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Hindi Essay/Paragraph/Speech on “Badh Ek Prakritik Prakop”, “बाढ़ एक प्राकृतिक प्रकोप” Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

बाढ़ एक प्राकृतिक प्रकोप

Badh Ek Prakritik Prakop

 

 

प्रस्तावना : ‘मनुष्य और प्रकृति का सम्बन्ध आरम्भ से ही चला आ रहा । है। प्रकृति के आँगन में ही आँखें खोल, । चलना- फिरना सीख धीरे-धीरे प्रगति और विकास किया । आज भी मनुष्य मुख्य रूप से जिन वस्तुओं के सहारे । जीवित है, अपना जीवन चला रहा है, वे सभी प्रकृति की ही महत्त्वपूर्ण देन हैं। अन्न-जल, फल-फूल और हवा आदि सभी प्रकृति का ही तो रूप हैं। ऋषियों-मुनियों ने प्रकृति की गोद में बैठकर ही घोर तपस्या की, वेद-शास्त्र रचे और जीवन को सुखी-समृद्ध एवं अनुशासित किया । इस प्रकार जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव-जीवन प्रकृति से जो कुछ पाता रहता है, उस का बदला कभी भी नहीं चुका सकता ।

प्रकृति और मानव : मानव का शरीर पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश आदि जिन पंचभौतिक तत्त्वों से बना हुआ माना जाता है, वे सब प्रकृति ही हैं। स्वभाव को इसी कारण प्रकृति कहा गया है कि वह मानव चेतना की प्रतीक तो है ही, उसकी स्थिति का मूल कारणभी है। जैसे मानव-स्वभाव का एक पक्ष: बल्कि मूल स्वरूप एवं स्वभाव भी हुआ करता है, यह सभी जानते और मानते हैं। बस प्रकृति और मानव-स्वभाव में एक बहुत बड़ा एवं गहरा अन्तर है। वह यह कि प्रकृति मार खाकर, पीड़ित और प्रताड़ित होकर भी बदले में मानव को सुख-सुविधा ही प्रदान करती है जबकि मनुष्य अपने स्वार्थ पर तनिक- सी आँच पाकर ही उलटा-सीधा सभी कुछ करने लगता है। स्वार्थी मानव ने अपनी मातृ-तुल्य प्रकृति के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया है। उसने प्रकृति-पत्र वनों को भी काट-छाँट कर उनसे प्राप्त आय से अपना पेट और अलमारियाँ भर ली हैं। बाढ़ आने का यह भी एक बहुत बड़ा कारण माना जाता है।

प्रकृति के प्रकुपित रूप : प्रकृति के प्रमुख दो रूप माने गए हैं; एक कोमल-कान्त और शान्त स्वरूप व दुसरा अशान्त कर देने वाला भयानक स्वरूप मूसलाधार वर्षा, आँधी-तूफान और बाढ़ आदि। प्रकृति के भयानक या दूसरे शब्दों में प्रकुपित रूप माने जाते हैं। ये रूप अच्छे – भले वातावरण और संसार को तहस-नहस कर के रख दिया करते हैं। मनुष्य के बसे-बसाये घरों को तबाह, बर्बाद और वीरान बना कर रख देते हैं। इसी प्रकार भूकम्प भी प्रकृति के प्रकोप का ही परिणाम और स्वरूप है। इनमें से एक भी रूप में प्रकृति जब रौद्र रूप धारण कर प्रकुपित हो जाया करती है, तब कुछ भी शेष नहीं रह जाया करता । समाचारपत्रों में ही इन विनाश- लीलाओं का हाल पढ़ कर गटे खड़े हो जाया करते हैं, फिर मुझे तो स्वयं प्रकृति के एक भयानक रूप अर्थात् बाढ़ का शिकार होना पड़ा है। सभी कुछ तन-मन पर सहना और आँखों से भोगना पड़ा है। आगे इसी का हाल सुनाने जा रहा हूँ।

