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Hindi Essay on “Vidyarthi Jeevan”, “विद्यार्थी जीवन” Complete Hindi Nibandh for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

विद्यार्थी जीवन

Vidyarthi Jeevan

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निबंध नंबर :-01

 

प्रस्तावना

भारत में ही नहीं अपितु अन्य देशों में भी विद्यार्थी जीवन को एक विशेष महत्त्व दिया जाता है; क्योंकि विद्यार्थी ही राष्ट्र के सच्चे कर्णधार होते हैं। इस स्थिति कारण ही विद्यार्थी जीवन को हर धर्म में उच्च स्थान प्राप्त हुई है। हिन्दू धर्मानुसार मानव जीवन को चार भागों में विभाजित किया गया है और उसी के अनुसार मानव कार्यशील था। ये आश्रम कहलाते थे। सबसे पहला ब्रह्मचर्य आश्रम होता था। इसमें मानव को जीवन के 25 वर्ष व्यतीत करने होते थे। इस अवस्था में वह अविवाहित रह कर, घर से दूर, आत्मीयों से परे, गुरु के आश्रम में विद्या-ग्रहण करता था और शेष समय गुरु-सेवा में बिताता था। ये आश्रम गुरुकुल कहलाते हैं। इसके बाद का 25 वर्ष का समय गृहस्थ आश्रम कहलाता था। इसमें मानव विवाह करके गृहस्थ का भार उठाता था। इस प्रकार उसका समय सामाजिक प्राणी के रूप में व्यतीत होता था। इसके बाद 25 वर्षों में वानप्रस्थ आश्रम में मानव प्रवेश करता था इसमें पति-पत्नी गृह त्याग, सगे सम्बन्धियों से मोह दूर कर वनों में चला जाता था। वहीं पर कन्दमूल खाकर प्रभु-स्तुति में लीन रहता था। इस प्रकार उसे दुनिया की हर चिन्ता से मुक्ति मिल जाती थी। इसके बाद के वर्षों में मानव संन्यास आश्रम में प्रवेश करता था। इस अवस्था में पति-पत्नी का सम्बन्ध भी टूट-सा जाता था। किसी एकान्त स्थान पर मानव संन्यास धारण कर लेता था। हिन्दू धर्म के अनुसार मानव की अवस्था कम-से-कम सौ वर्ष की मान ली गई थी और उसी के क्रमानुसार 25 वर्ष का एक आश्रम होता था।

 

विद्यार्थी जीवन की स्थिति

शिशु जब जन्म लेता है, वह अबोध होता है, उसे अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होता । सत्यं शिवं सुन्दरं को उसमें वास होता है। अत: विद्यार्थी जीवन की उसे एक विशेष आवश्यकता होती है; क्योंकि जिस ओर बच्चे को ले जाना होता है, इसी शिक्षा के द्वारा उसे सुगमता से ले जाया जा सकता है और इसी विद्या के द्वारा उसकी बुद्धि विकसित हो सकती है। अशिक्षित मानव असभ्य एवं जंगली कहलाता है। विद्यार्थी ही राष्ट्र के कर्णधार होते हैं और मानव की प्रगति की यही सीढी है। इस जीवन की तुलना किसी भी जीवन से नहीं की जा सकती है। विद्यार्थियों को हर देश एवं समाज में सम्मान मिलता है। विश्व से हर महापुरुष को इस जीवन से गुजरना पड़ता है। सत्य तो यह है कि उसकी महानता का श्रेय इस जीवन को ही है।

इस जीवन में विद्यार्थी वर्ग को किसी प्रकार की चिन्ता नहीं होती। उसका कार्य खाना-पीना, खेलना और पढ़ना होता है। माता-पिता अपने सुखों को त्यागकर अपने बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं ताकि उनका भविष्य उज्ज्वल रहे। विद्यार्थी इस जीवन में हर प्रकार का आनन्द उड़ाता है। मनोरंजन उसके साधन बन जाते हैं। इसी कारण हर बड़े इन्सान की सदैव यही इच्छा होती है कि वह विद्यार्थी जीवन बिताये । इसी से विद्यार्थी जीवन की मधुरता, सरसता व महत्ता का अनुभव किया जा सकता है।

 

