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Hindi Essay on “Rashtriya Ekta” , ” राष्ट्रीय एकता ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

राष्ट्रीय एकता

Best 4 Essay ” Rashtriya Ekta”

निबंध नंबर : 01 

 

एकता में बल है – हिंदी के कहानीकार सुदर्शन लिखते है – “ओस की बूंद से चिड़िया भी नहीं भीगती किंतु मेंह से हाथी भी भीग जाता है | मेंह बहुत कुछ कर सकता है |” शक्ति के लिए एकता आवश्यक है | विखराव या अलगाव शक्ति को कर करते है तथा ‘एकता’ उसे मज़बूत करती है |

                राष्ट्र के लिए ‘एकता’ आवश्यक – किसी भी राष्ट्र के लिए एकता का होना अत्यंत आवश्यक है | भारत जैसे विविधताओं भरे देश में तो राष्ट्रिय एकता ही सीमेंट का कम कर सकती है | पिछले कई वर्षो से पाकिस्तान भारत में हिन्दू-सिख या हिन्दू-मुसलमान का भेद खड़ा करके इसी सीमेंट को उखाड़ना चाह रहा है | अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमान का भेद खड़ा करके भारत पर सैंकड़ो वर्ष तक राज किया | परंतु जब भारत की भोली जनता ने अपने भेद-भाव भुलाकर ‘भारतीयता’ का परिचय दिया, तो विश्वजयी अंग्रेजों को देख छोड़कर वापस जाना पड़ा |

       एकता के बाधक तत्व – भारत में धर्म, भाषा, प्रांत, रंग, रूप, खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार की इतनी विविधता है किइसमें राष्ट्रिय एकता होना कठिन काम है |कहीं प्रांतवाद के नाम पर कश्मीर, पंजाब, नागालैंड, गोरखालैंड आदि अलग होने की बात करते है | कहीं हिंदी और अहिंदी प्रदेश का झगड़ा है | कही उत्तर-दक्षिण का भेद है | कहीं मंदिर-मस्जिद का विवाद है |

       एकता तोड़ने के दोषी – राष्ट्रय एकता तोड़ने के वास्तविक दोषी हैं – राजनीतक नेता | वे अपने वोट-बैंक बनाने के लिए किसी को जाती के नाम पर तोड़तें है, किसी को धर्म, भाषा, प्रांत, पिछड़ा-अगड़ा, स्वर्ग-अव्रण के नाम पर |

       एकता के तत्व – भारत के लिए सबसे सुखद बात यह है कि यहाँ एकता बनाए रखने वाले तत्वों की कमी नहीं है | राम-कृष्ण के नाम पर जहाँ सारे हिन्दू एक हैं, मुहम्मद के नाम पर मुसलमान एक हैं ; वहाँ गाँधी, सुभाष के नाम पर पूरा हिंदुस्तान एक है | आज जब कश्मीर पर सकंट घिरता है तो केरलवासी भी व्यथित होता है | पहाड़ों में भूकंप आता है तो सुचना भारत उसकी सहायता करने को उमड़ पड़ता है | जब अमरनाथ-यात्रा में फँसे नागरिकों को मुसलमान बचाते हैं, दंगों के वक्त हिन्दू पडोसी मुसलमानों को शरण देते है |

       एकता दृढ़ करने के उपाए – राष्ट्रिय एकता को अधिक दृढ़ करने के उपाए यह है कि भेद्वाव पैदा करने वाले सभी कानूनों और नियमों को समाप्त किया जाय | सारे देश में एक ही कानून हो | अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाय | सरकारी नोक्रियों में अधिक-से-अधिक दुसरे प्रान्तों में स्थानांतरण हों ताकि समूचा देश सबका साझा बन सके | सब नजदीक से एक-दुसरे का दुःख-दर्द जन सकें | राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन देने वाले लोंगो और कार्यों को आदर दिया जाये | कलाकारों और साहित्यकारों को एकता-वर्द्धक साहित्य लिखना चाहिए | इस पुनीत कार्य मैं समाचार-पत्र, दूरदर्शन, चलचित्र बहुत कुछ कर सकते हैं |

