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Hindi Essay on “Rani Laxmi Bai” , ”रानी लक्ष्मीबाई” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

रानी लक्ष्मीबाई

Rani Laxmi Bai

निबंध नंबर : 01

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1835 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मनु था।

सन 1842 में झांसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ मनु का विवाह हुआ था। इस तरह मनु रानी लक्ष्मीबाई बन गई। सन 1852 में महाराज गंगाधर राव और महारानी लक्ष्मीबाई के एक संतान हुई, किंतु तीन महीने के भीतर ही उस बालक की मृत्यु हो गई। सन 1853 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक बालक को गोद ले लिया। उस बालक का नाम आनंद राव था। गोद लिए जाने के बाद उस बालक का नाम ‘दामोदर राव’ रखा गया।

21 नवंबर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। तब लक्ष्मीबाई की अवस्था 18 वर्ष की थी। उस समय लॉर्ड डलहौजी भारत का गवर्नर जनरल था। उसने एक हड़प नीति लागू की थी। नीति के अनुसार, यदि संतानहीन रहते हुए राजा की मृत्यु हो जाएगी तब वह राज्य अंग्रेजी शासन में मिला लिया जाएगा।

रानी लक्ष्मीबाई ने सरकार ने निवेदन किया कि उनके दत्तक पुत्र को महाराज के उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार किया जाए। तीन माह बीत गए, डलहौजी का कोई उत्तर नहीं आया। मार्च 1854 में डलहौजी का पत्र आया। उस पत्र में कहा गया था कि उत्तराधिकारी को गोद लेने के लिए स्वर्गीय गंगाधर राव के अधिकार को कंपनी अपनी अनुमति नहीं देती। इस प्रकार झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाने का निर्णय लिया गया है। अब रानी को किला खाली कर देना चाहिए और अपने नगर स्थित महल में चले जाना चाहिए। उन्हें प्रतिमाह 5 हजा रुपए पेंशन दी जाएगी। पत्र पढऩे के बाद रानी उबल पड़ी ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।’ अपने निर्णय के अनुसार अंग्रेजों ने शासन पर अधिकार कर लिया। इससे रानी अत्यंत कु्रद्ध हुई। उन्होंने दस माह में अंग्रेजों से झांसी छीन ली। इस पर सर ह्मूरोज के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने युद्ध की घोषणा कर दी। रानी युद्ध की तैयारी पहले ही कर चुकी थी। वे इतनी सहजता से झांसी को छोड़ देने वाली नहीं थीं। तात्या टोपे और नाना साहब की मदद से सेना संगठित की गई। अंग्रेजी सेना ने झांसी को चारों ओर से घेर लिया। रानी ने अपनी दासियों को भी युद्ध विद्या में पारंगत कर दिया था, अत: दासियां भी रानी के साथ लड़ मरने के लिए युद्धक्षेत्र में आ डटीं। 18 जून 1858 को युद्ध शुरू हो गया था। रानी लक्ष्मीबाई ने चंडी का रूप धारण कर लिया था। उन्होंने घोड़े की लगाम मुंह में थामकर दोनों हाथों से तलवारें उठाईं। रानी जिधर भी निकल पड़तीं उधर ही मैदान साफ हो जाता। रानी की तलवार बिजली सी चमक रही थी। अचानक रानी का घोड़ा एक नाले के पास अड़ गया। अंग्रेज चारों ओर घिर आए। अंतत: महारानी वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गई।

 

निबंध नंबर : 02

रानी लक्ष्मीबाई

Rani Laxmibai

       अथवा

   झांसी की रानी

Jhansi ki Rani

 

                हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई का नाम अमर है। उनकी देशभक्ति और पराक्रम आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। ‘झांसी की रानी’ के नाम से विख्यात रानी लक्ष्मीबाई को देशवासी कभी भी भुला नहीं सकते ।

