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Hindi Essay on “Rashtriyakaran” , ”राष्ट्रीयकरण” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

राष्ट्रीयकरण

Rashtriyakaran

                                काल की परिस्थितियों के साथ मानवीय विचारों में भी परिवर्तन होता रहता है। एक युग था जब देश की शक्ति छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त थी और जो स्वयं अपने आपके पूरक थे उनकी अपनी-अपनी पृथक शासन व्यवस्था थी। लेकिन आज हम स्वतंत्र हैं। भारत पुनः एक अटूट सूत्र में जुट चुका है, उसकी शक्ति अखण्ड है। अतः वैयक्तिक शासन या अधिकार की बात करना उसकी अखण्डता को तोड़ना है। आज हम राष्ट्र के हैं और राष्ट्र हमारा है। राष्ट्रीय सरकार ही हमारे जीवन से सम्बधित सभी वस्तुओं की नियामक है। लेकिन अभी इस कथन की सत्यता का प्रमाण हमारे दैनिक व्यावहारिक जीवन में नहीं मिलता है। इसीलिए राष्ट्रीयकरण (छंजपवदंसपेंजपवद) देश के लिए एक समस्या है। कारण, कुछ व्यक्ति इसके पक्ष में हैं और कुछ विपक्ष में। राष्ट्रीयकरण का आशय किसी वस्तु पर किसी व्यक्ति के स्थान पर राष्ट्र के अधिकार एवं नियंत्रण से है। अर्थात उसके हानि-लाभ का प्रभाव व्यक्ति पर न होकर राष्ट्र के सामूहिक जीवन पर हो। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि उससे सम्बन्धित व्यक्ति का उस पर कोई अधिकार ही न हो, लेकिन इससे सम्बद्ध अन्य अधिकारों की रक्षा भी अपेक्षित है।

                यों तो राष्ट्रीयकरण की योजना जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सभंव है। तात्पर्य यह कि मानव समाज की स्थिति के स्थान पर केवल राष्ट्र ही समग्र जीवन का नियामक बन जाए। लेकिन इस प्रकार तो मानव राष्ट्र के हाथों बिक जाएगा। फलतः बिना सरकारी आज्ञा के वह कुछ कर ही नहीं सकेगा। फिर, जीवन के कुछ ऐसे पहलू होते हैं, जिन पर राष्ट्रीय नियंत्रण लाभप्रद ही सिद्ध होता है। भारत में आज कुछ अंश तक इसे कार्यन्वित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, शिक्षा राष्ट्रीयकरण। इसका आश्य यह है कि स्कूल, काॅलेज तथा विश्वविद्यालयों मे शिक्षा का प्रबन्ध राष्ट्रीय सरकार के हाथों मे रहे। उसी के द्वारा पाठ्य-पुस्तकों का नियंत्रण हो। यद्यापि यह प्रयोग मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं पंजाब आदि प्रातों में हो रहा है तथापि शिक्षा का समग्र राष्ट्रीयकरण कितना उपादेय होगा यह विचारणाीय प्रश्न है। इसके पक्ष-विपक्ष में विविध समस्याएं उत्पन्न होती हैं। जहां राष्ट्रीय प्रबन्ध से शिक्षा-संस्थाओं में किसी प्रकार की धांधली को मौका नहीं मिलेगा, अध्यापकों की निष्पक्ष नियुक्ति होगी, उनके वेतन आदि के सम्बन्ध में अन्याय न होगा, शिक्षा के समय-समय पर निरीक्षण से दोष का निवारण भी होता रहेगा, पुस्तकों का भार अभिभावकों के लिए सिर-दर्द नहीं बनेगा वहीं दूसरी ओर जनता का शिक्षा-प्रचार का उत्साह, आर्थिक-अनुदान की सेवा भावना, अध्ययन कार्य की भावी सफलता के लिए लगन और फलतः शिक्षा स्तर की उन्नति आदि बातों को भी धक्का लगेगा। फिर भी इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि हम राष्ट्रीयकरण की बात भुला दें। शिक्षा के क्षेत्र में इसकी अपेक्षा है लेकिन आंशिक रूप में। अध्यापकों की नियुक्ति एवं वेतन आदि का प्रबन्ध और कुछ अंश तक पाठ्य-पुस्तकों की स्वीकृति का नियंत्रण अवश्य सरकार के हाथों में रहना चाहिए।

                इसी प्रकार सम्पत्ति के राष्ट्रीयकरण का प्रश्न भी आज विशेष रूप से देश के समक्ष है। कारण जब उत्पादन में पूंजी और श्रम दोनों की ही अर्जित शक्ति का प्रयोग होता है, तब दोनों को ही उससे लाभान्वित होना चाहिए। पूंजीपति वर्ग तो दूसरे का श्रम का उपयोग करता है और वह दीन-मजदूर, खून-पसीना एक करने के बाद भी उस पूंजीपति की कृपा पर निर्भर रहता है। जबकि वैज्ञानिक रूप से दोनों ही वर्गों को समानाधिकार प्राप्त है। अब प्रश्न यह है कि यदि देश के सम्पूर्ण उद्योग-धन्धों का राष्ट्रीयकरण हो जाता है तो मौजदूा सरकार के पास उनके नियंत्रण के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र में राष्ट्रीयकरण की बात सरकार के सामथ्र्य से बाहर की बात है और अव्यावहारिक भी। कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में राष्ट्रीयकरण आवश्यक जरूर है। जैसे रेलवे या डाक-तार विभाग।

                सभी दृष्टिकोण से विचार करने के बाद अंतिम निष्कर्ष यही आता है कि राष्ट्रीयकरण देश में न सम्भव है और न उचित है। फिर भी जीवन के कुछ क्षेत्रों में सरकार इसके लिए गतिशील हो तो वह अधिकांश जनता के हितार्थ ही होगा। हर्ष का विषय है कि हमारी सरकार इस ओर प्रयत्नशील है।

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