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Hindi Essay on “Bharat America Sambandh” , ”भारत-अमेरिका संबंध” Complete Hindi Essay for Class 9, Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

भारत-अमेरिका संबंध

Bharat America Sambandh

निबंध नंबर :- 01

विश्व की राजनीतिक रंगमंच पर भारत और अमेरिका दो महान और सबसे बड़े जनतंत्री व्यवस्था वाले देश हैं। जनतंत्रवादी परंपराओं के पोषक होने के नाते दोनों का वर्चस्व भी विश्व में अत्याधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों मानवतावादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था पर भी विश्वास रखते हैं। विश्व-शांति के इच्छुक और उपासक हैं, फिर भी क्या यह विश्व का आठवों या नौंवा आश्चर्य नहीं कहा जाएगा भारत के स्वतंत्र होने के दिन से लेकर आज तक दोनों देशों के पारस्परिक संबंधों में, सिवाय राष्ट्रपति कैनेडी के शासन-काल के कुछ दिनों को छोडक़र, कभी भी वास्तविक सदभाव नहीं आ सका। इस ऐतिहासिक तथ्य से परिचित रहते हुए भी नहीं आ सका कि जब भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहा था, तब विश्व के देशों में अमेरिका से ही भारत को सर्वाधिक समर्थन और सहानुभूति मिल रही थी। इसका मूल कारण क्या है? एक तो यह है कि अमेरिका एक विकसित और धनी देश होने के कारण अमेरिका अन्य छोटे-मोटे देशों के समान भारत को भी अपने दबाव में रखना-देखना चाहता है, जबकि भारत केवल समानता के आधार और मानवीय विश्वासों के बल पर ही किसी देश या अमेरिका के साथ अपने सदभावनापूर्ण संबंध रखना चाहता है। लेकिन भारत की इस तरह की तटस्थ रीति-नीति अमेरिका को सहन नहीं हो पा रही है, आश्चर्य की बात है।

इन मुख्य कारणों के अतिरिक्त भी भारत-अमेरिका के सतही संबंधों के कुछ अन्य कारण है। भारत जब स्वतंत्र हुआ था, तब अमेरिका की इच्छा थी कि वह उसके शक्ति-गुट का सदस्य बन जाए। पर भारत ने अपने को तटस्थ राष्ट्र घोषित कर दिया। इस बात से चिढक़र ही अमेरिका ने पाक का अंधाधुंध समर्थन करना शुरू कर दिया। जानकार कहते हैं कि साम्यवादी रूस को घेरने के लिए अमेरिका कश्मीर के गिलगितचित्राल आदि स्थानों पर अपने सैनिक अड्डे स्थापित करना चाहता है पर भारत ने इनकार कर दिया। इस बात से चिढक़र अमेरिका ने सन 1948 में पाकिस्तान को उकसाकर न केवल कश्मीर पर कबायली-आक्रमण ही करवा दिया, बल्कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में कश्मीर का प्रश्न आने पर प्रत्येक स्तर पर कोशिा भी की कि कश्मीर पाकिस्तान को मिल जाए और रूस को घरेने की उसकी इच्छा पूर्ण हो सके। रूस के विशेषाधिकार के प्रयोग के कारण जब वह इसमें सफल हो सकता, तो पाकिस्तान के छोटे से प्याल को शस्त्रास्त्रों से इस सीमा तक लबालब भर दिया कि वह पहले सन 1965 और फिर सन 1972 में भारत की ओर छलक पड़ा। वह अलग बात है कि भारत की सैन्य शक्ति ने अपनी महान परंपरा के अनुसार दोनों ओर मुंहतोड़ उत्तर दिया, पर अमेरिका की बेशर्मी देखने लायक है। अब भी यह पाकिस्तानी तानाशाही को ही समायता पहुंचा रहेा है। जनतंत्री देश होते हुए भी एक महान जनतंत्री देश भारत के विरुद्ध दबाव डालने के लिए युद्धों के अवसर पर दोनों बाद उसने अपने सातवें बेड़े का रुख हिंद महासागर में भारत की ओर कर दिया। इतना ही नहीं, पहले तो पी.एल. 480 के समझौते के अंतर्गत अपने देश का सड़ा-गला गेहूं देने रहकर भारत को अनाज के मामले मे ंआत्मनिर्भर नहीं होने दिया, उस पर सन 1965 के भारत-पाक युद्ध के अवसर पर, भारत पर पाक के पक्ष में दबाव डालने के लिए भारत की ओर गेहूं लेकर आ रहे जहाज समुद्री राह के बीच में ही रोक दिए, ताकि भूखा रहकर भारत अमेरिका से शरण मांगने को विवश हो जाए। पर स्वाभिमानी भारत ने ऐसा नहीं किया और अमेरिका तथा उसके पालतू पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। उसने जनतंत्री होकर भी तानाशाहों की सहायता करके जनतंत्र के साथ कितना भद्दा मजाक किया और आज भी कर रहा है, इतिहास ही उसके इस घृणित कार्य का निर्णय करेगा। ऐसे विषम क्षणों में भारतीय शौर्य और भी तीखा होकर उभरा है, यह सभी जानते हैं।

