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Hindi Essay on “Yadi mein Pradhan Mantri Hota” , ” यदि मैं प्रधानमंत्री होता” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

यदि मैं प्रधानमंत्री होता

Yadi mein Pradhan Mantri Hota

Best 5 Essays on ” Yadi Mein Pradhan Mantri Hota”

निबंध नंबर :-01 

मानव संभवत : महत्वकांक्षी प्राणी है। अपने भविष्य के बारे में वह अनेक प्रकार के सपने देखा करता है तथा कल्पना की उड़ान में खोया रहता है। कभी-कभी मेरे मस्तिष्क में भी एक अभिलाषा होती है -यदि में देश का प्रधानमंत्री होता।

पर यह अकांक्षा आकाश के तारे तोडऩे के समान है, तथापि फिर भी मन के किसी कोने से एक आवाज आती है। यह असंभव तो नहीं है। भारत का ही कोई व्यक्ति जब देश का प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करेगा तो तुम क्यों नहीं।

यदि मेरी कल्पना साकार हो जाए, तो मैं अपने देश की विश्व के उन्नत, समृद्ध तथा शक्तिशाली राष्ट्रों के समकक्ष खड़ा करने में कोई कसर न छोड़ूंगा। मेरी दृष्टि में प्रधानमंत्री का सर्वप्रथम दायित्व है अपने देश को हर प्रकार से सबल और समृद्ध बनाना।

प्रधानमंत्री का दायित्व संभालते ही मेरे लिए राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि हो जाएगी। यद्यपि अपने पड़ोसी देशों से मित्रता का हाथ बढ़ाने में भी मैं पीछे नहीं हटूंगा पर सीमा पर हो रहे आतंकवाद तथा घुसपैठ को कतई सहन नहीं कर पाऊंगा। इसके लिए मुझे भारत की सैन्य शक्ति में वृद्धि करनी होगी जिससे शत्रु राष्ट्र हम पर आँख उठाने की भी हिम्मत न कर सकें। मैं घुसपैठियों के सारे रास्तों को बंद करवाकर शत्रु को ऐसा पाठ पढ़ाऊंगा कि वहां कभी हमला करने का दुस्साहस न कर सकें और यदि आवश्यक हुआ तो युद्ध से भी पीछे नहीं हटूंगा। उस संदर्भ में मैं अंतर्राष्ट्रीय दबाव में नहीं आऊंगा। मेरा आदर्श तो कवि दिनकर     की ये पंक्तियां होंगी-

छोड़ों मत अपनी आन

भले शीश कट जाए,

मत झुको अन्य पर

भले व्योम फट जाए

दो बार नहीं यमराज कंठ धरता है

मरता है जो एक ही बार मरता है

तुम स्वंय मरण के मुख पर चरण धरो रे

जीना है तो मरने से नहीं डरो रे।

प्रधानमंत्री बनने पर मैं देश व्याप्त भ्रष्टाचार, बेईमानी, रिश्वतखोरी तथा भाई भतीजावाद को समाप्त करने के लिए पूरा प्रयास करूंगा तथा देश को स्वच्छ तथा पारदर्शी सरकार दूंगा। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करूंगा।

मेरा मानना है कि आज भारत को जितना बाहरी शत्रु से खतरा है उससे अधिक भीतरी दुश्मनों से है। देश में बढ़ता आतंकवाद तथा सांप्रदायिकता भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहे हैं तथा राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा बन गए हैं। मैं इन पर नकेल कसने के लिए नए कानून बनाकर इन दुष्प्रवत्तियों पर अंकुश लगाऊंगा। प्रधानमंत्री बनने के बाद आतंकवाद को जड़ से समाप्त करके ही दम लूंगा।

मैं यह भली-भांति जान चुका हूं कि देश के जिस प्रकार की शिक्षा पद्धति प्रचलित है, वह अत्यंत दूषित, उद्देश्यविहीन तथा रोजगारोन्मुख बनाऊंगा। मैं पूरे देश में समान शिक्षा पद्धति लाने के लिए संविधान में परिवर्तन करने का प्रयास भी करूंगा।

