायु सेना के स्कवैडन लीडर हैं। उनके पिता श्री देवेंद्र शर्मा हैदराबाद के निवासी हैं। माता श्रीमती तृप्ता शर्मा सेंट्रल स्कूल की अवकाश प्राप्त अध्यापिका हैं। छोटा भाई मुक्तेश शर्मा मर्चेट नेवी में हैं। राकेश की पत्नी मधु सेना के अवकाश प्राप्त कर्नल पी.एन. शर्मा की पुत्री हैं। राकेश शर्मा में अपनी प्रतिभा के बल पर स्कवैडन लीडर के पद पर पहुंच गए। कार्य-कुशलता तथा कर्तव्य निष्ठा के कारण ही राकेश अंतरिक्ष यात्रा के लिए निर्वाचित हुए तथा यात्रा का गौरव भी प्राप्त हुआ। सन् 1961 ई. में जब प्रथम बार मनुष्य ने अंतरिक्ष यात्रा की थी और जिसका श्रेय रूसी नवयुवक यूरी गागरिन को प्राप्त हुआ था, तभी बालक राकेश के मन में महाकाय अभियान की महत्त्वकांक्षा पैदा हुई थी और लगभग 23 वर्षों में उसकी वह आकांक्षा पूरी हुई।

भारत-रूस के संयुक्त प्रयास से अंतरिक्ष उड़ान की एक महत्त्वपूर्ण योजना बनाई गई। उड़ान में भाग लेने के लिए भारतीय वायुसेना के लगभग 150 चुने हुए वीर नौजवानों में से राकेश शर्मा एवं कंमाडर रवीश मल्होत्रा को निर्वाचित किया गया। 1982 ई. को सितंबर महीने से रवीश-राकेश का प्रशिक्षण कार्य रूस के ब्रेजनेव स्टार सिटी के गागरिन सेंटर में आरंभ हुआ। प्रथम चरण में उन्हें रूसी भाषा सीखनी पड़ी। साथ ही साथ विशेष खाद्य-पद्धति का अभ्यास करना पड़ा। 1983 ई. के अगस्त महीने में उन्हें भारत आने की छुट्टी मिली। कुछ दिनों बाद वे पुनः मास्को लौट गए। दूसरे चरण में उन्हें महाकाय यान ‘सोयूज-2′ तथा ‘सोयूज-1’ के उपकरणों एवं कार्य-पद्धति की अच्छी जानकारी हासिल करनी पड़ी।

सोयूज-2 चौदह तल्ले के विशाल भवन की तरह ऊंचा था, जिसकी बाहरी सतह पर सूर्य के रथ की आकृति अंकित थी। यान का वजन 300 टन था। उसे खींचने के लिए 14 लाख 25 हजार अश्व शक्ति की आवश्यकता थी। सोयूज की गति ध्वनि की गति से 24 गुना थी।

आवश्यक प्रस्तुति एवं प्रशिक्षण के पश्चात् 3 अप्रैल, 1984 को सायं 6 बजकर 38 मिनट पर राकेश तथा उनके रूसी साथियों क्यालिशे और स्तेकालव को लेकर सोयूज-2 ने धरती से उड़ान भरी। मात्र 2 घंटे की उड़ान के बाद सोयजू अंतरिक्ष में स्थित सॉल्यूट-7 से जा मिला।

साल्यूट के कमांडर ने अपने यान का सुरंग-मुख खोल दिया और प्रसन्नचित्त राकेश सॉल्यूट में जा पहुंचे। वहां उन्होंने सात दिन बिताए और अनेक परीक्षण एवं निरीक्षण करते रहे। प्रतिदिन एक बार वे टेलीविजन के सम्मुख पहुंचकर धरती वालों से बातें करते। एक बार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसने पूछा- “महाशून्य से भारत कैसा दिख रहा है?” राकेश ने उत्तर दिया, “सारे जहां से अच्छा।” आठवें दिन 11 अप्रैल को 10 बजे नम यात्रियों ने सॉल्यूट के कमांडर से विदा ली और धरती की ओर बढ़े। उस समय उनके रॉकेट की गति कि.मी. प्रति सेंकड हो गई। उन्होंने ब्रेक पैराशूट खोल दिया, तब गति और भी कम हो गई। सभी यात्री सकुशल धरती पर लौट आए।

अपने अभूतपूर्व अभियान के लिए राष्ट्र की ओर से राकेशजी को अशोक चक्र और रवीशजी को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। रूस ने राकेश को आर्डर ऑफ लेनिन पुरस्कार से सम्मानित किया। विश्व के कोने-कोने से बधाइयां मिली। इस अंतरिक्ष अभियान से भारत को कई लाभ हुए। भारत की खनिज संपदा, हिमालय की बर्फ, जल विद्युत, जीव-विज्ञान, द्रव्य विज्ञान आदि के अध्ययन में देश को महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला। भारत की संचार-व्यवस्था में तो क्रांति ही आ गई है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा काफी बढ़ गई। अपने भारत भ्रमण पर यूरी गागरिन ने कहा था- “इसमें जरा भी संदेह नहीं कि एक दिन ऐसा आएगा, जब अंतरिक्ष यात्रियों के परिवार में भारत का नागरिक होगा।” नवंबर 1961 ई. में की गई उस महान अंतरिक्ष यात्री की भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य हुई।

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