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Hindi Essay on “Mahatma Gandhi” , ” महात्मा गांधी” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

महात्मा गांधी 

Mahatma Gandhi 

8 Best Hindi Essay on “Mahatma Gandhi”

 Essay-1

भारत के राष्ट्रपिता , नव राष्ट्र के निर्माता एव भाग्य  विधाता महात्मा गांधी एक ऐसे अनूठे व्यक्ति थे जिनके बारे में नाटककार बर्नार्ड शा ने उचित ही खा था की “ आने वाली पीढियाँ बड़ी मुशिकल से विश्वास कर पाएगी की कभी संसार में ऐसा व्यक्ति भी हुआ होगा” | वे सत्य, अहिसा और मानवता के पुजारी थे | वे उन महान पुरषों में से थे जो इतिहास का निर्माण किया करते है |

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास कर्मचन्द गांधी था | उनका जन्म 2 अक्टूबर , 1869 ई. को गुजरात कादियावाद प्रान्त में पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ था | उनके पिता राजकोट रियासत के दीवान थे | उनकी माता पुतलीबाई धार्मिक विचारों वाली सरल – सीधी महिला थी | उनकी प्रारम्भिक  शिक्षा पोरबन्दर तथा राजकोट में हुई | वे 18 वर्ष की अवस्था में यहा से मैट्रिक की परीक्षा पास करके बैरिस्टरी पढने के लिए इंग्लैण्ड गए उनका विवाह तेरह वर्ष की अवस्था में ही कस्तूरबा से हो गया था | जब वे बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे तो उनकी माता का स्नेहांचल उनके सर से उठ चुका था |

संयोगवश वकालत करते समय एक गुजराती व्यापारी का मुकदमा निपटाने के लिए गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा | वहा जाकर उन्होंने गोरो द्वारा भारतीयों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार को देखा | वहा पर गोरो ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया | उन्होंने निडरता के साथ गोरो के इन अत्याचारों का विरोध किया , जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा | अन्त में उन्हें इसमें सफलता ही मिली |

1915 ई. में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर उन्होंने स्वतंत्रता के लिए अनेको कार्यक्रमों में भाग लिया | उन्होंने अंग्रेजो के रोलट एक्ट का विरोध किया | सम्पूर्ण राष्ट्र ने उनका साथ दिया | स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उन्होंने सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया | वे अनेक बार जेल भी गए | उन्होंने सत्याग्रह भी किए | बिहार का नील सत्याग्रह, डांडी यात्रा या नमक सत्याग्रह व् खेडा का किसान सत्याग्रह गांधी जी के जीवन के प्रमुख सत्याग्रह है | गांधी जी ने भारतीयों पर स्वदेशी अपनाने के लिए जोर डाला | उन्होंने सन 1942 में ‘भारत छोडो’ आंदोलन चलाया | गांधी जी के अथक प्रयत्नों से 15 अगस्त , 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ | गांधी जी भारत को राम-राज्य के रूप में देखना चाहते थे |

गांघी जी छूतछात में विश्वास नही रखते थे | उनका सारा जीवन अछूतोद्धार ग्राम सुधार, नारी शिक्षा और हिन्दू- मुस्लिम एकता के लिए संघर्ष करने में बीता | 30 जनवरी सं 1948 को दिल्ली की एक प्रार्थना सभा में जाते समय एक हत्यारे नाथूराम गोडसे ने गांधी जी पर गोलियाँ चला दी | उन्होंने वही पर ‘हे राम’ कहते हुए अपने प्राण त्याग दिए | गांधी जी मर कर भी अमर है |

 

 

राष्ट्रपति महात्मा गांधी

Rashtrapita Mahatma Gandhi 

‘चल पड़े जिधर दो डग मग में

चल पड़े कोटि पग उसी ओर

पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि

गढ़ गए कोटि दृग उसी ओर’

 Essay-2

अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपति महात्मा गांधी के लिए कही गई कवि की उपर्युक्त पंक्तियां अत्युक्तिपूर्ण नहीं है। उनके एक इशारे पर लाखों लोग उठ खड़े होते थे, तन पर लंगोटी हाथ में लाठी और दुर्बल शरीर वाले इस महामानव से अस्त्र-शस्त्र भी कांप उठते थे, सेनांए महाप्रयास कर जाती थी तानाशाह नतमस्तक हो जाते थे और राजतंत्र की नींव हिल उठती थी।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म गुजरात राज्य के पोरबंदर नामक स्थान में 2 अक्तूबर सन 1869 ई. में हुआ था। इनके पिता राजकोट के दीवान थे। माता कबीरपंथी और धार्मिक विचारों वाली सीधी सरल महिला थी। गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। बालक मोहन भावनात्मक एंव आचार-विचार की दृष्अि से अपनी माता के अधिक निकट पड़ते थे। उनकी आरंभिक शिक्षा पोरबंदर में हुई तत्पश्चात मैट्रिक पास करके उच्च शिखा पाने के लिए वे इंज्लैंड चले गए। सरल और सीधे ढंग से शिक्षा पाकर बैरिस्टर बनकर भारत लौटे तब उनकी आदर्श माता स्वर्ग सिधार चुकी थीं। दुखी मन से आप वकालत करने लगे। मैट्रिक में पढ़ते समय विवाह हो गया था सो परिश्रमपूर्वक पढ़ा लिखकर पत्नी कस्तूरबा गांधी को अपने योज्य बनाया। वकालत करने समय एक गुजराती व्यापारी का मुकदमा निपटाने के लिए गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहां भारतीयों की दुर्दशा तो देखी ही, अपने साथ बार-बार हुए अपमानजनक व्यवहार को भी सहन किया। सब सह कर आप चुन कर रह सके और काले-गोरे के प्रश्न को लेकर भारतवासियों को उनके उचित अधिकार दिलाने के लिए वहीं संघर्ष आरंभ कर दिया। ‘नेशनल इंडियन कांग्रेस’ को एकजुट किया। पहली बार सत्याग्रह के अस्त्र का प्रयोग किया और विजय भी पाई। इस प्रकार सन 1914-15 में गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से वापस लौटे तो उनके विचारों में परिवर्त आ चुका था।

