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Saccha Dharm aur Manavta “सच्चा धर्म और मानवता” Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 and Graduate Students.

सच्चा धर्म और मानवता

Saccha Dharm aur Manavta

मानव इतिहास की विशेष तौर पर एक दुःखदायी वास्तविकता यह है कि संघर्ष धर्म के नाम पर ही हुए हैं। आज भी धर्म के दुरूपयोग, धर्मान्धता और घणा को बढ़ावा देने के परिणामस्वरूप लोग मारे जाते हैं, उनके समुदायों का विध्वंस किया जाता है और समाजों को विखंडित किया जाता है।

 

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समकालीन विश्व की समस्यायें और संत्रास किसी न किसी रूप में धर्म से जुड़े हुए हैं। अधिकतर देशों में एक ही धर्म के विभिन्न मतावलंबियों अथवा विभिन्न धर्मों के प्रचारकों के मध्य संघर्षों से समाज का सामाजिक ढांचा छिन्न-भिन्न हो रहा है। विश्व भर में दसों, हजारों और लाखों निर्दोषों को मारने के पश्चात इसे न्यायसंगत ठहराने के लिए किसी एक अथवा अन्य धर्म के नाम का सहारा लिया जाता है। हमें सभ्य विश्व के संपूर्ण इतिहास में किए गए ऐसे ही नरसंहार देखने को मिलते है। यह कहना न्याय संगत नहीं होगा कि इस प्रकार का ऐसा दुरूपयोग केवल किसी भी एक धर्म के अनुयायियों तक ही सीमित है; वरन् सभी तथाकथित धार्मिक अनुयायी दोषी हैं। बहुत से लोग धर्म के नाम में किए जाने वाले इन संघर्षों को न्याय संगत ठहराने के लिए तर्क वितर्क और प्रयास करेंगे। हरेक व्यक्ति सभी धर्मों की इस आधारभूत शिक्षा को भूल चुका है- “तुम्हें किसी की हत्या नहीं करनी चाहिए।”

 

धर्म एक शक्तिशाली हथियार है और जो लोग तबाही फैलाना चाहता है अथवा लोगों को उत्पीड़ित करना चाहते है, वे इसे इस्तेमाल करने के अत्यधिक इच्छुक होते हैं। प्रायः वे इन मतों को अपनी इच्छानुसार ही ढाल देते हैं और धर्म को अपने स्वयं के हितों की पूर्ति के माध्यम के रूप में प्रयुक्त करते हैं। विभिन्न धर्मों के अनुयायी अपने धर्म का सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते हैं तथा इसे चेतना की सर्वोच्च स्थिति प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग मानते हैं, उन्होंने अपने धर्मों को अन्य रूपों के साथ-साथ विभिन्न रूपों में परिभाषित किया है, जैसे कि ईश्वर के साथ एकाकार होना, स्वर्ग का मार्ग सुगम बनाना, निर्वाण प्राप्त करना अथवा मोक्ष प्राप्त करना। यह जार्ज आवेल के एनीमल फार्म में से लिया गया एक उत्कृष्ट परिदृश्य है। सभी व्यक्ति एक समान होते हैं परन्तु कुछ व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की तुलना में कुछ ज्यादा ही एक समान होते हैं। सभी कारण न्याय संगत होते हैं परन्तु कुछ कारण अन्य कारणों की अपेक्षा कुछ अधिक न्याय संगत होते हैं। सभी धर्म एक समान होते हैं, किंतु कुछ धर्म अन्य धर्मों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही एक समान होते है।

 

