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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Bihari”, “बिहारी ” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

बिहारी
Bihari

कवि बिहारी का जन्म संवत् 1660 में ग्वालियर राज्य के वसुआ गोविन्दपुर स्थान में हुआ था। बचपन बुन्देलखण्ड और युवावस्था विवाहोपरान्त ससुराल मथुरा में थी। कहा जाता है कि आमेर के महाराज जयसिंह के ये दरबारी कवि थे। जब महाराजा जयसिंह अपनी नयी-नवेली दुल्हन के प्रेमपाश में इतने आबुद्ध हो चुके थे कि वे महल से बाहर निकलते ही नहीं थे। राज-काज भी नहीं देखते थे। जब यह जानकारी गुप्तचरों से बिहारी को मिली तब बिहारी ने राजा के इस प्रेमोन्माद का दर्शन करने की जिज्ञासा की लेकिन जब उसे महाराजा की इस बेबस स्थिति का पता चला, तब उसने झटपट एक श्रृंगार रस से सिंचित एक दोहा लिखकर महाराज जयसिंह के करीबी सेवकों को महाराज के लिए भेज दिया।

उस दोहे को पढ़कर महाराज जयसिंह अपनी स्थिति से अवगत हो गए और उन्होंने कविवर बिहारी को इसी प्रकार से और दोहों की रचना करने का आदेश दे डाला, जिस कारण बिहारी को राज-दरबार में सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त हुआ है। कविवर बिहारी की महत्वपूर्ण वीर-रस से अभिसंचित पंक्ति है :

नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल।

अली-कली ही सौ बध्यो, आगे कौन हवाल।।

इसके अतिरिक्त इन की रचनाएँ हमें बिहारी सतसई में मिलती हैं। इस कृति में 700 दोहे हैं। इनमें श्रृंगार रस के अधिक दोहे हैं, जिसके प्रेरणास्रोत महाराज जयसिंह रहे।

 श्रृंगार रस के अतिरिक्त कविवर बिहारी ने नीतिपूर्ण दोहों की भी रचनाएँ की हैं। बिहारी ने अपने आश्रयदाता महाराज जयसिंह के प्रति अन्योक्ति की रचना की है। महाराज जयसिंह को संबोधित करते हुए कवि ने लिखा है – हे महाराज! आज शाहजहाँ को पक्ष लेकर हिन्दुओं को क्यों दुःखी कर रहे हैं। इसमें भला आपका क्या स्वार्थ… इसी प्रकार वे महाराज को टोका करते थे अगर वे कोई गलत मार्ग पर चलते थे तो।

कविवर बिहारी सिर्फ कवि ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपना परिचय ज्योतिष, गणित, दर्शन और विज्ञान में भली-भाँति दिया है।

बिहारी ने संसार में आडम्बरों पर प्रहार करते हुए मन दो सच्ची दशा में लाकर ईश्वर-ध्यान की शिक्षा भी दी है। जिस कारण वे कहते हैं :

जप-माला, छाया तिलक, सरै न एको कामु।

मन काँचै नाचे वृथा, साँचे राँचे रामू।।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में उत्तर मध्यकाल को रीतिकाल के नाम से जाना जाता है, इसी रीतिकाल के प्रमुख कवि बिहारी सिद्ध हुए। इसी कारण कविवर बिहारी को रस सिद्ध कवि बिहारी लाल भी कहा जाता है।

सुनत पथिक मख माह निशि लुएँ चलत उहि गाँव।

बिनु बूझे बिन हि कहे, जिपत बिचारी बाम।।

—-

अरे हंस! या नगर में, जैयो आयु बिचारि।

कागन सों जिन प्रीति करि, कोकिल दई बिगारी।।

—-

सत्सैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर।

देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर।।

—–

वतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाइ।

सौहं करै भौंहनि हँस, दैन कहै नटि जाई।।

कहत-नटत रीझत-खीझत, मिलजुलत लजियात।

भरै भौन में करत हैं, नैनन ही सौ बात।।

—-

उड़त गुड़ी लखि ललन की, अंगना-अंगना माँह।

बौरी लौ दौरी फिरती, छुअत छबीली छाँह।।

—-

आड़े दे आड़े बसन, जाड़े हूँ की राति।

साहस करके सनेह बस, सखी सबै डिग जाति।।

कहा जाता है कि कविवर बिहारी जी की मृत्यु संवत् 1720 में हुई थी। पर आज भी उनकी रचनाएँ उन्हें जीवित कर रखी हैं।

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