भारत लौटकर कुछ दिन गांधी जी देश घूमकर स्थिति का जायजा लेते रहे। फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी संस्था को पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य देकर संघर्ष में कूद पड़े क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध में वचन देकर भी अंग्रेस सरकार ने भारतीयों के प्रति अपने रवैये में कोई बदलाव नहीं किया था, इससे गांधी जी और भी चिढ़ गए और अंग्रेजी कानूनों के बहिष्कार और सत्याग्रह का बिगुल बजा दिया। भारतवासियों के मानवाधिकारों का हनन करने वाले रौलट एक्ट का जगह-जगह बहिष्कार होने लगा। सन 1919 में जलियांवाला बाग में हो रही विरोध सभा पर हुए अत्याचार ने गांधी जी की अंतरात्मा तक को हिलाकर रख दिया और फिर वह समूचे स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर संभाल खुलेआम संघर्ष में कूद पड़े। सारे देश में विरोधी आंदोलनों का एक तूफान सा आ गया। अंग्रेज सरकार की लाठी-गोलियां भी अंधाधुंध बरसने लगी। जेले सत्याग्रहियों से भर गई। गांधी जी को भी जेल में डाल दिया गया।

बिहार का नील सत्याग्रह, डांडी यात्रा या नमक सत्याग्रह खेड़ा का किसान सत्याग्रह आदि गांधी जी के जीवन के प्रमुख सत्याग्रह हैं। कईं बार महीने-महीने भर का उपवास भी करना पड़ा। अपने विचारों का प्रचार करने के लिए नवजीवन और यंग इंडिया जैसे पत्र प्रकाशित किए। विदेशी माल का दाह, मद्यनिषेध के लिए धरने का आयोजन, अछूताद्धार, स्वदेशी प्रचार के लिए चर्खे और खादी को महत्व देना, सर्व-धर्म समन्वय और विशषकर हिंदु-मुस्लिम एकता के लिए प्रचार आपके द्वारा आरंभ किए गए, इस प्रकार गांधी जी को स्वतंत्रता दिलाने के कार्य के लिए बीच-बीच में जेल जाना पड़ा था।

सन 1931 में इंज्लैंड में संपन्न गोलमेज कांफे्रंस में भाग लेने के लिए गांधी जी वहां गए, पर जब उनकी इच्छा के विरुद्ध हरिजनों को निर्वाचन का विशेषाधिकार हिंदुओं से अलग करके दिया तो भारत आकर गांधी जी ने आंदोलन आरंभ कर दिया। बंदी बनाए जाने पर जब आप अनशन करने लगे तो सारा देश क्षुब्ध हो उठा। फलत: ब्रिटिश सरकार को गांधी जी के मतानुसार हरिजनों का अलग निर्वाचनधिकार का हठ छोडऩा पड़ा। सन 1942 में बंबई कांग्रेस के अवसर पर आपके द्वारा अंग्रेजों को दी गई ।

 

 

महात्मा गांधी 

Mahatma Gandhi 

 Essay-3

महान मानवता की भावनात्मकता की प्रतीक एक वयक्विाचाक संज्ञा-महात्मा गांधी! आधुनिक भारत के ही नहीं, बल्कि आधुनिक विश्व का नव-निमा्रण करने वाले गिने-चुने चंद लोगों में स्वर्गीय महात्मा गांधी का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है और हमेशा लिया जाता रहेगा। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनका जन्म गुजरात प्रांत के पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्तूबर, 1869 में हुआ था। इनके पिता राजकोट में दीवान थे। माता धार्मिक विचारों वाली, कबीरपंथी, सह्दय नारी थीं। इनका लालन-पालन वैभवपूर्ण, मानवतावादी, धार्मिक वातावरण में हुआ था। इनका विवाह भी श्रीमती कस्तूरबा से छोटी आयु में ही हो गया था। अभी शिक्षा जारी थी कि पिता का स्वर्गवास हो गया। यहां की शिक्षा समाप्त कर उच्च शिक्षा के लिए जब यह इंज्लैंड गए, तब तक 17 वर्षों का होने के साथ-साथ यह एक बच्चे के बाप बन चुके थे। इंज्लैंड में इन्होंने अध्ययन के साथ-सााि स्वतंत्र विश्व की खुली आंखों से दर्शन किए। वहां से बैरिस्टर बनकर लौटे और वकालत करने लगे। इस बीच इनकी स्नेहमयी मां का भी स्वर्गवास हो गया। इस दौरान इन्हें पोरबंदर की एक कंपनी का वकील बनकर दीक्षणी अफ्रीका की यात्रा करनी पड़ी। वहां पर भारतीय होने के नाते इन्हें जो उपेक्षित-सा व्यवहार मिला, भारवासिायों की वहां जो दुर्दशा दिखाई दी, उसने इनके जीवन में एक भूकंप ला दिया। वास्तव में इसके बाद से ही इनके कर्ममय जीवन का आरंभ होता है, जो आज भी अनुकरणीय है और समूचे विश्व के लिए हमेशा बना रहेगा।