 

निबंध नंबर : 02 

 

राष्ट्रीय एकता का महत्व

प्रस्तावना – भारत में अनेक धर्मों, जातियों एवं भाषाओं के लोग निवास करते हैं। अनेकता में एकता भारत की मुख्य विशेषता है, परन्तु समय-समय पर इस देश की एकता को खण्डित करने के लिए विरोधियों द्वारा हरराम्भव प्रयास किये जाते रहे हैं।

एकता में जुट के कारण ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी करनी पड़ी। उन्होंने देश की एकता को खण्डित कर देशवासियों पर हुकूमत की तथा उनको अपमानित कर उनके साथ दुव्यवहार किया। अंग्रेजों की नीति के कारण ही आजादी के बाद भारत दो भागों में विभाजित हो गया-एक हिन्दुस्तान दूसरा पाकिस्तान।

अंग्रेजों की फूट की नीति के कारण ही दोनों देश एक-दूसरे के दुश्मन बने। पर हमारी सरकार द्वारा एकता बनाये रखने के लिए हर सम्भव प्रयास किये जा रहे हैं। देश के सभी नागरिक अपने वतन की रक्षा के लिए मिलकर आगे बढ़ रहे हैं और शत्रुओं से देश की रक्षा करते हैं। वस्तुत: राष्ट्रीय एकता के ना तो कोई देश समृद्धिशाली बन सकता है ना ही विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है।

राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय – राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय देश में रहने वाले सभी धर्मों, जातियों एवं भाषाओं से सम्बन्धित लोगों का एक साथ मिल-जुल कर रहने से है। देश की एकता को बनाये रखने के लिए सरकार द्वारा यह कानून बनाया गया कि देश का कोई भी नागरिक कोई भी धर्म अपना सकता है, चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान हो, सिक्ख या ईसाई हो। कोई किसी भी धर्म की लड़की या लड़के से शादी कर सकता है। ऐसा धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार में कहा गया है। अपने-अपने विश्वास से धर्म मानने की प्रत्येक को आज़ादी है |

इस प्रकार हमारे देश के लोगों के कर्मकाण्ड, रहन-सहन,  बोल-चाल, पूजा-पाठ्, खान-पान और वेशभूषा में अन्तर हो सकता है, इनमें अनेकता हो सकती है किन्तु हमारे की मुख्य विशेषता है। दूसरे धर्म और अन्तर्जातीय विवाह एकता के सूत्र में वांधे रहने का एक माध्यम है-मगर इसे स्वेच्छा के साथ ही अपनाया जा सकता है |

राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाए – राष्ट्रीय एकता के मार्ग में अनेक बाधाएं हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

 

(1) साम्ग्रदायिकता – राष्ट्रीय एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता ऐसी बुराई है जो मानव-मानव में फूट डालती है, भाइयों में मतभेद कुराती है, दो दोस्तों के बीच घृणा और भेद की दीवार खड़ी करती है तथा अन्त में समाज के टुकड़े कर देती है। साम्प्रदायिकता का अर्थ है अपने धर्म के प्रति कट्टरता और दूसरे धर्म के लोगों को हेय दृष्टि से देखना। अपने धर्म को मानने की आजादी तो प्रत्येक देशवासियों को है पर दूसरे धर्म से नफरत, साम्प्रदायिकता को जन्म देता है।

(2) भाषागत विवाद – भारत बहुभाषी राष्ट्र है। यहां अलग-अलग प्रांत और क्षेत्र में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने द्वारा बोली जाने वाली भाषा को ही श्रेष्ठ मानता है। इससे राष्ट्र की एकता खण्डित होने के खतरे बढ़ जाते हैं। प्रांतीय भाषाओं का उपयोग मौलिक अधिकार है, मगर दूसरी भाषा से विरोध दूसरे की मौलिक स्वतन्त्रता का ध्यान है। 

