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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Chandni Raat”, “चांदनी रात” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

चांदनी रात

Chandni Raat 

बचपन में दादी मां कहा करती थी कि चन्दा मामा है, जो बच्चों के लिए दूध-भात लेकर आते हैं। किशोरावस्था में विज्ञान-शिक्षक द्वारा जानकारी दी गयी कि चांद पृथ्वी का एक उपग्रह है और सतह ऊबड़-खाबड़ निर्जीव एवं शुष्क है। खैर! चंद जैसा भी कुरूप एवं शुष्क क्यों न हो, चांदनी की शीतलता और मादकता से भला कैसे इनकार किया जा सकता है। जिस पर भी चांदनी पड़ जाती है, वहः वस्तुतः एक अद्भुत सौन्दर्य से मण्डित हो जाता है। सृष्टि के कण-कण पर शान्त, स्निग्ध और उज्जवल चांदनी का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता है। कविवर पंत के शब्दों में-

शान्ति स्निग्ध ज्योत्सना उज्जवल।

अपलक अनन्त नीख भूतल।।

        रजनी के रजत श्रृंगार के रजत स्वरूप का दूसरा नाम है। चांदनी रात में मेघ रहित नीले आकाश में जब चन्द्रमा अपने पूर्ण यौवन के साथ आकाश कुसुम की भांति खिलता है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि जब रजनी अपनी काली साड़ी को उतारकर श्वेत बसना बन गयी है। पेड़ों पर लेटती चांदनी, पहाड़ों की गोद में लेटी चांदनी, सरिता के वक्ष पर छितरायी चांदनी तथा मखमली मैदान के दामन में हंसती-खेलती चांदनी बड़ी प्यारी लगती है। चांदनी रात में शहर की ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं ऐसी सुशोभित हो उठती हैं, मानों उनकी दीवारों पर रजत-पटि जड़ दी और शान्त गांव चांदी के डिब्बे में भरे मुरब्बे से लगते हैं। यानी जिधर भी दृष्टि डाली जाये, जल-थल, अवनि सर्वत्र चांद की मोहक चांदनी ही नजर आती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी में चांदनी की ऐसी ही अनुभूति होती है-

        ’’चारू चन्द्र की चंचल किरणें

        खेल रही हैं जल-थल में

        स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है

        अवनि और अम्बर तल में।’’

यों तो हर माह की चांदनी रात सुन्दर होती है, किन्तु शरद की चांदनी रात के बारे में कहना ही क्या है। ऊपर से अमृतमयी चांदनी की वर्षा और नीचे बेली, चमेली, रजनीगन्धा आदि पुष्पों की सुगन्ध से सम्पूर्ण वातावरण मादक हो जाता है। ऐसे में मन मयूर नाच उठे, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। साधारण मनुष्य की कौन कहे, महामानव श्रीकृष्ण का ‘महारास‘ भी इसी चांदनी में हुआ था। लेकिन भौतिकवाद के बन्धन में आकण्ठ निमन्न बहुत-से ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए शरद की चांदनी और भादो की अंधेरी रात में कोई फर्क नहीं है; क्योंकि चांदनी रात के सौन्दर्यवान के लिए सिर्फ आंखें ही नहीं, अपितु निश्छल और सरस ह्नदय भी चाहिए। वासनायुक्त मैले चोर ह्नदय को चांदनी रात अच्छी नहीं लगती। इसीलिए गोस्वामीजी लिखते हैं-

’’चैरहिं चैदनि रात न भावा।’’

                   (रामचरितमानस)

चांदनी रात मानव-जीवन में कुछ सन्देश दे जाती है। यह उज्जवल प्रभामयी रात कहती है कि मानव को अमावस्या की डरावनी रात, यानी दुःख से घबराकर सत्य मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि प्रत्येक अमावस्या के बाद पूर्णिमा की चांदनी छिटकती है।  

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