गांधी जी का राजनीतिक जीवन दक्षिण अफ्रीका से ही आरंभ हुआ। ‘नेशनल इंडिया कांग्रेस’ नामक संस्था स्थापित कर रंग-भेद और भारतीयों के साथ भेदभाव मिटाने के लिए यहीं उन्होंने पहला सत्याग्रह करके पहली विजय भी पाई। यहां पर फोनिक्स आश्रम स्थापित करके ‘इंडियन ओपीनियन’ नाम पत्र भी प्रकाशित किया और अनेकविध अत्याचार सहते हुए अंत में विजय प्राप्त की। दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के सत्याग्रह और राजनीतिक गतिविधियों के कारण ही वहां के जनरल स्मटस को जाति और रंग-भेदी काला कानून बदलना पड़ा। सन 1916 में भारत वापिस आकर गांधी जी ने पहले सारे भारत का भ्रमण किया, फिर गुजरात में साबरमती नदी के किनारे एक आश्रम स्थापित कर उसे सारे देश की राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। वहीं से वे चंपारन के नीलहे खेतिहरों का दुख दर्द मिटाने के लिए सत्याग्रही बनकर चंपारन पहुंचे और आंदोलन द्वारा अपना लक्ष्य प्राप्त किया। इसके बाद अहमदाबाद के मिल मजदूरों की दशा सुधारने के लिए सत्याग्रह एंव उपवास किया। इस प्रकार उनके कदम भारत को स्वतंत्र कराने, मानवता का दुख-दर्द हरने की दिशा में आगे ही आगे बढ़ते  गए। लाखों करोड़ों देश-जन उनके समर्थक और अनुयायी बनते गए।

अंग्रेज सरकार ने दमनात्मक रुख अपनाकर जब रोलट एक्ट लागू करना चाहा, तब गांधी जी की प्रेरणा से सारे भारत में उसका विरोध होने लगा। उसी के फलस्वरूप जलियांवाला बाग, अमृतसर में भयानक नर-संहार हुआ। तब गांधी ने प्रायश्चित स्वरूप तीन दिन तक उपवास करने के बाद, 1 अगस्त 1920 से पुन: व्यापह सत्याग्रह का आह्वान किया। उनका आह्वान सुनकर भारतवासियों ने सरकारी अदालतों, स्कूलों-कॉलेजों और विदेशी वस्तुओं के प्रयोग का बहिष्कार तो किया ही, विदेशी कपड़ों की होली भी जलाई। मद्य-निषेध के लिए मद्य की दुकानों के आगे धरने भी दिए। प्रिंसेस ऑफ बेल्ज के भारत आगमन पर उनके स्वागत का न केवल बहिष्कार किया, बल्कि खुला विरोध भी किया। पर जब बिहार के सामान बंबई में भी जनता अहिंसक न रह हिंसा पर उतर आई, उसने एक पुलिस थाना जला दिया, तो गांधी जी ने पांच दिन उपवास रखकर प्रायश्चित किया। वास्तव में वे हिंसा के सख्व एंव पूर्ण विरोधी थे। अहिंसा के प्रबल समर्थक और सफल प्रयोक्ता थे।

अपने आंदोलन के दौरान गांधी जी कई बार पकड़े जाते, जेल में बंद होते, लौटकर फिर अपने कार्यक्रमों में कूद पड़ते। साइमन कमीशन का विरोध, नमक कानून के विरुद्ध नमक सत्याग्रह के लिए डांडी-यात्रा, क्रिप्स-मिशन और प्रस्ताव का बहिष्कार आदि ऐसे महत्वपूर्ण कार्य हैं जो उनके महान व्यक्तित्व एंव नेतृत्व की झलक दे जाते हैं। सन 1942 में उनके द्वारा छेड़ा या ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ ब्रिटिश भारत में उनका अंतिम महत्वपूर्ण आंदोलन कहा जा सकता है। इसी वर्ष 9 अगस्त के दिन गांधी जी समेत सभी शिखर के नेता बंदी बना लिए गए। गांधी जी ने पूना के आगाखां महल में नजरबंद रखा गया, जहां उन्होंने 21 दिन का उपवास तो किया ही, उन्हें अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कस्तूरबा गांधी और अपने सैक्रेटरी भाई महादेव देसाई की मृत्यु का शोक भी सहन करना पड़ा। पर बाद में वे जेल से मुक्त कर दिए गए।भारत-विभाजन को रोकने के लिए उन्होंने बंबई में मुस्लिम लीग के प्रमुख मुहम्मद अली जिन्न से मुलाकात की। परंतु जिन्ना के हठ के कारण कोई परिणाम न निकला। उनकी सदभावना को गहरी ठेस पहुंची।

इधर हालात ऐसे बन रहे ोि कि अंग्रेज भारत को विभाजित कर स्वतंत्र करने को तैयार नजर आने लगे थे। अत: ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनेताओं में सम्मेलनों का दौर चलने लगा। परिणामस्वरूप नई योजनाओं के अनुसार मई 1946 में एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया। परंतु तभी 16 अगस्त से बंगाल में सुहरावर्दी की प्रेरणा से भयानक दंगे शुरू हो गए। उनका केंद्र नोआखाली नामक स्थान था। घायल मानवता के आंसू पोंछने गांधी जी वहां जा पहुंचे। वहां से बिहार के नोआखाली में भडक़े दंगे को शांत करने पहुंचे। उधर पंजाब भी जलने लगा। इसी बीच 15 अगस्त 1947 के दिन खंडित भारत आजा हुआ। तो दिल्ली में भी मार-काट होने लगी। तब यहां पहुंच उन्हें दंगे शांत कराने के लिए उपवास करना पड़ा। परिणाम अच्छा ही निकला। दंगे शांत हो गए। वे नई दिल्ली के बिरला भवन में नित्य प्रति प्रार्थना-सभाओं का आयोजन करने लगे। वहीं, 30 जनवरी 1948 के दिन एक धर्मांध नवयुवक नाथूराम गोडसे ने पिस्तौल की 3 गोलियां चलाकर उनका वध कर डाला। उन्होंने तीन बार ‘राम’ कहा और सदा के लिए सो गए।

दिल्ली के यमुना तट पर बनी राजघाट की समाधि में चिरनिद्रा में सोया पड़ा यह महापुरुष आज भी शायद मानवता के चरम कल्याण की कामना में डूबा होगा। उसी के बताए रास्ते पर चलकर मानवता सुख-शांति पा सकती है, आज यह बात विदेशी भी मुक्त भाव से स्वीकार करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि साहस जुटाकर उनके बताए रास्ते पर चला जाए। तभी मानवता की सहज एंव वास्तविक मुक्ति संभव हो सकती है। लेकिन खेद के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि आज उनके अनुयायी ही अपने असत्कर्मों से हर पल उनके सिद्धांतों की भी हत्या करते रहते हैं।

