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Hindi Essay on “Diwali, Deepawali ” , ” दीवाली, दीपावली ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

दीपावली

Deepawali

निबंध नंबर : 01

भारतवर्ष अनेक त्योहारों का देश है | उन त्योहारों में से दीपावली हिन्दुओं का एक अत्यन्त प्रसिद्ध त्योहार है | दीपावली का अर्थ है  दीपो की पंकित(कतार) | इस दिन हिन्दू लोग दिये तथा मोमबत्तिया जलाकर उनकी कतार लगा देते है | यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण- पक्ष की अमावस्या को सारे भारतवर्ष में बड़ी धूमधाम व उल्लास के साथ मनाया जाता है इससे एक दिन पहले छोटी दीपावली तथा दो दिन पहले अर्थात् त्रियोदशी को धनतेरस मनाई जाती है | इन दीपो , मोमबत्तियो तथा बिजली के बल्बों की इतनी रोशनी की जाती है कि अमावस्या की रात भी पूर्णिमा की रात सी जगमगाने लगती है |

इस दिन भगवान राम चौदह वर्ष का बनवास काटकर सीता था लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे थे | इसे ख़ुशी में अयोध्यावासियो ने इस दिन दीपक जलाए थे तथा घर –घर में मिठाइयाँ बाँटी थी | इसी ख़ुशी में लोग आज भी अपने घरो को सजाते है तथा आतिशबाजी चलाते है | परम्परागत यह त्यौहार आनन्द , उल्लास तथा विजय का प्रतीक बन गया है | इस दिन सभी बच्चे , बूढ़े ने वस्त्र धारण करते है |

इस त्यौहार से पूर्व सभी लोग अपनी दुकानों तथा घरो में लिपाई-पुताई व सफाई का काम कराते है | इस शुभ अवसर पर लोग शुभकामनाओ के साथ अपने इष्ट मित्रो व् सम्बन्धियों को भिन्न –भिन्न प्रकार के उपहार जैसे मिष्ठान्न, मेवे व फलादि भिजवाते है |

व्यापारी वर्ग के लिए तो इस त्यौहार का अपना विशेष महत्त्व है | वे इस शुभ अवसर पर लक्ष्मी-पूजन करते है | नए बही- खाते आरम्भ करते है तथा अपने बही – खातो की बड़ी श्रध्दा से पूजा करते है | लक्ष्मी के आगमन के विशवास के साथ वे अपने घरो के द्वार खुले रखते है तथा रात भर दीपक आदि जलाकर रोशनी करते है |

इस त्यौहार की महानता को एक विशेष अवगुण ने कम कर दिया है | इस दिन अनेक लोग लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए जुआ खेलते है तथा शराब पीते है | इन बुराइयों के कारण घर के घर बर्बाद हो जाते है | हमे इन बुराइयों को जड़ से उखाड़ने की कोशिश करनी चाहिए |

निबंध नंबर : 02

दीपावली

Deepawali

वैसे तो हर जाति और देश के अपने-अपने पर्व एवं त्योहार होते हैं जिन्हें वे महत्त्वानुसार हर परिस्थिति में मनाते रहते हैं। किन्तु हमारा देश लो पर्यों एवं त्योहारों का गढ़ है। यहाँ हर मास कोई न कोई त्योहारों अथवा पर्व आता रहता है। ये पर्व जीवन में एक प्रकार का उल्लास और आशा दीप लेकर आते हैं। जब मानव दैनिक गतिविधियों से थक-सा जाता है। नीरसता जब उसके जीवन आह्लाद को चुरा ले जाती है तब इससे मुक्ति की राह दर्शाते हैं ये पर्व और त्योहार।

हमारा देश अनेक धर्मों एवं मत मतान्तरों का पोषक है, इसलिए किसी न किसी धर्म का नित्यप्रति कोई न कोई पर्व अथवा त्योहार आता ही रहता है। फिर भी हिन्दू जाति के चार प्रमुख त्योहार होते हैं। इनमें देशहरा युद्ध एवं शस्त्रों की महत्ता का प्रतीक है, होली नाच रंग और भ्रातृत्व भावना को दर्शाता है पर दीपावली भारतीय जनजीवन का त्योहार है।

