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Hindi Essay, Paragraph on “Bharatiya Rajniti mein Jativad”, “भारतीय राजनीति में जातिवाद” 1000 words Complete Essay for Students of Class 9, 10 and 12 Examination.

भारतीय राजनीति में जातिवाद

Bharatiya Rajniti mein Jativad

भारत का राजनीतिक विकास षड्यंत्रों का शिकार हो रहा है। आर्य संस्कृति से भटक रहा है। आज की राजनीति स्वार्थ सीमा से संचालित हो रही है। राजनेताओं में जनकल्याण एवं राष्ट्रप्रेम नाम मात्र को भी दिखाई नहीं देता। चारों ओर जातिवाद अपना कहर बरपा रहा है। राजनेता सिंहासन की दौड़ में जातिवाद के जूते से होड़ लगा रहे हैं।

संपूर्ण भारत जातिवाद के नारों से गूंज रहा है-

तिलक, तराजू और तलवार इनको मारे जूते चार।” -बसपा

“तुम मुझे स्थायित्व दो, मैं तुम्हें समृद्धि दूंगा।” -कांग्रेस

“हिंदू का गौरव वापस लाना होगा।” -भाजपा

‘या अली’, ‘जय बजरंग बली’ के नारों से भारत का आकाश आच्छादित है। सभी राजनेता जातिवाद का मुखौटा लगाए हुए हैं, कोई भारतीय दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि राजनेता जातिवाद के सहारे सिंहासन प्राप्त करने के उपरांत जनता को अकेला छोड़ देते हैं। भारत में भाषावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद एवं भ्रष्टवाद निरंतर उच्च शिखर की ओर तेज गति से बढ़ रहे हैं।

अंबेडकर मंदिर की स्थापना भारत के प्रत्येक गांव में करने की सलाह दी जा रही है। यहां इन राजनेताओं की अंबडेकर भक्ति नहीं, स्वार्थ-शक्ति कार्य कर रही है। मुस्लिमों को अयोध्या कूच के लिए बहकाया जा रहा है। अयोध्या गुंबद तोड़कर गौरव दिवस मनाया जा रहा है। आज के राजनेता नैतिकता की ऐनक से राजनीति नहीं करते। जातिवाद के अश्व से सिंहासन प्राप्त करना चाहते हैं। जन्म के आधार पर जाति का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। जबकि भारत में कभी भी जाति जन्मानुसार नहीं रही है। कर्मानुसार जातियां आज भी भारत में विद्यमान हैं। राजनेता दलितों को क्षुद्र बताकर भड़का रहे हैं। भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ही वर्ण हैं। यूं शूद्र को दस्यु चोर कहा जाता है। सनातन धर्म शूद्रों को भी उन्नति का अवसर दे रहा है, क्षमा प्रदान कर रहा है। वाल्मीकि इसका प्रमाण है। किंतु भारतीय राजनेता जन- भावनाओं को भड़का कर अपना उल्ल सीधा करना चाहते हैं, राष्ट्र की इन्हें कोई चिंता नहीं है।

भारत के सभी दल जाति के अनुसार ही अपना प्रत्याशी निश्चित करते हैं। जातीय गणित आगे एवं कर्तव्य गणित पीछे चल रहा है। भाजपा ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों का दल कहा जाता है। सपा एवं बसपा अपने दल को दलितों का ईश बताती है। समता पार्टी कुर्मियों का दल कही जा रही है। मंडल कमीशन ने भारत में जाति चक्र चलाकर जातिवाद का उन्मूलन कर जातिवाद को आश्रय दिया जा रहा है। ऋषियों की वर्ण-व्यवस्था को समाप्त कर जातिगत आरक्षण दिया जा रहा है। सरकार आरक्षण के चक्र से शत्रु संहार करना चाहती है। भारत में भारत सरकार नहीं, दलों की सरकार चल रही है। दलितों को सरकार सहायता दे, किंतु उसे दलीय हित का लक्ष्य निर्धारित न करे। उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की है। किंतु कुछ राज्य इससे बहुत आगे निकल गए हैं। भारत के राजनेता आज अपने को जातिगत नेता कह रहे हैं। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव अपने को यादवों का नेता कह रहे हैं। पासवान, मायावती अपने को दलितों का नेता घोषित कर रहे हैं। अजीत सिंह अपने को जाट नेता बता रहे हैं।

