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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Kamij ki Atmaktha”, ”कमीज़ की आत्मकथा” Complete Hindi Nibandh for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

कमीज़ की आत्मकथा

Kamij ki Atmaktha 

‘बहुत बढ़िया कमीज पहन रखी है आज तो।’ ‘वाह ! क्या शेड है शर्ट (कमीज) का। कहाँ से खरीदी? या फिर ‘क्या फिटिंग है…….. क्या सिलाई है……. क्या डिजाइन है। भई, कहाँ से सिलाई ?’ मुझे देख कर अक्सर चहक उठा करते हैं न आप? ऐसे-ऐसे या इसी तरह के प्रशंसात्मक वाक्य भी बोलने लगते हैं। जिस किसी ने मुझे पहन रखा होता है, अक्सर उस से इस तरह के प्रश्न करने लगते हैं और कई बार उस दर्जी का पता-ठिकाना भी पूछने लगते हैं कि जिसने मुझे सिला होता है। लेकिन क्या कभी यह जानने का भी प्रयास किया है कि इस सूरत में पहुँचने तक मुझे कहाँ-कहाँ और कैसी-कैसी कष्टपूर्ण स्थितियों में से गुजरना पड़ा है ? नहीं सुना न कभी ? क्या कहा, मैं खुद ही बता दूँ ? ठीक है..मैं स्वयं ही बता देती हूँ आप-बीती। जरा ध्यान से सुनिए.

बिनौला…अरे । चौंकिए मत । मेरी कहानी का आरम्भ बिनौले से ही होता है। आरम्भ से मैं किसी एक बिनौले में ही बन्द थी। अन्य बहुत सारे बिनौलों के साथ एक बोरे में एक दिन एक किसान आकर दुकानदार से वह बोरा खरीद कर ले गया और ले जाकर अपने घर के औसारे में पटक दिया। कई दिनों तक वह मेरे समीप रखे हल-पंजाली उठाता, बाहर बन्धे बैल खोलता और सूर्योदय से पहले ही खेतों की ओर चल देता। फिर एक दिन ऐसा सब करते समय मुझे भी साथ लेता गया और खेत के किनारे उगे पेड़ के नीचे साफ-सुथरी जगह पर खोल कर पटक दिया। कुछ देर बाद किसान की पत्नी न आकर हमें एक बडे-से झोले में भर लिया और पति के साथ जा खड़ी हुई जहाँ वह हल-जीतने के लिए उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। हल की नोंक के ऊपर एक टिन की बड़ी खुली-सी नली लगी थी। जैसे ही किसान ने बैलों को हाँका, उसकी पत्नी ने उस नली की राह हमें भीतर छोड़ना शुरू कर दिया। देखते-ही-देखते हम सभी बिनौले धरती की मिट्टी में मिलकर अपने भाग्य को कोसने लगे। कुछ देर बाद हल उतार, उसके स्थान पर सुहागा (एक भारी और कुछ चपटा लकड़ी का टुकड़ा) बाँध बैलों को फिर हाँक दिया। इस से खेत की मिट्टी के रोडे टूट गए, मिट्टी दब कर समतल हो गई और हमारे लिए साँस तक ले पाना कठिन हो गया अगली सुबह सरलता और ठंडक अनुभव होने पर लगा कि खेती की सिंचाई कर दी गई है।

इस प्रकार खुदाई, गुडाई, सिंचाई के क्रम ने एक बात तो हमारे अस्तित्व को पूरी तरह से मिट्टी में मिला दिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद लगा कि हमें नया जीवन मिल रहा है। हम कपास के पौधों के रूप में धरती से निकल बड़े हो रहे हैं। हमारी टहनियाँ पत्ते फूट रहे है। उन पर कुछ गोलाकार फल लग रहे हैं और एक दिन ऐसा आया कि फल फुट कर खेत की उजली-सी सफेद हँसी बन गए। हमें देख किसान फूला नहीं समा रहा था। अगली सुबह आकर औरतें उस सफेद हँसी यानि कपास को चुनकर किसान के घर ले गई। घर में ढेर लग जाने पर किसान ने उसे एक व्यापारी के हाथों बेच दिया। इस तरह तीसरे स्थान पर पहुँच हमें इस कुछ दिन फिर दम घोटू वातावरण में बन्द रहना पड़ा। लेकिन फिर एक दिन हमें ट्रकों में लाद कर कहीं और पहुँचा दिया गया। जब एक मशीन में पड़कर हमारे अंजर-पंजर अलग होने लगे, तब पता चला कि हमें किसी कारखाने में बेला जा रहा है। बेलने के बाद बिनौले तो अलग हो गए और अब हमें रूई कहा जाने लगा। फिर एक अन्य मशीन में डालने से हमारी कताई होने लगी। रूई से हम लोग ताँतों यानि धागे के गुच्छे बन गए। फिर पता नहीं कहाँ से कुछ बनावटी रेशे लाकर हमें उनके साथ मिला दिया गया और अब हमें ‘टेरिकॉट’ कह कर पुकारा जाने

अभी कहाँ खत्म हुई हमारे दुख की कहानी। फिर हमें खड्डी जैसी किसी मशीन पर चढ़ा कर हमारा एक-एक तार दूसरे से मिलाया जाने लगा। लगातार मिलाया जाता रहा और तब किसी ने कहा- वाह ! कितना बढ़िया कपड़ा तैयार हुआ इस बार। वहाँ से बाहर ला कर हमें धोया, फिर प्रेस कर के लपेट दिया गया। कुछ दिन वैसे ही पड़े रहने के बाद एक दिन हम फिर ट्रकों पर लाद कर बाजार में पहुँचे। कई बिचौलियों के हाथों से होते हुए एक दुकान पर अन्य कपड़ों के साथ लाकर सजा दिए गए। वहीं एक दिन एक दम्पत्ति आया। अन्य कई तरह के कपड़ों के साथ मुझे भी पसन्द किया। दुकानदार ने बेरहमी से कैंची चलाकर मुझे अपने साथियों से अलग काट कर मात्र एक कमीज का टुकड़ा बना दिया। मैंने समझा, चलो अब और कष्ट नहीं झेलने पड़ेंगे। पर कहाँ, अभी तो फिर से कट कर, सुई से अंग-अंग छिदना बाकी था। सो वह दम्पत्ति मुझे दर्जी की दुकान पर ले गया। दर्जी ने ध्यान से देखा, नापा और अपनी मेज पर एक तरफ पटक दिया।

नही, अभी भी कष्टो की कहानी समाप्त नहीं हुई थी। दर्ज ने कैंची उठाई और मेरे छोटे-बड़े कई टुकडे कर डाले। उसके बाद एक (सिलाई मशीन पर चढा कर ज्यो तेजी से सइयाँ चुभोनी शुरू की कि बस क्या कहूँ। अंग-अंग छिद कर साथ ही धागे से पिरोया भी जाता रहा। कुछ देर के कष्ट के बाद मैंने देखा कि मैं सुन्दर साँचे में दली एक कमीज बन चुकी हूँ, जिसकी आप सब लोग इतनी प्रशंसा कर रहे हैं। सच है लगातार कष्ट सहन कर के ही जीवन और व्यक्तित्व को एक सुन्दर-आकर्षक साँचे मेदाला जा सकता है। केवल बैठे रहने या बातें बनाते रहने से कुछ भी हो पाना संभव नही हुआ करता।

 

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