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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Dahej Ek Danav”, “दहेजः एक दानव” Complete Essay for Class 9, 10, 12 Students.

दहेजः एक दानव

Dahej Ek Danav

शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब दहेज के कारण किसी वधू को जलाया या मारा नहीं गया हो दहेज की माँग अंधस्वार्थ का प्रतीक है और स्त्री-पुरूष की समानता का विरोधी स्वर है। दहेज लेना और देना दोनों ही अपराध माने जाते हैं। सरकार यह कानून बना चुकी है फिर भी सरेआम दहेज लिया जा रहा है और दिया जा रहा है। ताज्जुब तो इस बात का है, यह जानते हुए भी कि दहेज सामाजिक अभिशाप है। हरेक इस संगीन अपराध में संलग्न है। सरकार दहेज रोकने में असफल सिद्ध हुई है। यह एक अनिवार्य बुराई है। इसे रोकना सारी मानवजाति का फर्ज है।

दहेज है क्या? कन्या कन्यादान ही दहेज है? कन्यादान से बडा कोई दान नहीं? न ही दहेज विवाहिता युवती को पहली बार दिया जाता है और खुशी से दिया जाता है। यदि दहेज कन्यादान है तो उसमें कन्या का पिता स्वेच्छा से अपनी लडकी के विवाह में जो कुछ लड़के (वर-पक्ष) को देता है, सामान्य भाषा में वहीं दहेज है। इसे दायजा भी कहते हैं। विवाह के मांगलिक अवसर पर कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को दिया जाने वाला धन और सामान ही दहेज है। इस दहेज ने विवाह जैसे पवित्र तथा हार्दिक मधुर बन्धन को अभिशाप में बदल दिया है। दहेज नहीं, लडके वाले अपने लड़के की रकम लड़की वालों से लेने लगे हैं और वह भी मुहँ माँगी। विवाह के बाद भी लड़के वालों की माँग रहती है कि उनकी बहू अपने घरवालों से रुपया व सामान लाए।

आखिर यह सब क्यों है?

भारतीय रीति से शादी में दहेज कहाँ है? कन्यादान है। कन्यादान भी क्यों? यह सब ब्राह्मणवाद की संकीर्णता का परिणाम है। उसने अपने लिए विवाह में जबर्दस्त स्थान बनाया है। दहेज कोई रीति नहीं है। जैसे मृत्युभोज है ओर आज हम उसे एक गलत परम्परा करार दे चुके हैं, ठीक वैसे ही दहेज हैं विवाह में दहेज की बात उठनी ही नहीं चाहिए।

युवक-युवती का जीवन मांगलिक होना चाहिए। वह हमारे समाज का भविष्य है और कर्मठ तथा स्वस्थ राष्ट्र की पहचान है। उसी पर हमारी व्यवस्था टिकी हुई है। भावी पीढ़ी का जीवन-अस्तित्व उसी पर अवलम्बित है। क्या हम वर्तमान समाज को नष्ट करना चाहते हैं? क्या हम जीवनानन्द का उत्साह समाप्त करना चाहते हैं? आने वाली पीढ़ी पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा, यह निश्चित ही है।

आखिर हम अपने सुख-आनन्द और मंगल की होती नवजीवन में प्रवेश करते ही समाप्त क्यों कर डालना चाहते हैं? क्या युवती समाज का अभिन्न अंग नहीं है? क्या नारी की बराबरी की साझेदारी नहीं है? यदि है तो वर पक्ष दहेज की मांग क्यों करता है? वह क्यों भूल जाता है कि लड़की का जन्म उनके घर भी हो सकता है। यह विकराल काल उन्हें निगल सकता है। हम एक-दूसरे को लील देने वाली गलत मान्यताओं को जड़मूल से उखाड़ कर फेंक क्यों नहीं देते? कौन रोकता है हमें कि हम जीवन्त स्वर्गानुभूति से युक्त होकर न जिए? दहेज क्यों माँगे? क्यों दे? यह अपराध क्यों करे? यह अपराध आत्महत्या की ओर ले जाता है- पति,पत्नी, सन्तान और समाज को सामूहिक आत्महत्या का यह महोत्सव क्यों? दहेज सहज और प्रसन्न परिवार में विष घोल देता है। यह सामाजिक प्रदूषण है। यह तस्करी से भी गंदा तथा गर्हित धंधा है। यह सभ्यता तथा संस्कृति के नाम पर करारा तमाचा है। यह अभिशाप का आमन्त्रण है। इससे क्या हानि नहीं, सोचने का पक्ष यह है। इससे प्रमुख हानियाँ हैं:

दहेज वर-वधू को मंगल और आनंद से विमुख कर देता है। दहेज वर पक्ष के अति लोभी, अशिष्ट, असभ्य और जंगली होने का प्रतीक है। आज दहेज के कारण वधू को आत्महत्या तक करनी पड़ रही है। पति तथा उसके परिवार के लोग मिलकर वधू को जीवित जला रहे हैं। ऐसे लोग दस्यु से भी भयानक हैं।

दहेज से युवती का मनमयांतक भेयक छात्राओं से घिरा रहता है। वह विवाह से पूर्व और विवाह के बाद अदृश्य अमानवीय कुछायाओं से आवृत बनी रहती है। उसकी इस मानसिकता का कुप्रभाव उसकी आने वाली सन्तान पर पड़ता है और गृहस्थी का जीवन असामान्य हो जाता है। इससे परिवार कलह के दौर से गुजरता है।

दहेज से कन्या पक्ष को विवाह के बाद भी नारकीय जीवन से गुजरना पड़ता है। वह कर्ज के भार से दब जाता है। उस परिवार के सदस्यों के जीवन पर इसका गहरा दबाव पड़ता हैं उनका जीवन भी लुंजपुंज रह जाता है। कुल मिला कर दहेज समग्र समाज के लिए अभिशाप है।

दहेज की कुप्रथा को रोकने के लिए सरकार ने उसे गैरकानूनी करार दे दिया है। सरकार को चाहिए कि दहेज लेने और देने वालों को नागरिक अधिकार से कम से कम दस वर्ष के लिए. वंचित कर दे। दरअसल यह सामाजिक समस्या है। समाज चाहे तो ऐसे परिवार का वैवाहिक बहिष्कार कर दे जिस परिवार में वधू को आत्महत्या करनी पड़ी हो या वधू की हत्या कर दी गई हो, किन्तु भीरू और लालची समाज कभी ऐसा नहीं करेगा।

अचरज तो यह है कि वर पक्ष में वधू के साथ अमानुषिक अत्याचार में स्त्रियाँ ही सहयोग करती है। यह उन्हीं की अमानवीय समस्या है। और वे ही इस पाप में सहयोग दे रही हैं।

शिक्षित युवतियाँ तो स्वयं भी दहेज चाहती है दरअसल उनमें भी लोभवत्ति है और वे भी जीवन को पैसे से तोल रही है। इस समस्या का वास्तविक हल तो वर-वधू के पास है। वे ही सही निर्णय ले और जीर्ण-शीर्ण इस दीवार को गिरा दे।

निष्कर्षत: दहेज समाज के लिए फाँसी का फंदा है। उससे समूचे समाज की शान्ति और सुख पर गहरा प्रभाव पड़ता है। दहेज को विवाह प्रथा में से निकाल दिया जाए। शिक्षित, सभ्य और अगुआ वर्ग सामने आए और इस दिशा में पहल करे। जहां ऐसा हो रहा हो, वहाँ पर सामने आए। दहेज बंद किए बिना जीवन शाप से बच नहीं सकता।

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