भारत विश्व के बड़ें राष्ट्रों से आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। मेरा यह प्रयास होगा कि आर्थिक दृष्टि से यह विश्व के उन्नत देशों के समकक्ष आ सके। इसके लिए मेरी दो योजनांए होंगी- कृषि का आधुनिकीकरण तथा उद्योग धंधों को बढ़ावा।

प्रधानमंत्री बनने पर मैं विभिन्न टी.वी. चैनलों के माध्यम से हमारी संस्कृति पर हो रहे कुठाराघात को रोकूंगा तथा भारतीय संस्कृति के गौरत की रखा करूंगा।

खेल जगत में भारत के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए मैं देशव्यापी अभियान चलाकर प्रतिभाशाली तथा उदीयभान खिलाडिय़ों का चयन कर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की योजना को कार्यरूप दूंगा।

मैं मानता हूं कि इतने सभी कार्य एंव सुधार करने अत्याधिक कठित हैं तथापि मेरा दृढृनिश्चय है कि यदि एक बार प्रधानमंत्री बन गया तो सब कर पाऊंगा।

 

निबंध नंबर :- 02 

यदि मैं प्रधानमन्त्री होता 

Yadi mein Pradhan Mantri Hota

प्रस्तावना- हमारा देश भारतवर्ष एक स्वतन्त्र व गणतन्त्र देश है। यहां प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक अपने विचारों को प्रकट करता है। कोई व्यक्ति राष्ट्रपति, कोई डाॅक्टर, कोई वकील, कोई पुलिस, कोई क्रिकेटर तथा कोई प्रधानमन्त्री बनना चाहता है। मै भी प्रधानमन्त्री बनने की इच्छा रखता हूं।

प्रधानमन्त्री पद का महत्व- कोई भी योग्य व्यक्ति व्यस्क मताधिकार के द्वारा जो भारत का नागरिक हो, प्रधानमन्त्री बन सकता है। प्रधानमन्त्री का पद बहुत गरिमा व उत्तरदायित्व का होता है।

मेरे स्वप्न- सौभाग्य ये यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता तो सबसे पहले मैं राष्ट्र के विकास व उत्थान के लिए कार्य करता। मैं इस विशाल देश में जाति-पाति और धर्म के नाम पर होने वाले झगड़ों को समाप्त कर सम्पूर्ण भारतवासियों के मन में एकता की भावना उत्पन्न करता, क्योंकि एकता में बहुत शक्ति होती है। यदि पूरा देश एक साथ मिलकर रहे तो इस देश का कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

मेरी योजनाएं- हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी की है जिस कारण माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते तथा प्रारम्भ में ही उन्हें काम पर लगा देते हैं जैसे बच्चों में अज्ञानता व अशिक्षा रहती है। अतः यदि मैं प्रधानमन्त्री होता तो मैं बच्चों में शिक्षा की भावना जागृत करता, क्योंकि आज के बच्चे ही कल के देश का उज्जवल भविष्य हैं।

हमारे देश की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर है। इसलिए भारतीय कृषि में सुधार लाने की अत्यन्ता आवश्यकता है। वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही कृषि में सुधार सम्भव है। इसके लिए मैं नए-नए उपकरणों उत्तम बीज और अच्छी खाद के लिए किसानों को प्रेरित करता। बैंक प्रणाली विकसित करता ताकि किसानों की सरलता से ऋण प्राप्त हो जाते तथा उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती।

उत्थान के कार्य- यदि मैं प्रधानमन्त्री होता तो देश के उत्थान के साथ-साथ समाज कल्याण की ओर भी मैं विशेष ध्यान देता। दलित वर्ग पिछली जाति, अपाहिज व निर्धनांे को सुविधाएं प्रदान करता।

दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं की सुगमता से उपलब्ध करवाने के लिए जगह-जगह सदर बाजारों का निमार्ण करवाता ताकि जनता को एक ही जगह से बहुत सारी वस्तुएं प्राप्त हो जाती। मैं देश की आन्तरिक शान्ति एवं समृद्धि के लिए हर सम्भव प्रयास करता। प्रत्येक व्यक्ति के लिए अन्न, वस्त्र तथा रहने की व्यवस्था कराने का प्रयत्न करता।

उपसंहार- इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार फैलाने वाले कर्मचारियों की अपनी नौकरी से निलम्बित करता। देश के विभाजनकारी एवं विघटनकारी तत्वों के लिए प्राणदण्ड की व्यवस्था करता।

नशीली वस्तुओं के उत्पादन तथा उपयोग पर पाबन्दी लगाता और उसका कठोरता से पालन करवाता। अपराधी पर अंकुश लगाने के लिए वर्तमान कानूनों में मौलिक परिवर्तन करता। असामाजिक तत्वों से प्रेम से भाईचारे एवं न्याय तथा स्नेह का पाठ पढ़ाते हुए सुधार लाता और अगर आवश्यकता पड़ती तो सख्त-से-सख्त कानून भी लागू करता।

इस प्रकार यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता तो अपने देश भारतवर्ष को विश्व में पूर्ण सम्मान दिलवाता। जिससे मेरा देश भारत फिर से ‘सोने की चिड़िया‘ के नाम से विख्यात होता तथा भारत देश विकासशील देश के बजाय विकसित देशों की श्रेणी में आ जाता। विकसित देशों में मैं जापान का नाम लेना आवश्यक समझता हूं।

निबंध नंबर :- 03

यदि मैं प्रधान-मंत्री होता

Yadi mein Pradhan Mantri Hota

यदि मैं प्रधान-मंत्री होता-अरे। यह मैं क्या सोचने लगा। प्रधान-मंत्री भी बन पाना खाला जी का घर है क्या ? प्रधान-मंत्री-ओह। कितना बड़ा कितना भारी शब्द है यह, जिसे सुनते ही एक ओर तो कई तरह के दायित्वों का अहसास कर उनके निरन्तर पड़े रहने वाले बोझ के कारण मस्तक अपने-आप ही झुकने लगता है, जबकि दूसरी ओर स्वयं ही एक अनजाने से गर्व से उठ कर तनने भी लगता है। भारत जैसे महान् लोकतंत्र का प्रधान-मंत्री बनना वास्तव में बहुत बड़े गर्व और गौरव की बात है, इस तथ्य से भला कौन इन्कार कर सकता है। प्रधान मंत्री बनने के लिए लम्बे और व्यापक जीवन अनुभवों का. राजनीतिक कार्यों और गति-विधियों का प्रत्यक्ष अनुभव रहना बहुत ही आवश्यक हुआ करता है। प्रधान मंत्री बनने के लिए जन-कार्यों और सेवाओं की पृष्ठभूमि रहना भी जरूरी है और इस प्रकार के व्यक्ति का अपना-जीवन भी त्याग तपस्या का आदर्श उदाहरण होना चाहिए। एक और महत्त्वपूर्ण बात भी जरूरी है। वह यह कि आज के युग में छोटे-बड़े प्रत्येक देश और उसके प्रधान मंत्री को कई तरह के राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय दबावों, कुटनीतियों के प्रहारों को झेलते हुए कार्य करना पड़ता है। अतः प्रधान मंत्री बनने के लिए व्यक्ति को चुस्त-चालाक, कूटनीति-प्रवण और दबाव एवं प्रहार सह सकने योग्य मोटी चमड़ी वाला होना भी बहुत आवश्यक माना जाता है। निश्चय ही मेरे पास ये सारी योग्यताएँ और ढिठाइयाँ नहीं हैं। फिर भी अक्सर मेरे मन-मस्तिष्क को यह बात मथती रहा करती है, रह-रहकर गूंज-गूंज उठा करती है कि यदि मैं प्रधान-मंत्री होता, तो?

