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Hindi Essay on “Vidyarthi aur Fashion ”, “विद्यार्थी और फैशन” Complete Hindi Nibandh for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

विद्यार्थी और फैशन

Vidyarthi aur Fashion 

Best 3 Essays on “Vidyarthi aur Fashion”

निबंध नंबर :- 01

फैशन का अर्थ व कारण : शारीरिक प्रसाधनों से समाज के समक्ष आत्म-प्रदर्शन करना ही फैशन है। मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार हीनभाव, आत्मप्रदर्शन, जिज्ञासा तथा आत्मप्रेम आदि फैशन के प्रमुख कारण हैं। इसी  कारण फैशन मानव स्वभाव के लिए स्वाभाविक माना गया है। वह सौंदर्य वृद्धि तथा सौंदर्य पिपासा की संतुष्टि हेतु सदैव फैशन की सेवा करता रहा है।

प्राचीन भारत में फैशन : पुरातन युग के ग्रंथों में वर्णित पुष्प श्रृंगार, उबटन, लेपन तथा चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों के प्रयोग और विभिन्न प्रकार की केश-सज्जा आदि इस के साक्षी हैं। अजन्ता, एलोरा और खजुराहो की स्थापत्य कला के विभिन्न नमूने इसी के सूचक हैं। आचार्य चाणक्य और वात्स्यायन आदि विद्वान् तो फैशन को एक अनिवार्य कला मानते रहे हैं। प्राचीन भारत में फैशन करने का अधिकारी सिर्फ सामाजिक गृहस्थों को ही माना जाता था। विद्यार्थी, संन्यासी, वानप्रस्थी और गुरु इस से पूर्णरूप से अछूते रहते थे। फलत: तत्कालीन युग में विद्यार्थी जीवन में फैशन त्याज्य समझा जाता था। अतः सादा जीवन उच्च विचार ही उसका जीवन तथा विद्यार्जन उसका लक्ष्य था।

आज का विद्यार्थी और फैशन : समय परिवर्तन के साथ-साथ मान्यताओं में परिवर्तन आयो। ‘खाओ पिओ और मौज उड़ाओ’ जैसी मान्यताओं और स्वच्छंद जीवन प्रणाली ने समाज के साथ-साथ विद्यार्थी वर्ग को भी बदल डाला। वह विद्या प्राप्ति के मूल लक्ष्य को भूलकर, समाज का अंधानुकरण करने लग गया और शीघ्र की फैशन का गुलाम बन गया। वह तंग वस्त्र, नए-नए डिजाइन और साज- शृंगार में पूरी तरह घिर गया। आज उसका शिक्षक गुरु न होकर टेलर मास्टर है, उसका विद्यालय सिनेमा भवन और रेस्टोरेंट हैं, उसकी पाठ्य पुस्तकें । फैशन सम्बन्धी पत्र-पत्रिकाएँ हैं तथा उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है नए-नए फैशन की खोज करना। फैशन का यह ज्वर नगरों तक ही सीमित नहीं रहा ; बल्कि ग्रामों तक में फैल गया है। सीधे सादे ढंग से रहने वाला छात्र आज बुद्ध, मूर्ख और गणेश जी कह कर पुकारा जाता है। फैशन न करने पर मित्र मंडली में दुत्कारा जाता है और तथाकथित शिक्षित समाज में ठुकराया जाता है। फलत: अधिकांश विद्यार्थी फैशन के पीछे दीवाने हो चुके हैं।

फैशन के दुष्परिणाम : किसी भी व्यक्ति की वेश-भूषा से उसके चरित्र, रहन-सहन और विचारों का पता आसानी से लगाया जा सकता है। बहुधा देखा गया है कि निर्धन छात्र अधिक खर्चीला, बदसूरत अधिक मे अकप करने वाला, परिवार या समाज से उपेक्षित विद्यार्थी सस्ता तथा अधिक फैशन करने वाला होता है।