 

 

महात्मा गांधी

Mahatma Gandhi 

 Essay-4

इस नश्वर संसार में कौन नहीं करता। जो जन्म लेता है वह अवश्य मरता है, जो इस संसार में आया है उसका जाना भी निश्चित है। परंतु इनमें उसी मनुष्य का जन्म सार्थ है, जिसके द्वारा जाति, समाज और देश की उन्नति हो। महापुरुष वही कहलाते हैं जिनका देश की प्रगति और नव-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

यह बड़े गौरव की बात है कि हमारे देश में समय-समय पर अनेक महापुरुषों का जन्म होता रहा है युग-निर्माता गांधी जी का जन्म 2 अक्तूबर 1869 को काठियावाड़ के पोरबंदर में हुआ था। संसार के इतिहास में अब तक कोई महान शक्ति उत्पन्न नहीं हुई, जिसकी तुलना महात्मा गांधी से की जा सके। गांधी जी की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध विज्ञानी तथा दार्शनिक आइंस्टाइन ने कहा था आने वाली पीढिय़ां इस बात पर विश्वास करने से इनकार कर देंगी कि कभी महात्मा गांधी भी मनुष्य रूप में भूतल पर विचरण करते थे।

गांधीजी के पिता करमचंद काठियावाड़ रियासत के दीवान थे। माता पुतलीबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। तेरह वर्ष की अवस्था में उनका विवाह कस्तूरबा से हो गया था। उन्नीस वर्ष की अवस्था तक स्कूली शिक्षा समाप्त कर वे कानून की शिक्षा के लिए इंज्लैंड चले गए और 1891 में बैरिस्टर बनकर भारत लौट आए। स्वदेश आकर गांधी जी ने वकालत आरंभ कर दी। परंतु इस क्षेत्र में उन्हें सफलता नहीं मिली। सन 1893 में दक्षिण अफ्रीका भेजा गया। यह उनके जीवन की एक युगांतरकारी घटना सिद्ध हुई।

गांधीजी लगभग बीस वर्षों तक दक्षिण अफ्रीका में रहे। वहां के हिंदुओं की दुर्दशा को देखकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ। प्रवासी हिंदुओं का प्रत्येक स्थान पर अनादर होता और उनकी बातों को, उनके दुखों को वहां सुननेवाला कोई नहीं था। स्वंय गांधीजी को वहां के आदिवासी कुली बैरिस्टर कहते थे। अंत में गांधीजी को वहां भारी सफलता मिली। उन्होंने आंदोलन किए और सरकार से मांग की कि हिंदुओं के ऊपर होने वाले अत्याचारों को बंद किया जाए।

सन 1914 में गांधीजी स्वदेश लौट आए। दक्षिण अफ्रीका में मिली असाधारण विजय की भावना ने उन्हें देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्रेरित किया।

सन 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू करके खादी-प्रचार, सरकारी वस्तुओं का बहिस्कार और विदेशी वस्त्रों की होली आदि का कार्य संपन्न हुआ। सन 1930 में दांडी यात्रा करके गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा। सन 1942 में भारत छोड़ों आंदोलन का प्रस्ताव पास हुआ। गांधीजी और देश के अनेक नेता जेल भेजे गए। अंत में 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और इनके साथ ही गांधजी का अपना प्रयास सफल हुआ।

महात्मा गांधी अपने देशवासियों को उसी प्रकार प्यार करते थे जैसे एक पिता अपने पुत्र को करता है। इसलिए भारतवासी उन्हें प्यार से बापू कहते थे।

इस धरा पर जो फूल खिलता है, वह कभी न कभी अवश्य मुरझा जाता है। यह प्रकृति का विधान है-जो यहां आता है, वह इस संसार को छोडक़र अवश्य जाता है। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर गांधीजी की हत्या कर दी। उस समय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने आकाशवाणी पर बोलते हुए कहा था ‘जीवन की ज्योति बुझ गई। अब चारों ओर अंधकार है।’

 

 

महात्मा गाँधी

Mahatma Gandhi

 Essay-5

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर गाँधी जी का नाम सदैव अंकित रहेगा। ‘बापू जी’ के नाम से विख्यात गाँधी जी एक युगपुरूष थे । वे हमारे देश के ही नहीं अपितु विश्व के महान पुरूषों में से एक थे। राष्ट्र उन्हे ‘राष्ट्रपिता’ के नाम से संबोधित करता है ।

महात्मा गाँधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था । उनका जन्म 2 अक्तूबर 1869 ई0 को पोरबंदर में हुआ था । उनके पिता का करमचंद गाँधी राजकोट के प्रसिद्ध दीवान थे । पढ़ाई में औसत रहने वाले गाँधी जी ने कानून की पढ़ाई  ब्रिटेन में पूरी की । प्रारंभ में मुंबई में उन्होंने कानून की प्रैक्टिस की परंतु वे इसमें सफल नहीं हो सके । कानून से ही संबंधित एक कार्य के सिलसिले में उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा । वहाँ पर उनका अनुभव बहुत कटु था क्योंकि वहाँ भारतीयों तथा अन्य स्थानीय निवासियों के साथ अंग्रेज बहुत दुव्र्यवहार करते थे। भारतीयों की दुर्दशा को वे सहन नहीं कर सके । दक्षिण अफ्रीका के वर्णभेद और अन्याय के प्रति उन्होंने संघर्ष प्रारंभ किया । इस संघर्ष के दौरान 1914 ई0 में उन्हंे जेल भेज दिया गया । वे अपने प्रयासों में काफी हद तक सफल रहे। जेल से छूटने के दिया गया । वे अपने प्रयासों में काफी हद तक सफल रहे । जेल से छूटने के पश्चात् उन्होंने निश्चय किया कि वे अन्याय के प्रति अपना संघर्ष जारी रखेंगे ।