जहां तक भारत का प्रश्न है, उसने हमेशा चाहा कि जनतंत्रवादी देश होने के कारण अमेरिका के साथ उसके संबंध अच्छे रहें। पर अमेरिकन नीति हमेशा भारत को तोड़-मरोडक़र रख देने वाली रही है। आज भी पंजाब को भारत से अलग कर देने के इच्छुक आतंकवादी अमेरिका में खुलेआम दनदना रहे हैं। आज भी यह भारत का विरोध और अहित करने के लिए अपने चहेते पाकिस्तान को अनावश्यक और भयावह आधुनिकतम शस्त्रास्त्रों की सहायता दे रहा है। भारत की प्रगति और उसकी विकास योजनाओं की राह में उसी सी.बी.आई. और वह स्वंय हरचंद अडंग़े अड़ाने की कोशिश करता रहता है। अन्य देशों की तुलना में भारत का आर्यात-निर्यात के व्यापार पर भी कई तरह की पाबंदिया लगा रखी है और विशेष नियम भी बना रखे हैं। वह दबाव डालकर परमाणु-अप्रसार-संधि में भी बांधने पर तुला हुआ है।

ऐसी स्थिति में भला संबंधों में वास्तविक सुधार आकर सदभावनापूर्ण वातावरण बन भी कैसे सकता है? यों ऊपर संबंध उतने बुरे नहीं लगते। व्यापार और कुछ सहायता कार्य भी पारस्परिक सहयोग को दर्शाते हैं, पर अमेरिकी लक्ष्य? वह दबाव डालने की नीति से ऊपर उठकर सहज मानवीय नहीं बन सका। संबंधों में दरार पड़े रहने का यही मुख्य कारण है। निश्चय ही यह अत्यंत दुखद स्थिति है।

संबंध सुधार के लिए विशुद्ध मानवतावादी उदाहर दृष्टिकोण को आवश्यकता हुआ करती है। अमेरिकी दृष्टिकोण जब तक निहित स्वार्थी और यतीम मनोवृतियों वाला रहता है, तब तक यों ही घिसटते-घिसटते संबंध चलते रहेंगे, विशेष कुछ नहीं होगा। इसके लिए पहल अमेरिका को ही करनी होगभ्। उसे ही आगे बढक़र विशुद्ध मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। तभी विश्व के दो महान जनतंत्र सच्चे मित्र एंव सहयोगी बन सकते हैं।

निबंध नंबर :- 02

भारत-अमेरिका सम्बन्ध

Bharat America Sambandh 

भारत और अमेरिका शासन-व्यवस्था की दृष्टि से दोनों अपने आप को जनतंत्री व्यवस्था वाले देश मानते हैं। दोनों संसार के सब से बड़े जनतंत्र हैं भी, फिर जाने क्या बात है कि भारत के स्वतंत्र होने के बाद से लेकर आज तक दोनों देशों में वास्तविक और यथार्थ के धरातल पर सम्बन्ध अच्छे तो क्या रहने थे, कभी सामान्य भी नहीं हो सके। दोनों मात्र औपचारिकता का निर्वाह ही अधिक-से-अधिक करते आ रहे हैं। एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि भारत जब स्वतत्रंता पाने के लिए संघर्ष कर रहा था, उन दिनों इस अमेरिका-सरकार और जनता का हार्दिक समर्थन प्राप्त हुआ करता था। लेकिन स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद स्थिति वैसी भी नहीं बनी रह सकी, यह भी एक स्पष्ट ऐतिहासिक तथ्य है।

भारत जब स्वतंत्र हुआ, तब क्योंकि अमेरिका साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव से आतंकित था, इसलिए चाहता था कि विशाल जन-शक्ति वाला देश भारत उसके गुट का सदस्य बन जाए ताकि उस के माध्यम से या उसकी धरती का (जो काश्मीर भी हो सकता था और है) सहारा लेकर साम्यवाद की निरन्तर बाढ़ पर अंकुश लगा सके, लेकिन भारत ने अपने-आप को गुट-निरपेक्ष घोषित करना ही उचित समझा। फलस्वरूप अमेरिका का झुकाव लगातार पाकिस्तान की ओर होता गया। भारत का काश्मीर के मामले में तो खुला विरोध करता रहा; बल्कि पाकिस्तान के पक्ष में दबाव की राजनीति से भी काम लेता रहा; पर खुलकर अन्य विश्व मामलों में भारत का विरोध नहीं कर सका। अपनी गहरी साजिश का सहारा लेकर अमेरिका ने भारत के साथ पी-एल 480 का समझौता करके, अपना बचा-खुचा और वहाँ उपयोग में न आ सकने वाला अनाज (गेहूँ) भारत को देकर खाद्य के बारे में परी तरह से परावलम्बी बना दिया। यह बात तब स्पष्ट हुई, जब भारत-पाक युद्ध(1965) के समय उसने अनाज लेकर भारत आ रहे जहाज रास्ते में ही रोक लिए। पह तो भला हो लाल बहादर शास्त्री का जिन्होंने दूरदर्शिता से काम लेकर ‘जय जवान’ फ साथ ‘जय किसान’ का नारा भी लाकर इस दिशा में भारत को आत्मनिर्भर बनाने का सफल-सार्थक प्रयास किया।

