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Hindi Essay on “Manushya ho Manushya ko Pyar do” , ”मनुष्य हो, मनुष्यता को प्यार दो” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

मनुष्य हो, मनुष्यता को प्यार दो

Manushya ho Manushya ko Pyar do

 

मनुष्य सृष्टि के सभी प्राणियों में से श्रेष्ठ माना जाता है। इस का कारण स्पष्ट है। वह यह कि मनुष्य सोच-समझ सकता है। अच्छे-बुरे की पहचान और दोनों में विवेक कर सकता है। अन्य समस्त प्राणियों की तुलना में केवल मनुष्य ही अच्छे को अच्छा, बुरे को बुरा कह सकने की बुद्धि और क्षमता रखता है। संसार में आज जो कुछ भी उच्च और महान् है, जितने प्रकार की भी प्रगति और विकास संभव हो सका है, भविष्य की अच्छी-बुरी जो और जितने प्रकार की भी संभावनाएँ हैं; उन सबका एक मात्र कारण मनुष्य ही है। उसके अन्दर राक्षस और देवता दोनों एक साथ निवास किया करते हैं। जब राक्षस प्रबल हो कर जाग उठता है, तब मनुष्य चारों ओर कहर बरपा करने लगता है। इसके विपरीत जब उसके भीतर का देवता सक्रिय हो उठा करता है, तब वह दया-दाक्षिण्य का साकार मर्ति बन जाया करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि इच्छा करने पर केवल मनुष्य ही है कि जो चाहे कुछ भी कर सकता है।

स्वर्गीय उपन्यास-कला-सम्राट मुंशी प्रेमचंद का यह मानना था कि अपने मूल पास कोई भी मनष्य बरा नहीं हुआ करता। वह देव-तुल्य गुण-स्वभाव लेकर जन्म लया करता है। वह तो परिस्थितियाँ ही हैं कि जो उसे अच्छा या बुरा बना दिया करती जा ही बुद्धिमान् और समझदार प्राणी होने के नाते मनुष्य अच्छी तरह से जानता और समझता है कि वह अपने प्रति जैसा व्यवहार दसरों से चाहता है। दूसरे के प्रति उसे वसा हार करना चाहिए। लेकिन यह तो संसार है। इसमें सब की दशा, सब की परिस्थितियाँ हमेशा एक-सी नहीं रहा करतीं। स्वभावतः उनमें घट-बढ होता रहता है। उतार चढ़ाव आता रहता है। इस कारण कई बार कोई व्यक्ति हमारे साथ अच्छा और उचित व्यवहार करना नहीं देते। ऐसी दशा में इस का यह अर्थ नहीं हो जाता कि वह हमारे आदर-सम्मान या प्यार का अधिकारी नहीं रह जाता। नहीं, मनुष्य होने के नाते हमारा यह परम कर्तव्य हो जाता है कि हर हाल में हम दूसरों से प्यार करें।

संसार में तरह-तरह के लोग हैं। धनी हैं, निर्धन हैं। पढ़े-लिखे हैं, अनपढ़ हैं। भरपेट खाने वाले हैं, तो भूखे ही सो जाने वाले भी हैं। स्वस्थ, सुन्दर और नीरोग है। तो अस्वस्थ, कुरूप और रोगी भी हैं। शक्तिवान हैं, तो शक्तिहीन, दुर्बल प्राणी भी हैं। दूसरों को सताने वाले हैं, तो भूखा-प्यासा और सताया हुआ है; वह उतना ही अधिक हमारे प्यार और सहानुभूति का, हमारी सब प्रकार की सहायता का अधिकारी है। आखिर वह बेचारा लाचार और पीड़ित व्यक्ति भी है, तो मनुष्य ही न और हम भी अपने-आप को एक अच्छा और समर्थ मनुष्य ही समझते हैं। ऐसी दशा में वह अपने आप ही हमारी दया. सहानुभूति और प्रेम पाने का अधिकारी हो जाता है। समझदार महापुरुषों का यह साफ स्पष्ट कहना है कि यदि कुछ और नहीं भी कर सकते, तो कम-से-कम मनुष्य होने के नाते ऐसे लोगों से प्यार तो कर ही सकते हो। इतना ही पर्याप्त है। आगे बढो, ऐसे लोगों को गले लगा कर अपनी मनुष्यता का परिचय दो।

मनुष्य तथा संसार के अन्य प्राणी अनेक जातियों, धर्मों, समुदायों और वर्गों आदि में बँटे हुए हो सकते हैं; पर प्रेम की कोई जाति नहीं होती। कोई धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग नहीं हुआ करता। उस की बाहें इतनी लम्बी और संसार इतना विशाल हुआ करता है कि उनमें सारे धर्म, जातियाँ, वर्ग आदि आसानी से समा सकते हैं । केवल मनुष्य ही नहीं, पशु पक्षियों तक के लिए प्यार के संसार में भरपूर जगह रहती है। वह प्रेम ही तो है कि जो सैनिक को मातभमि के जड टकडे के लिए प्राणों तक की बाजी लगा देने को बाध्य कर दिया करता है। वह प्रेम ही तो होता है कि जिसे पाने या जिसकी रक्षा करने के लिए मनुष्य बड़े से बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार हो जाया करता है। प्रेम के संसार में ऐसे प्राणियों को भी एक साथ मिल जुल कर रहते देखा जा सकता है कि जिनके स्वभाव कतई नहीं मिलते। सामान्य स्थिति में जो एक-दूसरे को खा जाने तक के लिए उतारू रहा करते हैं। प्रेम की सत्ता और भावना को तो पशु-पक्षी तक पहचानते और मानते हैं। वास्तव में प्रेम में ही प्रभु का निवास हुआ करता है। मनुष्य होने के नाते कम-से-कम मनुष्यों से तो प्यार करो।

समर्थ होकर भी जो व्यक्ति दूसरे मनुष्यों के दुःख-दर्द को समझ कर उसे दूर करने का प्रयास नहीं करता, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं। समर्थ होकर जो आदमी दीन-दुखियों से प्यार नहीं करता, देश-जाति के उत्थान के लिए प्रयत्न नहीं करता, सभी को अपने समान मान कर उनके प्रति समता और प्रेम का भाव नहीं रखता, उसका होना न होना बराबर है। हमारे वेदों में कितनी अच्छी बात कही गई है हम मनुष्यों के लिए:

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भाग भवेत् ।

अर्थात् सभी मनुष्य (अन्य प्राणी भी) सुखी और समृद्ध हों। सभी हमेशा नीरोग और रहें। सभी का कल्याण हो, शुभ हो। किसी भी प्राणी को कभी किसी भी प्रकार सहख-दर्द न सताए। मानव-प्रेम की कितनी उच्च, कितनी पवित्र भावना है। इसे अपने मन-मस्तिष्क में, हृदय और अन्तरात्मा में अच्छी तरह से धारण कर लो। मनुष्य इस कारण सहज ही कर भी सकते हो। ऐसा करके मनुष्यता से प्यार करो और ससफल मनुष्य होने का परिचय दो। तुम्हारी सफलता सारी मनुष्यता की सफलता

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