गाँधीजी :  किनकी नजर में क्या

रवींद्रनाथ टैगोर       ः          महात्मा

सुभाषचंद्र बोस             ः        राष्ट्रपिता

विंस्टन चर्चिल             ः        देशद्रोही फकीर

फ्रैंक माॅरिस              ः        अधनंगा फकीर

रोम्या रोलाँ                ः        राष्ट्रीय इतिहास के अद्वितीय नायक

खान अब्दुल गफ्फार खाँ     ः        मलंग बाबा

माउंटबेटन                ः        वन मैन बाउंडरी फोर्स

देश वापस लौटने के पश्चात् गाँधी जी स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े । उन्होंने कांग्रेस में शामिल होने के पश्चात् अपनी लड़ाई तेज कर दी । गाँधी जी ने अंग्रेजी सरकार का बहिष्कार करने हेतू देश की जनता को प्ररित किया परंतु उन्होंने इसके लिए सत्य और अहिंसा का रास्ता अपनाने के लिए कहा । ऐतिहासिक डांडी यात्रा उन्हीं के द्वारा आयोजित की गई जिसमें उन्होंने अंग्रेजी सरकार के नमक कानून को तोड़ा । उन्होंने लोगों को अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए ‘असहयोग आंदोलन’ में हिस्सा लेने हेतु प्रेरित किया जिसमें सभी विदेशी वस्तुओं एवं विदेशी शासन का बहिष्कार किया गया । 1942 ई0 में उन्होंने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ चलाया तथा अंग्रेजी सरकार को देश छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया । उनके अथक प्रयासों व कुशल नेतृत्व के चलते अंग्रेजी सरकार को अंततः भारत छोड़ना पड़ा और हमारा देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी दासता से मुक्त हो गया ।

स्वतंत्रता के प्रयासों के अतिरिक्त गाँधी जी ने सामाजिक उत्थान के लिए भी अनवरत प्रयास किए। अस्पृश्यता तथा वर्ण-भेद का उन्होंने सदैव विरोध किया । समाज व राष्ट्र के कल्याण के लिए अपना संपूर्ण जीवन उन्होंने समर्पित कर दिया ।

 स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हिंदू-मुस्लिम संघर्ष को देखकर उनका मन बहुत ही व्यथित हुआ । अतः उन्होंने हिन्दुस्तान के विभाजन की स्वीकृति दे दी जिससे पाकिस्तान का उदय हुआ । 30 जनवरी 1948 ई0 को नाथू राम गोडसे नामक व्यक्ति द्वारा उनकी हत्या कर दी गई । इस प्रकार यह युगपुरूष चिरकाल के लिए मातृभूमि की गोद में सो गया ।

आज भी भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व उनके शांति प्रयासों के लिए उन्हें सदैव याद करता हैै । प्रतिवर्ष 2 अक्तूबर के दिन हम गाँधी जंयती के रूप में पर्व मनाकर उनका स्मरण करते हैं तथा उनकी समाधि ‘राजघाट’ पर जाकर श्रद्धासुमन अर्पित करते है ।

 

महात्मा गांधी

Mahatma Gandhi 

 Essay-6

जब 19 वीं सदी की साँझ थी, 2 अक्तूबर 1869 को पोरबन्दर के दीवान की कोठी में इस युग के क्या, युग युगों के महानतम व्यक्तित्व ने प्रथम बार अपनी पलकें खोली। वे थे विश्ववन्ध बापू। उनका पूरा नाम था मोहनदास कर्मचन्द गांधी।

वैभव और सम्पन्नता के शैशव में वे शिशु से किशोर हुये जबकि वे अध्ययन में लगे हुये थे तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। 17 वर्ष की अवस्था में जब वे अध्ययन के लिये इंग्लैंड जाने लगे, तो उस समय एक पुत्र के पिता बन चुके थे।

इंग्लैंड के विशाल वातावरण में भी अपने व्यक्तित्व में अछूते फूलों की सी पवित्रता रखते हुए उन्होंने वकालत की योग्यता प्राप्त कर ली। वहीं उनके जीवन का विकास हुआ। बम्बई वापस लौटने पर माता की मृत्यु का शोक समाचार सुना। फिर वे कुछ दिनों तक वकालत करते रहे; परन्तु उसमें सफलता हाथ न लगी। तभी पोरबन्दर की एक कम्पनी के वकील होकर वे दक्षिण अफ्रीका गये। वहाँ भारतीयों का होता अपमान सहन न कर सके और इस पर चोटें खाईं ईंट और पत्थर से।

बापू ने नेटाल इण्डियन कान्फ्रेंस’ नाम से एक युग की स्थापना की। ऐसे युग की जिसमें मानवता, अन्याय और घृणा का प्रतिशोध प्रेम और न्याय से लिया जाता था। इसके कुछ दिनों के उपरांत ही वे भारत लौट आये। घूम-घूमकर दक्षिण अफ्रीका में होने वाले भारतीयों पर अत्याचारों का रूप जनता के सम्मुख खड़ा कर दिया। अंग्रेजों के विरुद्ध दक्षिण अफ्रीका में एक बहुत बड़ा विप्लव हुआ जिसमें बापू जी ने सेवक बनकर कार्य किया। जिन गोरों न उन पर पत्थर बरसाये थे, उन्हीं के घावों को उन्होंने धोया। जिन्होंने उनकी बेईज्जती की थी, उन्हीं की जानें बचायीं। घृणा और मृत्यु के बदले में प्रेम और जीवन का वरदान देने वाले बापू को देखकर देवताओं के नेत्र भी सजल हो उठे होंगे।

