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Hindi Essay, Paragraph, Speech on “Jab Aave Santosh Dhan” , “जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान” Complete Essay for Class 10, Class 12 and Graduation Classes.

जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान

Jab Aave Santosh Dhan

Best 4 Hindi Essay on “Jab Aave Santosh Dhan”

निबंध नंबर :- 01 

‘हरि अनंत, हरिकथा अनंता’ की भाँति हमारी इच्छाओं का भी कोई अंत नहीं होता। एक इच्छा पूरी होती नहीं कि दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है। पूरा जीवन हम इच्छाओं के मूकड-जाल में फंसे रहते हैं। इच्छाओं के इस असीम सागर को पार करना तो किसी धन-कुबेर के लिए भी संभव नहीं। मानव की विचित्र प्रवत्ति होती है कि जितना उसके पास होता है वह उससे संतुष्ट नहीं होता। झोंपड़ी वाला एक पक्के मकान की, पक्के मकान वाला महल की चाह रखता है। भूखा दो रोटी चाहता है, जिसे रोटी मिल जाए उसे स्वादिष्ट भोजन चाहिए, छप्पन भोग चाहिए। यूँ तो व्यक्ति निन्यानवे के फेर में सदा से फंसता आया है किंतु जैसे-जैसे नए-नए ऐश्वर्य और भोग-विलास के साधन उपलब्ध होते जा रहे हैं व्यक्ति के जीवन से संतुष्टि तिरोहित होती जा रही है। असंतोष हमारे सभी तनावों के मूल में होता है। तनाव का सुख और आनंद से छत्तीस का आंकड़ा है। इसीलिए युगों पूर्व मनीषियों ने संतोष को इतना महत्त्व दिया। सारे प्रयत्न कर लेने पर भी यदि हम अपनी कोई इच्छा पूर्ण न कर सके तब हमें अपनी वर्तमान स्थिति में ही संतोष कर लेना चाहिए। प्राय: हम दूसरों की उन्नति, सुख समृद्धि देखकर उनसे ईर्ष्या करने लगते हैं। यह ईर्ष्या हममें असंतोष जगाती है और तब हमारे पास जो कुछ होता है, वह अर्थहीन लगने लगता है। यह सीख बड़ी उपयोगी है-‘देख पराई चूपड़ी, मत ललचावे जीव’। हमें अपनी चादर के अनुसार ही पैर पसारने चाहिए। जो संतुष्ट रहना सीख लेता है, जग में वही सुखी रहता है। आनंद, धन-संपत्ति या उपलब्धि में नहीं-संतोष में है। कबीर के दोहे में जीवन का सार है

चाहगईचिंतामिटी, मनुवाबेपरवाह।

जिसकोकहुचाहिए, सोईसहंसाह॥

निबंध नंबर :- 02

जब आवे संतोषधन सब धन धूरि समान

Jab Aave Santosh Dhan Sab Dhan Dhuri Saman

संकेतबिंदु मनुष्य की लालसाएँ एवं आकांक्षाएँ अनंत हैं। इच्छाएँ बढ़ती जाती हैं। भागों का अंत नहीं। 

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसकी समस्त परेशानियों का एक प्रमुख कारण है तृष्णा। तृष्णा एक ऐसी इच्छा है जो कभी तृप्त नहीं होती। जब मनुष्य इसके चक्रव्यूह में उलझ जाता है तो उसका दिन का चैन और रात की नींद समाप्त हो जाती है। वह हमेशा उधेड़बुन में रहता है। उसके मन में सदैव यही लालसा रहती है कि वह सभी सुखों को प्राप्त कर ले। वह निन्यानवे के फेर में पड़ जाता है। वह संसार की हर वस्तु की लालसा में रहता है। जिस प्रकार एक प्यासा मृग पाना की खोज में मरुस्थल में जा निकलता है और दूर चमकती रेत उसे बहता हुआ पानी दिखाई देता है, उसी प्रकार मनुष्य भा संसार के साधनों को ही असली सुख मान लेता है। परंतु जब मानव को संतोष प्राप्त हो जाता है तो उसे संसार के सारे ऐश्वय निरर्थक जान पड़ते हैं। उनमें उसे कोई रुचि नहीं दिखाई देती। वह हर तनाव, परेशानी से मक्त हो जाता है। संतोष प्राप्त होने से व्यक्ति हर संकट का समाधान कर लेता है। अतः यह सत्य है कि संतोष ही सबसे बडा धन है।

