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Hindi Essay-Paragraph on “Bharatiya Samaj mein Nari ka Sthan” “भारतीय समाज में नारी का स्थान” 700 words Complete Essay for Students.

भारतीय समाज में नारी का स्थान

Bharatiya Samaj mein Nari ka Sthan

भारतीय संस्कृति का इतिहास साक्षी है कि भारतीयों ने नारी जाति को हमेशा सामाजिक प्रतिष्ठान एवं सर्वोच्च स्थान प्रदान किए हैं। वैदिक युग में नारी सामाजिक अhथना की पात्रा थी। प्रकृति स्वरूपा नारी को परमेश्वर की शक्ति के रूप में स्थान दिया गया है। विद्या, विभूति एवं व्यक्ति को क्रमशः सरस्वती, लक्ष्मी एवं दुर्गा के रूप में उपास्थ माना जाता है। मनु का कथन आज भी हम हृदय से स्वीकार करते हैं-

यम नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

अत्यधिक प्राचीन युग मातृसत्तात्मक परिवार का युग होता था, जिसमें मातापरिवार की मुखिया होती थी और उसके नाम से ही परिवार परिचित होता था। काल क्रम से पितृ-प्रधान परिवार होने लगे। किंतु मातृपद पूजनीय ही बना रहा। लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व वैदिक युग में स्त्रियों को श्रेष्ठ सामाजिक अधिकार प्राप्त थे। उसे न केवल वैदिक मंत्रों के पाठ का वरन् वेद मंत्रों की रचना का भी अधिकार था। कोई भी धार्मिक अनुष्ठान उसके अभाव में पूरा नहीं होता था। वैसी महान् नारियां हैं-गार्गी, मैत्रेयी, कात्यानी, अनुसूया, अपाला आदि। गृह-प्रबंध ही नहीं, राज्य-प्रबंध और कभी-कभी युद्ध क्षेत्र में भी स्त्रियां पुरुषों का साथ देती थीं। कुंती, शकुंतला, रुक्मिणी, कैकेयी आदि के नाम विभिन्न संदर्भो में उल्लेख्य हैं।

समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदलती गई तथा सामाजिक परिवेश बदलते गए। आचार-विचार में भी परिवर्तन होते रहे। देश में अनेक सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक क्रांतियां हुईं। प्राचीन मूल्यों के ढांचे लड़खड़ा गए तथा नये-नये मूल्यों का उद्भव हुआ। मध्य युग आते-आते स्त्रियां की सामाजिक स्थिति में काफी ह्रास आ गया। आदर एवं श्रद्धा के स्थान पर स्त्री केवल मनोरंजन की वस्तु रह गई।

विदेशी यवनों के आक्रमण तथा राज्य की स्थापना के पश्चात् देश की सभ्यता एवं संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा। मुस्लिम शासनकाल में नारी जाति का अधःपतन तेजी के साथ हुआ। उस पर चाहे-अनचाहे अनेक बंधन लग गए। उनकी स्वतंत्रता घर की दीवारों के भीतर सीमित हो गई। साहित्य और समाज में वह मात्र मनोरंजन का साधन अथवा घर की दासी बनकर रह गई। विचार कितने बदल गए, उसके लिए कबीर का यह दोहा पर्याप्त है

नारी की झाईं पड़त, अंधा होता भुजंग।

कबिरा तिनकी कौन गति, नित नारी के संग ॥

प्रत्येक क्षेत्र में नारी को आघात लगा। परदा-प्रथा तथा बाल-विवाह का प्रचलन हो गया। कन्या को शिक्षा देना अनावश्यक समझा गया। सामाजिक कार्यों में नारी का प्रदेश निषिद्ध हो गया। इस तरह नारी क्रमशः शक्ति का प्रतीक न रहकर अबला बन गई। गुप्तजी की भावना से परिचित हुआ जाए-