इस पर भी गोरों के अत्याचार दिन और रात के समान बढ़ते ही गये, तो बापू ने फोनिक्स में एक आश्रम की स्थापना की और इण्डियन ओपिनियन’ नामक एक समाचार पत्र निकाला। उसी के पश्चात् की कहानी संघर्षों की एक लम्बी गाथा है। ‘काला कानून’ जिसके अनुसार हर भारतीय को अपने अंगूठे की छाप देनी होती थी। भारतीय विवाह नजायज करार दे दिये गए थे। सारे भारतीयों पर एक मौत का सन्नाटा छाया हुआ था। उस समय बापू की एक ही आवाज ने मुर्यों में जान डाल दी और वे अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिये चल दिये दल बाँधकर। उनकी जादू भरी आवाज ने हमें जानवरों की बजाय इन्सान बना दिया। और फिर हमने रगों में लाल रक्त की अधिकता महसुस की और विश्व ने आश्चर्य से निहारा कि किस प्रकार से सदियों की गुलाम कौम ने करवट ली और हुँकार उठी। अन्त में आवाज पर विजय का सेहरा बैंधा और भारतीय विवाह जायज करार दे दिया गया। काला कानून हटा दिया गया और जनरल स्मट्स को झुकना पडा। इसी बीच में प्रथम महासमर छिडा और बापू के कथनानुसार भारतीयों ने उसमें सहायता की।

सन् 1915 में बापू स्वदेश लौटे। भारत ने बाहें फैलाकर अपने मसीहा, अपने पैगम्बर का स्वागत किया। उन्हें महात्मा’ कह कर पुकारा। सारे भारत का भ्रमण करके उन्होंने साबरमती को अपना साधना स्थल चुना और वहीं अपना आश्रम स्थापित किया। वहाँ पर भी शाति न मिली और चम्पारन के नील की कोठियों से उठती हुई दर्द और कराहट की आवाज ने उन्हें बेचैन कर डाला और वहाँ आन्दोलन द्वारा शांति स्थापित की।

थोड़े समय पश्चात् ही अहमदाबाद के मिल मजदूरों के आन्दोलन के सिलसिले में प्रथम बार ही उन्होंने अपने जीवन में उपवास किया। सन् 1918 ई० में दिल्ली में युद्ध सम्मेलन हुआ और महात्मा जी ने स्वयं रंगरूटों की भर्ती करने में सहायता दी: परन्तु स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण उन्हें बकरी के दूध की शरण लेनी पड़ी।

इधर तो भारतीय रोलट एक्ट का विरोध कर रहे थे उधर पंजाब की धरती खून से रंग उठी। जलियाँवाला बाग में सैकड़ों निर्दोष गोलियों से भून दिये गये और खूरेजी की एक भयंकर लहर ने सारे भारत को डुबो दिया। किन्तु 40 करोड भारतीयों का पाप अपने सिर बापू ने ले लिया और तीन दिन तक उपवास किया। इस पर 1 अगस्त 1920 को उन्होंने फिर असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया। खिलाफत और स्वराज्य दोनों की आवाजें उठी और विदेशी उपाधियों, विद्यालयों, अदालतों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कर दिया और प्रिन्स ऑफ वेल्ज के आगमन के समय विदेशी कपड़ों की आग की रोशनी से ब्रिटेन के साज और तख्त थर्रा उठे।

इस पर भी जनता अपने पर नियन्त्रण न रख सकी। बम्बई में गोली काण्ड हुआ उसकी प्रतिक्रिया में जनता ने पुलिस का थाना जला दिया। इससे बापू को बड़ा दुख पहुँचा और उन्होंने पाँच दिन का उपवास किया।

10 मार्च 1922 को बापू को ब्रिट्रिश सरकार का आतिथ्य ग्रहण करना पड़ पर शारीरिक अवस्था ठीक न होने के कारण सरकार उन्हें अधिक दिन मेहमान न बना सकी। तत्पश्चात् उन्होंने साइमन कमीशन का विरोध -‘साइमन लौट जाओ’ के नारे के साथ किया। जिससे ब्रिट्रिश साम्राज्य की नींव हिल गई। फिर वे नमक कानून तोड़ने के अपराध में बन्दी बना लिये गए। गांधी-इर्विन समझौते पर ही पुनः छोड़े गये। इसी कारण कितनी ही बार उन्हें अनशन करने पड़े और कितनी ही बार सरकारी आतिथ्य ग्रहण करना पड़ा इसी बीच में द्वितीय महासमर छिड़ गया। भारत को बिना उसकी सलाह के समर में सम्मिलित घोषित कर दिया गया।

सन् 1914 में ‘क्रिप्स प्रस्ताव आया। परन्तु बापू ने इसे ‘बेकाम चैक’ बताकर अस्वीकार क दिया। तत्पश्चात् उन्होंने ‘भारत छोड़ो’ की आवाज उठायी। ब्रिट्रिश राज्य जिसमें कभी सूरज डूबता ही नहीं था, काँप उठा।

सन् 1942 के वर्ष में कांग्रेस ने भी उसी प्रस्ताव का समर्थन किया और 9 अगस्त को सभी नेता बन्दी बना लिये गये। ज्वालामुखी के शिखर उठा लिये गये और भारत धधक उठा। तत्पश्चात् अगस्त की महान् क्रान्ति हुई, जिसमें अंग्रेजों ने जी भरकर भारतीयों को कुचला और उत्तरदायित्व भी बापू और कांग्रेस के माथे पर थोप दिया गया।

फिर बापू ने 21 दिन का उपवास किया और सरकार घबरा गई। इसी बीच मौत ने उनसे भाई महादेव देसाई को छीन लिया था। फरवरी मास में कस्तूरबा ने भी उनका साथ दिया था। 6 मई सन् 1944 को इन दो मौतों की पीड़ा से व्यथित ‘बापू’ को सरकार ने छोड़ दिया। फिर बम्बई गये और कायदे आजम से भेंट की।

इसके आद कान्फ्रेंसों का एक लम्बा दौर चला। शिमला कान्फ्रेंस अभी भूली नहीं थी। 12 मई 1946 को नई योजना आई और अन्तरिम सरकार बनी; किन्तु 16 अगस्त के बाद बंगाल में भयंकर हत्याकांड आरम्भ हो गया। अपनी जीवन संध्या में इन हत्याकांडों से बापू का दिल सिहर उठा। बापू पैदल गाँव-गाँव में शांति का अलख जगाते हुए चल पंडे । परन्तु अग्नि पूर्णरूप से धधक उठी थी, बंगाल में दबी, बिहार में फिर धधक उठी।