(3) प्रान्तीयता या प्रादेशिकता की भावना – प्रान्तीयता या प्रादेशिकता की भावना भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करती हैं। मानवीयता या प्रादेशिकता से आशय ऐसी स्थिति से है कि जव कोई प्रान्त या प्रदेश के बल पर अपने प्रान्त के विकास के बारे में ही सोचता है पर किसी दूसरे प्रदेश में अपने द्वारा उत्पाद की गयी वस्तुओं का निर्यात नहीं करता तो ऐसी दशा में देश की एकता खण्डित होने की सम्भावना बढ जाती है। क्योंकि समग्र भारत में अलग क्षेत्र में अलग-अलग चीजों, खनिजों वनस्पतियों का उत्पादन होता है। अपने प्रान्त के जुत्पादनों को केवल अपने प्रान्त के बीच ही सुरक्षित रखने का विचार प्रांतीय भाषावाद को जन्म देता है।

 

(4) जातिगत विवाद – जातिगत विवाद भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बढ़ाएं उत्पन्न करता है| जातिगत विवाद की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी भी जाति से सम्बन्धित जैसे – ब्राह्मण, बनिया, क्षत्रिय, दलित तथा यादव आदि लोग अपनी जाति को ही श्रेष्ठ मानते हैं और इसके लिए वे एक-दुसरे से लड़ाई-झगडा करने लगते हैं | इस प्रकार भी राष्ट्रीय एकता डगमगा जाती जय |

राष्ट्रीय एकता के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के उपाय –

1 सर्वप्रथम राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए हमें शयद इकबाल के दथान को समझना चाहिए जिन्होंने एकता के ऊपर एक सन्देश देशवासियों के लिए लिखा था, जो अग्र प्रकार है —

मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना,

हिन्दू हैं हमवतन हैं, हिन्दोस्ता हमारा।

  1. साम्प्रदायिक एकता की भावना को समाप्तकरआपसी भाईचारे से रखना चाहिये।
  1. ‘भाषाओं का सम्मान करना ताकि भाषागत विवाद खत्म किया जा सके। इसके लिए कि भाषा सूत्र का फार्मूला सरकार ने लागू कर रखा है। उस पर अमल किया जा

सके।

  1. देश के सभी प्रदेशों को एक-दूसेक सहायता के लिए हर समय तेयार रहना चाहिए |
  1. जातिवाद का उन्मूलन होना चाहिये ताकि राष्ट्रीय एकता बनी रहे। कोई भी देश हमारी एकता को सुरक्षित होते देख हम पर अपना प्रभुत्व स्थापित न कर सके। प्रगतिशील एवं विकासशील देश के नागरिक हैं। उसमें इतनी समझ होनी ही चाहिये कि अनेकता में एकता के सिद्धान्त को बनाये रखे। ।

उपसहार  – यदि सरकार इस विषय पर ध्यानपूर्वक विचार करे, तो नई-नई योजना बना सकती है तथा देश की जनता भी जागरुक होकर राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह समझ सकती है। राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करने वाले कारकों को ऐसी कोई भी ताकत यहां तक कि आतंकवादी या विरोधी संगठन में इतनी क्षमता नहीं कि वह हमारी एकता को खण्डित कर सके। हम जितना ही एक ही सूत्र में बंधे रहेंगे-देश – उतनी ही ज्यादा तरक्की करेगा।

