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Hindi Essay on “Vigyan aur Manav Kalyan” “Vigyan ek Vardan” , ” विज्ञान और मानव-कल्याण या विज्ञान एक वरदान” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

विज्ञान और मानव-कल्याण

या

विज्ञान एक वरदान 

निबंध नंबर :- 01

शास्त्र, साहित्य, कला, सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान तथा अन्य जो कुछ भी इस विश्व में अपने सूक्ष्म या स्थूल स्वरूप में विद्यमान है, उन सबका एकमात्र एंव अंतिम लक्ष्य मानव-कल्याण या हित-साधन ही है। इससे बाहर या इधर-उधर अन्य कुछ भी नहीं। इससे भटकने वाले, इधर-उधर होने वालीं प्रत्येक उपलब्धि, योजना और प्रक्रिया अपने आपमें निरर्थक और इसलिए त्याज्य है। यही सृष्टि का सत्य एंव सार-तत्व है। सभी प्रकार की उपलब्धियों, साधनाओं, क्रियाकलपाओं और गतिविधियों का उद्देश्य या लक्ष्य मानव-कल्याण ही है और रहेगा। इसी मूल अवधारणा के आलोक में ही ‘विज्ञान और मानव कल्याण’ या इस जैसी किसी भी अन्य विषय-वस्तु पर विचार किया जा सकता है।

‘विज्ञान’ का शाब्दिक एंव वस्तुगत अर्थ कि किसी विषय का विशेष और क्रियात्मक ज्ञान। क्रियात्मक ज्ञान होने के कारण ही विज्ञान अपने अन्वेषणों-अविष्कारों के रूप में मानव को कुछ दे सकता या वर्तमान में दे रहा है। विज्ञान भौतिक सुख-समृद्धियों का मूल आधार तो है, पर आध्यात्मिक सिद्धियों-समृद्धियों का विरोधी कदापि नहीं है। फिर भी कईं बार क्या अक्सर विज्ञान को धर्म और अध्यात्मवाद का विरोधी समझ लिया जाता है। जबकि वस्तु सत्य यह है कि धम्र और अध्यात्म-भाव को वैज्ञानिक दृष्टि और विश्लेषण-शक्ति प्रदान कर विज्ञान मानव के हित-साधन में सहायता ही पहुंचाता है। विज्ञान ने उन अनेक अंध रूढिय़ों और विश्वासों पर तीखे प्रहार किए हैं, जिनकी भयानक जकड़ के कारण मानव-प्रगति के द्वार अवरुद्ध हो रहे थे। चेतना कुण्ठित होकर कुछ भी कर पाने में असमर्थ हो रही थी। यह विज्ञान की ही देन है कि आज हम अनेकविध भ्रांत धारणाओं के चक्र-जाल से छुटकारा पाकर माव की सुख-समृद्धि के लिए अनेक नवीन प्रगतिशील क्षितिजों के उदघाटन में समर्थ हो पाए हैं। ऊंच-नीच जाति-पाति, छुआछूत-अन्य धार्मिक धारणाओं में हमें विज्ञान ने ही मुक्ति दिलवायी है। हम आज खुले मन-मस्तिष्क से सोच-विचार सकते हैं, खुले वातावरण और वायुमंडल में सांस लेकर जी सकते हैं। आज हमारी मानसिकता को अनेकविध व्यर्थ भय के भूत आतंकित नहीं किए रहते। हम किसी भी बात का निर्णय खुले मन-मस्तिष्क से करके अपने व्यवहार को तदनुकूल बना पाने में समर्थ हैं। मानव-कल्याण के लिए इन सब बातों को हम आधुनिक विज्ञान की कल्याणकारी देन निश्चय ही मान सकते हैं।