सच्चे धर्म द्वारा कभी भी आतंकवाद जैसी घृणित विषयवस्तु को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है। इसका एक धार्मिक परिदृश्य होने और इसके द्वारा सभ्यताओं के मध्य संघर्ष उत्पन्न कराने की चर्चा समान रूप से ही मिथ्या है। हाल ही के वर्षों में जेहाद को आतंकवाद के रूप में धार्मिक उद्देश्यों की अपेक्षा अधिकतर राजनैतिक उद्देश्यों के लिए जानबूझकर इस्तेमाल किया गया है जिसके परिणाम स्वरूप संपूर्ण विश्व में व्यापक चिन्ता व्याप्त है। आतंकवाद की पहचान किसी भी धर्म विशेष के रूप में करना पूर्णतया अनुचित है। कोई भी धर्म घृणा का प्रचार नहीं करता अथवा न ही यह मासूम मानव मात्रों की हत्या की अनुमति देता है। स्वयं आतंकवादियों और उनके समर्थकों को ही धर्म के बारे में उत्पन्न किसी भी गलत धारणा के लिए उत्तरदायी ठहरया जाना चाहिए, जिसके (धर्म के) महान लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वे मिथ्या दावा करते हैं। वास्तव में विभिन्न धर्मों के मध्य संघर्षों और एक संप्रदाय द्वारा दूसरे संप्रदाय के लोगों के प्रति आतंकवादी गतिविधियों द्वारा स्वतः यह प्रदर्शित होता है कि धर्म और उनके मतावलंबी एकाश्म सत्व नहीं है। विश्व में लगभग प्रत्येक धर्म बहुवादिता और विभिन्नता द्वारा अभिलक्षित होता है। पोप ने इन शब्दों के साथ धर्म के नाम पर हिंसा की निंदा की-“धर्म के नाम पर हिंसा और संघर्ष को बढ़ावा देना ईश्वर के प्रति भयंकर अन्तर्विरोध और भयंकर अपराध है।” चर्च, मन्दिरों और मस्जिदों का धर्म लोगों को इसलिए सच्ची शिक्षाओं से दूर रखता है जिससे कि वे अपने धार्मिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों की ऐसी बाहरी बैसाखियों पर अधिकाधिक भरोसा कर सकें जिन्हें पापों के प्रायश्चित के लिए आवश्यक समझा जाता है। धर्म ने जीने की राह, जैसा कि इसे होना चाहिए, होने की बजाए, कर्मकाण्डों का रूप धारण कर लिया है। असगर अली इंजीनियर ने यह उल्लेख किया है कि दाउदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में धर्म कैसे मुल्लाओं के नियंत्रण के कारण तुच्छ वस्तु बन गया है। उन्होंने इस समुदाय पर पूर्ण तानाशही थोप दी है और वे लोगों से बड़ी धनराशि ऐंठ लेते हैं। इस धनराशि का कुछ भाग राजनैतिक प्रभाव जमाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिसके द्वारा आम बोहरा समुदाय को और अधिक आतंकित किया जाता है। उनके साथ गुलामों की तरह बर्ताव किया जाता है और उन्हें अपने निकाह के आमंत्रण पत्रों पर भी स्वयं को आबदे-सायेदाय (बड़े मुल्लाओं के गुलाम) के रूप में ही वर्णित करना पड़ता है। यदि पत्र में इसका उल्लेख नहीं किया जाए तो निकाह रोक दिया जाता है और बोहरा मुस्लिमों को उस परिवार का बायकाट करने के लिए कहा जाता है। हिन्दु धर्म में भी कर्मकाण्डों पर अपेक्षाकृत अधिक बल देना और मंदिरों पर ऊंची जातियों के लोगों का एकाधिकार तथा नीची जातियों का बहिष्कार, धर्म के सत्व के पतन में सहायक सिद्ध हुआ है।

 

धर्म एक ऐसा संयोजक बल है जो मानव संघटन के प्रत्येक पहलू को एकीकृत कर सकता है तथा प्रत्येक मनुष्य को उसके सहकर्मियों तथा उसके आस-पास की समस्त प्रकृति के साथ एकीकृत कर सकता है। सच्चे धर्म के बगैर कोई संतोषजनक मानव जीवन, अनुभूति तथा विचार नहीं हो सकते हैं। सच्चा धर्म खुद के एवं अन्यों के साथ शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व स्थापित करने की जननी है। विश्व के प्रमुख धर्मों से लिए गए कुछ चुनिंदा उद्धरण इसके स्पष्ट साक्ष्य हैं।

बहाई

 

“सुखी वह है जो अपने से अधिक अपने भाई को तरजीह देता है।” – बहाउल्लाह, टैबलैट्स आफ बहाउल्लला,71

 

बौद्ध धर्म

“दूसरों के प्रति ऐसा कोई भी कार्य करके ठेस न पहुंचाए जिससे स्वयं आप को भी ठेस लगती है।” – उदाना वर्गा, 5:18

ईसाई धर्म

“जैसे बर्ताव की आप स्वयं से अपेक्षा करते हैं वैसा ही बर्ताव आप दूसरों के साथ करें।” – यीशु, मैथ्यू 7:12

कन्फ्यूशियसवाद

“दूसरों के साथ ऐसा ही व्यवहार करें जैसे व्यवहार की आप स्वयं अपेक्षा करते है।” – एनालेक्टस 15:23

हिन्दू धर्म

यह कर्तव्यों का सार है: दूसरों के साथ ऐसा कुछ न करो जिसे आप के साथ करने पर आपको दर्द हो। –महाभारत 5:1517

 

 

इस्लाम

“आप में से कोई भी तब तक धर्मानुयायी नहीं है जब तक वह अपने भाई के लिए उस चीज की कामना न करता हो जिसकी कामना वह स्वयं के लिए करता है।” – सुन्नाह

