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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Stri Sashaktikaran”, “स्त्री सशक्तीकरण” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

स्त्री सशक्तीकरण

Stri Sashaktikaran

 

स्त्री और पुरुष दोनों ही समाज के महत्वपूर्ण सहभागी हैं। किसी एक के अभाव से समाज के अस्तित्व की कल्पना संभव नहीं। हम इसे मोटे तौर पर कह सकते हैं कि स्त्री पुरुष गाड़ी के वो दो पहिए होते हैं जिसमें से किसी एक में भी अगर कोई कमी रह जाए तो गाड़ी नहीं चल सकती है। इसी कारण हमारे देश में पहले से ही नारी को बहुत ऊंचा तथा सम्मानजनक स्थान दिया गया।

परिवर्तन तो संसार का नियम है। समय भी परिवर्तनशील है। धीरे धीरे समय के साथ मानव की सोच में भी बदलाव आया। देवी जिसे माता के रूप में सिंहासन पर बैठाया गया था अब उस नारी को सिर्फ घर की शोभा बढ़ाने वाला सामान समझा जा रहा है। भारत में 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नारी जागरण का प्रारंभ हुआ था।

राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी आदि जैसे कई समाज सुधारकों ने नारी को कठोर बंधन से मुक्त करवाने और शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण अधिकारी बनाने के लिए कई आंदोलन किए।

माना जाता है कि नारी जागरण आंदोलनों को पश्चिमी देशों से भी प्रेरणा मिली। जिसके साथ ही स्त्री-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर समाज तथा देश के विकास के लिए प्रभावकारी भूमिका निभाने का प्रयास किया जिस कारण रूढ़िबद्ध जीवन को तिलांजलि दे वह नवयुग का आह्वन कर सकें।

इतिहास कहता है कि देश को स्वतंत्र कराने में स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं है। नारी जीवन संघर्ष से भरा पड़ा है। नारी के कई रूप हैं। आज के युग में नारी हर वह स्थान तक पहुँच चुकी हैं जहाँ की कभी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने का गौरव श्रीमती प्रतिभा पाटिल को प्राप्त है। राजनीति ही में नहीं नारी उच्च शिक्षा प्राप्त कर परीक्षाओं में अपनी योग्यता दिखाकर आज पुलिस, सेना, इंजीनियरिंग, विज्ञान, लेखन, एयर होस्टेस, समाज सेविका इत्यादि सभी क्षेत्रों में प्रभावशाली काम कर रही हैं।

शिक्षा ने नारी को सोचने समझने की शक्ति प्रदान की। जिस कारण उसका बुद्धि विवेक जाग उठा। उसने अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों पर विजय प्राप्त करना आरंभ कर दिया।

केवल अपने परिवार के बारे में अब तक सोचने वाली नारी, आज अपने और अपने देश के बारे में भी सोचने लगी है। जिससे केवल उसके परिवार की ही उन्नति नहीं हुई बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व की भी उन्नति साथ ही में हुई।

कामकाजी महिलाओं का आत्मविश्वास जागृत होता है, उसके सोचने समझने का दृष्टिकोण विस्तृत हो जाता है। नौकरी करके वह अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में भी सुधार ला देती है। क्योंकि आजकल के इस महंगाई के दौर पर सिर्फ एक आमदानी पर रहना संभव नहीं।

पर जहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए फायदे हैं वहीं पर कुछ नुक़सान भी हैं। जैसे कि- कामकाजी महिलाएँ (माताएँ) अपने बच्चों को नौकरों के भरोसे या फिर शिशुगृहों में छोड़कर अपने कार्य में लग जाती हैं। नौकरों के हाथों पले बच्चों में वह संस्कार नहीं आ पाते जो माता पिता देना चाहते हैं।

हाल ही के सर्वेक्षण से पता चला है कि कामकाजी महिलाओं में अहम भाव जागृत हो जाता है तो उनके परिवार टूटने लगते हैं। यौन उत्पीड़न भी समाज का एक अनोखा रूप है।

आज के समय की यह माँग है कि नारी नौकरी भी करे और मूहणी का उत्तरदायित्व भी पूर्णरूप से निभाए। पर यह तभी संभव है जब स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर घरेलु, बाहरी कार्यों में एक दूसरे को सहयोग दें। दोनों आपस में बैठकर अपनी अपनी समस्याओं के समाधान तलाशें।।

भारतीय नारी हो या विश्व के किसी भी कोने की नारी, कामकाजी जीवन उसके जीवन के विकास, व्यक्तित्व में निखार लाने के लिए है, न कि अपने परिवार को समाप्त करने के लिए।

नारी को नौकरी के साथ साथ क्षमता, ममता, धैर्य, विनम्रता आदि का अपना मौलिक स्वरूप बनाए रखना है। उसे परिवार व अपने कामकाजी जीवन का संतुलन बनाए रखना है। तभी उसका, उसके परिवार का, उसके देश का विकास संभव है।

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