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Hindi Essay on “Sahitya Ke Udeshya” , ” साहित्य का उद्देश्य” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

साहित्य का उद्देश्य

Sahitya ka Udeshya 

निबंध नंबर :- 01

‘साहित्य’ शब्द में मानव हित साधन का भाव स्वत: ही अन्तर्हित रहा करता है और यह सोद्दश्य होता है। सृष्टि में कोई भी प्राणी, पर्दााि या अन्य कुछ निरुद्देश्य नहीं है। मानव इस सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट प्राणी है। इस मानव ने अपने सतत प्रयत्न और साधना से आज तक जो कुछ भी प्राप्त किया है, उस सबमें कला और सहित्य और श्रेष्ठतम उपलब्धि माना गया है। यही कारण है कि साहित्य का मूल उत्स या स्त्रोत जीवन और मानव-समाज को ही स्वीकार किया जाता है। साहित्य का प्रभाव अचूक हुआ करता है। मुख्यतय यह प्रभाव जीवन को सहज-स्वस्थ और आनंदमय बनाने में ही दिखाई दिया करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि साहितत्य का मूल उद्देश्य कुरीतियों, सभी प्रकार की बुराइयों से हटाकर स्वस्थ, सुंदर और आनंदमय जीवन की ओर अग्रसर करना है। जीवन और समाज से संबंधित शेष सभी बातें इसी चेतना के अंतर्गत आ जाती है।

व्युत्पत्ति या बनावट की दृष्ट से ‘साहित्य’ शब्द पर विचार करने पर हम पाते हैं कि इसमें ‘सहित’ और ‘हित’ का भाव छिपा है। अर्थात जो रचना मानवता का हित-साधन करती है वह साहित्य है। तभी तो संस्कृत के आचार्यों ‘सहितस्य भार्व साहित्यम’ कहकर इसकी परिभाषा की है। आधुनिक आचार्यों ने भी साहित्य की परिभाषा करते समय इन्हं बातों का ध्यान रखा है। डॉ. श्यामसुंदर दास मानते हैं कि ‘साहित्य वह है, जो हृदय में आलौकिक आनंद या चमत्कार की सृष्टि करे।’ स्वर्गीय प्रेमचंद मानते थे कि ‘साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक ओर सुंदर बनाता है।’ इसी प्रकार की मान्यतांए अनेक पाश्चात्य विद्वानों ने भी प्रगट की हैं। सभी मान्यतांए वस्तुत: साहित्य के उद्देश्य की है प्रकाशित करने वाली हैं। यहां गोस्वामी तुलसीदास का कथन भी द्रष्टव्य है। वे कहते हैं-

‘कीरति भणिति भूति भल सोई।

सुरसरि सम सबका हित कोई।।’

कुछ पाश्चात्य विद्वान साहित्य को समाज का दर्पण और कछ दिमाग मानते हैं। कुछ लोग साहित्य को ‘जीवन की व्याख्या’ भी स्वीकार करते हैं। इन्हीं से मिलता-जुलता मत आचार्य महावीरप्रसाद द्विेवेदी का भी है ‘विचारों के संचित कोश का नाम साहित्य है।’ इस प्रकार स्पष्ट है कि साहित्य में मानव जीवन के सदविचार और भाव संचित रहा करते हैं- ऐसे भाव और विचार कि जिनका उद्देश्य जीवन-समाज में आ गई कुरुपताओं, दुष्प्रभावों और असंगतियों को मिटाकर संगत एंवव कल्याणकारी बनाना है। भारतीय ग्रामीण आचायों ने साहित्य या काव्य का उद्देश्य भावनाओं का परिष्कार करके ब्रहमानंद सहोदर आनंद की अनुभूति कराना स्वीकार किया है। अर्थात उनके अनुसार रस प्राप्त करना या मनोरंजन पाना ही साहित्य का उद्देश्य है। रस या मनोरंजन भी तभी पाया जा सकता है जब कि व्यक्ति और समाज का मन-मस्तिष्क सहज एंव स्वस्थ हो। क्योंकि स्वस्थ मन-मस्तिष्क ही रस प्राप्त कर सकता है। अत: इस उद्देश्य की प्राप्ति के साथ-साथ प्राचीन भारतीय आचार्य साहित्य का उद्देश्य, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति, व्यवहार-ज्ञान कराने के साथ-साथ यश की प्राप्ति भी स्वीकार करते हैं। शुभमंगल की रक्षा भी इसका उद्देश्य है।

‘काव्य यशसे अर्थकृते व्वहारविदे शिवेत रक्षये।’

इस प्रकार कहा जा सकता हे कि साहित्य का उद्देश्य व्यापक संदर्भों में मानव का मनोरंजन, स्वस्थ रक्षण और कल्याण करना ही है। यश प्राप्ति का उद्देश्य साहित्यकार तक ही सीमित हुआ करता है। पर यह बात भी ध्यान रखने वाली है कि साहित्य ये सारे कार्य नीति-उपदेश देकर नहीं करता, बल्कि मित्र और प्रिया के समान प्रिय लगने वाले हित वचन कहकर ही किया करता है। इसी कारण उसके कथन में एक प्रकार की कलात्मक विचक्षणता रहती है। यह कलात्मक विक्षणता ही वास्तव में सहित्य है। इसी को साहित्य एंव साहित्यकार की कलात्मक उपलब्धि कहा जाता है।