अबला जीवन हाय! तुम्हारी वही कहानी।

आंचल में है दूध और आंखों में पानी ॥

आधुनिक युग में पुनः नारी के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आने लगा। इस युग में नारी पूज्य और श्रद्धा की पात्र रहे न रहे इसे बराबरी का अधिकार जरूर मिल रहा है। हालांकि अभी भी पूर्वाग्रह समाप्त नहीं है, फिर भी अब नारी की ओर से ही कमी हो रही है। नारी के हितार्थ स्वयंसेवी संस्थाएं जितना चाहिए, उतनी जुझारू नहीं हो पा रही है।

आधुनिक युग भारत में नारी के उत्थान का युग है। सांस्कृतिक पुनर्जागरणकाल में समाज सुधारकों और विचारकों ने नारी की दुर्दशा पर भी ध्यान दिया। स्वामी दयानंद, राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर तथा महात्मा गांधी जैसे सांस्कतिक महापरुषों ने जिस संस्कृति को जन्म दिया, उससे नारी-मक्ति आंदोलन की लहर फैल गई। अंग्रेज शासकों को भी बाध्य होकर सती-प्रथा जैसी कप्रथा पर कानूनी रोक लगानी पड़ी। धीरे-धीरे स्त्रियों को खोये हुए अधिकार मिलने लगे। बाल-विवाह, अनमेल-विवाह, पर्दा-प्रथा आदि शिथिल पड़ने लगे तथा स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह जैसे प्रगति मलक कार्यों पर जोर दिया जाने लगा। समस्त विचारकों ने अपने-अपने ढंग से नारी-मुक्ति आंदोलन में योगदान दिया। नारी को सामाजिक अधिकार दिए जाने लगे एवं उसकी महत्त्व का परिचय प्राप्त होने लगा। साहित्य में नारी जागरण का संदेश गंज उठा।

डॉ. राहुल ने लिखा है-

नारी है पूजा की मूर्ति

नारी आत्म-निवेदन है

नारी है विश्वास-भावना,

नारी करुणा-रोदन है।

एक अन्य जगह उन्होंने लिखा है-

सारा सौंदर्य-दर्शन जैसे समा गया है

नारी की देह-यष्टि में।

आधुनिक युग में नारी ने अपने खोये अधिकार पुनः प्राप्त किए। पिछली श्रृंखलाएं टूटने लगीं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर मांतगिनी हाजरा, कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, कमला नेहरू अदि ने पुरुषों के कंधों से कंधा मिलाकर संघर्ष किया एवं यातनाएं सहीं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में बंदूक धारण करने वाली आजाद हिंद सेना की नारी सैनिकों का साहस एवं शौर्य भुलाया नहीं जा सकता। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नारी ने राष्ट्रीय कार्यों में भाग लेकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है।

भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी विश्व की सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक महिला मानी जाती थी। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में राजनीतिज्ञ विधिवेत्ता न्यायाधीश प्रशासक, राजदूत, कवि, चिकित्सक, वैज्ञानिक आदि के रूप में भारतीय नारी ने विशिष्ट स्थान बना लिया है। अब वह किसी भी क्षेत्र में अबला नहीं रही। उसने सिद्ध कर दिया है कि उसमें पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर घर और बाहर सभी क्षेत्रों में कार्य करने की क्षमता है। भारतीय संविधान ने भारतीय महिलाओं को पुरुषों की भांति समान अधिकार प्रदान किए हैं। स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में क्रमशः सधार लाए जा रहे हैं, शहरों की महिलाओं का कार्य क्षेत्र निरंतर व्यापक एवं क्षमताशील बनता जा रहा है। अभी ग्रामीण स्तर पर निश्चय ही बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

भारतीय नारी ने अपनी शक्ति को पहचान लिया है। उसने अपने-आपको प्रत्येक क्षेत्र में स्थापित करना आरंभ कर दिया। अब वह अपने अस्तित्त्व के लिए संघर्ष करने को भी प्रस्तुत है।

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