सन 1947 में बिहार पहुँचे, वहाँ का दंगा शांत किया। इसके पश्चात् तो जैसे पशुता और रक्तपात ने बापू को चैन न लेने दिया। 15 अगस्त 1947 को जब भारत भर में स्वतन्त्रता की खुशियाँ मनायी जा रही थी। उस समय बापू कलकत्ते में साम्प्रदायिक शान्ति कराने में व्यस्त थे। वहाँ पर भी उन्हें उपवास करना पड़ा। कलकत्ते के ठण्डे होते ही दिल्ली धधक उठी। सितम्बर 1947 को बापू दिल्ली पहुँचे। कौन जानता था कि दिल्ली में जहाँ इतनी बादशाहतें समाप्त हुई, वहीं इस देश के भक्त को अपनी मौत देखनी पड़ेगी

13 जनवरी 1948 को उन्होंने अपना अन्तिम उपवास किया। सारा देश थर्रा उठा। नेताओं ने शान्ति स्थापना का वचन दिया। बापू ने उपवास तोड़ा।

बिरला भवन में 30 जनवरी 1948 की संध्या को राष्ट्रपिता प्रार्थना सभा में जा रहे थे, वहीं पर एक मराठे हिन्दू नाथूराम गोडसे ने 3 गोलियों से महान् आत्मा का अन्त कर दिया। भारत के गगन का सूर्य अस्त हो चुका था। भारत की आत्मा का प्रकाश बुझ चुका था और आगे क्या होगा, उसको सोचकर मन काँप उठता था ? आपकी समाधि राजघाट पर बनी हुई है।

विश्ववन्द्य बापू सत्य के प्रतीक थे। उन्होंने ही अव्यवस्थित भारत को सुव्यवस्थित किया था। वे देश में रामराज्य देखना चाहते थे, पर वह सपना साकार न हो सका। फिर भी मानवता के इतिहास में बापू का नाम सदैव अमर रहेगा।

 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

 Essay-7

महात्मा गांधी हमारे देश के राष्ट्रपिता थे। उन्होंने स्वाधीनता की लडाई में देश का नेतत्व किया था। उनके पवित्र जीवन और अद्भुत त्याग ने न केवल देशवासियों को प्रभावित किया, बल्कि सम्पूर्ण विश्व पर उनका प्रभाव पड़ा। महात्मा गांधी सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखते थे। इसलिए वह मोटी खादी और बकरी के दूध पर सारी जिन्दगी निर्वाह करते रहे। वह विशुद्ध शाकाहारी थे। ईश्वर पर उनका अटल विश्वास था। उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन किया था और उस महान रचना में प्राचीन तथा विद्वान ऋषियों द्वारा वर्णित आदर्शों का पालन करते थे। रामायण का भी उन्होंने अध्ययन किया था और उसके उच्च आध्यात्मिक सिद्धान्तों की ओर आकृष्ट हुए थे। कर्त्तव्य-पालन को वह सर्वाधिक आवश्यक मानते थे।

हमारे और हमारे देश के लिए अत्यन्त खेद की बात है कि उस महान देशभक्त का बलिदान एक भारतीय के हाथों हुआ। लेकिन वह अपने जीवन के सिद्धान्तों पर आजीवन दृढ़ रहे और उनकी रक्षा के लिए प्राणों तक की बाजी लगा दी। उनकी आकांक्षा थी कि सभी धर्मों में विश्वास रखने वाले लोग शांतिपूर्वक और परस्पर सहिष्णुता के साथ रहें। वह सभी मनुष्यों को ईश्वर की संतान मानते थे और इसीलिए अपने उपदेशों में भ्रातृ भावना को सर्वाधिक महत्त्व देते थे।

श्री मोहनदास कर्मचन्द गांधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात प्रान्त के पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ। उच्च शिक्षा के लिए वह इंग्लैण्ड भी गए और वहां भी वह पक्के शाकाहारी बने रहे।

इंग्लैण्ड में अपना अध्ययन समाप्त करने के बाद मातृभूमि की सेवा के लिए महात्मा गांधी स्वदेश वापिस लौट आए और वकालत का पेशा शुरू किया। कुछ समय पश्चात् वह भारतीयों तथा अन्य एशियाई लोगों के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के लिए दक्षिण अफ्रीका गए। वहां उन्हें उनकी पत्नी श्रीमती कस्तूरबा गांधी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

भारतीय और अन्य एशियाई जनों की सहायता करते हुए तथा उनके आन्दोलन में हिस्सा लेते हुए गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में लगभग बीस वर्ष रहे और सन् 1914 में वहां से वे भारत वापिस लौट आए। भारत आकर महात्मा गांधी ने सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की और सत्य-आचरण की शपथ ली। उनका आदर्श था – अहिंसा परमो धर्म। सन् 1918 में महात्मा गांधी ने अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों के सहायतार्थ कार्य शुरू किया। अफ्रीका की भांति भारत में भी उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन का सूत्रपात किया। इतिहास-प्रसिद्ध डांडी यात्रा का प्रारम्भ भी गांधीजी ने ही किया था। इन सबके परिणामस्वरूप उन्हें अनेक बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी।

सन् 1942 में उन्होंने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन आरम्भ किया। देश के एक कोने से दूसरे कोने तक अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा गूंजने लगा। इस बार भी उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। एक प्रकार से कांग्रेस संगठन और स्वाधीनता आन्दोलन की प्रेरक-शक्ति महात्मा गांधी ही थे। उन्हीं के नेतृत्व और संरक्षण में देश को स्वाधीनता प्राप्त हुई।