निबंध नंबर : 03

राष्टीय एकता : आवश्यकता और महत्त्व

Rashtriya Ekta : Avashyakta aur Mahatva

राष्ट्र चाहे भारत हो या कोई या कोई अन्य, उसकी सार्वभौम सत्ता और स्वतंत्रता को बनाए के सभी स्तरों, वगो के निवासियों में संघठन एवं एकता का होना बहुत ही आवश्यक हुआ करता है। फिर भारत जैसे देश, जिसमें प्राकृतिक-भौगोलिक विविधता है ही, भाषाएं और बोलियाँ भी अनेक बोली, पढी जाती हैं। इतना ही नहीं, भारत में अनेक जातियों और धर्मो को मानने वाले लोग निवास कर रहे हैं। सभी के अपने-अपने पूजा स्थल हैं और विश्वास हैं। यहाँ तक कि भारत में रीति-रिवाजों, परम्पराओ, रहन-सहन, खान-पान आदि में भी विविधता एवं अनेकता देखने को मिलती है। ऐसी विविधता एवं अनेकता में देश को जो बात एक शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण बनाए रख सकती है; वह मान्य राष्ट्रीय एकता की उदात एवं महत्त्वपूर्ण भावना और व्यवहार भी तदानुकूल ही हो सकती है।

संसार का छोटा-बड़ा प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि अकेले रह कर, अपनी ढाई चावल की खिचड़ी अलग पका कर न तो कोई रह सकता है और न ही कुछ कर ही सकता है। कहावत भी है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। समाज, देश और राष्ट्र का अवधारणा का मूल आधार ही उपर्युक्त स्वीकृत तथ्य तो है ही सामूहिकता का, समानता का भाव भी है। अकेलेपन का अवसाद मिटाने की इच्छा भी है। अकेले व्यक्ति, समाज, देश या राष्ट्र को कोई भी प्रबल देखते-ही-देखते तहस-नहस कर सकता है। इन सब सत्ता तक को मिटा सकता है। अपनी रक्षा के लिए ही पशु-पक्षी तक भी टोलियाँ बना कर चला करते हैं। फिर सब तरह से बुद्धिमान, सोच-समझ पाने में समर्थ प्राणी का तो कहना ही क्या। वह तो कभी कतई अकेला रहा है, न रह ही सकता है।

यदि समाज अन्य सभी व्यक्ति या प्राणी एक समान ही आस्था और विश्वास रखने वाले होते हैं, तब तो एकता भंग होने की आशंका प्रायः नहीं ही हुआ करती। लेकिन वह कहावत है न कि जहां बहुत सारे झंडे हों वे कभी-न -कभी टकरा ही जाया करते हैं। सो जब किसी एक आसमान की छाया में धरती के एक ही देश एव राष्ट्र नामक टुकड़े पर भिन्न जातियों, धर्मों, आस्थाओं और विश्वासों वाले लोगों का वास हो, तब कभी-न-कभी टकराहट स्वभावतः हो ही सकती है। लकिन उसका कुछ दुष्परिणाम नहीं हो सकता कि लोग यह सोच और मानकर टकराहट का कारण दूर करने का प्रयास करें, कि घर-परिवार में रहने वालों में भी तो कभी कभार टकराव हो ही जाया करता है। ऐसा व्यावहारिक रूप से सोच एवं कर के ही राष्ट्रीय एकता के हमेशा जीवित बनाए रखा जा सकता है।

राष्ट्रीय एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा उन लोगों से हुआ करता या ऐसे लोगों द्वारा पैदा कर दिया जाता है कि जो रहते और खाते तो किसी देश में हैं, पर नज़र किसी अन्य देश में रखा करते हैं। इसी प्रकार वे लोग भी राष्ट्रीयत्ता के लिए खतरा हुआ करते हैं कि जो मात्र अपने विश्वास, धारणा, धर्म और जाति को दूसरों से श्रेष्ठ मान कर उनके विरुद्ध घृणा कर प्रचार-प्रसार किया करते हैं। ऐसे कट्टरतावादी कठमुल्ले निश्चय ही किसी राष्ट्रीयता के प्रत्यक्ष और घोर शत्रु हुआ करते हैं। जो राष्ट्रीय सरकार अपने-आपको राष्ट्रीय कह कर भी ऐसे देशद्रोहियों का सिर कुचलने में हिचकती या समर्थ नहीं हो पाती, नैतिक दृष्टि से ऐसी सरकार का बने रहने का अधिकार नहीं रह जाता। वह इसलिए कि उसके बने रहने से सामुदायिक अराजकता को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक हो जाया करता है। जैसा कि आरम्भ से ही देश पर शासन कर रही इस दृष्टि से निरी आदर्शवादी और दुर्बल सरकार के कारण हुआ है। साम्प्रदायिकता का संवैधानिक स्तर या पर तो बढ़ावा दिया ही गया है, वोट पाने और कुर्सी पाने के लिए भी यही किया गया । है। उत्तर-प्रदेश, बिहार आदि में आज भी ऐसा ही किया जा रहा है। यही कारण है कि आज राष्ट्रीयता दाव पर लग चुकी है।

