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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Swadesh Prem”, ”स्वदेश प्रेम” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

स्वदेश प्रेम

Swadesh Prem

 

 

 जहां जन्म देता हमें है विधाता,

उसी ठौर में चित्त है मोद पाता।

 

हमारी मातृभूमि ही हमारा स्वदेश कहलाता है। जो सम्बंध एक पुत्रका माता से होता वही देश वासियों का मातृभूमि से होता है। स्वदेश हमारी माता है। जो भावनाएं माता के प्रति पुत्र की होती है। वहीं देश वासियों की स्वदेश के लिए होती है।

दूसरे की माता कितनी ही सुन्दर हो पर अपनी कुरूप माता ही। हमारे सम्मान तथा प्रेम की अधिकारिणी होती है। प्रायः सभी लोगों को अपने देश से प्रेम होता है। वे अपने देश को सदा सम्पन्न और उन्नत देखना चाहते हैं। जिस प्रकार अपनी माता को कष्ट और संकट में पड़ा देखकर पुत्र उसकी सभी प्रकार से सेवा और सहायता कर के अपना कर्तव्य पूरा करता है, उसी प्रकार देशवासी भी देश पर संकट आया देख उसकी रक्षा में अपना तन मन धन लगा देते हैं।

स्वदेश क्या है? यहाँ की मिट्टी नहीं, यहां के निवासी, प्रकृति, वनस्पतियाँ, नदियाँ और पर्वत सभी मिलकर स्वदेश कहलाते हैं। सभी के प्रयत्न करना ही देश प्रेम है। भारतवासियों को अपना समझकर बन्धुत्व की भावना से उनकी उन्नति देश पर बाहरी आक्रमण के समय सभी भारतीय एक जुट होकर उसकी रक्षा करें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो जिस प्रकार सहायता कर सकता है करे तो यही स्वदेश प्रेम होगा। धनवान धन से, विज्ञान विचारों से शक्तिवान शरीर से लड़कर, वैज्ञानिक आयुधों के नवीनीकरण से – ऐसे संकट में सहायता कर अपने देश प्रेम को प्रकट कर सकते हैं।

कुछ वर्षों पूर्व तक भारत परतंत्र था। स्वदेश प्रेम की भावना से उसे स्वतंत्र कराने के लिए कितने महापुरुषों ने बलिदान दिया, संकट सहे, जेलों में रहे, पर स्वदेश प्रेम का व्रत नहीं छोड़ा। भगतसिंह ने देश के अपमान का बदला लेने के लिए अदालत में बम फेंका।। स्वयं फाँसी पर चढ़कर स्वदेश प्रेम का उदाहरण बनाया। झाँसी की रानी देश का अपमान न सह सकी। अंग्रेजों से लड़ती लड़ती वह शहीद हो गई। नेता जी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द सेना बनाकर देश के शत्रुओं का सामना किया। वे सभी स्वदेश प्रेम के उदाहरण हैं। उनका त्याग या बलिदान किसके लिए था? केवल अपने आदर्षों को विश्व में सम्मान से जीवन बिताने योग्य बनाने के लिए ही न! ।

स्वतंत्रता संग्राम में हमारे देश के कितने ही महा पुरुष एवं नवयुवक प्राणों की चिन्ता न करते हुए कूद पड़े। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरू आदि अपने सुख-सुविधाओं को छोड़कर स्वदेश के लिए ही जेलों में रहे। वह समय आदर्शों का था। आज हमारे देश में देश प्रेम की भावना का ह्रास होना प्रारंभ हो गया है।

हम देखते हैं कि देश के अनेकों प्रतिभाशाली विद्यार्थी जिन्हें देश छात्रवृत्तियाँ देकर उच्च शिक्षा दिलाता है, देश का उपकार न मान कर विदेश चले जाते हैं। वे अपना स्वार्थ देखते हैं। उनमें स्वदेश प्रेम की भावना नहीं पायी जाती। जिस देश ने उनको साधन उपलब्ध कराके इस योग्य बनाया कि देश की कुछ सेवाकर सके, उसे वे प्रायः विस्मृत.ही कर देते हैं। विदेशों में उन्हें देश की याद भी नहीं आती।

ऐसे डाक्टरों और इंजीनियरों की संख्या कम नहीं है। देश प्रेम का तकाजा है कि ऐसे लोग स्वदेश की सेवाकर देश को उन्नत बनाएं।

आज के सामाजिक भष्टाचार ने देश प्रेमियों से अधिक देश द्रोहियों को उत्पन्न किया है। जिस देश में देश द्रोहियों की संख्या बढ़ती है। वह रसातल को चला जाता है। परतंत्रता में जकड़ जाता है। आए दिन हम सुनते हैं कि अमुक भारतीय ने किसी विदेशी को सेना के गुप्त दस्तावेजों को बेचा। कभी कभी ऐसे लोग पकड़े भी जाते हैं। देश द्रोह का दण्ड अत्यंत कठोर होना चाहिए। धन के लालच ने चरित्र का हनन कर रखा है।

इतिहास साक्षी है कि देश पर विपत्ति लाने में देश द्रोही किस प्रकार सहायक रहे हैं। कितने आम्भीक और जयचंद्र भारत में विदेशियों को बुलाकर देश को हानि पहुँचाने में सहायक रहे हैं। उनका देश द्रोह देश को किस अधोगति में पहुँचा चुका है। उनकी करनी के फल से छुटकारा पाने के लिए कितने ही देशभक्त, देश प्रेमियों का देश को बलिदान देना पड़ा।

देश की उन्नति में बाधक बनना भी देश द्रोह कहलाता है। देश में अकारण हड़ताले, तालाबंदी, आंदोलन, घिराव आदि जिनसे आर्थिक हानि होती है वह देश द्रोह ही कहलायगा। सरकारी नियमों का उल्लंघन कर आर्थिक अपराध किए जारहे हैं। बड़ी बड़ी कम्पनियाँ, व्यापारिक घराने करों की चोरी करके धोखा धड़ी द्वारा देश को हानि पहुँचा रहे हैं। इसका कारण उनमें स्वदेश प्रेम का अभाव है। देश को हानि पहुँचा कर स्वार्थसाधन देश द्रोह की कोटि में ही आता है।

यदि हमें देश के उन्नत गौरवशाली और सशक्त बनाना है तो प्रत्येक भारतवासी को स्वदेश प्रेम का आदर्श स्थापित करना चाहिए।

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