 

निबंध नंबर :- 03

जब आवे संतोषधन सब धन धूरि समान

Jab Aave Santosh Dhan Sab Dhan Dhuri Saman

मनुष्य के मन में हर समय कोई न कोई इच्छा जन्म लेती रहती है। एक इच्छा की पूर्ति के पश्चात् दूसरी इच्छा शुरू हो जाती है। ज्यादा से ज्यादा प्राप्त होने पर भी उसकी इच्छा की पूर्ति नहीं होती। एक कामना की पूर्ति के लिए अनन्त कामनाएं जन्म लेती हैं। इन कामनाओं को पूरा करने के लिए आदमी दिन रात दौड-धूप करता है। इतनी दौड़-धूप करने पर भी जब मनुष्य की इच्छाएं पूरा नहीं होती तो उसके मन में बेचैनी और असन्तोष की भावना उत्पन्न होने लगती है। यही बेचैनी और असन्तोष मनुष्य के दुःखों का मूल कारण है। सन्तोष सबसे बडा सख है और असन्तोष सबसे बड़ा दुःख । सबसे मुश्किल बात यह है कि मनुष्य के मन में सन्तोष नहीं आता। इसीलिए वह दुःखी रहता है।

मानव मन सदा सुख प्राप्त करने की इच्छा करता है। उस सुख की कामना में उसकी इच्छाएँ निरन्तर बढ़ती जाती है। थोड़ा पाकर वह और अधिक पाने की इच्छा करता है जैसे एक निर्धन जिसके पास सौ रुपए हैं, वह सौ पाकर सन्तुष्ट नहीं हो जाता । उसकी इच्छा होती है उसे अब हज़ार मिल जाए. हज़ार से वह फिर लाख और लाख से करोड़ चाहता है। करोड़पति से वह राजा तथा राजा से अपवर्ती सम्राट बनने की इच्छा रखता है। इस प्रकार मनुष्य अपनी बढ़ता हुई इच्छाओं को पूरा करने के लिए इधर उधर भटकता फिरता और अशान्त रहता है।

मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है, परन्तु उसकी इच्छा नहीं मरती । मनुष्य बूढ़ा हो जाता है परन्तु उसकी इच्छा सदा ही जवान रहती है। सिर के सारे बाल सफेद हो गए हैं, आँखों की ज्योति चली गई हैं,सारा शरीर जर्जर हो गया है परन्तु जीने की आशा अभी भी समाप्त नहीं हुई है। एक हस्पताल में 80 साल का बूढ़ा जिसके सारे के सारे शरीर को लकवा मार गया है वह हस्पताल की नर्स को आँख मार रहा है तथा मानों कह रहा है-

गोया हाथ में जुम्बिश नहीं गालिब, अभी आँख में दम है।

 

यह तो है जीते जी मनुष्य का उदाहरण। मरने के बाद भी कितने संस्कार, कितनी रस्में निभानी पड़ती हैं-

आदमी की खवाहिशों की इन्तहा नहीं गालिब

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए. दो गज कफ़न के बाद

हमें तृष्णा से बचना चाहिए, उसका त्याग करना चाहिए ।

सन्त कवि सुन्दर दास ने कितने सुन्दर शब्दों में इसका वर्णन किया है-

तृष्णा तू अति कोढ़नी, लोभ भर्तार

इन्हें कभी भेटिए, कोढ़ लगे ततकाल

 

अर्थात् तृष्णा कोढ़नी है और लोभ उसका भाई है। इनसे कभी भी भेंट नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह उसी समय लग जाते हैं।