राष्ट्रीयता के नष्ट होने का खतरा तब भी पैदा हो जाया करता है जब देश के मूल और बहुसंख्या में निवास करने वालों के प्रति वोट और सत्ता पाने के निहित स्वार्थों कारणों से उपेक्षा और अनादर के बीज बोए जाने लगते हैं। उनके प्रत्येक अच्छे कार्य और कर्म को भी संकुचित नजरों से देख विरोध शुरू कर दिया जाता है, जैसा कि आज इस देश में व्यापक स्तर पर कभी कांग्रेसवाद, कभी गैर-कांग्रेसवाद और कभी गैर भारतीय जनता पार्टीवाद पर हो रहा एवं अक्सर होता रहता है। इसी प्रकार जब राजनितिज्ञों का संरक्षण पा कर तरह-तरह के दुश्चरित्र माफियों गिरोह, अराजक तत्त्व राजनीति में घुसपैट कर जाया करते हैं और सरकार तथा प्रशासन सब-कुछ देखते सुनते हुए भी उन मक्खियों को चुपचाप निगलने को बाध्य हो जाया करते हैं, तब भी राष्ट्रीयता एकता को नष्ट करने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि पंजाब में किया गया. महाराष्ट्र में हुआ और काश्मीर में अभी भी हो रहा है। उत्तर-पूर्वी सीमा-प्रदेशों में अन्यारा भी इस प्रकार की राष्ट्रीय एकता को पलीता लगाने वाली कई शक्तियाँ सक्रिय हैं।

इन यथार्थ तथ्यों के आलोक में आम जन, नेतृ वर्ग और सरकार सभी का यह परम और पहला दायित्व हो जाता है कि ऐसे राष्ट्र-एकता भंजक तत्त्वों के समूल नाश में एक हो कर काम करें। सरकार का कर्तव्य सर्वाधिक बढ़ जाता है कि वह आदर्श-भावुकता। त्याग और सम्पूर्णतः यथार्थवादी बन कर इस प्रकार के तत्त्वों के विरुद्ध कठोर कदम उठाए।। समी राष्ट्रीय एकता बनी रह सकती है, जिसका बना रहना हर दृष्टि से बहुत ही ज़रूरी है।

निबंध नंबर : 04

 

राष्ट्रीय एकता

Rashtriya Ekta

 

प्रत्येक राष्ट्र के विकास के लिए उसके मूल में एकता का भाव विद्यमान रहना अनिवार्य है । राष्टीय एकता से प्रभावित होकर व्यक्ति अपने तन-मन तथा धन को राष्ट्रीय एकता के हेत समर्पित कर देता है । इसके अभाव में राष्ट्र का विकास असम्भव है ।

भारत में अनेकता में एकता का देवता निवास करता है। यहां विविध धर्म विविध भाषायें बोलियां जातियां.प्रदेश.आदि अनेक विभिन्नताएं दृष्टिगोचर होती हैं। यहां के निवासी चाहे वे उत्तर के हों या दक्षिण के, पूर्व के हों या पश्चिम के. एक समान भावना से नहीं रहे है। राष्ट्र के आवश्यक तत्व निम्न प्रकार है-

