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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Jansankhya ki Samasya”, “जनसंख्या की समस्या” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

जनसंख्या की समस्या

Jansankhya ki Samasya

प्रस्तावना : प्रकृति हो अथवा मानव समाज, उस सबकी समुचित स्थिति, सुख- समृद्धि तभी बनी रह सकती है जब उसमें सभी प्रकार का समुचित एवं स्वाभाविक संतुलन बना रहे। सभी की प्रगति एवं विकास — की ओर भी तभी ध्यान दिया जा सकता है। इसी प्रकार अनाप-सनाप उत्पत्ति एवं असन्तुलन रहने पर सभी के विकास के लिए किए गए कायों का लाभ पहुँच पाना अत्यन्त कठिन है ।

जनसंख्या वृद्धि : स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत की आबादी अनुमानत: चालीस करोड़ ही थी। जब देश दो भागों में विभाजित हुआ तो अनुमानत: दस करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान में रह गई। इस प्रकार भारत की जनसंख्या अनुमानतः तीस करोड़ ही थी। यह बढ़ते-बढ़ते 11 मई 2000 ई० को एक अरब तक पहुँच गई। इससे अब देश के कर्णधार अत्यधिक परेशान हैं।

उपभोक्ता माल का अभाव : देश की एक अरब जनसंख्या ने आज अन्य कई प्रकार की समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। ये समस्याएँ कई प्रकार के अभाव-अभियोगों के रूप में पग-पग पर हमारे सामने आ रही हैं । खाद्य सामग्री की कीमतें आकाश को छूने लगी हैं। इसका मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में उनका उत्पादन सम्भव न हो पाना है । इसी प्रकार ऐसी सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की सेवाओं और नौकरियों का भी अभाव है, जो सभी इच्छुकों को नियोजित कर सके। उन्हें पाने के लिए कई प्रकार की मिलीभगत, रिश्वत और भ्रष्टाचार का बाजार गर्म हो जाना भी स्वाभाविक है। इतना ही नहीं आवास का भी अभाव होता जा रहा है । फलतः इस जनसंख्या के बहुत बड़े भाग को कस्बों, गंदी बस्तियों, झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने को बाध्य होना पड़ रहा है । इस विशाल जनसंख्या के दबावों के कारण साफ़-स्वच्छ हवा-पानी तक मिल पाना सुलभ नहीं रह गया है। चहुँ ओर जो आपाधापी, मार-पीट, लूटपाट, रिश्वतखोरी, काला बाजार और काले धंधों का ज़ोर है, उसका एक प्रमुख कारण जनसंख्या का अंधाधुंध बढ़कर अभाव की स्थिति पैदा कर देना ही है। समाजशास्त्रियों की स्पष्ट मान्यता है कि जनसंख्या बढ़ने का यदि यही अनुपात रहा, तो वह दिन भी आ सकता है कि जब कीड़े-मकोड़ों की तरह धरती इंसानों से भर जाएगी । तब अपनी भूख मिटाने एवं आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए एक इंसान दूसरे इंसान को खा जाने के लिए बाध्य हो जाएगा । वह दृश्य कितना भयावह होगा ?

जनसंख्या वृद्धि की भयावहता : ऐसी स्थिति में न खाने को अन्न होगा, न पीने को जल और रहने को एक फुट स्थान तक सुलभ न हो सकेगा। झोंपडे अथवा घर का तो कहना ही क्या ? तन ढकने को दो मीटर कपड़ा तक न मिल सकेगा। यहाँ तक कि खुल कर साँस तक ले पाना सुलभ न रह जाएगा। किसी की आँखों में किसी के लिए भी लाज-हया नहीं रह जाएगी। आत्मीयता अतीत की निराशाजनक कहानी बन कर रह जाएगी। व्यक्ति स्नेह-सम्मान की एक बूंद पाने के लिए तरस जाएगा । यदि अब भी सच्चे मन से जनसंख्या पर सख्त रोक लगाने का प्रयास नहीं किया गया, तो स्थिति और भयावह हो जाएगी, इसमें संदेह नहीं ।

उपसंहार : निस्संदेह विगत कई दशकों से जनसंख्या की समस्या की भयावहता को उजागर जन-जागरण के लिए तरह-तरह से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है; किन्तु कई प्रकार के अन्धविश्वास, असमानताएँ, अव्यावहारिकताएँ और जागरूक चेतना का अभाव कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आने दे रहा है । ऐसा प्रतीत होता है कि जनसंख्या की अबाध वृद्धि की समस्या का घी सीधी उँगली से निकलने वाला नहीं है; किन्तु ऐसी धारणा बनाकर हाथ पर हाथ धर कर भी तो नहीं बैठा जा सकता है। देश की जनता को निरीह कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने को भी तो नहीं छोड़ा जा सकता है। सो हमारे विचार में जिस प्रकार का प्रचार, प्रसार, जन-जागरण अभियान, कई प्रकार के उपायों एवं संतति निरोधक उपायों का प्रयोग चल रहा है, यह तो निरन्तर चलता ही रहे, उस सबके साथ-साथ बिना जाति-धर्म का लिहाज़ किए कुछ कानूनी और कठोर दण्डात्मक प्रावधान करना भी आवश्यक हो गया है। ऐसी ही स्थिति में इस समस्या का समाधान सम्भव हो सकेगा।

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