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Mahapurush ki Jeevani Mahatma Gandhi “महापुरुष की जीवनी – महात्मा गाँधी ” Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech.

महापुरुष की जीवनी – महात्मा गाँधी

 

2 अक्टूबर को सारे देश में गाँधी जयंती मनाई जाती है। इसी दिन सन 1880 को गुजरात प्रदेश के पोरबंदर नामक स्थान पर मोहनदास करमचंद गाँधी का जर हुआ था। गाँधीजी के पिताजी का नाम करमचंद गाँधी तथा माताजी का नाम पुतली बाई था। उनके पिता पोरबंदर के दीवान थे। उनकी माताजी धार्मिक विचारों युक्त ममतालु तथा सद्विचारों को मानने वाली महिला थीं।

गाँधीजी की प्राथमिक शिक्षा पोरबंदर में हुई थी। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा राजकोट से उत्तीर्ण की। 18 वर्ष की आयु में बैरिस्ट्री की शिक्षा पाने के लिए वे इंग्लैंड गये।

इंग्लैंड से बैरिस्ट्री की परीक्षा पास कर गाँधीजी भारत आये। प्रारंभ में वे बहुत संकोची स्वभाव के थे। साथ ही वे सच्चे एवं सीधे सादे थे। सच्चाई, ईमानदारी, संकोची स्वभाव से काम करने के कारण उन्हें भारत में वकालत के काम में सफलता नहीं मिली। इसी समय वे एक भारतीय व्यापारी के आग्रह पर एक मुकदमे की पैरवी करने दक्षिण अफ्रीका गये।

दक्षिण अफ्रीका में भारत के लोगों की अपमानजनक स्थिति को देखकर उन्हें गहरी पीड़ा पहुँची। उन्होंने इस अपमान से मुक्ति पाने के लिए तथा वहाँ के लोगों को मानवोचित अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया। इस संघर्षपूर्ण कार्य में उन्होंने कठिन चुनौतियों एवं कष्टों का सामना करना पड़ा। अंत में उन्हें सफलता मिली। इसी कारण सारी दुनिया में उनके कार्यों की प्रशंसा होने लगी।

सन् 1915 में गाँधीजी भारत लौटे। भारत में अंग्रेजों के शासन में भीषण अत्याचार तथा शोषण का बोलबाला था। इन अत्याचारों से देशवासियों को मुक्ति दिलाने का उन्होंने संकल्प लिया।

गाँधीजी ने देशवासियों को जाग्रत करने के लिए असहयोग आंदोलन चलाया; सत्याग्रह और अहिंसा का प्रचार किया। इसके साथ ही उन्होंने देश की जनता को एक सूत्र में बाँधने के लिये अछूतोद्धार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वावलंबन, बुनियादी शिक्षा जैसे अनेक सामाजिक कार्य किये।

गाँधीजी जो कहते थे, वह करते भी थे। इसी कारण उनके प्रयासों से देश के सभी धर्म और जाति के लोगों में एकता स्थापित हुई। उनकी त्याग, तपस्या, नेका, मानवीयता, समानता की भावनाओं ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लोगों को प्रभावित किया। उनके नेतृत्व में 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। उन्हें देशवासियों ने राष्ट्रपिता का दर्जा दिया। प्रेम से उन्हें ‘बापू’ कहा जाने लगा।

ईविश 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे नामक व्यक्ति ने इस महान स्वतंत्रता सेनानी की गोली मारकर हत्या कर दी। उनकी मृत्यु से सारी दुनिया शोक से व्याकुल हो गई। गाँधीजी नहीं रहे, परंतु उनके द्वारा प्रचारित प्रेम, सद्भाव, सत्याग्रह, अहिंसा, समानता, मानवता, स्वावलंबन के संदेश हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गये।

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