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Hindi Essay, Paragraph or Speech on “Jayprakash Narayan”, “जयप्रकाश नारायण”Complete Essay, Speech for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

लोकनायक जयप्रकाश नारायण

Lok Nayak Jayprakash Narayan

 

     

        ’’हां जयप्रकाश है नाम समय की करवट का अंगराई का।

        भूचाल बवण्डर के ख्वाबों से भरी हुई तन्हाई का।।’’

        सम्पूर्ण क्रान्ति के सूत्रधार, लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 ई0 में बिहार के छपरा जिलान्तर्गत ’सिताबदियारा’ नामक गांव में हुआ था। जयप्रकाशजी का जन्म एक मध्यवर्गीय कायस्थ परिवार मंे हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई थी। बचपन से ही वे कुशाग्र बुद्धि के छात्र थे। सन् 1919 ई0 में इन्होंने प्रथम श्रेणी में इण्टेªन्स की परीक्षा पास वकील और कांग्रेसी नेता थे। वे जयप्रकाशजी की प्रतिभा पर मुग्ध हो गये और 1919 ई0 में अपनी इकलौती पुत्री प्रभावती की शादी उनसे कर दी। इस प्रकार प्रभा और प्रकाश का मिलन हुआ। इण्टर पास करने के बाद महाविद्यालय की पढ़ाई के लिए जयप्रकाशजी का नामांकन पटना साइन्स काॅलेज में हुआ। विज्ञान की पढ़ाई के लिए पटना साइन्स काॅलेज की गिनती तभी और अब भी बिहार में सबसे अच्छे काॅलेजों में होती है।

        उस समय देश का वातावरण गरम था। सर्वत्र स्वतन्त्रता की लहर बन रही थी। गांधीजी के असहयोग आन्दोलन का उफान जोरों पर था। ऐसे में जयप्रकाशजी का पढ़ाई में मन नहीं लगा। वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। बाद में पटना वि0वि0 से आई0 एस-सी0 की परीक्षा पास कर सन् 1922 ई0 में ये उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गये। अमेरिका प्रवास के दौरान इन्हें विषम आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। युवा जयप्रकाश कभी अमेरिका के होटलों मे जूठे बर्तन धोते, तो कभी बैरा का काम करते थे। वे कभी-कभी कमरों की सफाई का कार्य भी करते थे। लेकिन अपने लक्ष्य से वे कभी नहीं डिगे और अन्ततः 1928 ई0 में अमेरिका के वि0वि0 से बी0ए0 की डिग्री हासिल कर ली मां की बीमारी का समाचार पाकर आगे की पढ़ाई छोड़कर जयप्रकाश बाबू स्वेदश लौट आये।

        स्वदेश आकर सपत्नीक जयप्रकाशजी गांधीजी के अनुयायी बन गये। दोनों ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस क्रम में कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा। सन् 1942 ई0 मंे तो हजारी बाग के केन्द्रीय कारागार से दीवार फांदकर जयप्रकाशजी भाग गये और आन्दोलन का नेतृृत्व किया। पुनः पकड़ लिये जाने पर उन्हें कठोर यातनाएं दी गयीं।

        आजादी के बाद राजनीति में आयी गिरावट के चलते इन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया और विनोबा के भूदान आन्दोलन से जुड़ गये। इस बीच सन् 1974 ई0 मंे इन्दिरा गांधी द्वारा आपातकाल घोषित कर दिया गया। जयप्रकाशजी को यह अलोकतान्त्रिक लगा। बस क्या था। बूढ़ा शेर दहाड़ उठा। सर्वत्र आपातकाल का विरोध शुरू हो गया। बूढ़ा एवं रोगग्रस्त होने के बावजूद जयप्रकाशजी ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। इनके द्वारा सम्पूर्ण क्रान्ति का आकर्षक नारा दिया गया। सार्वजनिक सभाओं में इनका यही आहृान होता था-

                                ’’सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा है

                                भावी इतिहास हमारा  है।’’

        इनकी सभाओं में एकत्रित भीड़ को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा कि बापू एक बार फिर जीवित हो उठे हैं। इन्दिरा सरकार का पतन हो गया और केन्द्र में जनता पार्टी की लोकप्रिय सरकार का गठन हुआ। परन्तु कुछ ही दिनों मंे जनता पार्टी के नेताओं के तुच्छ स्वार्थ के चलते केन्द्र की जनता सरकार टूट गयी। फलतः जयप्रकाशजी का बूढ़ा हृदय भी टूट गया और 8 अक्टूबर 1979 ई0 को वे हमारे बीच से सदा के लिए चल बसे।

        इनके निधन पर लोगों ने का-’’सम्पूर्ण क्रान्ति का सूत्रधार, अहिंसा का पुजारी, गांधी और विनोबा का सच्चा उत्तराधिकारी हमारे बीच से उठ गया।’’

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