यदि मैं प्रधान मंत्री होता, तो सब से पहले स्वतंत्र भारत के नागरिकों के लिए, विशेष कर नई पीढियों के लिए, पूरी जनता के लिए, पूरी सख्ती और निष्ठुरता से काम लेकर एक राष्ट्रीय चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा एवं उपायों पर बल देता। छोटी-बड़ी विकास-योजनाएँ आरम्भ करने से पहले यदि हमारे अभी तक के प्रधान मंत्री राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण की ओर ध्यान देते और उसके बाद विकास-योजनाएँ चालू करते, तो वास्तव में उनका लाभ आम आदमी तक पहुँच पाता। आज हमारी योजनाएँ एवं सभी सरकारी-अर्धसरकारी विभाग आकण्ठ निठल्लेपन और भ्रष्टाचार में डूब कर रह गए हैं, एक राष्ट्रीय चरित्र होने पर इस प्रकार की सम्भावनाएँ स्वतः ही समाप्त हो जातीं। इस | कारण यदि मैं प्रधान-मंत्री होता तो प्राथमिक आधार पर यही कार्य करता।

आज स्वतंत्र भारत में जो संविधान लागू है, उसमें बुनियादी कमी यह है कि वह देश का अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, अनुसूचित जाति, जन-जाति आदि के खानों में बाँटने वाला तो है, उसने हरेक के लिए कानून भी अलग-अलग बना रखे हैं जबकि नारा समता और समानता का लगाया जाता है। यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो संविधान में रह गई इस तरह की कमियों को दूर करवा सभी के लिए एक शब्द ‘भारतीय’ और समान सविधान-कानून लागू करवाता ताकि विलगता की सूचक सारी बातें स्वतः ही खत्म हो । जाएँ। भारत केवल भारतीयों का रह जाए न कि अल्प-संख्यक, बहुसंख्यक आदि का।

यदि मैं प्रधान-मंत्री होता तो सभी तरह की निर्माण-विकास योजनाएँ इस तरह से लागू करवाता कि वे राष्ट्रीय संसाधनों से ही पूरी हो सकें। उनके लिए विटेडी एवं सहायता का मोहताज रह कर राष्ट्र की आन-बान को गिरवी न रखना पड़ता। में आ कर इस तरह की आर्थिक नीतियाँ या अन्य योजनाएं लागू न करने देना राष्ट्रीय स्वाभिमान के विपरीत तो पड़ती ही हैं, निकट भविष्य में कई प्रकार की आम एवं साँस्कृतिक हानियाँ भी पहुँचाने वाली हैं।

हर स्वतंत्र राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्र भाषा, अपनी एक राष्ट्रीय-साँस्कतिका को सामने रख कर बनाई गई शिक्षा नीति हुआ करती है। बड़े खेद एवं दःखी कहना-मानना पड़ता है कि स्वतंत्रता प्राप्त किए आधी शती बीत जाने पर भी भारत का दो महत्त्वपूर्ण कार्यों को सही परिप्रेक्ष्य में महत्त्व नहीं दे पाया। यदि मैं प्रधान मंत्री होता तो ऐसी शिक्षा नीति तो तत्परता से बनवाने का प्रयास करता ही, राष्ट्र-भाषा की समस्या भी प्राथमिक स्तर पर हल करने, अपनी एक राष्ट्र घोषित करने का प्रयास करता। यदि मैं प्रधान मंत्री होता, तो भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण कभी न होने देता। किसी भी व्यक्ति का भ्रष्टाचार सामने आने पर उस की सभी तरह की चल-अचल सम्पत्ति को तो छीन कर राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करता ही, चीन तथा अन्य कई देशों की तरह भ्रष्ट कार्य करने वाले लोगों के हाथ-पैर कटवा देना, फाँसी पर लटका या गोली से उड़ा देने जैसे हृदयहीन कहे माने जाने वाले उपाय करने से भी परहेज नहीं करता। इसी प्रकार तरह-तरह के अलगाववादी तत्त्वों को न तो उभरने देता और उभरने पर उनके सिर सख्ती से कुचल डालता। राष्ट्रीय-हितों, एकता और समानता की रक्षा, व्यक्ति के मान-सम्मान की रक्षा और नारी-जाति के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार का दमन मैं हर संभव उपाय से करता-करवाता।