ऊपर यह कहा जा चुका है कि प्राय: पाश्चात्य विद्वान साहित्य को समाज का दर्पण, मस्तिष्क और जीवन की आलोचना मानते हैं। वस्तुत: उनकी ये मान्यतांए ही साहित्य के उद्देश्य की ओर संकेत करने वाली है। दर्पण का काम करना भी वस्तुत: जीवन की आलोचना या व्याख्या करना ही है और साहित्य जो तथा जिस प्रकार की व्याख्या करता है, उसमें रंजन एंव शुभ या कल्याण दोनों भार्वों का सुखद समन्वय रहा करता है। तभी ताक साहित्य के अध्ययन से अनेक बार जीवन में महान हलचल मच जाया करती है, बड़ी-बड़ी क्रांतियां हो जाया करती है। फ्रांस की क्रांति के मूल में तो साहित्य था ही, रूस की बोलोशेविक क्रांति भी इसका अपवाद नहीं कही जा सकती। वस्तुत: संसार में जहां भी कुछ नया, कुछ क्रंातिकारी हुआ है, वह साहित्य के कारण, उसी के प्रभाव से हुआ है। जीवन की सड़ी-गली परंपराओं, रूढिय़ों और हीनताओं से जीवन-समाज को निकालकर एक स्वस्थ सुंदर और शिवलोक की तरफ से जाना ही साहित्य का मूल और अंतिम उद्देश्य हुआ करता है। इस उद्देश्यपूर्ति के कारण ही जीवन का ‘सत्य’ तत्व आज भी संरक्षित है।

साहित्य और कला के उद्देश्य क्या हैं? इस प्रश्न को लेकर काफी समय से पश्चिम और भारत में भी, ‘कलावाद’ के सिद्धांत के मानने वाले तो यह कहते या मानते रहे हैं कि कला या साहित्य मात्र एक प्रकार की अभिव्यक्ति है, उससे अधिक कुछ नहीं। अर्थात ‘कला कला के लिए है, जीवन के लिए नहीं।’ क्रोंचे का अभिव्यंजनावाद ‘कला कला के लिए मत का ही समर्थक रहा है।’ इसके विपरीत दूसरा मत है कि ‘कला कला के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए’ है। इसी मत वालों ने कला को जीवन की व्याख्या कहकर उसके उपयोगितावादी पक्ष का समर्थन किया है। स्वर्गीय प्रेमचंद भी कला-साहित्य के उपयोगितावादी पक्ष के ही समर्थक थे। हमारे विचार में परंपरागत भारतीय रसवाद या आनंदवाद, इसके अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि, शुभ की रक्षा आदि मत भी वस्तुत: साहित्य के उपयोगितावादी पक्ष के ही समर्थक हैं। आनंद या विशुद्ध मनोरंजन भी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है, यदि वह मात्र उत्तेजक एंव भावनांए भडक़ाने वाला न हो। अन्यान्य उपर्युक्त बातें भी साहित्य की उपलब्धि एंव गंतव्य ही हैं। विशेषता यह है कि साहित्य, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, विचक्षणता, यश आदि सभी की प्राप्ति मनोरंजक ढंग से ही करवाता है- उपदेश, आदेश देकर या शास्त्र की तरह नीति-वाक्य कहकर नहीं। इस दृष्टि से माक्र्सवादी या फ्रॉयडवादी जो साहित्य का उद्देश्य दीन-दुखियों का लेखा-जोखा, दमित भावनाओं की अभिव्यक्ति आदि बताते हैं, उस सबका समाहार भी स्वत: ही उपर्युक्त धारणा और परिभाषा में हो जाता है।

इस प्रकार कुल मिलाकर अंत:बाह्य सभी दृष्टियों से सहज मनोरंजक ढंग से मानवमात्र का हितसाधन, शुभ की रक्षा एंव विस्तार और अंत में लौकिक-पारलौकिक मुक्ति ही साहित्य का चरम उद्देश्य कहा जा सकता है। जीवन के व्यवहारों का जो सत्य है, उसी सत्य को अपने रोचक ढंग से अभिव्यंजित करके ही साहित्य अपने उद्देश्य की पूर्ति अर्थात जीवन के ‘शिव’ की रक्षा करते हुए ‘सुंदर’ का अभिधान किया करता है, ऐसे सभी किसी-न-किसी रूप में स्वीकार करते हैं।

 

निबंध नंबर :- 02

 