दीपावली प्रत्येक वर्ष नया संदेश और नया उल्लास लेकर आती है। इस शुभ दिवस से हमारे हृदय में नए आदर्श और नई कल्पना का संचार होता है। इसके मनाने की तैयारियाँ शुरू की जाती हैं। पुरातन युग में व्यापारी जलयानों में बैठकर सागर पार जाया करते थे और अपनी व्यापारिक यात्रा के बाद इस शुभ पर्व पर वे अपने घर लौटकर परिवार के सदस्यों से मिलकर आनन्दोत्सव मनाया करते थे। घर में लक्ष्मी का प्रदेश होता था। इस प्रकार यह गृहस्थ-जीवन का एक सौभाग्य पूर्ण त्योहार के रूप में मनने लगा।

दीपावली के इस शुभ त्योहार के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ गुथी हुई हैं। सुना जाता है कि देशहरे के दिन भगवान् राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी और इस दिन वे सती सीता सहित अयोध्या पधारे थे। उनकी आगमन की खुशी में यह त्योहार भारत में प्रचलित हुआ। सच तो यह है कि सत्य की असत्य पर विजय के रूप में यह त्योहार जन-जन के जीवन में उतर आया है।

कुछ लोगों का कथन यह भी है कि प्राग् ज्योतिष नगर में एक नरकासुर नामक दुष्ट नरेश राज्य करता था। वह अपने बाहुबल पर अनेक राजकुमारियों का अपहरण करके ले गया और उन्हें बन्दी बनाकर अपने बन्दीगृह में डाल दिया। भगवान् कृष्ण ने अपनी भार्या सत्यभामा के साथ जाकर उसे युद्ध में पराजित किया और उन राजकुमारियों को कारागार से मक्त कराया। उस नराधम नरकासर के यमलोक गमन पर सारे देश में आनन्द की लहर दौड़ गई और कार्तिक अमावस्या की अंधेरी रात्रि को दीप पंक्तियों से इतना सजाया कि वह पूर्णिमा जैसी रात्रि बन गई।

किन्तु यह नरकासुर हर वर्ष जन्म लेता है और उसे हर वर्ष ही यमलोक गमन करना पटता है। पावस ऋत में उत्पन्न गन्दगी से नगर व ग्राम चारों ओर से घिर जाते हैं। उनमें पनपने वाले कीटाणु जन जीवन को त्रस्त कर देते हैं। तब यह नराधम राक्षस के वध हेतु देश की जनता कुदाली और फावड़ों से उनके साथ युद्ध करती है और विजय प्राप्त कर तेल के दीपकों को प्रकाशित कर मच्छरों एवं कीटाणुओं को नष्ट कर देती है। लोग पर्व के उल्लास में खूब मिष्ठान्न खाते हैं और इष्ट मित्रों के यहाँ उपहार स्वरूप भिजवाते हैं।

दीपावली पर्व भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मनाया जाता है। जनता जनार्दन इस शुभावसर पर अपने घरों एवं दूकानों को सजाते हैं। उनकी दीवारों पर ‘लक्ष्मी सदा सहाय लिखते हैं। देवताओं और नेताओं के चित्रों और मिट्टी के सुन्दर-सुन्दर खिलौनों से घर की शोभा को बढ़ाते हैं। बाजारों की शोभा द्विगुणित हो उठती है। नर-नारियों, बाल-बूढों की चहल-पहल बढ़ जाती है। हलवाइयों की दुकानों पर तो भीड ऐसे दृष्टिगत होती है जैसी कहीं बाजीगर के तमाशे पर इकट्ठी हो जाती है। यही अवस्था बर्तन वाले मिट्टी के खिलौने वाले और आतिशबाजी वालों की दूकानों की होती है। अमीर-गरीब सभी अपनी-अपनी धुन में दृष्टिगत होते हैं । अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चों के दिल बहलाव का सामान खरीदते हैं और एकाध बर्तन भी।

दीपावली विशेषकर व्यापारी वर्ग का त्योहार माना जाता है। इस दिन पुरानी पद्धति को मानने वाले व्यापारी अपने बहीखाते बदलते हैं। उनके नववर्ष का आरम्भ इसी शुभ पर्व से होता है। सभी हिन्दू गृहस्थ अपने-अपने घरों में परिवारों के सदस्यों के साथ बैठकर श्रद्धा और भक्ति से लक्ष्मी और श्रीगणेश का पूजन करते हैं।

