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Hindi Essay on “Chota Parivar Sukhi Parivar”, ”छोटे परिवार सुखी परिवार” Complete Hindi Anuched for Class 8, 9, 10, Class 12 and Graduation Classes

छोटे परिवार सुखी परिवार

Chota Parivar Sukhi Parivar

जमानव-सभ्यता संकट के जिन क्षणों से गुजर रही है, जीवन जीना जिस तरह कठिन होता जा रहा है, विशेष कर आम आदमी को जिस प्रकार के अभाव अभियोगों जीने को विवश होना पड़ रहा है; उस सब का मूल कारण है जीवन जीने के साधनों नित्य प्रति महँगे और दुर्लभ होते जाना। इस महँगाई और दुर्लभता का मुख्य कारण यह माना जाता है कि जिस अनुपात से जन-संख्या में वृद्धि हुई और अब भी निरन्तर होती जा रही है, उस अनुपात से जीवनोपयोगी वस्तुओं एवं साधनों में वृद्धि नहीं हुई और न हो पा रही है। अतः मानव-सन्तानों को अभाव-अभियोगों में जीने को बाध्य न होना पडे इसी कारण परिवार कल्याण, सन्तति-निरोध और छोटे परिवार रखने की आवश्यक बात सामने आई इस बारे में प्रचार और उपाय दोनों किए जाने लगे।

छोटा परिवार सुखी परिवार कहा और माना जाता है। इस का कारण यह है कि उसको सुखी रखने के उपाय तो सरलता से किए ही जा सकते हैं. दुःख की स्थितियाँ और कारण उपस्थित होने पर उन का उपाय एवं निराकरण कर पाना भी उतना कठिन प्रतीत नहीं हुआ करता। मान लो एक बड़ा किसान परिवार है। उसमें तीन-चार बेटियाँ और इतने ही बेटे हैं। उसके पास जमीन मात्र बीस-पच्चीस एकड़ ही है। पहले तो यह जमीन बेटियों के ब्याह आदि की व्यवस्था करने में ही चुक जाएगी। यदि जिस-किसी तरह उनके विवाह हो गए, तब बेटों के बड़े होने पर उनके परिवार बढ़ेगे। मान लो उस बीस एकड़ जमीन का बँटवारा उन चार बेटों में किया जाता है, तो एक के हिसे में पाँच-छ: एकड़ ही आ पाएगी। इसके बाद उनके परिवार के बच्चों के शादी-ब्याह होंगे और इस तरह जमीन बँटते-बँटते अन्त में शून्य में समा जाएगी। यदि एक दो ही बेटा-बेटी हैं, तब इस प्रकार शून्य से दो-चार होने से निश्चय ही बचा जा सकता है। इसी कारण छोटे परिवार के सुख अधिक और दुःख कम या बहुत सामान्य माने जाते है।

इसी प्रकार का उदाहरण अपना व्यवसाय या उद्योग-धन्धा करने वालों पर भी लागू हा जाता है। उनमें भी बडे परिवार होने की स्थिति में बँटवारा होते-होते अन्त में शून्य पर पहुंचने की अवस्था आ सकती है। फिर जो लोग या परिवार परोपजीवी है, अर्थात् नोकरी आदि कर के अपना जीवन-यापन करते हैं, उनक लिए ता. महंगी परिस्थितियों में सुख की कल्पना कर पाना तो क्या, सामान्य पाना भी एक बहुत बड़ी समस्या है। जरूरतें सभी की प्रायः बराबर हुआ करती है। उन्हें पूरा करते-करते आम नौकरी पेशा आदमी को नाक में दम आ सकता है। सामान्य रोजगार करने या मजदूरी आदि कर के जीवन जीने वाले लोग तो अपने परिवार की इच्छाएं तो क्या पूरी करती हैं, सामान्य आवश्यकताएँ तक पूरी नहीं कर सकते। यही सब देखते हुए ही आज छोटा परिवार सुखी परिवार होने की बात कही जाती है।

आज विश्व की, विशेषकर भारत जैसे नव-निर्माण में इन देशों की जनसंख्या जिस सीमा तक बढ़ चुकी और निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। यदि इस पर शीघ्र अंक न लगाया गया, तो जानकारों का मानना और कहना है कि इस सदी के अन्त और अगली सदी के पहले ही देशक तक जन-संख्या कीड़े-मकौड़े की तरह हो जाएगी। धरती पर मनुष्य उन्हीं की तरह रेंगते हुए, एक-दूसरे को खा एवं निगल जाने को व्याकुल दिखाई देंगे। जीवनोपयोगी वस्तुओं, अन्न-जल तक का और भी अभाव हो जाएगा। एक मनष्ण दूसरे का शत्रु बन जाएगा। रिश्ते-नाते सभी समाप्त हो जाएँगे। जीवन-समाज सभी कुछ अस्त-व्यस्त होकर टूट कर, बिखर कर रह जाएगा। इसलिए परिवार छोटा रखना ही सुख है। बड़े परिवार वालों के दुःखों का भी कोई पार या अन्त नहीं रह पाएगा।

परिवार छोटा होने पर सभी का आयु के अनुसार हर उचित आवश्यकता का पूरा ध्यान रखा जा सकता है। सभी को पौष्टिक भोजन, तन ढकने को अच्छा वस्त्र और रहने के साफ-सुथरा आवास दिया जा सकता है। सभी की पढ़ाई-लिखाई और शारीरिक विकास की उचित व्यवस्था संभव हो जाएगी। स्वास्थ्य रक्षा भी संभव हो सकेगी। अस्वस्थ या रुग्ण होने पर दवा-दारू एवं इलाज की भी उचित व्यवस्था की जा सकती है। इस प्रकार छोटे परिवार के लिए प्रत्येक सुविधा की व्यवस्था संभव हो सकती है। यह उचित व्यवस्था ही उस परिवार के सुख का कारण भी होगा। इसके विपरीत बड़ा परिवार होने पर आज बड़े-बड़े सम्पन्न व्यक्ति भी सभी की आवश्यकताओं और सुविधाओं का उचित ध्यान नहीं रख सकते, आम आदमी के वश की बात तो कतई है ही नहीं। परिवार बड़ा होने पर सभी के लिए उचित और आवश्यक मात्रा में पौष्टिक आहार-विहार, वस्त्र और आवास की व्यवस्था कर पाना संभव नहीं। इसी प्रकार न तो सभी के स्वास्थ्य पर ही ध्यान रखा जा सकता है, और न ही रुग्ण होने पर इलाज की व्यवस्था ही संभव हो सकती है। पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठा पाना भी दूर की कौड़ी लाने जैसा ही है। यही कारण है कि बड़े परिवारों के अक्सर सदस्य अनपढ़-अशिक्षित रहकर, कई तरह की गंदी-संगत का शिकार होकर इधर-उधर मारे-मारे फिरा करते हैं।

आज के वातावरण में यह आवश्यक है कि लोग समझदारी से काम लें। अपने ही भले के लिए परिवार छोटे एवं सन्तुलित रखें। तभी जीवन को सहज ढंग से सुख के साथ जिया जा सकता है; अन्यथा निरन्तर दुःख झेलते हुए, सुबक-सुबक कर जीवन का बोझ ढोने की विवशता, एक तरह से जीते जी मर जाने के समान ही है। जीना ही है, तो क्यों न सन्तुलित परिवार रख कर सुखपूर्वक हँसते-हँसते जिएँ।

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