 ज्ञानार्जन

विद्यार्थी जीवन में शिशु ज्ञानार्जन करता है। उसे अच्छा साहित्य अध्ययन के लिये मिलता है। कभी वह पंत जी की कविता में प्रकृति नटिनी के सौन्दर्य में अपने आप को भूल जाता है, तो कभी प्रेमचन्द जी की कहानियों में यथार्थ के दर्शन करता है। यहाँ तक उसकी सीमा सीमित नहीं होती। गुरुकुल एवं आश्रमों में वह अच्छे-अच्छे। शिक्षार्थियों की संगति करता है। उनसे सद्भावनाएँ ग्रहण करता है। उसका चरित्र पुष्ट होता है। गुरुओं के आचरण का भी उस पर प्रभाव पड़ता है। उसमें अच्छाई घर कर जाती है। शिशु का मस्तिष्क कोमल होता है। उसे अच्छे बुरे की पहचान नहीं होती है। जैसी उसे शिक्षा दी जाती है, वह वैसा ही बन जाता है और फिर आजीवन वैसा ही रहता है। सच तो यह है कि विद्यार्थी जीवन शिशु को ढालने का साँचा है।

ज्ञानोपार्जन के साथ-साथ इस जीवन में शिशु का आत्मसुधार भी होता है। इसी अवस्था में वह स्वधर्म से भी परिचित होता है। धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन का समय मिलता है। परोपकार की भावना जागृत हो जाती । है। इस प्रकार उसका आत्म-सुधार होता है।

 

विद्या और चरित्र का महत्त्व

इस जीवन में विद्या के साथ-साथ चरित्र की ओर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। चरित्रभ्रष्ट मानव अपने जीवन में कुछ नहीं कर सका। विद्यार्थी को विगत इतिहास द्वारा चरित्र की महत्ता के विषय में बताया जाता है। ब्रह्मचर्य व्रत पर जोर डाला। जाता है, उन्हें अपने देश के ऋषि-मुनियों के जीवन-चरित्र पढ़ने को दिये जाते हैं। वे पढ़ते हैं रामतीर्थ, दयानन्द व महात्मा बुद्ध के विषय में, किस प्रकार वे लग्न के साथ कार्य करते थे, उनमें किसी प्रकार का अहंकार न था और किस प्रकार उन्होंने इस विश्व में नाम पाया, उन्हें वैसा बनने की प्रेरणा दी जाती है और चरित्र की ओर ध्यान दिलाया जाता है।

 

आज का विद्यार्थी

पुरातन विद्यार्थी आज के विद्यार्थी से भिन्न था। पुरातन विद्यार्थी तो एक साधारण, सीधा-सादा जीवन व्यतीत करता था। उस समय शिशु को शिक्षा पाने के लिये गुरु के आश्रम में भेज दिया जाता था। राजा और रंक के बच्चों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता था। हरेक को शिक्षा काल में सादा जीवन व्यतीत करना पड़ता था। फैशन से दूर रहना पड़ता था। आडम्बर उनसे कोसों दूर भागता था। विद्यार्जन और गुरु-सेवा ही उनका लक्ष्य होता था। पर आज का विद्यार्थी तो पाश्चात्य सभ्यता का प्रतीक है। फैशन उसका जीवन है, आडम्बर उसका सहचर है। इसी प्रकार की वह शिक्षा ग्रहण करता है। गुरुकुलों का अभाव-सा हो गया है, उनका स्थान स्कूल एवं कॉलिजों ने ले लिया है। शुल्क देकर वह विद्या ग्रहण करता है। विद्यार्थी घर पर अथवा छात्रावास में रहता है। गुरु की सेवा का भाव उसमें नहीं होता। एक प्रकार से गुरु-शिष्य का सम्बन्ध ही समाप्त हो जाता है। आज तो वह पैसे की शक्ति पर विद्या अर्जित करता है। सादा जीवन व्यतीत करने की वह कभी भी नहीं सोचता। आज के विद्यार्थी का उद्देश्य खाना-पीना व मौज उड़ाना है, विद्या के महत्त्व को जानना नहीं ।

 

