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Hindi Essay on “Vishwa Shanti me Vigyan ki Bhumika”, ”विश्व शान्ति में विज्ञान की भूमिका” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

विश्व शान्ति में विज्ञान की भूमिका

Vishwa Shanti me Vigyan ki Bhumika

 

ज्ञान हो या विज्ञान, इन विषयों का अन्वेषण और आरम्भ वास्तव में मानव-जावन को सब प्रकार के भीतरी-बाहरी झंझटों से छुटकारा दिलाकर सुख और शान्त बनाने के लिए हुआ था। लेकिन आज युग एकदम उलट रहा है। आज न तो ज्ञान हमें भीतरी अर्थात आत्मिक-मानसिक शान्ति प्रदान कर पाने में समर्थ रह गया है, न विज्ञान ही, मानव के बाहरी अर्थात् भौतिक जीवन को सुखी, समृद्ध और शान्त बनाने के मार्ग पर चल पा रहा है। आज ऐसा स्वाभाविक ही लगता है कि इन दोनों-अर्थात् ज्ञान-विज्ञान की या उन्नति और विकास ने मनुष्य समाज का एक-दूसरे का प्रबल विरोधी और प्रतिद्वंदी बनाकर एक-दूसरे के सामने के सामने खड़ा कर दिया है। इसे किसी भी दृष्टि से अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता।

दूसरे विश्व–युद्ध के बाद से, एक- वह भी बाहरी या ऊपरी दृष्टि से अवश्य ही की रक्षा कर पाने में विज्ञान को एक सीमा तक सफलता मिली है। द्वितीय विश्व-युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर जिन ऐटम बमों का प्रयोग किया था, उन से हुई विनाश-लीला ने एक तो सारी दुनिया को भीतर से डरा कर रख दिया। लेकिन उसके साथ ही ऐटमी शास्त्रों के निर्माण की दौड़ भी आरम्भ हो गई। फलस्वरूप आज किस देश के पास किस प्रकार के ऐटमी शस्त्र या जैविक-रासायनिक शस्त्र हैं, ठीक प्रकार से कोई नहीं जानता। इस कारण कोई देश दूसरे देश पर आक्रमण करने का साहस भी नहीं जुटा पाता। उसे भय रहता है कि यदि उसने बदले में ऐटमी, जैविक या रासायनिक शस्त्रों से हमला कर दिया तब उसका क्या होगा? तो आधुनिक विज्ञान ने इस प्रकार की भय जन्य शान्ति अलग ही स्थापित कर रखी है कि जिसे हर हिटलर के समान आज का कोई भी सद्दाम हुसैन या सिरफिरा कजाकी, कोई नया जियाउलहक या फिर नया जुल्फिकार अली भुट्टो तोड सकता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि विज्ञान वास्तविक अर्थों में विश्व शान्ति स्थापित करने का दिशा में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन यह तभी संभव हो सकता कि जब वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी, तकनॉलोजी में विकसित देशों की अपनी नीयत साफ़ एवं स्पष्ट हो। अपनी दृष्टि मात्र राष्ट्रहित पर न टिकी होकर सामूहिक मानवता के हितों पर टिकी हों।

अशान्ति और अराजकता का कारण व्यक्ति की नीयत तो होती ही है. आभयोग भी हुआ करता है। आज विश्व में आधी से कहीं अधिक जनता गरीबी अभावों की मान्य सीमा-रेखा से भी नीचे का जीवन जीने के लिए विवश हो रही अपने को हर प्रकार से उन्नत और समद्ध मानने वाले देशों में भी गरीबो, भूखा-नंगों और इस कारण अराजकता का रास्ता अपनाने वालों की कमी नहीं है। विज्ञान अपने विकसित साधनों से सभी की गरीबी, भूख, नंगेपन के विरुद्ध लड़ कर आन्तरिक स्थापित करने में सचमुच बहुत सहायक हो सकता है। आवश्यकता उसे मारक शस्त्रास्त्रो के  निर्माण के स्थान पर सभी प्रकार के मानवोपयोगी साधनों के उत्पादन की और का है। इसके बिना वह शान्ति-रक्षा की भूमिका नहीं निभा सकता।

इसी प्रकार विज्ञान ऐसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करके शान्ति. और विस्तार में सहायक हो सकता है कि जिसमें छोटे-बड़े प्रत्येक आदमी की । साफ हो। जीवनदृष्टि स्वस्थ, सुन्दर और उन्नत हो। हमारा यह स्पष्ट मत है कि वैज्ञानिक वास्तव में चाहता यही सब करना ही है, पर देशों के राजनेताओं की स्वार्थ राजनीति उनपर दबाव बनकर वह सब करने नहीं देती। यदि सचमुच हम विश्व-प्रालि की स्थापना में विज्ञान की स्वस्थ भूमिका देखने के इच्छुक हैं, हृदय से विश्व में शामिल की स्थापना चाहते हैं; तो ऊपर बताई गई विसंगतियों से छुटकारा पाकर विज्ञान की दिशा मोडना परम आवश्यक है। अन्य कोई चारा नहीं।

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