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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Bhrashtachar ke Badhte Charan”, ”भ्रष्टाचार के बढ़ते चरण” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

भ्रष्टाचार के बढ़ते चरण

Bhrashtachar ke Badhte Charan

भ्रष्टाचार, तेरे रूप अनेक। दूसरे शब्दों में आज अनेक क्या प्रत्येक स्तर पर और अनेक रूपों में जीवन- समाज में भ्रष्टाचार का विस्तार हो चुका है, निरन्तर होता ही जा रहा है। कोई भी कोना बचा नहीं रहना चाहता। सरकार और सरकारी प्रतिष्ठानों जन सेवा से सम्बन्धित प्रतिष्ठानों का तो सीधा-सादा अर्थ ही भ्रष्टाचार का संवैधानिक अड्डा या दूसरों की जेबो पर डाका डाल कर ऐयाशी-स्थली लिया जाने लगा है। आज धर्म, समाज, राजनीति, साहित्य, कला, संस्कृति आदि का भी कोई कोना ऐसा नहीं बचा जहाँ भ्रष्टाचार के कदम न पहुँच पाए हों। सारी व्यवस्था ही लेन-देन पर आधारित पर्णतया कलियुग से प्रभावित होकर कर-युगी हो गई है अर्थात् एक हाथ से रिश्वत दो, दसरे से अपना कार्य करवा लो। छोटा-बड़ा कोई भी कार्य अन्यथा हो पाना संभव नहीं रह गया है।

जनता से सीधा सम्पर्क रखने वाले सरकारी, अर्द्ध सरकारी या जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के संस्थान हैं, सभी जगह भ्रष्टाचार आराम से पाँव फैलाए पसर रहा है। उस के चरणों में भेंट-पूजा अर्थात दस्तरी चढाते जाइये, काम बनने की आशा होने लगेगी। बना दस्तूरी के फूल-पत्र चढाए कोई फाइल तो क्या पत्ता भी एक मेज से दूसरी मेज तक नहीं सरक सकता। फाइल सामने रखी है, तब भी नहीं है-ठीक उसकी तरह जैसे अहम का स्थिति है भी और नहीं भी है। आज जो इतना ताम-झाम फैलाकर महंगे चुनाव लड़ जाते हैं, किसी सामान्य-सी धार्मिक या स्वाभाविक संस्था तक का चुनाव लड़ने में चात पागल की तरह प्रयास करता है. वह इसीलिए कि चुनाव-विजय के रूप में उस खुल और व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार कर सकने का एक प्रकार से लायसन्स प्राप्त हो जाता है। बाद ‘जब सैयाँ भए कोतवाल अब डर काहे का’ की कहावत को सम्बद्ध निर्वाचित व्यक्ति तो क्या उसके आस-पास के सभी दोनों हाथों से चरितार्थ करने में जुट जाते हैं। फलस्वरूप आज बनाई गई गई पक्की सड़क पहली वर्षा की बूँदें भी सहन न कर उखड़ जाती है। यहाँ तक की सड़कें बनती नहीं, कुएँ खुदते नहीं, हैण्डपम्प लगते नहीं, कोई उपकरण या मशीनरी खरीदी तक नहीं जाती; पर लाखों-करोड़ों के बिल पास जाता है। तब तक व्यवस्था बदल चुकी होती है। गोल-माल करने वाले सेवामुक्त होकर बिना डकार लिए ही सब हज़्म कर चुके होते हैं।

इसे आप एक कमाल ही कह सकते है कि भारतीय इंजीनियर बिना नींव खोदे ही कई-कई मंजिले मकान खड़े कर देते हैं- वह भी बिना सीमेण्ट काँक्रीट के मात्र रेत से ही। यह भारत ही है जहाँ कागजों में जंगल-के-जंगल पेड उगा दिए जाते हैं। सैंकडों कुएँ तक खुद जाते है और उन की चोरी भी हो जाती है। बिना रिश्वत आपके घर के नल में पानी की बूंद नहीं टपक सकती, घर में रोशनी नहीं आ सकती और कहीं पत्ता तक नहीं हिल सकता। किसी का सारी जमा-पूँजी लगाकर बनाया गया घर भूमिसाल हो जाता है। सामने चीज रखी होती है; पर मिलती ही नहीं । कोई आदमी गाय नहीं पालता. पर प्रत्येक हलवाई और दूधिये की दुकान पर ‘यहाँ केवल गाय का दूध बिकता या प्रयोग में लाया जाता है, का लिखा बोर्ड देखा जाता है। फूड इंस्पैक्टरों से सहज ही इस बात का, मानकी का सर्टिफिकेट तक प्राप्त किया जा सकता है। पीड़ित और अराजक तत्त्वों द्वारा सब कुछ लूट कर संत्रस्त किए जाने पर भी आप थाने में तब तक रिपोर्ट नहीं लिखवा सकते जब तक कि लिखने वाले की मुट्ठी न गरम कर दें। इसरार करने पर रिपोर्ट लिखाने वाले को न केवल बन्द ही किया जा सकता है, बल्कि मार-मार कर परलोक-गमन का परवाना भी दिया जा सकता है। न्यायाधीश की बगल में बैठ कर उसका पेशकार रिश्वत ले रहा है, पर रिश्वत के विरुद्ध निर्णय सुना रहे न्यायाधीश महोदय की दृष्टि उधर भूल कर भी नहीं जा पाती। जन-सेवकों तक ने कोई प्रार्थना-पत्र आगे सरकाने के लिए एक प्रकार की फीस निश्चित कर रखी है।

हिंसक, असामाजिक और अराजक तत्त्व खुले आम मनमानी करते फिर रहे हैं, सरकारी पार्को-जमीनों, चरगाहों पर कब्जे जमा और भवन खड़े कर करोड़ों की कमाई कर रहे हैं। पर आप यदि अपनी खरीदी जमीन पर छोटा-सा घर बनाना चाहते हैं, तो कई तरह के रिश्वतखोर तोड़-फोड़कर पूरे ताम-झाम के साथ आकर बिना मुट्ठी गर्म किए वापिस नहीं जाते। ट्रक-के-ट्रक अवैध माल पार कर जाने वाले को कोई पूछता नहीं पर किलो भर चीज घर के लिए ज्यों-त्यों करके ले जाने वाला ब्लैक के नाम पर पकड़ा जाता है। आम जनता के पास खाने को सामान उपलब्ध नहीं और सरकार की कृपा से, इन्स्पैक्टर महोदयों की दया दृष्टि से दुकानदार खुले आम ब्लैक में बेच रहा है। आम आदमी को मरम्मत के लिए किलो भर सीमेण्ट प्राप्त नहीं और उधर सरकारी गोदामों, उतराई स्थलों से ट्रक-के-ट्रक पार कर समर्थों के भवन मुफ्त में खड़े हो रहे हैं।

इस प्रकार वास्तव में आज चारों ओर भ्रष्टाचार का राज है। उनके बल पर छोटा-बड़ा कोई भी काम करवा लीजिए. रिश्वत लेते समय पकड़े जाने पर रिश्वत देकर छूट जाइये; पर सामान्य ढंग से छोटे-से-छोटा काम करवा पाना सम्भव नहीं। इस प्रकार भ्रष्टाचार जीवन-समाज को किस अन्ध तमस की ओर ढकेले लिए जा रहा है, विचारणीय विषय है।

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