उपसंहार : फैशन ऐसी जोंक है यदि इसे दूर न किया गया, तो यह युवा समाज का सारा खूनं-चूस जाएगी । इसके लिए अभिभावकों और शिक्षकों को युवा वर्ग के सामने आदर्श रखने चाहिए। गाँधी जी के सिद्धान्त ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की शिक्षा देकर उन्हें प्रेरित करना चाहिए। इसके साथ ही युवा वर्ग को, उपयोगी कार्यों में लगाकर तथा उनका मनोवैज्ञानिक उपचार करा कर भी फैशन रूपी पिशाचिनी से पीछा छुड़ाया जा सकता है। फैशन का अंत ही जनहित है। अत: इस से मुक्ति दिलाने के यथाशीघ्र प्रयास किए जाने चाहिए ।

निबंध नंबर :- 02

विद्यार्थियों के मध्य फैशन

Vidyarthiyo ki Madhya Fashion

फैशन सामाजिक विकास का एक फल हैं। यह समय के साथ-साथ बदलते रहते हैं। यह समय की जरूरतों तथा लोगों की पसन्द को दर्शाते हैं। लड़के तथा लड़कियां दोनों ही इसके पीछे पागल हैं। वे अपना अधिकतर समय तथा ताकत इस पर व्यर्थ करते हैं।

कपड़ों में फैशन बहुत आम है। सबसे अधिक प्रभाव स्कूल तथा कालेज के बच्चों पर है। वे हर समय ‘अपटूडेट’ होकर रहना पसन्द करते हैं। वे पढ़ाई की तरफ ध्यान न देकर अपने बाल, टाई तथा कालर ठीक करने में लगे रहते हैं। लड़के आजकल के नवीन कपड़े पहनते हैं। कई बार वे जीन के साथ कुड़ता पहन कर फिलोस्फर जैसी पहचान बना लेते हैं। लड़कियां भी फैशन के प्रति उतनी ही सक्रिय हैं। वे तंग फिटिंग के कपड़े पहनती हैं। वे बिना बाजू वाली कमीजें पहनती हैं। वे स्वयं को खूबसूरत बनटने के लिए ब्यूटी-पार्लर जाती हैं।

फिल्में लड़के-लड़कियों पर फैशन का बहुत प्रभाव डालती हैं। वे फिल्मी हीरो तथा हीरोइनों की नकल करते हैं। वह उनकी तरह चलने, बात करने तथा कपड़े पहनने का प्रयास करते हैं। दर्जी भी उन्हें नए प्रकार के कपड़ों की जानकारी देते हैं। कपड़ों के फैशन के अलावा और भी कई प्रकार के फैशन होते हैं। ऊँचे दर्जे के लोगों में क्लब जाने का बहुत रिवाज है। वे कई बार विभिन्न कलाओं में रुचि को प्रदर्शित करते हैं चाहे उन्हें उसकी जानकारी न हो।

फैशन एक व्यर्थ की चीज़ है। यह केवल हमारी बाहरी सन्दरता कख्न दर्शाती है। व्यक्ति की असल खूबसूरती उसके व्यक्तित्व में होती है। हमारे जीवन का उद्देश्य सादा जीवन तथा ऊँची सोच होना चाहिए।

निबंध नंबर :- 03

विद्यार्थी और फैशन

Vidyarthi aur Fashion 

 

फैशन की दौड़ में पीछे रहना चाहे कोई।

बोलती है बुढ़िया भी डायलॉग फिल्मी

आज का विद्यार्थी फैशन में किसी से पीछे नहीं है। आज के विद्यार्थी को अपनी पढ़ाई की उतनी चिन्ता नहीं है जितनी उसे अपने आपको सजाने संवारने की। घंटों शीशे के सामने खड़े होकर अपने बाल संवारना उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया है। इसके अतिरिक्त बालों में सुगन्धित तेल लगाना, बढ़िया से बढ़िया कपडे पहनना, उन पर तरह-तरह के महँगे- सैंट छिड़कना, हाथ में मोबाइल, मोटर साइकिल पर इधर-उधर व्यर्थ घूमना फिरना आज एक फैशन बन गया है। ऐसा वे इसलिए करते हैं ताकि वे अपने रहन-सहन से स्वयं को दूसरों की तुलना मे धनी दिखला सकें। आज का विद्यार्थी अपने-आपको दूसरों से अधिक सुन्दर दिखाना चाहता है जोकि वास्तव में वह नहीं है। इस फैशन से वे अपना महत्त्वपूर्ण समय नष्ट करते हैं। ऐसे में कौन उन्हें बुद्धिमान कहेगा और कौन उन्हें समझाए कि यह धन का अपव्यय भी है और साथ ही समय की बर्बादी भी। जितना समय वे अपने आपको सजाने-संवारने में लगाते हैं, यदि वे उतना समय अपनी पढ़ाई में लगाएं तो वे अच्छे अंक लेकर पास हो सकते हैं।

