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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Guru Nanak Dev Ji”, “गुरुनानक देव जी” Complete Hindi Essay, Nibandh, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

श्री गुरु नानक देव

Shri Guru Nanak Dev Ji

निबंध नंबर :- 01

गुरु नानक देव जी का जन्म सन् 1469 में, जिला शेखूपुरा के तलवण्डी नामक गाँव में हुआ, जो अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब के नाम से प्रसिद्ध है। इनके पिता का नाम कालचन्द और माता का नाम तृप्ता था। पिता जाति के खत्री थे और पटवारी का काम करते थे।

गुरु नानक देव जी के बचपन की बहुत सी चमत्कारपूर्ण घटनाएँ प्रसिद्ध हैं। 9 वर्ष की अवस्था में इन्हें स्कूल में भर्ती करवाया गया। इनका किताबी शिक्षा को आर कोई ध्यान ही नहीं था। इन्होंने अपनी सहज और आध्यात्मिक शिक्षा से अपने गुरु और अध्यापकों गोपाल पंडित, पंडित बजपाल और मौलवी कुतुबुद्दीन का आश्चर्यचकित कर दिया। एक बार भैंसे चराते समय जंगल में इन्हें नींद आ गई। इन पर धूप देखकर एक फन वाले साँप ने इन पर छाया कर दी। खेतों की रखवाली करने के लिए गए हुए गुरु नानक देव जी का विचार था-

भर भर के पेट चुगो री चिड़ियों हरि की चिड़ियां, हरि के खेत

एक बार इनके पिता ने इन्हें व्यापार करने के लिए कुछ रुपये देकर भेजा तो ये सारा धन साधुओं को खिला कर लौट आए। पिता के पूछने पर उत्तर दिया कि वे सच्चा सौदा कर आए हैं। इस प्रकार बचपन से ही का झुकाव धर्म की ओर था और इनमें एक अलौकिक शक्ति विद्यमान थी।

पुत्र की धर्म की ओर रुचि तथा व्यापार और काम-काज के प्रति उपेक्षा देखकर पिता ने इन्हें सुल्तानपुर भेज दिया। वहाँ इनकी बहिन नानकी और बहिनोई श्री जयराम जी रहते थे। बहिनोई ने आप को दौलत खाँ लोधी के यहां मोदीखाने में नियुक्त करवा दिया। वहाँ भी ये साधु सन्तों को बिना मूल्य लिए रसद दे दिया करते थे। एक बार एक आदमी को आटा तोल कर दे रहे थे। बारह तक तो गिनती ठीक रही, तेरह पर पहुंच कर नानक देव प्रभु के ध्यान में मग्न होकर ‘तेरा, तेरा’ करने लगे और इसी तरह सारा आटा दे दिया। शिकायत होने पर नवाब ने पड़ताल की तो अन्न में कोई कमी न थी। किन्तु यहां भी आप अधिक देर तक न टिक पाए।

श्री मूलचन्द जी की सुपुत्री सुलक्षणा के साथ इनका विवाह हुआ और दो पुत्र श्रीचन्द और लक्ष्मी चन्द हुए। 30 वर्ष की अवस्था में घर बार छोड़ कर इन्होंने फकीरी अपना ली। बाला और मरदाना इनके साथ थे। भक्ति की पवित्र गंगा बहाते हुए गुरू नानक देव एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करने लगे।

गुरु जी ने चार यात्राएँ की जो चार उदासियों के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन यात्राओं में उन्होंने सारा भारत घूम लिया। ईराक, ईरान, अफगानिस्तान, रूस और मक्केमदीने की भी यात्रा की। इन यात्राओं में उन्हें अनेक कष्ट सहन पड़े परन्तु वे विचलित न हुए। जगह जगह उन्होंने लोगों को उपदेश दिए, पाखंडों का खंडन किया और प्रभु की महिमा गाई। तदनन्तर इन्होंने अपना शेष जीवन करतारपूर (समीप जालन्धर) में बिताया।

श्री गुरू नानक देव सिक्ख सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। सन्त और सुधारक होने के साथ साथ वे श्रेष्ठ कवि भी थे। श्री गुरू ग्रन्थ साहिब में ‘मुहल्ला पहला’ के अन्र्तगत सारी वाणी इनका रचना है। इनके शब्द जहां कर्मकाण्डों का खंडन करते हैं वहां भक्ति के मधुर रस से भी भरपूर है। इन्हें लोककवि कहा जा सकता है। आज के समय में चाहे इनकी भाषा हमें कठिन लगती हो परन्तु अपने समय में वही लोकभाषा थी।

