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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Mera Priya Neta”, ”मेरा प्रिय नेता” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

मेरा प्रिय नेता

Mera Priya Neta

निबंध नंबर :- 01 

राजेन्द्रबाबू को मैने 1947 से जाना, जब वे कुछ दिन क लिए वर्धा आए थे। उस समय से हमारा परिचय और सम्बन्ध बढ़ता ही गया। धीरे धीरे मै उनके परिवार का सदस्य ही नही बेटी बन गई। जब वे वर्धा आए तब मेरा बच्चा केवल एक डेढ़ वर्ष का था। बाबूजी नित्य उसे पलंग पर बैठाकर साथ ही नाश्ता करते। उनकी इस कृति में मैने उनके सहज बालप्रेम का परिचय पाया, कभी कभी ऐसा भी होता कि वह स्वयं ही उनके पास पहुँच जाता और उनकी पीठ पर चढ़कर घोडे का खेल खेलने लगता। बाबू जी को दमा था, इसलिए हम उसे हटाने के प्रयत्न करते। पर वे उसे कभी न हटाते और कहते, “खेलने दो।”

आगे चलकर जब वे राष्ट्रपति बने तो मैंने राष्ट्रपति भवन में भी यही दृश्य देखा। बाबू जी कितने ही काम में व्यस्त क्यों न हों यदि उनकी पोतियों के नन्हें बच्चे उनके पास आते तो वे उन्हें अपने पास बिठा लेते और उनके साथ खेलते। इतना ही नही कई बार स्टाफ के व्यक्ति भी अपने बच्चों को बाबूजी की गोद में रख देते। बाबूजी बडी खुशी और आनंद के साथ उन्हें खिलाते, प्यार करते और आशीर्वाद देते। काम करते हुए भी बच्चे उनके कमरे में कितना भी शोर करें कुछ भी बिगाडे, कुछ भी छुएं उनके मुंह से कड़ा शब्द नहीं निकलता था।

बच्चों का तो क्या? वे बड़ों का भी दिल नही दुखाते थे। मुझे याद आता है कि एक बार जब वे बहुत बीमार हुए तो उनकी दिन चर्या में रहने वाली एक नर्स उनसे दूध पीने की आग्रह कर रही थी। बाबूजी की तनिक भी इच्छा नहीं थी। जब उसने हाथ मे लेकर कप उनकी ओर बढाया तब वे खीझ उठे। जोर से कप हटा दिया। तब उन्होंने इतना ही कहा था कि “इच्छा नहीं तो क्यों पिलाती हो?’ कुछ समय बाद वे बडे दुखी हुए। कहने लगे- “आजकल हमें न जाने क्या हो गया है, इस पर बिगड़ पडे।” उनकी आत्माको तभी शान्ति मिली जब उन्होंने नर्स से क्षमा मांग ली। इतनी छोटी सी बात उनके हृदय की कोमलता का परिचय देती है।

सदबाब बड़े समदर्शी थे। छोटे-बडे, धनवान-गरीब सब उनके बराबर थे। कई बार देखा गया कि जिस प्रकार अपने परिवार के किसी सदस्य के बीमार पड़ने पर वे व्याकुल हो जाते थे, उसी प्रकार अपने चपरासी और कर्मचारी अथवा उनके परिवार के किसी सदस्य की बीमारी से व्यथित हो उठते थे। कई बार उनसे वे पूछताछ करते थे। रुपए पैसे से भी उनकी सहायता करते थे। अपने नौकरों के प्रति उनका यह व्यवहार कितना मानवीय था?

वास्तव में अपने जीवन में उन्होने छोटे-बडे का भेद नहीं किया। अपनी पोती की शादी में उन्होने चपरासी से लेकर बड़े अफसरों तक को एक ही पंगत बैठाकर भोज दिया। उन्ही के बीच नीचे आसन पर बैठ उन्होने स्वयं भी खाना खाया। वे कभी-कभी कहा करते थे”हमें ऐसा लगता ही नहीं कि हम राष्ट्रपति हैं और अमुक छोटा है, अमुक बडा”। उनकी अहंकार शून्यता की यह पराकाष्ठा थी।