वैज्ञानिक युग और वैज्ञानिक अनवेषणों-अविष्कारों का मूल लक्ष्य ही वस्तुत: मानव के कल्याण का पुनीत भाव है। यदि मानव स्वंय ही अपनी उपलब्धियों का अपने ही विनाश हित उपयोग करना चाहे, तो उसे कौन रोक सकता है। अपनी नियति का अपने कर्म-फल का विधाता मानव स्वंय है। वह विज्ञान की गाय के थनों से कोमल उंगलियों का सहारा लेकर दूध भी दुह सकता है कि जो हर हाल में पौष्टिक एंव स्वास्थ्यप्रद है, दूरी ओर यह मानव ही विज्ञान की गाय के थनों से जोंक की तरह चिपपकर उनके रक्त चूस उसके साथ-साथ अपने विनाश और सर्वनाश को भी आमंत्रित कर सकता है। उसे किसी भी दिशा में जाने से कौन रोक सकता है? हां, रोक सकता है, तो मात्र उसका अपना जागृत विवेक और तदनुरूप संपादित कर्म, अन्य कोई नहीं।

ज्ञान-विज्ञान की नित नई उपलब्धियों के कारण ही आज शिक्षा का विस्तार संभव नहीं हो सका है। मानव को नई और सूझ-बूझपूर्ण आंख मिल सकी है। ज्ञान-विस्तार और मनोरंजन के विभिन्न क्षेत्र एंव संसाधन प्राप्त हो सके हैं। वह गांव-सीमा से उठकर नगर, नगर-सीमा से ऊपर जिला और प्रांत, फिर राष्ट्रीय और सबसे बढक़र अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं तक अपना, अपने मानवीय संबंधों का निरंतर विकास कर सका है। अनेक प्रकार के संक्रामक एंव संघातक रोगों से भी मुक्ति पाने में समर्थ हो सका है। ऐसा क्या नहीं, जो विज्ञान ने मानव को अपने सुख-समृद्धि और कल्याण के लिए नहीं दिया?

यह ठीक है कि दिन के साथ जुड़ी रहने वाली रात के समान विज्ञान ने विनाश के भी अनेक संसाधन जुटा दिए हैं। मानव के ह़दयय पक्ष को लगभग शून्य बना उसे अधिकाधिक बुद्धिवादी बना दिया है। जिस कारण अनेकविध रसिक-रोचक वैज्ञानिक साधनों-प्रसाधनों के रहते हुए भी आज का मानव-जीवन शुष्क-नीरस होता जा रहा है। आपस के सामान्य संबंधों में भी दरारें आती जा रही हैं। अशांति, अराजकता, शीतयुद्ध के क्षेत्र और युद्ध की संभावनाओं का भी आज विस्तार होता जा रहा है। परंतु विचार का मुख्य मुद्दा यह है कि इन सबके लिए विज्ञान और उसकी उपलब्धियों को क्यों कर और किस सीमा तक दोषी ठहराया जा सकता है? हम यह तथ्य क्यों नहीं सोचना-समझना चाहते कि अपने आप में विज्ञान और उसकी उपलब्धियां जड़ और निर्जीव हैं। उसके संचालक, प्राप्तकर्ता और भोक्ता सभी कुछ हम हैं। हम मानव कहे जाने वाले बुद्धि और हृदयवान प्राणी। यदि हम स्वंय अपनी विचारधारा, अपने हृदय और बुद्धि, अपनी इच्छाओं और स्वार्थों को संतुलित रख सकें तो कोई कारण नहीं कि विज्ञान मानवता का बाल भी बांका कर सके। मानव-कल्याण के अपने पावन ओर चरम लक्ष्य से विज्ञान स्वंय नहीं भटकता, हम मनुष्य भटका करते हैं। तब उसे दोष देने का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम मानव अपने मन-मस्तिष्क को विशाल, उदार और संतुलिब बनांए। निहित स्वार्थों या दंभो को, सभी प्रकार की कुंठाओं को भुलाकर विज्ञान की गाय के बछड़े बनकर उसका दूध पीने-दुहने का ही प्रयत्न करें, जोंक बनकर रक्त चूसने का नहीं। बस-फिर मानवता का कल्याण ही कल्याण है। अन्य कोई उपाय नहीं है कल्याण का।