जातिवाद भारतीय राजनीति का कोढ़ बन चुका है। भारत में जातिवाद का जहर इतना बढ़ गया है कि प्रत्येक नागरिक केवल अपनी ही जाति को महत्त्व देता है। राष्ट्र या समाज की भलाई के विषय में नहीं सोचता।

प्रसंगात सोहनलाल द्विवेदी की पंक्तियां याद आ रही हैं-

वर्ण-वर्ण में छिपा द्वंद्व हैं, जाति-जाति से जूझ रही है।

स्वार्थ किए हैं व्यग्र सभी को, खुयाति खुयादि कब सूझ रही है।

विवाह समारोह भी जातिवाद पर खड़े हैं। सवर्णो, दलितों, पिछड़ों, अगड़ोंपिछड़ों के बीज बो दिए गए हैं। बिहार में जाति के आधार पर हिंसा का तांडव हो रहा है। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो, राज करो’ कि नीति की अपनाई थी। आज के नेता, ‘जाति डालो, राज करो’ की नीति अपनाए हए हैं।

समाज सुधारकों ने जाति नाश का बीड़ा उठाया था। किन्तु आज के राजनेता रोटी और बोटी के आधार पर वोट प्राप्त करना चाहते हैं और देश का विभाजन करना चाहते हैं। राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता को बढ़ाया जा रहा है। आज जाति कल्याण का नारा दिया जा रहा है। जन कल्याण की भावना को नष्ट किया जा रहा है। मनु की व्यवस्था को मनुवाद बताया जा रहा है। इसी मनु के नाम पर व्यक्ति मानव कहलाया। इसी मनु ने मानवता को जन्म दिया था, वरना बर्बर लोग सृष्टि को ही नष्ट कर देते। मनु ने कर्म के अनुसार जाति की बात तो कही है, किंतु जन्म के आधार पर उसका समर्थन नहीं किया। अखिल बिंब में सिर्फ एक मानव जाति के पक्षधर डॉ. राहुल का कथन है कि

जाति वर्ण-केवल भ्रम है

सभी जीव जन एक समान

द्वेष मिटाकर प्रेम बढ़ाएं

एक ईश सबका भगवान!

कोई व्यक्ति निनदीय नहीं है। मनुष्य कर्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या कुछ भी बन सकता है। मनु ब्राह्मणवाद बताया जा रहा है। ब्रह्मा के पुत्र ब्राह्मण हैं। अतः जन्म से सभी ब्राह्मण है। हाथ साफ करना, हाथ जोड़ना, चरण-स्पर्श करना, सप्त पदी से विवाह करना, पत्नी को अर्धागिनी बताना, निर्बल की सेवा करना, ब्राह्मणवाद है। नीति के देव, अनीति के दानव कहलाते हैं। दोनों भ्राता हैं। नीति मनु की माता है। देव आर्य और दानव अनार्य भी कहे जाते हैं या देव-द्रविड़ भी कह सकते हैं। समीक्षक हैं। संपूर्ण विश्व ब्रह्मा ने ही उत्पन्न किया है। वे ही सृष्टि के रचयिता हैं। भारत धर्म (कर्तव्य) का देश है। सनातन धर्म, जातिवादकों को प्रश्रय नहीं देता। इनका प्रमाण है प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर बढ़ता जन समुदाय। गंगाजल से अपने इष्ट देव का अभिषेक करने के लिए बोल-बम के उद्घोष के साथ आगे बढ़ता है। सभी ब्राह्मणों का वस्त्र, तौलिये का प्रयोग करते हैं। दलित, सवर्ण, भंगी, जाटव सभी उसमें होते हैं। बिना भेदभाव के लोगों की सेवा में सेवकगण लगे रहते हैं। आशा है इस देश में जातिवाद नहीं चलेगा, जातिवादी नेता भी न रहेंगे। देश और खुशहाल समानतापूर्ण जनता रहेगी। अ

गर ऐसा न हुआ तो सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में-

भारत मस्तक का कलंक यह

जाति-पातियों में जन खंडित।

जहां मनुज अस्पृश्य चरम राज

राष्ट्र रहे वह कैसे जीवित।

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