उपसंहार

आज का विद्यार्थी बहुत ही बदल गया है। चरित्र की ओर से वह उदासीन होता जा रहा है। फैशन उसके जीवन में घर कर गया है। अत: आज विद्यार्थी-जीवन में विशेष परिवर्तन की आवश्यकता है। हमें आधुनिक शिक्षा प्रणाली को भी बदलना होगा। उन्हें ऐसी शिक्षा देनी होगी जिससे उनमें चारित्रिक विकास हो और आत्मसुधार की भावना बढे । इसी की कमी के कारण हम देखते हैं। कि देशं में अच्छे नेताओं एवं नागरिकों की कमी है और यह कमी शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करने से दूर हो सकती है। इसके साथ ही विद्यार्थियों का दृष्टिकोण भी बदलना होगा। उनके अन्दर से फैशन का भूत भगाना होगा। सरल एवं शुद्ध आचरण की शिक्षा देनी होगी तभी यह विद्यार्थी-जीवन एक आदर्श जीवन कहलाया जा सकता है।

 

निबंध नंबर :-02

विद्यार्थी जीवन

Vidyarthi Jeevan

छात्र राष्ट्र की सबसे बडी सम्पत्ति है। ये देश का भविष्य तथा आशा होते हैं। देश का भविष्य इन्हीं पर निर्भर करता है। देश के जितने महान् नेता, कार्यकर्ता, समाज सुधारक एवं धार्मिक पुरुष हुए हैं, वे इस अवस्था से निकले हैं। छात्रों की योग्यता एवं शक्ति में सन्देह करना भारी भूल है। ये अपने जीवन के विविध सोपानों को सफलतापूर्वक पार करते हुए नव-रत्न बनते हैं। यदि उनका उचित मार्गदर्शन किया जाए तो ये शिवा, प्रताप, गुरू गोबिंद सिंह बनकर दांत खट्टे करते हैं, सुभाष एवं भगत सिंह के समान बनकर शत्रु के नाक में दम कर देते हैं ; गांधी तथा नेहरू बनकर राजनीति के क्षेत्र में डंका बजा देते हैं। स्वामी दयानंद, विवेकानंद एवं अद्धानद के आदर्शों को जीवित करने की शक्ति केवल छात्रों में ही है। मनुष्य के सावन का चार मुख्य अवस्थाएँ मानी गई हैं। उनमें पहली अवस्था विद्या प्राप्त करने है। इसे ही विद्यार्थी जीवन कहते हैं। पढ़ना-लिखना, कला कौशल सीखना, युद्ध विद्या में निपुण होना, ज्ञान प्राप्त करना, अच्छे संस्कार अपनाना, इसी आयु में पूरा तरह संभव होता है क्योंकि बाल, किशोर और युवा अवस्था में बुद्धि तीव्र, मन नमल, मस्तिष्क साफ एवं बलवान और शरीर स्वस्थ होता है। हृदय में उत्साह और मग होने से आशाएँ भरी हुई होती हैं। विद्यार्थी जीवन, जीवन की सबसे मीठी, सुन्दर और आनन्दमय अवस्था होती है। विद्यार्थी जीवन मुख्यता पांच वर्ष से लेकर पच्चीस वर्ष तक होता है परन्तु धन्य हैं वे लोग जो जीवन भर विद्यार्थी और जिज्ञास बने रहकर अपना ज्ञान बढ़ाते रहते हैं।

विद्यार्थी जीवन मनुष्य के सारे जीवन की नींव है। नींव पक्की हो तो उसके ऊपर भवन भी पक्का बनता है। यदि नींव कच्ची रह जाये तो इसके ऊपर भवन देर तक नहीं टिकता। इसी प्रकार विद्यार्थी जीवन में यदि विद्या भली-भांति प्राप्त न की जाए तो भविष्य में मनुष्य का जीवन सूना-सूना, अधूरा और पिछड़ा हुआ रह जाता है। विद्यार्थी को जीवन में चिन्ता ज़रा भी नहीं होती। विद्यार्थी सदा प्रसन्न रहते हैं। हंसते खेलते उनका समय बीतता है। चेहरे पर चमक और ताज़गी होती है। उन्हें आनंद मग्न देखकर बड़े-बड़े लोग विद्यार्थी जीवन के लिए कई बालक, बहुत से किशोर तथा अनेक युवक इस जीवन की महत्ता को नहीं जानते। वे अपनी इस सुनहरी अवस्था को व्यर्थ गंवा देते हैं। उन्हें पता नहीं कि ऐसा अमूल्य समय फिर हाथ नहीं आएगा, बाद में केवल पछताना पड़ेगा। उन्हें जान लेना चाहिए कि विद्यार्थी जीवन का एक-एक पल कीमती होता है। अन्दर की शक्तियाँ इसी जीवन में फलती-फूलती है। इसलिए इस जीवन में बड़ी लगन और रुचि से विद्याएँ सीखनी चाहिए।