राजेन्द्रबाबू जैसे निरभिमानी थे, वैसे ही ईमानदार भी। जीवन की छोटी छोटी बातों में भी वे इसका ध्यान रखते थे। उन्होंने अपने निजी सहायक से एक पत्र लिखाया- “अमुक व्यक्ति को मैंने पत्र लिख दिया है।” उस व्यक्ति का पत्र भी तभी लिखा गया था। बाबूजी ने निजी सहायक से कहा- “पहले उस पत्र को डाक मे डाल देना, तब यह पत्र लिखना, नहीं तो ऐसा लिखना गलत होगा।” जब इतनी छोटी बातों में वे सच्चाई बरतते थे तब बडी बातें तो स्वयं सत्य बनकर उनके सामने आ जाती थी।

उनकी ईमानदारी की एक बहुत छोटी पर बहुत ऊँची बात हैएक बार उनके सैनिक सचिव एक हिसाब की अडचन लेकर उनके पास आए। उन्हें दो एक बातों या मदों के विषय में चिन्ता थी। वे नहीं समझ पा रहे थे कि उस खर्च को सरकारी व्यय में लिखें या व्यक्तिगत व्यय में?

बाबूजी ने उनकी समस्या सुलझाने में क्षण भर भी नहीं लगाया। उन्होंने हिसाब भी नहीं देखा। उन्होंने शंका का समाधान इस प्रकार किया- “जब कभी आपको शक हो वहाँ आप हमारे विरुद्ध निर्णय दीजिएं। अर्थात उस व्यय को सरकारी खर्चा में नहीं हमारे निजी व्यय में लिखिए। राष्ट्रपति और राजेन्द्रबाबू इन दो व्यक्तित्वों के समन्वय और ईमानदारी का इससे अच्छा क्या उदाहरण हो सकता है।”

इतने महान आदर्श एवं सदगुण इतने बड़े नेता में होने के कारण ही डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जो कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे, मेरे प्रिय नेता बने हुए है। सादा जीवन उच्च विचार उनके चरित्र पर पूर्ण रूप से चरितार्थ होती है।

निबंध नंबर :- 02

 

मेरा प्रिय नेता

Mera Priya Neta

भारत ने कई महान नेताओं को जन्म दिया। इसके स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास नेताओं से अटा पड़ा है। उन्होंने देश की तन-मन से सेवा की। उन्होंने अंग्रेज़ों से देश को स्वतंत्रता दिलवाने के लिए अपने जीवन बलिदान कर दिए। कइयों पर अत्याचार किए गए और कइयों को फांसी पर लटका दिया गया। उन्होंने वक्त रेत पर अपने कदमों के निशान छोड़े। मेरे प्रिय नेता हैं-महात्मा गांधी।

महात्मा गांधी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ। अपनी स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद वे कानून की पढ़ाई करने के लिए विलायत चले गए। वहां से बैरिस्टर बन कर वे भारत लौटे। जब वे वापिस आए तो उन्हें दक्षिण अफ्रीका भेज दिया गया। अफ्रीका में उन्होंने देखा कि भारतीयों के साथ बहुत ही अमानवीय व्यवहार होता था। उन्हें स्वयं को कई बार अपमानित होना पड़ा। उन्होंने भारतीयों के सम्मान को बहाल रखने के लिए कई आंदोलन किए। वे भारत लौट आए और उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने का निर्णय लिया।

महात्मा गांधी ने अपने देश के लोगों को इकट्ठा करना शुरू किया। उन्होंने उन्हें देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने के लिए तैयार किया। उन्होंने सरकार के नियमों को तोड़ना शुरू किया। उन्होंने असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो जैसे आंदोलन शुरू किये। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जेल में बिताया। उन्होंने अहिंसा को एक हथियार के रूप में अपनाया।

महात्मा गांधी आम आदमी के सच्चे प्रतिनिधि थे। उन्होंने स्वयं आम आदमियों की तरह जीवन व्यतीत किया। उन्होंने गरीबों के मुद्दों को उठाया। हालांकि वे शारीरिक रूप से काफी कमज़ोर दिखाई देते थे लेकिन उनके भीतर एक मज़बूत आत्मा थी। वे एक दृढ़ इच्छा शक्ति के मालिक थे। अंग्रेज़ उनसे भयभीत थे। अंतत: वे अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रहे। अंग्रेजों को उनके आगे झुकना पड़ा। 1947 में वे सदा के लिए भारत से चले गए। दुर्भाग्य से 30 जनवरी, 1948 को उनकी गोली मार कर हत्या कर दी। गांधी जैसे लोग कभी नहीं मरते। वे लोगों के दिलों में सदा जिंदा रहते हैं। उन्हें उचित ही राष्ट्रपिता के रूप में याद किया जाता है।

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