कृषक समाज इस त्योहार को नए अन्न के आगमन की खुशी में मनाते हैं। पहले वह उसका भगवान को भोग लगाते हैं तब बाद में उसे प्रयोग में लाते हैं। यह प्रथा बहत ही पुरातन है।

महाराष्ट्र में इस नए अन्न से पूर्व कुछ कड़वी वस्तु का भक्षण किया जाता है। गोवा में इस शुभ त्योहार पर चिउड़ा और मिष्ठान्न खाने का महत्त्व है, जिसमें सभी इष्ट-मित्र सम्मिलित होते हैं। गुरु गोविन्द सिंह जिन्हें इसी शुभावसर पर मुसलमानों के बन्दीगृह से मुक्ति मिली थी। सिख लोग इस कारण भी इस त्योहार को पूर्ण उल्लास से मनाते हैं। आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती का निर्वाणोत्सव भी इसी शुभ घडी में मनाया जाता है।

दीपावली भारतीय समाज का बहुत ही गौरव पूर्ण त्योहार है। यह त्योहार देश की नवरात्रि पूजा से आरम्भ होकर भाई के ललाट पर लगाई जाने वाली बहिन की उमंगभरी रोली के उत्सव में भैयादूज के दिन समाप्त होता है। भारत के हर कोने में दीपों एवं बिजली के बल्बों का प्रकाश अमावस्या की रात्रि के अंधकार को किंचितमात्र भी नहीं अखरने देता है।

इस शुभ त्योहार के विषय में लोगों में यह भी विश्वास है कि द्युत् क्रीड़ा से लक्ष्मी का आगमन होता है। वे इस अवसर पर दाँव पर दाँव लगाते हैं। इस में बहुत से लोग बेघर जाते हैं पर जए की मादकता उन पर से नहीं उतरती। ऐसे शुभावसर पर ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए. बल्कि इसे ठीक ढंग से मनाना चाहिये।

निबंध नंबर : 03

दीपावली

Deepawali

 

पर्व-त्योहार मनाने से हमारे जीवन की उदासी भी दूर हो जाती है और हम नए उत्साह और नई उमंग से कार्य में लग जाते हैं। दीपावली हँसी-खुशी और प्रसन्नता का पर्व है। इसे दीपों का त्योहार भी कहा गया है।

यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस पर्व के पीछे भी पौराणिक कथाएँ हैं। श्री रामचंद्र जी के चौदह वर्ष के वनवास की अवधि समाप्त होने की कथा इसी से जुड़ी है। दूसरी कथा शंकर भगवान द्वारा काली के क्रोध को शांत करने की है। तीसरा कथा श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध से संबंधित है। दीपावली के पर्व से जैन धर्म तथा सिक्ख धर्म से जुड़ी कथाएँ भी हैं।

दीपावली के दिन लोग अपना घर-आँगन साफ करते हैं। शहरों के पक्के मकानों को भी रँगा जाता है।

दीपावली के अवसर पर रात को गणेश-लक्ष्मी की पूजा की जाती है। व्यापारी इस दिन अपना नया बही-खाता शुरू करते हैं। इस त्योहार में विशेष रूप से बच्चे काफी उत्साहित रहते हैं। वे पटाखे, फुलझड़ी और अन्य रंग-बिरंगी रोशनियाँ जलाकर प्रसन्नता  प्रकट करते हैं। इस अवसर पर घरों में अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाए जाते हैं।

दीपावली अंधकार पर प्रकाश की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का पर्व है। किसी भी पर्व को मनाने में अनुशासन आवश्यक है। उसके अभाव में खुशी दुख में बदल जाती है। लापरवाही से पटाखे आदि छोड़ने से दूसरे लोग जल सकते हैं। इससे आग लगने का भी भय रहता है। यह धन की बर्बादी के साथ-साथ पर्यावरण भी प्रदूषित करता है। धन की देवी लक्ष्मी को घर में लाने के लिए कुछ लोग जुआ खेलते हैं। लेकिन यह कोरा अंधविश्वास है जो एक बुरी लत को जन्म देता है।

 

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