गुरू नानक देव जी एक ईश्वर के उपासक थे। अवतारवाद और मूर्तिपूजा में इनका विश्वास नहीं था। वे मनुष्य मात्र को समान मानते थे इसलिए छुआछूत और जातपात में इनका विश्वास नहीं था। जहां दूसरे सन्तों ने स्त्री की निन्दा की, वहां आप ने उनके इस विचार का विरोध किया है। उन्होंने श्रम को महत्त्व दिया और कोरे वैराग्य का विरोध किया है। आप का विश्वास था कि अहंकार का त्याग, शुद्ध आचरण और पूर्ण समर्पण द्वारा ही प्रभु को प्राप्त किया जा सकता है, उसके लिए न तो घोर तपस्या की ज़रूरत है और न ही तीर्थों पर भटकने की।

1539 में सत्तर वर्ष की आयु में श्री गुरु नानक देव अपना यह भौतिक शरीर छोड़ कर ईश्वर की ज्योति में विलीन हो गए।

 

 निबंध नंबर :- 02

गुरुनानक देव जी

Guru Nanak Dev Ji

चमत्कारी महापुरुषों और महान् धर्म प्रवर्तकों में प्रमुख स्थान रखने वाले सिख-धर्म प्रथम प्रवर्तक गुरुनानक देव का जन्म कार्तिक पूर्णिमा संवत् 1526 को लाहौर जिले के तलवंडी गांव में हुआ था, जो आजकल ‘ननकाना साहब’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थान अब पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) में है। आपके पिताश्री कालूचंद वेदी तलवंडी के पटवारी थे और आपकी माताश्री तृप्ता देवी यड़ी साध्वी और शांत स्वभाव की धर्म-परायण महिला थी।

गुरुनानक जी बचपन से ही कुशाग्र और होनहार प्रकृति के बालक थे। अतएव आप किसी विषय को शीघ्र समझ जाते थे। आप एकान्त प्रेमी और चिन्तनशील स्वभाव के बालक थे। इसलिए आपका मन विद्याध्ययन और खेलकूद में न लगकर साधु-संतों की संगति में अत्यधिक लगता था। यद्यपि घर पर ही आपको संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा-साहित्य का ज्ञान दिया गया। संसार के प्रति गुरुनानक जी का मन उदास और उपेक्षित रहता था। इस प्रकार की वैरागमयी प्रकृति को देखकर इनके पिताश्री ने इन्हें पशु चराने का काम सौंप दिया। नानक के लिए यह काम बहुत ही सुगम और आनन्ददायक सिद्ध हुआ। वे पशुओं की चिन्ता छोड़कर संसार की चिन्ता में मग्न होते हुए ईश्वर-ध्यान में डूब जाते थे और मन-ही-मन ईश्वर को भजन-भाव करते रहते थे।

एक बार फिर इनके पिताश्री ने इन्हें गृहस्थ-जीवन में लगाने का प्रयत्न किया। इन्हें बीस रुपये देकर कहा कि बेटा इन रुपयों से ऐसा कोई काम करो जिससे कुछ आय और लाभ प्राप्त हो और मुझे कुछ सहारा मिले। पिताश्री ने इसके लिए गुरुनानक के साथ में दो विश्वस्त नौकरों को भी लगा दिया। गुरुनानक लाहौर की ओर बढ़े। रास्ते में गुरुनानक ने देखा कि कुछ साधु तपस्या में लीन हैं। अब गुरुनानक कुछ समय तक उनके पास ही ठहर गये। नानक जी ने मन-ही-मन विचार किया कि इन महात्माओं को कुछ खिलाना-पिलाना चाहिए। इसी से इस पूँजी को बड़ा लाभ और आय प्राप्त हो सकती है। इसलिए गुरुनानक ने अपने पास के उन बीस रुपयों को उन साधु-महात्माओं के खान-पान में खर्च कर दिए। उनके पिताश्री इस प्रकार के आचरण से वे अत्यधिक प्रभावित हुए थे।

गुरुनानक के जीवन में एक और असाधारण घटना घट गयी। गर्मी का मौसम था। जंगल में पशु-पक्षी लू से बचने के लिए छाया का अनुसरण कर रहे थे। छाया में सुखपूर्वक पड़े हुए जीव आनन्द विहार कर रहे थे। इसी समय जंगल में गुरुनानक देव भी गर्मी से आकुल होकर पसीने से तर-बितर हो रहे थे। ठीक इसी समय एक बहुत बड़े सर्प ने आकर गुरुनानक के मुख के ऊपर अपने फण को फैलाकर छाया कर दी। गाँव के मुखिया को इस दृश्य को देखकर अत्यन्त विस्मय हुआ। उसने गुरुनानक देव को हृदय से बार-बार लगा लिया। सभी ने तभी से यह स्वीकार कर लिया कि गुरुनानक साधारण मनुष्य नहीं है, अपितु कोई देव स्वरूप हैं। उसी समय से गुरुनानक के नाम के आगे देव शब्द जुड़ गया और आप गुरुनानक देव के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

