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Hindi Essay on “Jansankhya, Samasya aur Shiksha ” , ”जनसंख्या, समस्या और शिक्षा” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

जनसंख्या, समस्या और शिक्षा

Jansankhya, Samasya aur Shiksha 

भारत एक विशाल देश है। आजादी के बाद से ही हमारा विकास प्रारंभ हुआ। विज्ञान और प्रोद्योगिकी कृषि और चिकित्सा  तकनीकी तथा संचार के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु यह सब प्रगति जनसंख्या वृद्धि की लगातार बढ़ती गति के सामने समन्वित विकास के रूप में नहीं दिखाई देती। 11 मई सन 2000 को जनसंख्या घड़ी के अनुसार हमारी जनसंख्या एक अरब की सीमा को पार कर चुकी है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती जा रही है हर क्षेत्र में भीड़ बढ़ रही है यहां तक कि रोटी-कपड़ा और मकान की समस्या से हमारे अधिकांश देशवासी जूझ रहे हैं।

हमारे देश के पिछड़े हुए राज्यों में जनसंख्या का घनत्व लगातार बढ़ा है और यहां के जनजीवन पर इसका अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ा है। भ्रष्ट सामाजिक व्यवस्था के चलते विकास की किरणें गांवों तक नहीं पहुंची। गांव के लोगों ने अपनी समसयाओं से निपटने के लिए शहरों की ओर पलायन शुरू कर दिया है। यही कारण है कि महानगरों में आवासीय समस्या एक ज्वलंत प्रश्न बन गई है। पेय जल संकट गहरा गया है। बेरोजगारी घटने का नाम नहीं ले रही है। चारों और प्रदूषण फैल रहा है। आश्चर्य की बात है कि चिकित्सा, शिक्षा पौष्टिक भोजन, आवास जैसी समस्याओं से ग्रस्त लोग ही जनसंख्या वृद्धि करने की दिशा में लगातार अग्रसर हैं।

सरकार ने नई जनसंख्या नीति 2000 में अनेक ऐसी योजनाओं का निर्माण किया है जिनसे जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करने में पहल हो सकती है। जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में सभी योजनांए तब तक कोई महत्वपूर्ण परिणाम नहीं दे सकतीं जब तक हम शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक विकास नहीं करते। आंकड़ों के अनुसार 1999 तक भारत में कुल 6.27 लाख प्राथमिक तथा 1.90 लाख माध्यमिक विद्यालय हैं, जिनमें लगभग 22 लाख शिक्षक हैं। जिस देश में विद्यालयों और शिक्षकों का यह अनुपात जनसंख्या की आवश्यकता को देखते हुए बहुत कम है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1999 तक प्राथमिक विद्यालयों में केवल 11.09 लाख तथा माध्यमिक विद्यालयों में केवल 4.03 लाख छात्र ही नामांकित हुए हैं।

शिक्षा और जागृति द्वारा ही जनसंख्या की दिशा में कोई कदम उठाया जा सकता है। यद्यपि सरकार सर्वशिक्षा अभियान द्वारा ग्रामीण तथा दूरदराज के क्षेत्रों में गैरसरकारी संस्थाओं के सहयोग से लगातार इस दिशा में काम करती जा रही है। परंतु आज हमारे जीवन में पैसे का महत्व बढ़ा है। राष्ट्रीय व सामाजिक कर्तव्य की भावना का ह्रास हुआ है। इस युग में लगातार अमी अमीर हुआ हैर गरीब गरीब हुआ है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे लोगों के बच्चे पेट भरने के लिए भीख मांगने या फिर मेहनत मजदूरी करने के लिए विवश हैं। सरकार ने ऐसे बच्चों की शिक्षा और पोषण के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों और सर्वशिक्षा अभियान जैसे आंदोलनों से लाभ भी हुआ है परंतु जिस गति से जनसंख्या में वृद्धि हुई है उस गति से शिक्षा के क्षेत्र में विकास संभव नहीं हो पा रहा है।

बढ़ती हुई जनसंख्या को स्थित करने की दिशा में कुछ दंडात्मक कार्यवाही भी सरकार को करनी चाहिए। दूसरी ओर शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार की दिशा में, देश के बड़े से बड़े नेताओं, अफसरों, खिलाडिय़ों, अभिनेताओं, शिक्षकों, चिकित्सकों तथा गैर-सरकारी क्षेत्र से जुड़े संस्थाओं के कार्यकर्ताओं का भरपूर सहयोग लिया जाना चाहिए। इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालयों की भांति देश में उच्च शिक्षा की सर्वसुलभता भी दूरदराज के लोगों के लिए बनाई जानी चाहिए। विद्यालयों में छात्रों के इस भयंकर समस्या से निपटने के लिए वाद-विाद, भाषण प्रतियोगिता, चित्र प्रदर्शनी, नाटक आदि के द्वारा प्रेरित किया जाना चाहिए। मीडिया का हमारे समाज पर लगातार गहरा प्रभाव पड़ रहा है। जनसंख्या नियंत्रण तथा साक्षरता के प्रचार-प्रसार की दिशा में दूरदर्शन, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिकाओं विज्ञापनों का अधिकाधिक उपयोग इस कार्य के लिए किया जाना चाहिए।

इस विकराल समस्या से निपटने के लिए स्वरोजगार योजनाओं को बढ़ावा देना होगा। कक्षा 12 तक पूरे देश में निशुल्क शिक्षा कर दी जानी चाहिए ताकि अशिक्षा के अंधकार से होने वाली बुराइयों एंव बीमारियों से लडऩे की शक्ति हमें मिल सके। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों द्वारा अधिकाधिक लोगों को नसबंदी तथा अन्य कारगर साधन अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। हमारी शिक्षा वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप बनाई जाए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था व पाठयक्रम आदि में विभिन्न सामाजिक आवश्यकताओं को देखते हुए सुधार किए जाने की आवश्यकता है। देश के विकास के लिए स्त्री शिक्षा पर विशेष बदल दिया जाना चाहिए। क्योंकि पढ़ी-लिखी मातांए जनसंख्या नियंत्रण में अच्छी भूमिका निभा रही हैं। कुल मिलाकर हमें ऐसी शिक्षण-पद्धति और शिक्षण-व्यवस्था का निर्माण करना होगा जो न केवल जनसंख्या नियंत्रण में उपयोगी हो वरन देश के लिए जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण कर सके।

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