बाढ़ दृश्य वर्णन : बात पिछली वर्षाऋतु की है। हमारा गाँव नदी-तट से कुछ ही दूरी पर बसा हुआ है। इससे पहली वर्षाऋतु में। गाँव और आस-पास के सभी को भयानक सखे का सामना करना पड़ा था, जबकि इस बार एक दिन जैसे ही वर्षा आरम्भ हुई, कई दिनों तक उसने रुकने का नाम तक नहीं लिया । हम लोग पीडा और दु:ख से भर कर बाहर देखते, चारों ओर पानी-ही-पानी नजर आता। इस आशा से आकाश की ओर देखता कि अब वर्षा रुके; पर वह थी कि रुकने के स्थान पर और भी कड़कड़ा कर, जमकर बरस पड़ती। इस तरह सात-आठ दिनों तक लगातार वर्षा के बाद जब एकाएक सूर्य उग आया, सभी ने आशा-उत्साह से भर कर आकाश की जोर देखा । घरों से बाहर निकले; पर पानी में उतार नहीं आया था। फिर भी आशा तो थी ही कि अब सब ठीक-ठाक हो जाएगा सो उस रात निश्चिन्तता की नींद सोए। लेकिन यह क्या ? आधी रात के समय चारों ओर हाहाकार मच गया चारों ओर लोग चिल्ला रहे थे-अरे, बाढ़ आ गई- बाढ़ ! नदी का पानी किनारों के ऊपर बह कर अब बाहर निकल तेजी से आस-पास भरता जा रहा है। सुन कर होश उड़ गए।

अब वर्षा तो नहीं थी, पर बाढ़ वह भी रात के समय ! ओह ! जिस पे जो और जैसे बन पड़ा, बाल-बच्चों को सम्भाल जितना थोड़ा बहुत सामान लिया जा सकता सिरों पर लाद पास ही कुछ ऊँचे पर बनी ‘लवे लाईन की ओर भागा। ऊँचे से जहाँ तक भी नज़र जाती थी शाँ-शाँ करता, भयावह अजगर-सा रेंगता-सपटता पानी-ही-पानी दीख पड़ रहा था। रात के अन्धेरे में ही हमने नदी की धारा में कई जानवरों, पेड-पौधों, घरों की छतों तक को बहते हुए देखा ! हे राम ! यह क्या, एक छत पर कुछ बच्चे-बूढे बचाओ-बचाओ चिल्लाते बहे ना रहे थे; पर उनको बचाने पहुँच पाना कतई संभव न था। देखते-देखते सुबह का प्रकाश छाने लगा।

तेज बाढ़ के प्रवाह में क्या कुछ बहता चला आ रहा था, समझ-बूझ प ना बड़ा कठिन कार्य था। तरह-तरह के सामान, यहाँ तक कि आदमियों की असहाय नाशें भी बही जा रही थीं। एक बहे जा रहे वृक्ष की डाल पर बन्दर, साँप तथा अन्य कई पशु-पक्षी एक साथ सहमे-से बैठे हुए दिखाई दिए। सो मन मार और आँखें मूंदकर एक तरफ चुपचाप बैठ गया। तब तक राहत बाँटने-पहुँचाने वाले दल आ चुके थे। सरकारी दलों की तुलना में स्वयंसेवी संस्थाओं के दल सच्चे मन से राहत पहुँचाने का काम कर रहे थे, यह स्पष्ट है। कोई सप्ताह भर बाद ही हम लोग अपने टूटे-फूटे घरों में लौट पाए थे।

उपसंहार : इस प्रकार वह भयानक बाढ़ तो ज्यों-त्यों कर के बीत गई; पर अपने पीछे जो हानि, जो दाग छोड़ गई, आज तक उसकी भरपाई नहीं हो पाई। निकट भविष्य में बहुत जल्दी हो पाना सम्भव भी नहीं है। भौतिक सामान की भरपाई तो शायद हो भी जाए पर मन में भरी वितृष्णा और बाढ़ की भयावहता नाम सुनते ही पुन: जाग उठती है, आगे भी मन को कचोटती रहेगी।

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