बहुत संभव है कि ऐसा सब करने के कारण मेरे हाथ से प्रधान मंत्री की कुर्सी और मेरे दल की सरकार भी चली जाती; पर मैं वोटों को पाने और कुर्सी बचाने का खेल न खेलता रह, राष्ट्रोत्थान एवं मान-सम्मान की रक्षा के लिए वह सब करता कि जो आम जनता चाहती और जो करना परमावश्यक भी है।

निबंध नंबर :- 04

यदि मैं प्रधान-मंत्री होता

Yadi mein Pradhan Mantri Hota

 

मानव एक महत्त्वाकांक्षी प्राणी है। उसका लक्ष्य अपने जीवन को साथक बनाना है। जिसके हृदय में दृढ संकल्प अदम्य साहस और काम करने की लगन होती है वह अपने जीवन के लक्ष्य को अवश्य परा कर लेता है। बहुत से मानव जीवन की सार्थकता खाने-पीने और मौज-मस्ती मनाने में ही मानते है। ऐसे लक्ष्यहीन मानव का जीवन पशु तुल्य होता है। मुझे अपने भावी जीवन के लिए ऐसा लक्ष्य चुनना होगा जिससे न सिर्फ अपने जीवन को सख शान्ति मिले बल्कि समाज तथा राष्ट्र का भी कुछ हित हो सके । शिक्षण काल से ही मेरी रुचि राजनीति में रही है। मेरी चिर अभिलाषा देश का प्रधानमन्त्री बनने की रही है। इस गौरवपूर्ण एवं प्रतिष्ठित पद को पाना उतना ही कठिन है जितना सरल कहना । परन्तु फिर मेरे मन में कभी कभी यह ख्याल आता है कि काश ! मैं देश का प्रधानमन्त्री होता तो देश की हालत शायद यह न होती जो आज है।

भारत के संविधान और शासन प्रणाली में प्रधानमन्त्री का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। चाहे संविधान द्वारा राष्ट्रपति को मुख्य कार्यपालिका (Chief Executive भाव Head of the State) नियुक्त किया गया है किन्तु व्यावहारिक रूप में मुख्य कार्यपालिका के सब कार्य प्रधानमन्त्री ही करता है। राष्ट्रपति एक संवैधानिक मुखिया होता है। डॉ. अम्बेदकर के शब्दों में, “यदि हमारे संविधान के किसी प्रशासक की तुलना अमेरिका के प्रधान (President) से की जा सकती है तो वह प्रधानमन्त्री ही है, राष्ट्रपति नहीं ।” एक प्रसिद्ध लेखक के शब्दों में, “प्रधानमन्त्री की अन्य मन्त्रियों में वही स्थिति है, जो सितारों में चन्द्रमा की होती है।” अतः स्पष्ट है कि प्रधानमन्त्री संविधान एवं शासनप्रणाली में सबसे अधिक शक्तिशाली अधिकारी है।

सामाजिक दृष्टि तथा आर्थिक क्षेत्र में देश की वर्तमान स्थिति सुदृढ़ नहीं है। महंगाई दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है। रुपये की कीमत भी नित्य प्रति कम होती जा रही है। विकास की अनेक योजनाएँ विश्व बैंक से ऋण लेकर चलाई जा रही है। सबसे अधिक खर्च पैट्रोल और डीज़ल पर होता है। देश की बढ़ती हुई आबादी के कारण भी आर्थिक दशा कमज़ोर हुई है। पड़ोसी देश पाकिस्तान से खतरे की सम्भावना को देखते हुए सेना के बजट पर भी अधिक खर्च किया जाता है।