सभी प्रकार की बुराइयां जैसे रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, देशद्रोह, असामाजिकका भरमार. अपराधिक वत्ति में बढौतरी के मूल में असन्तोष की भावना काम कर रही है। असंतुष्ट व्यक्ति अपनी इच्छा पूर्ति के लिए कुछ भी करने यार हो जाता है। एक असन्तुष्ट व्यक्ति केवल अपना ही हित सोचता है सा दूसरे का नहीं। लोभ के कारण वह रातों रात करोड़पति बनने के सपने देखता है। लोभ के कारण मनुष्य अपने पास की पूँजी को भी गॅवा लेता है। मिलावट, चोर बाज़ारी, तस्करी, काला बाज़ार सभी प्रकार की बुराइयों के मूल में असन्तोष की भावना ही काम कर रही है।

सन्तोष अमृत के समान है। सन्तुष्ट व्यक्ति ही इस संसार में सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। जो सुख ईमानदारी से कमाई रोटी खाकर ज़िन्दगी बसा करने से मिलता है, वह लोभ और लालच द्वारा कमाई गई रोटी से नहीं । एक सन्तुष्ट व्यक्ति तो भिखारी होते हुए भी शहनशाह होता है जबकि एक धनवान से धनवान व्यक्ति सब कुछ होते हुए भी दुःखी होता है। कबीर का कहना है-

जिसको कछु चाहिए, सोई शहनशाह

 

स्वयं धन में कोई दोष नहीं है। जीवन की आवश्यकताओं को परा करने के लिए धन की परमावश्यकता है। दर्शनशास्त्र धन के विरुद्ध नहीं हैं। इसमें यह नहीं कहा गया कि धन को छोड़ दो। केवल धन के बेईमानी से कमाने की इच्छा को छोड़ने के लिए कहा गया है। मेहनत की कमाई रोटी ही सन्तुष्टि देती है। इसलिए हमें अपनी सभी प्रकार की तृष्णाओं का त्याग करके सुखपूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक, सन्तोषपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। सन्त कबीर ने ठीक ही कहा है-

गोधन, गजधन, वाणिधन,सबरतननकीखान

जबआवैसन्तोषधन, सबधनधूरिसमान

 

निबंध नंबर :- 04

जब आवै संतोष धन

Jab Aave Santosh Dhan

 

संकेत बिंदुसंतोष का महत्त्वसंतोष का अर्थइच्छाओं पर नियंत्रणसंतोषी व्यक्ति सदा सुखी  

संतोष का महत्त्व भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले ही बता दिया था। पाश्चात्य विद्वानों एवं विचारकों ने भी संतोष को ही जीवन का सार माना है। यह पूर्णतः सत्य है कि संसार के अन्य धन व्यक्ति को सच्चा सुख नहीं दे सकते, अपितु वे उसकी लालसा को ही बढ़ाते हैं, जबकि संतोष का धन आने पर अन्य सब प्रकार के धन धूल के समान प्रतीत होने लगते हैं। संतोष का अर्थ वर्तमान दशा से तृप्त रहने को ही समझना भूल होगी। प्रत्येक व्यक्ति को अपने विकास हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपने व्यक्तित्व को पूर्ण किए बिना कोई व्यक्ति समाज एवं मानवता का भला नहीं कर सकता। व्यक्तित्व का सही विकास करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है। धन-वैभव इंद्रियों को संतुष्टि नहीं दे सकते। राजा शुद्धोधन के महलों में भला सिद्धार्थ को किस वस्तु की कमी थी, परंतु सिद्धार्थ को सुख-शांति की प्राप्ति बोधवृक्ष के नीचे ही हुई। सम्राट अशोक को किस चीज का अभाव था, पर उन्हें भिक्षुक के समान जीवन व्यतीत करने में परम संतोष का अनुभव हुआ। आज संसार में जितना भी कलह एवं संघर्ष है, उसका कारण इच्छाओं की लगातार वृद्धि ही है। प्रत्येक मनुष्य अपने वर्तमान से असंतुष्ट है और अधिकाधिक पा लेना चाहता है। उसमें संचय की वृत्ति पनपती जा रही है। इस कारण जीवन अशांत हो चला है। हमें संतोषी स्वभाव का बनना चाहिए। मानसिक तनाव को कम करने के लिए संतोष रखना आवश्यक है। दूसरों के हित का विचार भी हमें करना चाहिए। कहा गया है-“संतोषी व्यक्ति, सदा सुखी।”

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