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Hindi Essay on “Vyayam Ke Labh” , ”व्यायाम के लाभ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

व्यायाम के लाभ

निबंध नंबर : 01

व्यायाम से अभिप्राय है अपने तन –मन को स्वस्थ, सुन्दर और निरोग बनाए रखने के लिए किया गया परिश्रमपूर्ण कार्य या प्रयास | सर्वप्रसिद्ध उक्ति ‘पहला सुख निरोगी काया’ के अनुसार शरीर का स्वस्थ व निरोग  रहना ही सबसे बड़ा सुख है | अस्वस्थ व रोगी व्यक्ति संसार के सुखो का भोग कदापि नही कर सकता है | स्वस्थ शरीर के लिए व्यायाम अत्यन्त आवश्यक है | जो व्यक्ति नित्यप्रति व्यायाम करते है , वे ही सदैव स्वस्थ व सुखी रहते है |

खेलना-कूदना , दण्ड- बैठक करना , मुगदर उठाना या घुमाना, कुश्ती लड़ना, कबड्डी खेलना , तैराकी करना, योगाभ्यास करना, नृत्य करना, घुड़सवारी करना, दौड़ लगाना, आसन तथा प्राणायाम करना आदि व्यायाम के कई ढंग , साधन और उपाय है | अपनी रूचि , इच्छा , उपलब्धता और शक्ति के अनुसार व्यक्ति इनमे से किन्ही को चुनकर नियमित रूप से अपना कर उन्हें अपने जीवन का अंग बना सकता है |

व्यायाम शरीर को स्वस्थ, ह्रष्ट-पुष्ट, सुन्दर- सुडौल तो बनाया ही करते है , मन – मस्तिष्क और आत्मा के उचित विकास में भी सहायक हुआ करते है | मस्तिष्क से काम करने वालो के लिए प्रात:काल ब्रह्म-मुहूर्त में घूमना, सूर्य नमस्कार करना आदि लाभकारी व्यायाम है | प्रात:काल खुले वातावरण में घूमना बिना मूल्य का अनमोल व्यायाम है | इससे हमे प्रात:काल जल्दी उठने की आदत पडती है तथा हमारी दिनचर्या नियमित रूप से चलती है | महात्मा गांधी जी ने भी अपनी आत्मकथा में प्रात : व सायकल में भ्रमण करना एक अच्छा व्यायाम बताया है |

व्यायाम करने से अनेक लाभ है जैसे व्यायाम करने से हाथ , पैर और शरीर के अन्य अंग बलिष्ठ हो जाते है | शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न हो जाती है | व्यायाम करने से पाचन-क्रिया भी ठीक रहती है , भूख समय पर लगती है | शरीर में रक्त का निर्माण भली प्रकार होता है तथा रक्त का संचार तीव्रगति से होता है | काया ह्रष्ट-पुष्ट तथा मन प्रसन्न रहता है सारा दिन काम करने में मन लगा रहता है |

यदि हमारा शरीर स्वस्थ है तो मन भी प्रसन्न रहेगा | स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ  मन का वास होता है | किसी ने ठीक खा है A sound mind in a sound body. अंत समय निकाल कर हमे थोडा – बहुत व्यायाम नित्य प्रति अवश्य करते रहना चाहिए |

निबंध नंबर : 02

व्यायाम के लाभ

संसार में प्रत्येक महापुरुष ने स्वास्थ्य को ही मानवीय सुन्दरता का मुखा लगा माना और कहा है। आदमी का चेहरा, नयन-नक्श लाख बदिया और आकर्षक हो, लेकिन यदि वह स्वस्थ नहीं, तो समझो कि उन सब का जरा भी मूल्य और महत्त्व नहीं। स्वामी के बिना आदमी की दशा एक तन्तु-रहित पौधे के समान ही कही जाएगी। अस्वस्थ आटी के लिए जीवन में धन-दौलत आदि सब-कुछ रहते हुए भी जीवन में न तो कोई रस है और न किसी तरह का कोई आनन्द ही है। वह अमृत से भरा प्याला हाथ में रहते हुए भी प्यासा है। तरह-तरह के स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों से भरा हुआ थाल सामने रहने पर भी भूखा है। वास्तव में उसके पास भूख-प्यास जैसा कुछ रहने ही नहीं दिया उसकी अस्वस्थता ने। तभी तो तन्दरुस्ती को हजार नेहमत कहा Health is gold जैसी कहावते बडे गर्व के साथ कही और सुनी जाती हैं।

