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Hindi Essay-Paragraph on “Adarsh Nagrik ke Kartvya” “आदर्श नागरिक के कर्तव्य” 700 words Complete Essay for Students of Class 10-12 and Subjective Examination.

आदर्श नागरिक के कर्तव्य

Adarsh Nagrik ke Kartvya 

राष्ट्र के प्रति नागरिकों के क्या कर्तव्य है तथा एक आदर्श नागरिक के क्या कर्तव्य है? नागरिक और नागरिकता को स्पष्ट रूप से समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि ‘नागरिकता’ नागरिक के संपूर्ण प्राकृतिक, सामाजिक कर्तव्यों एवं अधिकारों का वह पुण्य पुंज है, जिसका सौरभ व्यक्ति को समाज और राष्ट्र की भावी उन्नति में संलग्न रहने की प्रेरणा देता है। किस प्रकार व्यक्ति अपने समाज के सामूहिक जीवन को अधिकाधिक सुखी बना सकता है। नागरिकता इसी की आधारभूमि है। जब हम समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तब यह आशा भी करते है कि वह हमारे अधिकारों का अपहरण न कर उनकी रक्षा के साधन भी जुटाए। उदाहरण के लिए, जब हम अपनी शक्ति और परिश्रम से धनोपार्जन करते हैं, तब उसका उपयोग सामाजिक कार्यों में भी करना हमारा कर्तव्य हो जाता है। लेकिन यदि उसके उपयोग के समय कोई अन्य व्यक्ति आकर उसका हरण करता है, तब यह हमारे उपयोग के अधिकार’ की हत्या है। अतः समाज ऐसे व्यक्ति को दंडित करता है। तात्पर्य यह कि इसी नागरिकता के बल से हम जीवन के मूल को प्राप्त कर पाते हैं।

आदर्श नागरिक ही समाज एवं राष्ट्र के भौतिक तथा आत्मिक उत्कर्ष के आधार-स्तंभ होते हैं। यदि वे अपने कर्तव्य और अधिकारों का अनुसरण करते हैं, तो शीघ्र ही देश उन्नति के शिखर पर पहुंच जाता है। इनके अनुचित प्रयोग से उसे अवनति के गर्त में गिरते देर नहीं लगती। मानवता का कहीं कोई निट नहीं रह जाता फिर उन्नयन कैसा? अतः आदर्श नागरिक ही समाज एवं देश के प्राण होते हैं। आदर्श नागरिक में इसीलिए कुछ अपेक्षित हैं। प्रथमतः उसे ईमानदार होगा। वह ईमानदार होगा, तभी दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर सकेगा।

आदर्श नागरिक के तीन गुण हैं-चमत्कार, सहानुभूति और आत्मसंयम। चमत्कार उसकी विचार शक्ति और विवेक का परिणाम है। सहानुभूति पारस्परिक स्नेह का हेतु हे और आत्मसंयम, लोभ, क्रोध और द्वेष आदि कुप्रवृत्तियों पर रोक को लगाना है। इन तीन गुणों के रहते हुए भी आदर्श नागरिक का सुशिक्षित, सुसभ्य और सुगठित देहधारी होना आवश्यक है।

जीवन में अधिकार और कर्तव्य का अटूट संबंध है। जहां एक ओर अधिकार होता है, वहीं दूसरी ओर कर्तव्य भी आवश्यक होता है। जहां हम अपने अधिकार की मांग करते हैं। वही दूसरे के अधिकार की रक्षा करना भी हमारा कर्तव्य है। हमारे संविधान दो प्रकार के अधिकार प्रदान करते हैं-

  1. सामाजिक अधिकार,
  2. राजनीतिक अधिकार।

डॉ. अंबेडकर ने कहा था, “सारी सामाजिक प्रगति राजनीतिक सत्ता पर निर्भर करती है। राजनीतिक सत्ता सामाजिक प्रगति का घर है। यदि इसकी गहराई में जाकर विचार करे तों।”

सामाजिक अधिकार में पहला अधिकार समाज में जीवित रहने का अधिकार है। राज्य प्रत्येक नागरिक के निर्भय जीवन का दायित्व इसी कारण अपने ऊपर लेता है। इसी के अंतर्गत हमारा समानता का अधिकार आता है। चूंकि मानव यहां सुख-दुख की बात दूसरों को सुनाने के लिए उत्कंठित रहता है। अतः उसे विचाराभिव्यक्ति का अधिकार होता है। नागरिकों को कानून सम्मत व्यवसाय करने का पूर्ण अधिकार है। यदि कोई इन अधिकारों से वंचित करता है, तो कानून उसे दंडित करेगा। राजनीतिक अधिकार के अंतर्गत व्यक्ति को 18 वर्ष की आयु के पश्चात् मताधिकार प्राप्त होता है।

मानव स्वभावतः सुविधा भोगी का आदी होता है और कष्टों से दूर रहना चाहता है। लेकिन कर्तव्य पालन उसे कष्टकर होता है। फिर भी जीवन का सार-रूप इन दोनों के सम्मिश्रण में ही हैं और मूल बात तो यह है कि एक के बिना दूसरे की स्थिति ही संभव है। जहां कर्तव्य पालन से अधिकार का स्वरूप मिलता है वहां अधिकार प्राप्त कर कर्तव्य की भावना स्वयं जागृत होती है।

सच्चे नागरिक का सर्वोपरि कर्तव्य अपने राष्ट्र और राष्ट्रवासी की रक्षा करना है। संकट काल में देशवासियों की सहायता करना हमारा कर्तव्य हैं। अपने सुख-सुविधाओं के बदले अनेक करों का समय पर भुगतान आवश्यक है। कानून के बनाए नियमों का पालन करना हमारा कर्तव्य है। उसकी अवज्ञा से देश की एकता विच्छिन्न हो जाने की संभावना है। इसके अतिरिक्त परस्पर एक-दूसरे अधिकारों की पूर्ण जानकारी और पुनः उसकी रक्षा तथा समाज और राष्ट्रोत्थान के लिए प्रयत्नशील रहा अच्छे नागरिक के कर्तव्य है। पारस्परिक सहयोग की भावना से सुख-शांतिसमृद्धि आती है। अतः सद्भावना और एकजुटता हमारे कर्तव्य होनी चाहिए। इसमें राष्ट्र का विकास और हित छिपा है।

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