ज्यों-ज्यों विद्यार्थी में फैशन की भावना घर करती जाती है त्यों-त्यों उसमें विलासिता की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है। विलासमय जीवन बिताने के लिए धन की आवश्यकता होती है। उनके पास इतना धन तो होता नहीं है इसलिए धन प्राप्ति के लिए वे तरह-तरह के व्यसनों में फँस जाते हैं। इस प्रकार परिवार से सम्बन्ध टूट जाने तक की नौबत आ जाती है। विद्यालयों में जाने की रुचि कम हो जाती है. पढने में भी उनका मन नहीं लगता। उनके आदर्श फिल्मी अभिनेता बन जाते हैं। इस प्रकार विद्यार्थी अपनी मंजिल से भटक जाते हैं अन्त में जीवन में निराशा ही उनके हाथ लगती है और वे जीवन भर पछताते रहते हैं।

आज सिनेमा हमारे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन चुका है। विशेषकर, छात्र-छात्राओं पर इसका प्रभाव कुछ अधिक ही पड़ता है। आधुनिक बढते हए फैशन की जड हमारी फिल्में ही हैं। छात्र-छात्राएं अपनी वेश-भूषा का अनुकरण अपने मन पसन्द अभिनेता एवं अभिनेत्रियों की तर्ज पर करने को अधिक महत्त्व देते हैं। इसलिए विद्यार्थियों में फैशन की दौड़ दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। सिनेमा के साथ टी.वी. संस्कृति भी विद्यार्थी जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित कर रही है। नाच-गानों के इतने सीरियल आ रहे हैं जो साथ-साथ फैशन परस्ती को भी बढ़ावा दे रहे हैं। विदेशी संस्कृति का प्रभाव भी हमारी संस्कृति पर पड़ रहा है। कल लडके और लड़कियाँ यूरोपियन लड़के और लड़कियों की नकल कर रहे हैं। लडकियों का बाल कटवाना, जीन्स पहनना, चश्मा लगाना आज आम बात गई है। कई बार तो लड़के और लड़की में भेद करना भी मुश्किल हो जाता है।

फैशन की बढ़ती हुई प्रवृत्ति केवल विद्यार्थियों के लिए ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी घातक सिद्ध हो रही है। कई बार माता-पिता विद्यार्थियों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते जिससे विद्यार्थी जिद्दी और हट्ठी स्वभाव के बन जाते हैं। कई बार विद्यार्थी सिनेमा हालों में जाकर लोगों से अशोभनीय व्यवहार करते हैं, गली महल्लों में इल्ला मचाते हैं और कई बार तो हिंसात्मक गतिविधियों पर भी उतर आते हैं। फैशन परस्त विद्यार्थी अपनी पढ़ाई ठीक प्रकार से नहीं कर पाते जिससे माता-पिता जो उनसे आशाएँ लगाए बैठे होते हैं, उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर जाता है।

विद्यार्थियों को फैशन परस्ती से हर हाल में बचना चाहिए और हमेशा ही ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ के आदर्श के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। फैशन के चक्कर मे पडकर विद्यार्थी को अपना जीवन बर्बाद नहीं करना चाहिए। विद्यार्थी का लक्ष्य उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने लक्ष्य को पाना होना चाहिए न कि फैशन परस्ती में फंस कर अपना धन और यौवन दोनों नष्ट करना। विद्यालय के अध्यापक एवं अध्यापिकाएँ आदर्श होने चाहिएं न कि फिल्मी अभिनेता या अभिनेत्रियाँ।

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