साहित्य का उद्देश्य

Sahitya ka Uddeshya 

साहित्य से हमारा अभिप्राय हित चिन्तन से है। इसमें विश्व कल्याण की भावना निहित होती है, पर आज साहित्य शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है। अंग्रेजी में लिट्रेचर’ का जो अभिप्राय होता है, वही आज साहित्य का अभिप्राय समझा जाने लगा है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने विचारों के संचित कोश को ही साहित्य की संज्ञा दी है। डॉ० श्याम सुन्दर दास के मतानुसार साहित्य वह है जो हृदय में अलौकिक आनंद की या चमत्कार की सृष्टि करे। प्रेमचन्द एक स्थान पर साहित्य का उद्देश्य स्पष्ट करते हए लिखते हैं कि साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और सुन्दर बनाता है। दूसरे शब्दों में उसी की बदौलत मन का संस्कार होता है। यही इसका मुख्य उद्देश्य है। पाश्चात्य विद्वान मैथ्यु आर्नल्ड ने साहित्य को जीवन की आलोचना बताया है।

इस प्रकार साहित्य शब्द की व्याख्या करने से साहित्य के दो क्षेत्र सामने आते हैं-एक व्यापक और दूसरा संकुचित। वाणी विस्तार और शब्द भण्डार की सीमा में आने वाली प्रत्येक वस्तु साहित्य है। संकुचित अर्थों में साहित्य काव्य का पर्यायवाची है। साहित्य का व्यापक अर्थ उसकी उत्पत्ति पर और संकुचित अर्थ रुढ़ि पर आधारित है। इस प्रकार साहित्य के भी दो विभाग हो जाते हैं-काव्य और शास्त्र। काव्य रसात्मक होता है और शास्त्र ज्ञान प्रधान।

जिस प्रकार भारतीय दार्शनिकों ने जीवन के दो उद्देश्य बतलाये हैं, उसी प्रकार भारतीय साहित्यकारों ने भी साहित्य के दो उद्देश्य बतलाये हैं, उनका एक अलौकिक पक्ष जावन के आन्तरिक तथा आध्यात्मिक पक्ष से सम्बन्ध रखता है और दूसरा जीवन के लौकिक अथवा बाह्य पक्ष से सम्बन्ध रखता है।

जिस प्रकार भारतीय दार्शनिक जीवन का प्रथम उद्देश्य आत्म तत्त्व या ज्ञानप्रद ब्रह्मानन्द की प्राप्ति मानते हैं, उसी प्रकार भारतीय साहित्यकार भी साहित्य का प्रथम उद्देश्य मात्र के अन्तःस्थल में व्याप्त भावनाओं का अनुभव कर ब्रह्मानन्द सहोदर रस की अनुभूति मानते हैं।

जिस प्रकार आत्म-तत्त्व के ज्ञान से स्व पर की भावना का विनाश हो जाता, उसी प्रकार साहित्य के अनशीलन से प्राप्त रस की अनुभूति से भी स्व पर का सपना का विलोप होता है। विश्व में सर्वत्र कष्ट ही कष्ट हैं। सांसारिक भोग दुःखो की जड़ हैं। विश्व का समस्त वैभव एवं महान विद्वता भी मन को शान्ति नहीं देती है।

जिस प्रकार भारतीय दार्शनिक धर्म अर्थ और काम को भी जीवन का उद्देश्य मानते हैं। प्रकार भारतीय साहित्यकार भी रस की अनुभूति के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम विचक्षणता और कीर्ति की प्राप्ति भी साहित्य के उद्देश्य मानते है। आचार्य मम्मट के विचारानुसार, “यश की प्राप्ति, धन की प्राप्ति, उचित व शिष्ट व्यवहार का ज्ञान अकल्याण को दूर करने में सहायक, सरलता और लौकिक आनन्द की प्राप्ति काव्य के प्रयोजन है।

साहित्य के उद्देश्य के विषय में पाश्चात्य विद्वानों के अनेक मत है । फ्रायड ने अमुक्त भावनाओं की अभिव्यक्ति को साहित्य का प्रधान लक्ष्य माना है। उनके अनुसार जब वास्तविक रूप में काम का उपभोग न कर उसे चिन्तन रूप में ही परिवर्तित कर दिया जाता है, तब साहित्य की सृष्टि होती है। एडलर के अनुसार साहित्य जीवन के अभावों की पूर्ति मात्र है। उन्होंने चिरकालिक हीनता की भावना तृप्ति को साहित्य का प्रमुख उद्देश्य माना है। क्रोंचे ने अभिव्यंजना को साहित्य का मूल उद्देश्य माना है। ब्रेडले ‘कला-कला के लिए है के सिद्धान्त को मानते हुए कहते हैं कि ‘कविता कविता के लिए होती है।

मार्क्सवादी प्रचार को ही साहित्य का उद्देश्य बतलाते हैं। इनके अनुसार साहित्य सम्पन्न लोगों द्वारा बह-संख्यक दलितों तथा पीडितों का लेखा-जोखा मात्र है। यह सिद्धान्त अमान्य है।

उक्त विवेचन से सिद्ध होता है कि सभी विद्वान् साहित्य के उद्देश्य पर एकमत न होते हुए भी मानव का हित सम्पादन या उसकी आनन्द प्राप्ति का लक्ष्य काव्य को मानते हैं। हम सभी को साहित्य का अध्ययन करना चाहिये।

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