भारत क्योंकि विकासोन्मुख देश था, इस कारण उसे सभी पक्षों से अमेरिका से भी आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी, इस कारण भारत ने अमेरिका का न तो कभी खुला विरोध ही किया और न कभी. उसके मामलों में अपनी टाँग ही अड़ाई। फिर भी अमेरिका भले-बरे प्रत्येक अवसर पर भारत विरोधी रुख ही अपनाता रहा। यह विरोध सयुक्त राष्ट संघ और उसके बाहर सभी जगह जारी रहा। इसका घिनौना और दादागिरी पाला स्वरूप सन 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय देखने को मिला कि जब भारत पर दबाव डालने के लिए अमेरिका ने अपना अणु अस्त्रों से सज्जित सातवां बेडा, बंगाल की खाड़ी में खड़ा कर दिया। वह तो भला हुआ कि पाक सेनाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया, नहीं तो बहुत संभव था कि उस बेडे के कारण भारत-अमेरिका-सम्बन्ध हम के लिए सुधरने तो क्या थे, और भी खराब हो जाते।

इतना ही नहीं, अमेरिका जो कुछ स्वयं खुले आम कर रहा है, उसे करने पर भी भारत पर चारों ओर से दबाव डालता-डलवाता और धमकियाँ देता आ रहा है कि उसे (भारत) न करे। परमाण-परीक्षण, मिसाइल-निर्माण आदि कुछ इसी प्रकार के प्रसार अमेरिका स्वयं तो चाहता है कि इन क्षेत्रों में निरन्तर आगे बढ़ता जाए, पर भारत की तथा-कथित सन्धियों में बान्ध कर रख देना चाहता है। सोवियत संघ के बिखर जान के बाद से उसकी प्रवृत्ति विश्व भर में थानेदारी और दादागीरी करने की हो गई है। उसी का सहारा लेकर उसने रूस पर दबाव डालकर भारत को क्रायोजनिक इजिन देने का सौदा रह करवाया। पाकिस्तान को यह जानते हुए भी कि वह चोरी कर के परमाणु-शस्त्र बना रहा है, सब तरह की आर्थिक सहायता, युद्धक-सामग्री, अणु बम तक फेंक सकन में समर्थ विमान आदि देते रहने का निर्णय किया, यद्यपि विश्व-दबाव के कारण विमान-देने पर अभी तक दुल-मुल रूख अपना रखा है।

प्रेसलर कानून, गैट समझौता, भारत का व्यापार आदि की दृष्टि से विशेष दर्जा समाप्त करना, औषधि और बीज-नियंत्रण, कॉपी राईट जैसी नीतियाँ और योजनाएँ वास्तव में भारत पर दबाव डालने के लिए ही बनाई और नियोजित की गई हैं। इस पर भी भारत) मात्र बातों से तो अमेरिका के इस तरह के कार्यों का विरोध करता रहता है: पर वास्तव में उस का विरोध कर सकने या कुछ बिगाड सकने की स्थिति में कतई नहीं है। उधर, अमेरिका को इस बात की कतई चिन्ता नहीं कि विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र का किसी बात में हित होता है या अहित, उसे तो मात्र अपने देश के सरकारी और व्यापारी वर्ग के हित-साधन से मतलब है। ऐसी स्थितियों में कोई भी समझदार व्यक्ति देख और कह सकता है कि भारत-अमेरिका के सम्बन्ध अच्छे तो क्या, सामान्य भी कैसे रह सकते है।

इतना ही नहीं, विगत दिनों कुछ अमेरिकी प्रवक्ताओं ने काश्मीर का भारत में विलय तक नकार दिया। वहाँ मानवाधिकारों के तथाकथित हनन का नारा बुलन्द कर इस बार। में भी भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की। भारत की सुविधा असुविधा से परीचित राजदूत को यहाँ न भेज कट्टर विरोधी को भेजा। फिर भी शुक्र है कि अमेरिका के किलण्टन-प्रशासन ने, वहाँ के राजदूत और प्रवक्ताओं ने अब जमीनी सत्यों को पहचानना। शुरू कर दिया है। सो आशा की जा सकती है कि अब जल्दी ही दोनों देशों के सम्बन्ध में सुधार आने लगेगा।

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