जैन धर्म

“सुख और दुख, हर्ष और विषाद में हमें सभी जीवों का उसी तरह सम्मान करना चाहिए जैसा सम्मान हम स्वयं के साथ चाहते हैं।”- भगवान महावीर, 24 वें तीर्थंकर

यहूदी धर्म

‘आपके लिए जो भी घृणात्मक है उसे अन्य के साथ नहीं करो। यहीं विधान है, शेष टिप्पणी ही टाल्मुड शब्द 31

 

अमेरिकी निवासी

“सभी जीवित प्राणियों का सम्मान करना ही धर्म की आधारशिला है।” – दी ग्रेट ला आफ पीस

सिक्ख धर्म

‘किसी के साथ भी शत्रुता न करें क्योंकि सभी प्राणियों में ईश्वर होता है’ –गुरू अर्जुन देव जी 259, गुरू ग्रंथ साहिब

पारसी धर्म

प्रकृति तभी अच्छी है जब दूसरों के साथ यह कुछ ऐसा-वैसा नहीं करती है जो खुद इसके लिए उचित नहीं होता।-दादीस्तान-ए-दिनिक, 94:5

 

प्रत्येक धर्म की उत्पत्ति मानव समाजों की आवश्यकतानुसार हुई ताकि वे संगठित और एकीकृत हो सके तथा मौजूदा धार्मिक मतों और रीति रिवाजों की बेड़ियों को तोड़कर उनसे छुटकारा पा सकें। इसका मुख्य उद्देश्य बड़े-बड़े पुरोहित वर्गों द्वारा मौजूदा धार्मिक मतों के बारे में प्रचारित भ्रान्तियों को दूर करके सत्य को सामने लाना था; परन्तु यह खेदजनक है कि समय के साथ ही प्रत्येक धर्म उन्हीं बुराइयों का शिकार हो गया जिन्हें सुधारने का इसने बीड़ा उठाया था। मानव की इतिहास को दोहराने की नियति रही है, यह एक ऐसी उक्ति है जो यह वर्णित करते हुए युक्तिसंगत प्रतीत होती है कि किस तरह प्रत्येक धर्म की नियति उन बुराइयों को दोहराते हुए प्रतीत होती हैं जिनसे से छुटकारा पाना चाहते थे। काश हम धर्म के संबंध में वर्षों से चले आ रहे भ्रष्टाचार की सहज सच्चाई को मात्र महसूस कर सकते और इस बात पर ध्यान संकेन्द्रित कर सकते कि असलियत में धर्म का क्या उद्देश्य है। ये सच्चाइयां सभी धर्मों में समाहित हैं, और उन्हें जीवन में आत्मसात किए जाने की आवश्यकता है। निम्नलिखित उद्धरण इसे पर्याप्त रूप से सुस्पष्ट करता है और समझने में सहज बनाता है।

 

“किसी भी चीज पर केवल इसलिए सहज ही विश्वास न करें कि यह आपने सुना है। केवल इसलिए सहज ही विश्वास न करें कि यह कई पीढ़ियों से चली आ रही है। किसी भी चीज पर केवल इसलिए सहज ही विश्वास न करें कि यह कइयों द्वारा बोली जाती है और इसकी अफवाह उड़ाई जाती है। किसी भी चीज पर केवल इसलिए सहज ही विश्वास न करें कि यह पवित्र ग्रन्थों में लिखी गई है। किसी भी चीज पर केवल शिक्षकों, बड़ों अथवा विद्वान लोगों के कहने पर सहज ही विश्वास न करें। केवल सावधानीपूर्वक प्रेक्षण तथा विश्लेषण के बाद ही किसी भी चीज पर तब विश्वास करें जब आपको ऐसा प्रतीत हो कि यह तर्क के अनुरूप है और सभी के हित एवं लाभ के अनुकूल है। इसके बाद इसे स्वीकार करें तथा इसके अनुसार कार्य करें।”

 

द बुद्धा आन बिलीफ- कलाम सुत्त से उद्धृत’

 

धर्म का उद्देश्य संघर्षों को टालना है न कि नए संघर्षों को जन्म देना। किन्तु यदि वर्तमान युग का मानव अपने धर्म के विषय में मात्र और चिंतन करे और इसका गहनता से अध्ययन करें तो वे निश्चित रूप से वर्तमान युग के ऐसे धार्मिक गुरूओं, जो वास्तव में कहीं ज्यादा राजनैतिक गुरू हैं, द्वारा दिए गए निरे धर्मोपदेशों के आवेग में नहीं बहेंगें। अज्ञानता के कारण ही हम उन लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं जो मामूली अथवा अत्यधिक अहम के वास्ते धर्म का दुरूपयोग करते हैं।

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