जीवन को सफल बनाने के मुख्य रहस्य है-कर्त्तव्य पालन, आज्ञाकारी होना, ब्रह्मचर्य, संयम, कुसंगति से बचना, खेल तमाशों का त्याग, व्यायाम, उत्तम स्वास्थ्य, गुरू और माता-पिता के प्रति श्रद्धा, ईश्वर भक्ति, आलस्य का त्याग एवं समय का सदुपयोग।

विद्या ग्रहण करते हुए अपने स्वास्थ्य का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए व्यायाम और खेलकूद आवश्यक है। कई विद्यार्थी पुस्तकों के कीड़े बनकर अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लेते हैं। पढ़ने और खेलने दोनों में समयानुसार भाग लेकर निपुण बनना हितकर है। शिक्षा एवं खेलों में समन्वय की आवश्यकता है। तमाशे, व्यर्थ की गप्पे, दुर्व्यसन आदि से बचने वाले विद्यार्थी का जीवन ही चमकता है। जो विद्यार्थी इनके अधीन हो जाता है वह स्वयं अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारता है। अपना भविष्य धुंधला कर लेता है। महात्मा गांधी का कथन है कि विद्यार्थी जीवन में पान, सिग्रेट तथा शराब की बुरी आदतें डालना आत्मघात करना है।

विद्यार्थी जीवन कच्चे घड़े के समान होता है। इस अवस्था में जैसे संस्कार टाले जाएं वे पक्के हो जाते हैं। यह सोचकर विद्यार्थी को सदा अच्छे और सच्चे साथी तथा मित्र बनाने चाहिए क्योंकि वे जीवन को ऊँचा और सुखी बना देते हैं। बुरे साथी और आचरणहीन मित्र विद्यार्थी की जीवन नैया को डुबो देते हैं।

विद्यार्थी को मितव्ययी होना चाहिए। संभल कर खर्च करने वाले विद्यार्थी माता-पिता पर बोझ नहीं बनते, स्वयं ऋण से बचकर सदा सुखी रहते हैं । मर्यादा का ध्यान रखना विद्यार्थी का परम् कर्त्तव्य है। उसे निर्लज्ज नहीं बनना चाहिए। हंसी मज़ाक एक सीमा तक ही अच्छा होता है। हाँ झूठी शर्म, दब्बूपन छोड़ देना चाहिए। साहस, वीरता तथा निडरता से विद्यार्थी की विशेषताएँ बढ़ती हैं।

उपद्रव, हिंसा, तोड़-फोड़, उदंडता भरे आन्दोलनों में पड़ने से विद्यार्थी जीवन का गौरव नष्ट हो जाता है। विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता के कारण आज सारा वातावरण दूषित हो गया है। इन बातों से विद्या प्राप्ति में बड़ी बाधाएँ आ रही हैं। आज भारत ही नहीं लगभग सारा संसार ही छात्रों की अनुशासनहीनता से परेशान है। यह अनुशासनहीनता छात्र वर्ग एवं राष्ट्र दोनों के लिए घातक है। आज तो ऐसे छात्रों की आवश्यकता है जो आदर्श जीवन से मोह करने वाले हों।

विद्यार्थी जीवन अमत से भरा जीवन है। यही बाद में जीवन को बनाता या बिगाड़ता है। इसी के आधार पर अच्छे नागरिक उत्पन्न होते हैं। इसी के सहारे राष्ट्र में राष्ट्रप्रियता बढ़ती है। महान् नेता बनने के अंकुर इसी अवस्था में उगते हैं । अतः अपने विद्यार्थी जीवन का सदुपयोग करना छात्र का परम कर्त्तव्य होना चाहिए।

 

निबंध नंबर :-03

विद्यार्थी जीवन 

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विद्यार्थी जीवन भावी जीवन की आधार शिला है। इस वय में जो संस्कार विद्यार्थी में पड़ते हैं, वे स्थायी होते हैं। अच्छे संस्कारों का निर्माण विद्यार्थी के उज्जवल भविष्य का द्योतक है।