राजनैतिक क्षेत्र में भी अस्थिरता बनी हुई है। कुछ समय से लोकसभा चनावों में एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पा रहा है जिसके कारण केन्द्र में छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों की सहायता से सरकार चलानी पड़ती है। कई बार ऐसी सरकार एक दल के अलग हो जाने पर अल्पमत में आ जाती है और गिर जाती है। देश को फिर से एक ओर तो राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ता है तथा दूसरी ओर गरीब जनता नए-नए टैक्सों के बोझ से भी दब कर रह जाती है। नैतिक दृष्टि से भी आज भारत की वर्तमान स्थिति बहुत ही नाजुक है। आज हम अपनी पुरानी सम्भता एवं संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति का अन्धानुकरण कर रहे हैं। इन सब का कारण विदेशी चैनलों द्वारा प्रसारित टेलीविज़न के कार्यक्रम है जिनमें नैतिकता नाम की कोई चीज़ नहीं है।

यदि मैं प्रधानमन्त्री होता तो मैं देश के सर्वांगीण विकास के साथ साथ निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देता-

  1. सबसे पहले मैं अपने कर्तव्य में किसी प्रकार की लापरवाही बरतने वाले व्यक्ति के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था करता । ऐसे लोग वह हैं जो दफ्तरों में आकर भी अपना काम पूरी मेहनत एवम लगन से नहीं करते,गप्पे मारकर या चाय, सिग्रेट आदि पीकर ही अपना समय बिताते रहते हैं।
  1. जो कर्मचारी, चाहे वह सरकारी कर्मचारी हों चाहे अर्द्ध सरकारी, लोगों से रिश्वत लेकर काम करते हैं और देश में भ्रष्टाचार जैसी बीमारी को बढ़ावा देते हैं ऐसे कर्मचारियों के लिए भी कठोर दण्ड की व्यवस्था करता और यदि उसको नौकरी से निष्कासित भी करना पड़ता तो भी मैं हिचकिचाता नहीं ।
  1. बड़े बड़े उद्योगपति और व्यापारी जो गलत ढंग से अधिक से अधिक लाभ कमाते हैं तथा छोटे-छोटे उद्योगपतियों एवं व्यापारियों को तंग करते हैं उन पर भी कड़ी नज़र रखता और ऐसे बड़े बड़े उद्योगपतियों एवं व्यापारियों के लिए भी कठोर से कठोर दण्ड की व्यवस्था करता ताकि भविष्य में कोई बड़ा उद्योगपति या बड़ा व्यापारी छोटे उद्योगपति अथवा छोटे व्यापारी का शोषण न कर सके ।
  2. मैं देश के प्रधानमन्त्री होने के नाते व्यक्तिगत चरित्र निर्माण पर भी विशेष ध्यान दंगा क्योंकि यदि देश के प्रधानमन्त्री का ही चरित्र ऊँचा नहीं होगा तो फिर देश की जनता से क्या आशा की जा सकती है ? ‘यथा राजा तथा प्रजा’ वाली उक्ति देश के सभी व्यक्तियों पर लागू होती है और जो अधिकार प्राप्त लोग है उच्च पदों पर आसीन है उनके लिए यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि उनका चरित्र ऊँचा हो ।
  1. आज देश में चारों ओर अपराधिक प्रवत्ति में वद्धि हो रही है। अपराधी को रोकने के लिए कानून भी बने हुए है परन्तु ऐसा लगता है कि केवल सख्त कानून बनाने ही ज़रूरी नहीं है बल्कि उनका सख्ती से पालन भी होना चाहिए । अपराधों पर नियन्त्रण पाने के लिए वर्तमान कानूनों में कुछ परिवर्तन करके उनको सभी व्यक्तियों पर बिना किसी भेद भाव के सख्ती से लाग करने के लिए आदेश दिए जाएंगे।
  1. देश की आन्तरिक शान्ति एवं समृद्धि पर भी पूर्ण ध्यान दिया जाएगा । प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मूल भूत आवश्यकताएँ-रोटी, कपड़ा और मकान पूरी करने के लिए सरकार लोगों की आर्थिक सहायता करेगी ।
  1. देश की सीमाओं पर हर समय युद्ध के बादल मंडराते रहते हैं इसलिए सीमा सुरक्षा बलों में यथोचित वृद्धि की जाएगी और सैन्य शक्ति की वृद्धि पर भी उचित ध्यान दिया जाएगा ।
  1. मेरा यह प्रयास रहेगा देश को विभाजित करने वाली शक्तियों के साथ सख्ती से निपटा जाए और कोई भी व्यक्ति जो देश के विघटनकारी तत्वों के साथ मिलकर ऐसी गतिविधियों में शामिल होता है उसे मृत्यु दण्ड देने की व्यवस्था होनी चाहिए ।
  1. आज सिनेमा जगत में जो हिंसा और मार धाड़ की घटनाओं की बढ़ोत्तरी हो रही है और जिस अश्लीलता का प्रदर्शन आजकल सिनेमा जगत में हो रहा है यह चिन्ता का विषय है। मेरा काम होगा कि सिनेमा जगत में व्याप्त अभद्रताओं का ध्यान रखते हुए उनको दूर करने का पूरा ध्यान दिया जाएगा ताकि भविष्य में लोगों की भावनाओं को और अधिक उत्तेजित न कर सके।
  1. आज का युवक तेज़ी से नशीली वस्तुओं का शिकार हो रहा है और अपने जीवन को अपने ही हाथों नष्ट कर रहा है। मैं नशीली वस्तुओं के उत्पादन पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा दूँगा और नशीली वस्तुओं के उपयोग और उपभोग पर भी पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा दूँगा ताकि देश के लोग पवित्र और नशा मुक्त जीवन व्यतीत कर सकें।