तन्दरुस्ती के नेहमत या हैल्थ का गोल्ड पाने के लिए व्यायाम करना आवश्यक है। नियमपूर्वक अपनी स्थिति और शक्ति के अनुसार, मिलने वाले समय के अनुसार व्यायाम करते रहने वाला व्यक्ति जीवन का सच्चा रस, वास्तविक आनन्द अवश्य पा लेता है। जिसे वास्तविक प्रसन्नता कहा जाता है, अस्वस्थ रहने वाला आदमी लाख चाहने पर भी कभी पा नहीं सकता। स्वस्थ व्यक्ति का ही उस पर अधिकार हुआ करता है। व्यायाम करने का एक लाभ स्वास्थ्य-रक्षा और शरीर को नियमित बनाए रखना तो है ही, व्यायाम करने वाला हमेशा प्रसन्न भी रहा करता है। प्रसन्नता उसकी एक बहुत बड़ी और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है। व्यायाम आदमी को कमजोर और चिड़चिड़ा नहीं होने देता। सब तरह के रोगों से भी नियमित व्यायाम करने वाला व्यक्ति बचा रहता है। उदासी और निराशा कभी भूल कर भी ऐसे आदमी के पास नहीं फटकने पाते। कहा गया है कि Health is wealth अर्थात् स्वास्थ्य ही सच्चा धन है सो नियमपूर्वक व्यायाम करने वाला व्यक्ति । स्वास्थ्य-रूपी सम्पत्ति से हमेशा मालामाल रहा करता है। कमजोर आदमियों की तरह ऐसे व्यक्ति को कभी परिश्रम से जी नहीं चुराना पड़ता। अपनी असमर्थता का परिचय देकर दूसरों के सामने कभी शर्मिन्दा नहीं होना पड़ता। व्यायाम कई प्रकार के होते हैं। तरह-तरह के खेल खेलना, दण्ड-बैठक पेलना, दौड़ लगाना, कबड्डी खेलना, कुश्ती लड़ना, योगाभ्यास या आसन करना, तैरना, नृत्य करना, घुड़सवारी करना, नौकायन आदि सभी व्यायाम ही । तो हैं। प्रातःकाल खुले स्थान पर भ्रमण करना, जोर-जोर से खुला साँस लेना भी व्यायाम ही है। इनमें से आदमी अपनी रुचि, अपनी शक्ति और स्थिति, अपने को मिलने वाले समय के अनुसार किसी भी व्यायाम को अपना सकता है। उसे करते रहने का नियम बना कर अपने लिए जीवन की वास्तविक प्रसन्नता और आनन्द प्राप्त करने का अधिकार पा सकता है। और नहीं तो दो-चार किलोमीटर तक थोडा तेज-तेज चलने से भी एक तरह का व्यायाम हो जाया करता है। यही कारण है कि कुछ लोग सुबह कार्यालय जाते समय घर से कुछ पहले ही निकल पड़ते हैं और दो-चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद ही बस आदि पर सवार हुआ करते हैं.

महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वे चाहे कहीं भी रहते. देश में होया परदेश में, सुबह-शाम सैर करने के लिए समय जरूर निकाल लिया करते थे। गांधी जी के विचार में सुबह-शाम भ्रमण एक बहुत ही अच्छा व्यायाम है। फिर हर आयु और स्थिति वाला व्यक्ति भ्रमण तो कर ही सकता है। इस लिए उन्होंने सभी को व्यायाम के रूप में प्रातः-सायं सैर या भ्रमण करने की आदत डालने की सलाह दी है।

व्यायाम आदमी चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न करे, उसके लिए स्थान अवश्य ही उचित होना चाहिए। ऐसा स्थान यदि खुला, हरा-भरा और साफ-सुथरा हो तो क्या कहना ? वास्तव में व्यायाम के उपयुक्त स्थान होता ही इसी प्रकार का है। बन्द और गन्दे स्थान पर, घुटन भरे वातावरण में व्यायाम करने से लाभ के स्थान पर उलटे हानि हो सकती है। कई प्रकार के रोगों का शिकार होना पड़ सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि उचित और योग्य स्थान पर ही व्यायाम किया जाए। हरे-भरे खुले मैदान, नदी का किनारा, कोई पार्क, वन-उपवन या फिर दूर स्थित खेतों के हरे-भरे पेड़ भी व्यायाम के लिए उपयुक्त स्थल माने जा सकते हैं।