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 15 जून 1834 ई0 को बितूर प्रांत में हुआ था। इनके बचपन का नाम ‘मनुबाई’ था । वे बचपन से ही अति कुशाग्र बुद्धि तथा प्रतिभा की धनी थीं। बाल्यकाल मेें ही इन्होने शस्त्र विद्या ग्रहण की। वे तलवार चलाने व घुड़सवारी में पारंगत हो गई थीं । इनकी कुशलता देख बड़े-बड़े योद्धा भी इनका लोहा मानते थे । उनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ । परंतु विधि की विडंबना कुछ और ही थी । अपने दो वर्ष के वैवाहिक जीवन के उपरान्त ही वह विधवा हो गईं।

उस समय अंग्रेजी साम्राज्य धीरे-धीरे पूरे हिंदुस्तान पर अपना आधिपत्य कायम कर रहा था । राजा गंगाधर राव की मृृत्यु के पश्चात् झाँसी को अपने साम्राज्य में मिलाने की उनकी इच्छा प्रबल हो उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने पति की मृृत्यु के उपरान्त भी हिम्मत नहीं हारी और पूरी जिम्मेदारी से शासन की बागडोर सँभालने लगी । अपना वंश चलाने हेतु उन्होनें एक बालक को गोद ले लिया पर अंग्रेजी साम्राज्य ने इसे मान्यता नहीं दी । तत्कालीन गर्वनर लार्ड डल्हौजी ने उन सभी राज्यों को अपने अधीन करने की घोषणा की जिनके राजा संतानहीन थे ।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने इसका स्पष्ट रूप से विरोध किया । उन्होंने अंग्रजी साम्राज्य का विरोध किया तथा उनकी किसी भी आज्ञा को मानने से इंकार कर दिया । उन्होंने कुछ अन्य राजाओं तात्याँ टोपे, नाना साहेब व कुँवर सिंह आदि के साथ मिलकर अंग्रजो से लोहा लेने हेतू पूरी तरह से स्वयं को तैयार कर लिया । अनेकों बार उन्होंने देशद्रोहियों का सामना किया और वीरतापूर्वक उन्हें पराजित भी किया ।

1857 ई0 में  रानी लक्ष्मीबाई का अंग्रजों के साथ ऐतिहासिक युद्ध हुआ । उन्होंने तात्याँ टोपे व नाना साहेब आदि के साथ मिलकर अंग्रेजों को देश से उखाड़ फेंकने का संकल्प किया । युद्ध में अंग्रेजों की विशाल सेना के समक्ष भी उन्होेेंने हिम्मत नहीं हारी । उनकी हिम्मत और वीरता उनकी सेना में एक नया जोश भर देती थी । उन्होंने युद्ध में अंग्रेजों का बड़ी वीरता के साथ सामना किया परंतु अंततः उन्हे परास्त होना पड़ा । झाँसी अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन हो गया। तब उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक वे झाँसी को पुनः वापस नहीं ले लेंगी तब तक वह चैन से नहीं बैठेंगी । नाना साहेब के साथ मिलकर उन्होंने ग्वालियर पर पुनः कब्जा भी कर लिया परंतु अपने ही एक प्रमुख दिनकर राव के देशद्रोही होने से उन्हे ग्वालियर छोड़ना पड़ा । इससे पुर्व कि वह पुनः एक नई सेना को संगठित करती, तत्कालीन जनरल स्मिथ ने उन पर सभी ओर से धावा बोल दिया । अपने थोड़े से सैनिको के साथ वह अंत तक वीरतापूर्वक लड़ती रहीं और फिर वीरगति को प्राप्त हुईं ।

झाँसी का रानी स्वतंत्रता संग्राम में पराजित तो हुई परंतु उन्होने देशवासियों के लिए स्वतंत्रता के बीज बो दिए । जिस हिम्मत और वीरता के साथ उन्होंने अंग्रेजी सेना से युद्ध किया, इससे सभ्भी देशवासियों  में साहस और जोश का संचार हुआ । स्वयं अंग्रेजो ने लक्ष्मीबाई को वीरता को देखते हुए उन्हें भारतीय ‘जाॅन आॅफ आर्क’ की संज्ञा दी । देश की आजादी के लिए उनका बलिदान भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा ।

 

         ”बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी,

         खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।“

                                                                                                    -सुभद्रा कुमारी चैहान

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