मेरे मन में बार बार एक ही विचार आता है कि काश ! मैं देश का प्रधानमन्त्री होता तो देश का कल्याण कर दिखाता और आज देश को जो भिन्न-भिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उन समस्याओं का समचिन हल निकालकर देश की उन्नति में अपना योगदान देता । परन्तु काश ! यदि मैं देश का प्रधानमन्त्री होता ।

 

निबंध नंबर :- 05

यदि मैं प्रधानाचार्य बनूँ

Yadi Mein Pradhan Mantri Banu

 

संकेत बिंदुकर्तव्यमेरी वरीयताएँमेरा योगदान

प्रत्येक व्यक्ति के मन में कोई-न-कोई इच्छा अवश्य होती है। मैं भी चाहता हूँ कि मैं प्रधानाचार्य बनूं। यदि मैं प्रधानाचार्य बन जाऊ तब मैं अपने कर्तव्य का पालन दढता के साथ करूंगा। मैं अपने कर्तव्यों की वरीयता तय कर लूंगा। मेरा प्रथम कर्तव्य शिक्षा का स्तर ऊंचा बनाए रखना होगा। मैं अपने स्कूल में योग्य शिक्षकों को नियुक्त करूंगा ताकि वे अपनी पूरी क्षमता एवं योग्यता से छात्र-छात्राओं का मार्गदर्शन कर सके। मैं अपने स्कूल के वातावरण को पूर्णतः शैक्षिक बनाए रखने का भरपूर प्रयास करूंगा। वहाँ क वातावरण में सहजता होगी। वहीं किसी भी प्रकार का तनाव नहीं होगा। मैं विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर पूरा ध्यान दूंगा। गरीब बच्चों को शिक्षा प्राप्ति के अवसरों से वंचित नहीं किया जाएगा। मैं शिक्षा जगत को अपना पूरा योगदान दूंगा। मैं एक सफल प्रधानाचार्य बनना चाहूँगा।

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commentscomments

  1. Gautam kr verma says:

    i like very much this essay that is written on yadi mai pardhanmantri hota.

  2. Pavithra says:

    This essay is very useful.but should be in simple hindi

  3. Its a wonderful essay…..But would be more useful if it would be in simpler hindi.

  4. Astuti thakur says:

    A very useful essay and nice hindi. I don’t think there is a need for simpler hindi

  5. avi sharma says:

    very good essays and topics

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