मनुष्य जीवन बड़ा दुर्लभ माना गया है। यह रोग-शोक में रहकर यों ही गँवा देने के लिए नहीं है। एक-एक पल बड़ा ही मूल्यवान माना गया है। इसलिए इस का सदुपयोग होना चाहिए। केवल स्वस्थ व्यक्ति ही हर प्रकार से सदुपयोग करने की बात सोच सकता और कर भी सकता है। स्वस्थ व्यक्ति ही किसी प्रकार का धर्म-कर्म करने में भी समर्थ हो सकता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी कुछ समर्थ लोगों के हिस्से में ही आया करते है। समर्थ बनने और बने रहने के लिए व्यायाम करना बहुत ही आवश्यक है। बस, एक बार, इस की आदत डाल लीजिए, फिर देखिए कि सब प्रकार की खुशियाँ, सब तरह के आनन्द कैसे भागे आते हैं अपने आप।

निबंध नंबर : 03

व्यायाम के लाभ

Vyayam Ke Labh

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। जब तक शरीर स्वस्थ नहीं है, तब तक मस्तिष्क का विकास नहीं हो सकता। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता पाने के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है।

अस्वस्थ व्यक्ति अनेक रोगों से घिरा रहता है। उसमें स्फूर्ति नहीं रहती। उसे आलस्य घेरे रहता है। पढ़ने-लिखने में उसका मन नहीं लगता। प्रगति के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। यदि मनुष्य वास्तव में मानसिक एवं बौद्धिक विकास चाहता है, तो उसे स्वस्थ रहना आवश्यक है।

शरीर को स्वस्थ रखने की दृष्टि से व्यायाम करना जरूरी है। व्यायाम से शरीर का प्रत्येक अंग सुदृढ़ एवं निरोग रहता है। व्यायाम अनेक प्रकार के होते हैं। तैरना, दंड बैठक लगाना, कुश्ती लड़ना, दौड़ना आदि क्रियाएँ व्यायाम का ही स्वरूप हैं। विद्यालयों में खो-खो, कबड्डी, हॉकी, वालीबाल आदि खेलों की व्यवस्था इसीलिए की जाती है, जिससे बालक शारीरिक दृष्टि से बलवान बन सकें।

हमारे देश में योगासन पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। योगासन के द्वारा शरीर का प्रत्येक अंग सुडौल बनाया जा सकता है। रोगों से छुटकारा पाने की दृष्टि से भी योगासन का विशेष महत्व है। सूर्य नमस्कार, शीर्षासन, मयूरासन स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी हैं। आसनों की विधिवत शिक्षा इस कला के विशेषज्ञों से लेना चाहिये।

छात्र जीवन में छात्रों को स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से खो-खो, कबड्डी, हॉकी, फुटबाल आदि खेलों में भाग लेना चाहिये। शिक्षा का लक्ष्य केवल पढ़ने-लिखने तक सीमित नहीं है। पढ़ाई-लिखाई के साथ शारीरिक विकास की ओर भी ध्यान देना आवश्यक है।

व्यायाम से शरीर हष्ट-पुष्ट रहता है। रक्त संचार ठीक ढंग से होता है। पाचन क्रिया ठीक रहती है। स्फुर्ति आती है। आलस्य नहीं रहता है। रोगों से मुक्ति मिलती है। प्रायः विद्यार्थी जीवन में विद्यार्थी पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक विकास को ही अपना लक्ष्य मानते हैं। इससे शारीरिक विकास की दिशा में विद्यार्थी पीछे रह जाते हैं। विद्यार्थियों को शारीरिक एवं बौद्धिक विकास दोनों ओर समुचित ध्यान देना चाहिये।

विद्यार्थियों को घर में भी व्यायाम करने की आदत डालना चाहिये। उन्हें घर में दंड-बैठक एवं आसन करने की आदत डालना चाहिये। सूर्योदय के पहले मैदान में दौड़ लगाना चाहिये। खेलकूद में भी क्रियात्मक योगदान देना चाहिये। लम्बी आयु की दृष्टि से भी व्यायाम आवश्यक है।

महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, लोकमान्य तिलक आदि महापुरुषों ने शरीर को अधिक से अधिक बलिष्ठ बनाने पर जोर दिया है। वे व्यक्ति ही देश की रक्षा कर सकते हैं, जो मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास की कला में पारंगत हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह बालक हो; युवा हो; वृद्ध हो; नियमित रूप से व्यायाम करने की आदत डालना चाहिये।

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