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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “International Children Year”, “अन्तर्राष्ट्रीय बाल वर्ष” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

अन्तर्राष्ट्रीय बाल वर्ष

International Children Year

बाल विकास का महत्त्व : संयुक्त राष्ट्र संघ ने बाल विकास के महत्त्व की ओर विश्व का ध्यान केन्द्रित करने के लिए सन् 1979 ई० को बाल वर्ष घोषित किया था। इसके साथ ही यह भी निश्चित किया गया। कि हमारे देश में बाल विकास के लिए। जितने भी कार्यक्रम सरकार की ओर से बनाये जाएँगे, उन्हें सफल बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र बाल-विकास कोष संस्था (यूनिसेफ) धनराशि प्रदान करेगा जो कि बच्चों की देखभाल, समुचित पोषण, प्रारम्भिक शिक्षा तथा गर्भवती महिलाओं की देखभाल में व्यय की जाएगी। अतः अन्तर्राष्ट्रीय बाल वर्ष को पूर्ण सहयोग व उदारता से मनाया जाए ताकि बाल विकास की राष्ट्रीय नीति में जिन लक्ष्यों का निर्धारण किया गया है, उनकी पूर्ति हेतु पूर्ण शक्ति लगायी जा सके। इसके लिए ऐसे ठोस क़ार्यक्रम बनने चाहिए; जिससे उपलब्ध राशि का भली प्रकार उपयोग हो सके। उसका प्रसार नगर से ग्राम की ओर होना चाहिए; क्योंकि ग्राम का जन-जीवन नगर की अपेक्षा काफी पिछड़ा हुआ है। बाल विकास में उन्हें अच्छे संस्कार मिल पायेंगे और उनके जीवन के विकास की दिशाएँ खुल पायेगी।

बाल स्वर्ग की सोपान : आज़ के मानव का लक्ष्य इस वसुधा को स्वर्ग बनाना है। इसमें अपने को असमर्थ समझने के कारण वह यह सोचने लग गया कि इस लक्ष्य की पूर्ति उसके बच्चे करे। इसीलिए बच्चों को स्वर्ग का सोपान कहा गया है। वास्तव में मानव की इस स्वार्थ-लोलुपता से ही स्वर्णिम भविष्य का सम्पूर्ण दायित्व उनके कंधों पर आ गया है जो युवावस्था में पहुँचकर अपने समाज के अगुआ और राष्ट्र के निर्माता बनेंगे । इस अणु युग में बच्चों के महत्त्व को समझा। जाने लगा है। मानव समाज उनके प्रति सचेत हो गया है। उनकी शिक्षा पर विशेष बल दिया जा रहा है ताकि वे शिक्षित होकर अमीरी-गरीबी की खाई को पार कर राष्ट्र में समानता की भावना भर सकें।

बाल वर्ष पर शुभ संदेश : हमारे महामहिम भूतपूर्व राष्ट्रपति तथा भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इस शुभावसर पर नव वर्ष की पूर्व संध्या पर अपने-अपने संदेश दिये। राष्ट्रपति महोदय ने अपने शुभ संदेश में इस बात पर विशेष बल दिया कि सामाजिक परिवेश में किसी भी तरह का भेदभाव न रखा जाए और बच्चों के मन में दया, सहन-शक्ति और एकता के संस्कारों को भरा जाए। उनके कथनानुसार, “मानव समाज के समक्ष इस समय सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है, विश्व के शिशुओं के कल्याण का कार्य, विशेषकर अविकसित राष्ट्रों के शिशुओं का कल्याण, जहाँ निर्धनता, कुपोषण, अज्ञान और निरक्षरता, अंधविश्वास के कारण विश्व के इन भावी नागरिकों के लिए गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ और उससे सम्बद्ध सभी संस्थाएँ। तथा राष्ट्रीय सरकारें इस कार्य में अपने शक्ति साधनों का उपयोग करेंगी। वयस्क पीढी के हम लोगों पर अन्तर्राष्ट्रीय बाल वर्ष के मध्य और उसके बाद भी एक विशेष उत्तरदायित्व आ गया है। हमें बच्चों पर गर्व करना। चाहिए, भले ही ये बच्चे किसी भी सामाजिक स्तर के किसी भी रंग, धर्म या जाति के हों और उनमें मानव-प्रेम, सहिष्णुता, मानव एकता जैसी उच्च भावनाएँ भरने का प्रयास करना चाहिए। तभी हम ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं जिसमें वर्तमान सभ्यता के तनाव और टूटने से मानव मुक्ति का अनुभव करे और मानव समाज शक्ति संतोष व उसके मंगल के वातावरण की ओर बढ़ सके।

भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के कथनानुसार, “बच्चों की ‘दुनिया सरलता, सुख और प्यार की दुनिया है। बच्चे भावी समाज का आधार हैं। अत: ये सतत् नवीनीकरण का बहुमूल्य स्रोत हैं। बच्चे। मानवता के उज्ज्वल भविष्य की नींव हैं। यदि हम न्यायपूर्ण और सुखीविश्व की मजबूत नींव रखना चाहते हैं, तो हमें बच्चों की उन पीढ़ियों की ओर ध्यान देना होगा, जिन्हें कल की दुनिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है। वर्ष 1979 को विश्व बाल वर्ष घोषित करना, इस समय का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय है। हमारे संविधान में 45 के अनुच्छेद में सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की गई। है, अनुच्छेद 24 में कारखानों में बच्चों को नौकरी कराना और अनुच्छेद 39 में कोमलवय में बच्चों का शोषण करना वर्जित किया गया है। हमने संविधान के इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कई कानून बनाए हैं। हमारा राष्ट्र विश्व के उन राष्ट्रों में आता है जिन्होंने बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनायी है। हमारी राष्ट्रनीति में बच्चों को ‘राष्ट्र की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति’। स्वीकार किया गया है और इसमें बच्चे के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास के प्रति वचनबद्धता व्यक्त की गई है।”

बच्चे राष्ट्र की मूल्यवान सम्पत्ति : इसकी वास्तविकता को झुठलाया नहीं जा सकता है कि बच्चे राष्ट्र की मूल्यवान सम्पत्ति हैं। इनके लालन-पालन और विकास का सम्पूर्ण दायित्व हमारा है। हमारी सरकार का लक्ष्य भी इनका चहुंमुखी विकास है। इस अणु युग में इनके समुचित पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि के लिए सरकारी एजेंसियों के साथ स्वयंसेवी संगठन भी अच्छी भूमिका निभा रहे हैं। हमारी सरकार ने ‘स्वयंसेवी संगठनों’ हेतु ‘राष्ट्रीय बाल कोष’ स्थापित किया है जिसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और निर्धन बच्चों के कल्याण कार्यक्रम हेतु धन की मदद पहुँचाना है। इसी कारण प्रधानमंत्री की ओर से देश के नागरिकों से उदारतापूर्वक दान देने की अपील की। भी गई है।

भारत में बच्चों का स्थान : भारत में बच्चों को मात्र अपने माता-पिता की ही जिम्मेदारी माना जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने समाज व राज्यों को बच्चों के प्रति उनकी जानकारी की अनुभूति करायी है। आज भी भारतीय बच्चे अपने देश की बसों में उपेक्षित हो रहे हैं। उन्हें बैठने को सीट नहीं मिलती। इस बाल वर्ष में ऐसे अन्याय को खत्म करने की आवश्यकता है। भारतीय बच्चों की अपने ही देश में दोहरी दुनिया है। एक वर्ग ऐश्वर्य में पनपता है, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं में अपना समय गुजारता है और बढ़िया से बढिया यातायात के साधनों में सफर करता है जब कि दूसरा धूल में लोटता है, टूटी-फूटी झोंपड़ी। में पलता है और पैदल ही यात्रा करता है। उसके पास पेट भरने के लिए अन्न भी पूरा नहीं होता है, दूध के लिए सोचना तो आकाश से कुसुम तोड़ना मात्र ही है। यह कैसी विडम्बना है कि एक का बचप दूसरे के लिए समर्पित है। धनिक वर्ग पब्लिक स्कूलों के सुखद एवं ऐश्वर्यपूर्ण वातावरण में शिक्षा पा रहा है और दूसरा उन विद्यालयों में जहाँ पर बैठने के लिए टाट भी उपलब्ध नहीं हैं।

विश्व बाल सम्मेलन : हमारे देश में नवम्बर मास में अन्तर्राष्ट्रीय बाल कल्याण संघ ने विश्व बाल सम्मेलन का आयोजन किया। इसका उद्देश्य था कि माध्यमिक कक्षाओं के बच्चों से उनकी समस्याओं का ज्ञान अर्जित करना और यह जानना कि आधुनिक विश्व के विषय में उनकी राय क्या है।

उपसंहार : अन्तर्राष्ट्रीय बाल वर्ष का सम्पुर्ण ढाँचा जन-जागरण की दृष्टि से हर देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है, इसमें कोई दो राय नहीं है।

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