  1. राष्ट्र का प्रथम आवश्यक तत्व है भूमि । इसके अभाव में राष्ट्र सम्भव नहीं है।‘

  1. राष्ट्र की भूमि पर निवास करने वाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथ्वी और उसके निवासियों के सम्मेलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है ।

  1. राष्ट्र के स्वरूप निर्माण में तीसरा अंग संस्कृति है । जब तक संस्कृति का विकास नहीं होता, राष्ट्र का वास्तविक विकास नहीं हो सकता ।

  1. सांस्कृतिक विकास के लिये सहयोग और समन्वय की भावना परम आवश्यक है ।

राष्ट्रीय एकता का अभिप्रायः है सम्पूर्ण भारत की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक एकता । हमारे कर्मकाण्ड,पूजा-पाठ,खाने-पीने,रहन-सहन और वेश-भूषा में अन्तर हो सकता है । इस प्रकार अनेकता में एकता भी भारत की प्रमुख विशेषता है। तरसा करते हैं । परन्तु अब वह चंचलता कहां, वह थिरकन कहां। कितना सरस और सुहावना है विद्यार्थी जीवन।

इतिहास साक्षी है कि भारत के नागरिकों ने सर्वदा अपने देश के लिए एकता और बलिदान की भावना का परिचय दिया है । समय-समय पर ऐसे दूषित तत्व अपना प्रभुत्व स्थापित करते रहे हैं जिन से हमारी भावनाएं बिखर गई । गुलामी एवं अंग्रेज़ों की डाली गई ‘फूट’ के शिकार होकर हम एक दूसरे से पृथक हो गये। अलग-अलग राष्ट्र की ज़हरीली गैस फैल रही है और एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय के प्राणों का प्यासा बना हुआ है । भारतीय एकता को खण्डित करने वाले अनेक दूषित तत्व निम्न प्रकार के है :

प्रान्तीयता : यह हमारे राष्ट्र की एकता की प्रबल शत्र है । पंजाब की धरती एवं स्वस्थ स्त्री पुरुषों की बात कहकर पंजाबी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं । राजस्थान का आदमी स्वयं को परिश्रमी जीवन का प्रतीक समझता है । दक्षिण भारत के लोग हिन्दी को उत्तर भारत की भाषा कहकर पुकारते हैं और अपने पर इस भाषा की थोपने की बात करते हैं । इस प्रकार प्रान्तीयता की भावना राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है। हमें भलना नहीं चाहिए कि राष्ट्र भाषा एक सम्पूर्ण इकाई है।

सम्प्रदायवाद : हमारा देश विभिन्न धर्मों का देश है । धर्म का उद्देश्य आत्मिक विकास करना है । परन्तु धर्म के कथित ठेकेदारी के पाखण्ड एवं अज्ञान के कारण एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय के अनुयायियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगता है । एक सम्प्रदाय के लोग दूसरे के प्राणों के शत्रु बन जाते है । इस प्रकार साम्प्रदायिकता का विष राष्ट्र की एकता की छिन्न-भिन्न कर देता है । साम्प्रदायिकता की भावना एक ऐसी बुराई है जो मानव-मानव में फूट डालती है । दो दोस्तों के बीच घृणा और भेद की दीवार खड़ी करती है । यह घनिष्ठतम सम्बन्धों को तोड़ सकती है । भाई को भाई से अलग करती है और अन्त में समाज के टुकड़े कर देती है । दुर्भाग्य से इस रोग को समाप्त करने का जितना अधिक प्रयास किया गया है यह उतना ही बढ़ता गया ।

बाहरी शक्तियां : हमारे देश की सीमा से लगे कुछ देशों का स्वार्थ इसी में है कि हमारे देश में अस्थिरता बनाए रखें । इसी कारण वे देश में लगातार तनाव बनाए रखने में मदद करते हैं। इसके लिए वे सर्वदा सीमा से लगे नगरों में दंगे कराते हैं ।

