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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Jhansi Ki Rani”, “झांसी की रानी” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

झांसी की रानी

Jhansi Ki Rani

झांसी की रानी, लक्ष्मीबाई ऐसी विरांगना थी, जो भारतीय नारी के लिए  आदर्श बन गईं साथ ही 1857 में लड़े गए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अपने लहू से लिखा। वे अपनी वीरता व साहस के लिए जानी जाती थीं। हर भारतवासी के लिए उनका जीवन एक आदर्श है।

लक्ष्मीबाई का जन्म 1835 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपंत तथा माता का नाम भागीरथी था। लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनुबाई था जिसे प्यार से लोग सिर्फ मनु करकर पुकारते थे। छह वर्ष की अल्पायु में ही लक्ष्मीबाई मातृविहीन हो गईं। तदनंतर उनका लालन-पालन बाजीराव पेशवा के संरक्षण में हुआ। उन्होंने इन्हीं से व्यूह रचना, तीर चलाना, घुड़सवारी करना, युद्ध के गुर आदि सीखा।

सन् 1842 में मनुबाई का विवाह झांसी के अंतिम पेशवा राजा गंगाधर राव के साथ हुआ। विवाह के पश्चात् मनुबाई, लक्ष्मीबाई बन गईं। विवाह के बाद वह अपने राजा की सेवा में लग गईं। विवाह के 9 वर्ष पश्चात् उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पर दुर्भाग्य से किसी कारणवश शीघ्र ही उसकी मृत्यु भी हो गई। यही कारण था कि राजा गंगाधर राव उदास और अस्वस्थ रहने लगे। तब किसी के सुझाव पर दामोदर राव को उन्होंने अपना दत्तक पुत्र बना लिया।

लक्ष्मीबाई के ऊपर विपत्ति के बादल मंडरा रहे थे। 1853 को राजा गंगाधर राव ने भी उनका साथ छोड़ दिया और स्वर्ग सिधार गए। लाड़ से पली-बढ़ी मनुबाई 18 वर्ष की अवस्था में ही विधवा बन गई। सारे राज्य में सुरक्षा को लेकर हाहाकार मच गया। अंग्रेज झांसी पर कब्जा करने के लिए कुटिल नीति रचने लगे। जनता के बीच मचे हाहाकार को देख लक्ष्मीबाई ने अपने आंसू पोंछने से पहले ही कह दियाझांसी आपकी हमारी है, मैं अपने प्राण रहते इसे नहीं छोड़ सकती हैं।

यह सुन राज्य में स्थिरता आ गई। अपने हृदय में अंग्रेजों के प्रति घृणा तथा विद्रोह की ज्वाला को सुलगा लक्ष्मीबाई ने उनके खिलाफ कूटनीति से लड़ने का। फैसला लिया।

इसी बीच एक चिंगारी मंगल पाण्डेय के रूप में मेरठ में भी स्फुटित होने लगी थी। धीरे-धीरे इसकी लपटें पूरे भारत में फैल गईं। इसी बीच अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेज यह भी जानते थे कि लक्ष्मीबाई कोई आम औरत नहीं बल्कि रणचंडी का अवतार है इसीलिए वह भयभीत होते हुए अपने कदम आगे बढ़ा रहे थे। लक्ष्मीबाई ने डटते हुए अंग्रेजों का सामना किया और ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए अंग्रेजों को हरा दिया।

इतिहास गवाह है, जैसा अक्सर होता है ठीक वैसा ही हुआ आपसी घृणा के कारण कुछ विश्वासघातियों ने अंग्रेजों का साथ दिया जिसकारण लक्ष्मीबाई को अपने दत्तक पुत्र के साथ राजमहल छोड़ना पड़ा। लक्ष्मीबाई किसी भगौड़े की तरह नहीं बल्कि शेरनी की तरह अपने दुश्मनों का नाश करते हुए आगे बढ़ने लगीं और अंतः कालपी जा पहुँची।।

कालपी नरेश ने अपने 250 योद्धाओं को लक्ष्मीबाई को सौंपा। इन्हीं 250 सैनिकों को लेकर पुनः लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से जा लड़ी। पर जब अपने ही दुश्मन बन चुके हों तो क्या होता है, सब जानते हैं। इस बार लक्ष्मीबाई को हारना पड़ा।

युद्ध के मैदान से पुनः लौटने की धमकी देती हुई लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र को लेकर सीधे ग्वालियर जा पहुँची। वहाँ भी अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए जाल बुन रखा था। पर लक्ष्मीबाई ने डटकर अंग्रेजों का सामना किया, खून की नदियाँ बहने लगी। यहाँ अकेली लक्ष्मीबाई ने ही सभी अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए। पर अफसोस उनका प्यारा घोड़ा इस युद्ध में शहीद हो गया।

युद्ध के दौरान उन्हें अपना घोड़ा बदलना पड़ा घोड़ा नया था लक्ष्मीबाई के इशारे न समझ पाया और एक नाला पार करते हुए जैसे कि एक अंग्रेज ने पीछे से वार किया लक्ष्मीबाई घायल हो गईं घोड़ा घबरा गया और युद्ध के मैदान में बैठ गया जिस कारण चारों तरफ से हो रहे प्रहार से लक्ष्मीबाई बच न सकीं और अंतः वीरता का परिचय देती हुईं स्वर्ग सिधार गईं।

लक्ष्मीबाई ने अपने कई रूपों को बखूबी निभाया है। एक माँ के रूप में, एक पत्नी के रूप में, एक रानी के रूप में आदि उनके जीवन की एक-एक घटना नवस्फूर्ति और नवचेतना का संचार कर रही थी। अगर हम कहें की आज की नारी का सम्मान रानी लक्ष्मीबाई के कारण ही हो रहा है तो इसमें कोई गलत नहीं होगा।

सुभद्राकुमारी चौहान ने तो इनपर पूरी एक कविता ही लिख डाली जिसे सुन आज भी हर भारतीय के मन में देश प्रेम की भावना जाग उठती है।

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