प्राचीन काल में विद्याध्ययन हेतु ऋषि-मुनियों के आश्रम में अपने घर से दूर रहकर विद्यार्थी शिक्षा पाते थे। इन्हें गुरुकुल कहा जाता था। गुरुकुलों का जीवन बड़ी साधना का जीवन था। नियम, संयम, अनुशासन का कड़ाई से पालन करना पड़ता था।

जीवन के समस्त सुखों को त्यागकर गुरु के मार्गदर्शन में बड़ी निष्ठा एवं लगन के साथ विद्यार्थी को शिक्षा ग्रहण करना होती थी। इसीलिये कहा गया है –

 

सुखार्थी वा त्यजेत् विद्या, विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।

सुखार्थिनो कुतो विद्या, विद्यार्थिनो कुतः सुखम्।।

 

विद्यार्थी जीवन में सुख और आराम की कल्पना ही नहीं करना चाहिये। सुखार्थी को विद्या उपलब्ध नहीं हो सकती। अतः विद्यार्थी जीवन में सारे सुखों को तिलांजली देकर केवल अध्ययन में ही रत रहना चाहिये।

वास्तव में सच्ची शिक्षा वह है, जो विद्यार्थी में श्रद्धा, ज्ञान और चरित्र का आदर्श प्रस्तुत कर सके।

विद्यार्थी जीवन में ही अच्छे संस्कार और चरित्र का निर्माण होता है। महापुरुषों के चरित्र से शिक्षा ग्रहण कर विद्यार्थी को अपना चरित्र संवारना चाहिये। सफल विद्यार्थी को जिज्ञासु और ज्ञान पिपासु होना चाहिये। जिज्ञासा से विद्या के प्रति ललक बढ़ती है। कहा गया है –

 

विद्या ददाति विनयं, विनयात् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मः ततः सुखम्।।

 

विद्या से विद्यार्थी विनम्र बनता है, जिससे योग्यता आती है। योग्यता से धन और धन से धर्म और फिर उससे सुख मिलता है। सफल विद्यार्थी का जीवन संयमित एवं नियमित होना चाहिये। विद्यार्थी को समय पर सोना, उठना, यथा समय अध्ययन, व्यायाम, खेलकूद करना चाहिये।

समय का दुरुपयोग विद्यार्थी के लिये अत्यन्त हानिकारक है। एक-एक क्षण का सदुपयोग करना चाहिये अन्यथा वह विद्या अर्जित नहीं कर सकता क्योंकि कण त्यागे कुतो विद्या, क्षण त्यागे कुतो धनम्।

संस्कृत साहित्य में आदर्श विद्यार्थी के सात लक्षण बताये गये हैं –

 

काक चेष्टा, बको ध्यानी, श्वान निद्रा, संयमी श्रमी।

अल्पाहारी, गृह त्यागी, विद्यार्थी सप्त लक्षणम्।।

 

विद्यार्थी कौआ जैसी चेष्टा वाला, बगुले के समान ध्यान वाला, कुत्ते जैसी निद्रा वाला, संयमी, परिश्रमी, थोड़ा खाने वाला और घर से विशेष मोह नहीं रखने वाला होना चाहिये।

अनुशासन के प्रति आस्था रखना विद्यार्थी का पावन कर्तव्य है। वह विद्यार्थी अनुशासन प्रिय होता है, जो शाला के नियमों का निष्ठा से पालन करे। माता-पिता, गुरु एवं अपने से बड़ों के प्रति आदर की भावना व्यक्त करे। इन सब गुणों को आत्मसात करने वाले विद्यार्थी मेधावी, परिश्रमी, प्रतिभा सम्पन्न और सर्वप्रिय होते हैं।

आज के विद्यार्थियों की गतिविधियों पर जब हम विचार करते हैं, तो हमें मार्मिक पीड़ा होती है। अनुशासनहीनता को आज के छात्रों ने अपना आदर्श मान लिया है। गुरु शिष्य की पावन परम्परा समाप्त हो गई है।

आज का छात्र पतन के कगार पर खड़ा है। अधिकांश गुरु भी अब उतने समर्पित नहीं रहे। आज का छात्र कल का नागरिक है।

यदि आज के छात्रों ने अपने दायित्व की और ध्यान नहीं दिया तो देश का भविष्य अंधकारमय होना निश्चित है।

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