गुरुनानक देव के जीवन-विराग सम्बन्धित एक ओर रोचक घटना सुनी जाती। है। कहा जाता है कि एक बार आपको खेत की रखवाली का कार्यभार सौंप दिया गया। लेकिन वहाँ पर भी आप ईश्वरीय चिन्तनधारा में बहते रहे। फलतः सारे खेत को चिड़ियाँ चुगती रहीं और आप की भावधारा ईश्वरीयस्वरूप में उछलती रही। इससे आपके पिताश्री अधिक रुष्ट हुए। आपके जीवन से संबंधित एक और रोचक घटना यह है कि आपके पिताश्री ने आपको लोदी खाँ नवाब के यहाँ मोदी खाने में निरीक्षक की नौकरी दिलवाई। लेकिन गुरुनानक जी कब इस गृहस्थी के झाँसे। में आने वाले थे। वहाँ भी आप साधु-संतों की संगति में लगे रहे और उनकी सेवा-सत्कार में खूब खर्च करते रहे। जब नवाब के पास यह शिकायत पहुँचाई गई,    तब मोदी खाने की जाँच-पड़ताल को आदेश नवाब ने दिया। जॉच के दौरान यह पाया गया कि कहीं कोई कुछ भी कमी गुरुनानक देव में नहीं है अपितु गुरुनानक देव के ही 300 रुपये निकले। इससे नवाब को बड़ी हैरानी हुई और तभी उसने गुरुनानक देव के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित कर दी।

गुरुनानक देव का विवाह लगभग उन्नीस वर्ष की आयु में मूलाराम पटवारी की कन्या से हुआ। इससे आपके दो पुत्र श्रीचन्त और लक्ष्मीदास उत्पन्न हुए। इन  दोनों ने गुरुनानक देव की मृत्यु के बाद उदासी मत को चलाया था।

गुरुनानक के जीवन की एक अद्भुत घटना यह है कि आप रात के समय एक नदी में स्नान कर रहे थे ; तभी आपको आकाशवाणी हुई, कि “प्यारे नानक अपना कार्य कब करोगे। जिस कार्य के लिए तुम संसार में आए हुए हो, उसके लिए मोह ममता छोड़ो। भूले-भटकों को मार्ग पर लाओ।” इस आकाशवाणी से आप फिर घर लौटे नहीं और साधु-वेश में अपने मुसलमान शिष्य मरदाना के साथ इधर-उधर भ्रमण करते रहे। भ्रमण करते हुए आप एक बार मक्का भी गए। वहीं पर काबा के निकट सो गए। दैव योग से उनके पैर काबा की ओर हो गए। सबेरे जब मुसलमानों ने देखा, तो वे बिगड़कर गुरुनानक से कहा “ऐ नादान मुसाफिर ! तुझे शर्म नहीं आती ; जो तू खुदा की ओर पैर पसारे है।” कछ अटपटी बात को कहने पर गुरुनानक ने कहा, ”भाई बिगड़ते क्यों हो ? मेरा पैर उधर कर दो जिधर खदा न हो। कहा जाता है कि गुरुनानक का पैर जिधर घुमाया गया, उधर ही काबा दिखाई देता था। इससे मुसलमानों ने नानक से क्षमा मांगकर उनके प्रति श्रद्धा अर्पित की|”

गुरुनानक देव की मृत्यु संवत 1596 में मार्गशीर्ष माह की दशमी को 70 वर्ष की आयु में हुई। सांसारिक अज्ञानता के प्रति गुरुनानक देव ने कहा था-

रैन गबाइ सोइ के, दिवसु गवाया खाय।

हीरे जैसा जन्म है, कौड़ी बदले जाय।।

गुरु नानक देव ने ईश्वर को सर्वव्यापी मानने पर बल दिया है। जाति-पांति के बन्धन को तोड़ने का आहान किया है। मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए केवल “एक ओंकारा मत, और सत गुरु प्रसाद के जप को स्वीकार किया है। आपके रचित धर्मग्रन्थ ‘गुरु-ग्रन्थ साहब’ पंजाबी भाषा में हैं, जिसमें मीरा, तुलसी, कबीर, रैदास, मलूकदास आदि भक्त कवियों की वाणियों का समावेश है। उपर्युक्त तत्वों से अमरत्व स्वरूप की सिद्ध हो जाती है।

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