निबंध नंबर :- 02

विज्ञान और समाज-कल्याण

Vigyan aur Samaj Kalyan

ज्ञान हो चाहे विज्ञान, दर्शनशास्त्र हो चाहे ललित साहित्य, लिखित-अलिखित कोई भी विषय क्यों न हो, सभी का चरम लक्ष्य एक ही है । वह है जीवन की सफलता के लिए व्यावहारिक सत्य की सत्य की खोज करना ताकि उस सत्य का दामन थाम कर मानव-समाज का हर प्रकार से कल्याण संभव हो सके। मानव-समाज उन्नत, विकसित एवं सुख-समृद्ध हो सके। धर्म, राजनीति, समाज-शास्त्र आदि के सारे सिद्धान्तों का चरम उद्देश्य एवं अन्तिम -जीवन और समाज का उन्नत, सुखी एव समृद्ध बना कर उसके अत्यधिक तमार्ग खोजना और प्रशस्त करना ही है । अपने आरम्भ से ही मानव द्वारा अवेषित, प्रतिष्ठापित, विनिर्मित उपरोक्त सभी विषय और मार्ग मानव-समाज का ही कल्याण करने की दिशा में निहित हैं। इसमें तनिक सन्देह नहीं ? वास्तव में संसार में तो कुछ भी है। उसके अस्तित्व का महत्त्व मानव-समाज के कल्याण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। उसके अस्तित्व का महत्व मानव-समाज के कल्याण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

आज का युग विज्ञान का युग कहलाता है। वास्तव में आज विज्ञान का प्रवेश मानव-जीवन और समाज के हर क्षेत्र में हो चुका है। बीते कल और आज के जीवन-समाज का तुलनात्मक अध्ययन करने पर हम स्पष्ट पाते हैं कि अनेक प्रकार की कुरीतियों, अन्धविश्वासों की अन्धेरी गुफाओं में से निकल कर आज का जीवन-समाज, सुख-समृद्धि और यथार्थ के चहँमखी उजले प्रकाश में आ गया है, उस सब का एकमात्र कारण विज्ञान की खोजे और उपलब्धियाँ ही हैं। आज का मानव-समाज जो तरह-तरह की संकीर्णताओं, सकुचित घेरों से बहर निकल कर मानवता के सहज भाव से प्रेरित हो सका है, उसका कारण विज्ञान के विभिन्न प्रकार के चमत्कार ही हैं। समाज में जो तरह-तरह के विभेद और दूरियाँ थीं वैयक्तिक और सामूहिक स्तर पर जो धारणाएँ थीं, उन सब को अपने उज्ज्वल अलोक से मिटा कर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बना दिया है। उसे विवश कर दिया गया है ज्ञान-विज्ञान के द्वारा कि उसका विख्यात, उसकी धारणाएँ उसके सुख-दुःख मात्र एक व्यक्ति के न होकर है। यही वह मल चेतना है कि जो मानव मात्र का कल्याण बात है कि आज का मानव अभी तक सामूहिकता की भावना को पूरी तरह से हिरदयंगम कर अपने आचरण-व्यवहार को ऐसा विज्ञानं-सम्मत नहीं बना पाया:पर वैज्ञानिक शोधों और अकर्यों ने उसे इस प्रकार का अहसास अच्छी तरह करा दिया है।

सुबह से लेकर शाम और फिर रात सोने तक आज हम घर-बाहर जितने भी प्रकार के उपकरणों का उपयोग एवं प्रयोग करते हैं जिस और जिस प्रकार की वस्तुओं का उपभोग करने के कारण उपभोक्ता कहलाते हैं; वस्तुतः वे सब आधुनिक विज्ञान की ही विशिष्ट देन हैं। सचमुच जिस प्रकार की विचारधाराओं को अपना कर, जिन वादों और सिद्धान्तों को कार्य रूप में परिणत कर हम कल्याणकारी राज्य एवं समाज की स्थापना करने का प्रयास कर रहे हैं, उनकी अवधारणाएँ भी वस्तुतः आधुनिक विज्ञान की ही देन हैं। यदि सच्चे मन और क्रिया-कलापों, कार्य पद्धतियों को अपना कर वैज्ञानिक उपकरण की सहायता से उचित मानवीय मार्ग पर चलना आरम्भ कर देंगे, तो कल्याणकारी राज और समाज की स्थापना से हमें कोई रोक नहीं सकता।