विभिन्न आन्दोलन : हमारे देश की एकता को आन्दोलनों ने भी गंम्भीर हानि पहुंचाई है। भारत आन्दोलनों का देश बन गया है । यहां चरित्र, ईमानदारी, अनुशासन और योग्यता के आधार पर श्रेष्ठ नागरिक के स्थान पर खोखले नारे लगाये जाते हैं । इनसे देश का निर्माण नहीं होता अपितु वह पतन की ओर उन्मुख होता है ।

विभिन्न आन्दोलन : जातीयता ने भारत की अखण्डता पर आघात किया है । हमारा समाज धार्मिक सम्प्रदायी एवं प्रान्तीय भाषाओं के आधार पर विभक्त है । एक प्रान्त के एक सम्प्रदाय के लोग अनेक जातियों में बंटे हुए है । एक जाति का व्यक्ति दूसरी जाति के व्यक्ति को नीचा दिखाना चाहता है । चुनावों में जातिवाद का प्रचार प्रचण्ड रूप से होता है ।

भाषागत विवाद : भारत बहुभाषी राष्ट्र है। यहां 27 विभिन्न प्रान्तों तथा संघीय क्षेत्रों की अलग-अलग बोलियां और भाषाएं है । वे परस्पर विभक्त हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा को श्रेष्ठ और उसके साहित्य को महानतम् मानता है । इस आधार पर भाषागत विवाद खड़े हो जाते हैं तथा राष्ट्र की अखण्डता भंग होने के खतरे बढ़ जाते हैं । यदि व्यक्ति मातृभाषा के मोह के कारण दूसरी भाषा का अपमान करता है, उसकी अवहेलना करता है तो वह राष्ट्रीय एकता पर प्रहार करता है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी मातृभाषा को सीखने के बाद संविधान में स्वीकृत अन्य प्रादेशिक भाषाओं को भी सीखें तथा राष्ट्रीय एकता के निर्माण में सहयोग प्रदान करें।

राष्ट्रीय एकता की अनिवार्यता तथा उसके समक्ष सम्भावित खतरों को दृष्टिगत रखते हुए साहित्यकार, विचारक, दार्शनिक, समाज-सुधारक अपनी-अपनी सीमाओं में निरन्तर इस बात के लिए प्रयत्नशील है कि देश में भाईचारे और सद्भावना का वातावरण बने। वर्तमान समय में व्याप्त अलगाव की भावनाएं समाप्त हों। परन्तु इस प्रयास में सफलता दृष्टिगोचर नहीं हो पा रही है । इस आग में कभी पंजाब सुलग उठता है, कभी महाराष्ट्र, कभी गुजरात, तो कभी उत्तरप्रदेश। किसी भी राष्ट्र में इन अप्रिय घटनाओं की पुनरावृत्ति इस बात का संकेत देती है कि हम टकराव और बिखराव उत्पन्न करने वाले तत्वों को रोक नहीं पा रहे है । यह स्मरण रखना चाहिए कि इसका समाधान हमारा सांझा कार्य है। इन समस्याओं का समाधान केवल राष्ट्र के नेताओं अथवा प्रशासनिक अधिकारियों के स्तर पर नहीं हो सकता। इसके लिए हम सबको परस्पर मिलजुल कर प्रयास करना होगा। जनता को राष्ट्रीय एकता की स्थापना में अहम भूमिका निभानी चाहिए ।

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commentscomments

  1. anil bhusare says:

    I am interested

  2. Vinay says:

    Simple and sweet essay

  3. Sandhya says:

    Good essay .

  4. Devdas says:

    nice easy

  5. Anupam mandal says:

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  6. Surinder rana says:

    Excellent essay.

  7. Vaibhav kumar says:

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  8. Jatin Potlia says:

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  9. shams nikita says:

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  10. Interesting n excellent essay

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