अगस्त 15, 1947 को हमारा देश भारतवर्ष सदियों की गुलामी से मुक्त हुआ। देशवासियों ने स्वाधीनता के वातावरण में सांस ली। देश दो हिस्सों में बंट गया और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान दो अलग-अलग देश बन गए।

इसके अतिरिक्त देशवासियों को एक और मनहूस दिन भी देखना था।

सन् 1948 की 30 जनवरी की संध्या का समय था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपने अनेकानेक अनुयायियों के साथ बिड़ला भवन में संध्या प्रार्थना करने जा रहे थे। ठीक उसी समय एक पागल हिन्दू ने पिस्तौल से उनकी हत्या कर दी। अन्तिम समय में बापू के मुंह से तीन बार केवल ‘हे राम!’ शब्द निकला और उन्होंने सदा-सदा के लिये आंखें मूंद ली। उनके प्रति वैमनस्य का एक कारण यह था कि उन्होंने भारत सरकार से पाकिस्तान के लिये, विभिन्न खातों से प्राप्य, 55 करोड़ रुपये देने का आग्रह किया था। महात्मा गांधी की इस अस्वाभाविक मृत्यु से सारे देश में शोक की लहर दौड़ गई। विश्व भर के लोग शोक से व्याकुल हो उठे।

महात्मा गांधी एक महान् नेता थे। उन्होंने अपने ही बनाए सिद्धान्तों पर अपने जीवन को ढाला था और निष्काम सेवा में विश्वास रखते थे। नैतिक सिद्धान्तों पर उनका अटल विश्वास था और सत्य व अहिंसा का वह आजीवन पालन करते रहे।

गांधीजी अस्पृश्यता जैसे अभिशापों को मिटाकर देश में एक आदर्श समाज की स्थापना करना चाहते थे। वह एक ऐसे समाज की रचना करना चाहते थे जो पंचायत राज पर आधारित हो। वे कुटीर उद्योगों की स्थापना के पक्ष में थे। जाति-व्यवस्था में उनका लेशमात्र भी विश्वास नहीं था।

शारीरिक रूप से महात्मा गांधी की मृत्यु हो जाने के बावजूद वह अमरता का पद पा चुके हैं। वह सारे विश्व की एक सम्मानित विभूति माने जाते हैं और उनके जीवन सम्बन्धी सिद्धान्तों को ‘गांधीवाद’ के नाम से जाना जाता है।

गांधीजी की समाधि नई दिल्ली में राजघाट पर है। प्रतिदिन देश-विदेश से अनगिनत व्यक्ति उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं।

वे भारत सरकार की मार्गदर्शक प्रेतात्मा हैं। महात्मा गांधी एक दार्शनिक और एक राजनीतिज्ञ साथ-साथ थे। एक ओर यदि वह एक सन्त थे तो दूसरी ओर वह एक अविजेय योद्धा भी थे और उनका एक मात्र शस्त्र था – अहिंसा। समस्त विश्व में उन्हें एक मानवता प्रेमी महापुरुष के रूप में याद किया जाता है।

 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी

Rashtrapita Mahatma Gandhi

 Essay-8

परिचय-महात्मा गाँधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था। इन्हें हम लोग ‘राष्ट्रपिता’ या ‘बापू’ के नाम से भी संबोधित करते हैं। महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर, सन् 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गाँधी था। वे राजकोट में दीवान के पद पर कार्य करते थे। महात्मा गाँधी की माता का नाम पुतलीबाई था। वे बहुत ही धार्मिक महिला थीं। महात्मा गाँधी माता-पिता के अनन्य भक्त थे। इनका विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था। इनकी पत्नी का नाम कस्तूरबा था। वे बहुत सरल और नेक स्वभाव की महिला थीं। वे हर अवस्था में वह गाँधी के साथ रहीं। उन्हें प्यार से सभी ‘बा’ कहते थे।

शिक्षा एवं कार्य-स्थानीय विद्यालय में गाँधी जी ने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। प्रवेशिका की परीक्षा पास करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गए। वहाँ उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की। प्रवेश-परीक्षा पास कर वे अपने देश लौट आए। भारत आकर गाँधी जी ने एक वकील की तरह काम करना शुरू किया। इस काम में उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली। सौभाग्य से उसी समय दक्षिण अफ्रीका के एक धनी व्यापारी ने उन्हें अपने केस की देखभाल के लिए दक्षिण अफ्रीका बुलाया। वे दक्षिण अफ्रीका गए। वहाँ वे भारतीयों की बुरी हालत देखकर बहुत दुखी हुए। उन्होंने वहाँ सत्याग्रह आंदोलन चलाए। इसमें उन्हें सफलता मिली। वे लौटकर भारत आए। यहाँ भी अंग्रेज़ों के अत्याचार देखकर वे बहुत दुखी हुए और उन्होंने जन सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने सबसे पहले चंपारण के किसानों की हालत सुधारने के लिए आंदोलन प्रारंभ किया। अंग्रेजों ने कई बार उन्हें जेल में बंद किया। अंत में उन्हें सफलता मिली। इसके बाद वे अपने देश को अंग्रेज़ों के चंगुल से मुक्त कराने में जुट गए। इस सिलसिले में उन्होंने अहिंसा आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन आदि आंदोलनों का नेतृत्व किया। गाँधी जी के प्रयासों का ही फल था कि भारत को 15 अगस्त, सन् 1947 को आजादी मिली।

मृत्यु-30 जनवरी भारत के इतिहास में एक शर्मनाक । दिन है। 30 जनवरी, सन् 1948 को नाथूराम गोडसे नामक नराधम ने महात्मा गाँधी की हत्या कर दी। उस समय वे प्रार्थना करने जा रहे थे। आज महात्मा गाँधी हमारे बीच नहीं हैं, फिर भी भारत उन्हीं के बताए रास्ते पर चलकर दुनिया में अपना सिर ऊँचा कर रहा है। दिल्ली में राजघाट महात्मा गांधी की समाधि है। महात्मा गांधी का जन्मदिवस गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह भारत का राष्ट्रीय पर्व है।

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