वैज्ञानिकों ने आज तक जितने भी वैज्ञानिक अन्वेषण किए और उनके आधार पर उपकरण बनाए हैं, उन सब का अन्तिम लक्ष्य मानव-जाति और समाज का कल्याण साधना ही है, यह एकदम सत्य है। लेकिन मानव का लोभी और निहित स्वार्थी स्वभाव, उसका क्या किया और कहा जाए ? वह तो जोंक की तरह का है न, जोंक चिकनी मिट्टी में निवास करने वाला एक लम्बा कीड़ा, गन्दा खून-अच्छा भी, चूसना उसका प्राकृतिक स्वभाव है। एक बार शरीर पर चिपक जाने के बाद पेट भर कर फूल जाने पर भी वह शरीर के उस भाग से अलग नहीं होना चाहता। चाहता है कि बस और-और रक्त चूसता ही जाए. पेट में समा न पड़ने पर भी निरन्तर चूसता जाए। कुछ ऐसा ही स्वभाव लोभी-स्वार्थी मानद का भी होता है। इस प्रकार के मानव भी अपना एक अलग समाज बना लिया करते हैं. ताकि मिलकर मानव-समाज का रक्त चूस सकें। ऐसे व्यक्ति सभी विज्ञान-सम्मत उपलब्धियों और कल्याणकारी बातों का उपयोग नहीं दुरुपयोग अपनी स्वार्थ साधना के लिए ही किया करते हैं। संयोग से आज के जीवन और समाज में इस प्रकार के । अकल्याणकार लोगों की अधिकता एवं बहुलता हो गई है। इस कारण वैज्ञानिक मानव और उसके द्वारा प्रवर्तित सभी प्रकार की सामाजिक कल्याणकारी उपलब्धियाँ भी दुषित एवं अपवित्र होती जा रही हैं। उनकी अपवित्र मानसिकता ने विज्ञान के मन-मस्तिक को भी अकल्याणकारी राह की तरफ मोड़ दिया है। तभी तो आज कुछ ही क्षणों में सारी मानवता को ध्वस्त कर रख देने में समर्थ भयावह शस्त्रास्त्रों का अबाध-निर्माण हो रहा है। बम्बों के मारक धुओं की छाया में घुटते साँसों से समाज कल्याण और शान्ति की बातें हो रही हैं।

हमारा यह दृढ विश्वास है कि परिस्थितियाँ चाहे बना दें; पर स्वभाव से मनुष्य हृदयहीन राक्षस या अमानव नहीं हुआ करता। उसे देवता कहना भी उचित एवं युक्तिसंगत नहीं है। उसे महज मनुष्य कहना ही उचित है। यह मनुष्य इतना मूर्ख एवं हृदयहीन नहीं हो सकता कि अपनी चेष्टाओं से जीवन समाज का कल्याण कर पाने में समर्थ बातों को भी बरी एवं अकल्याणकारी । बना दे। आज का वैज्ञानिक मानव कहा जा सकता है कि सत्ता और अधिकार के स्वार्थवश कुछ भटक अवश्य गया है; पर जल्दी ही वह सीधी राह पर आ जाएगा। तब निश्चय ही विज्ञान की प्रत्येक उपलब्धि महज जीवन-समाज के सार्वभौमिक विकास और कल्याण के लिए ही होगी । वनाश या अकल्याण के लिए कतई नहीं।

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commentscomments

  1. Very nice essay
    I like it very much it is written in easy words which a student can understand in every aspect.
    Thank you for this essay.

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