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Hindi Essay on “Berojgari ki Samasya” , ” बेरोजगारी की समस्या” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

भारत में बेरोजगारी

Bharat me Berojgari

अथवा

बेरोजगारी की समस्या 

Berojgari ki Samasya

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7 Best Hindi Essay on “Berojgari ki Samasya”

निबंध नंबर :-01

समस्याओ के देश भारतवर्ष में जो एक बहुत बड़ी समस्या सभी को पीड़ित व आतंकित किए हुए है, वह है बेकारी की समस्या | भारत में यह समस्या द्वितीय महायुद्ध के समाप्त होते – होते बढने लगी थी और आज यह अपनी चरम सीमा पर विद्दमान है | तथा यह धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करती जा रही है | आज देश में शिक्षित बेरोजगारो की संख्या लगभग दस करोड़ है जिसमे लाखो युवक पथ-भ्रष्टता एव अराजकता के शिकार बन गये है | आज जो देश में हिसा, तोड़ – फोड़ , मारधाड़ , धोखाधड़ी आदि कई तरह के आपराध पनप  रहे है उनका कारण है बेकार युवा वर्ग की मानसिकता | कहावत भी है खाली मन – मस्तिष्क शैतान का घर |

हमारे देश में बेकार अंग्रेजो की देन है | अंग्रेजी ने देश के उन छोटे-छोटे उद्दोगो को समाप्त कर दिया जिन्हें प्राचीन काल से भारतीय अपने घरो में चलाकर रोजीरोटी कमा लेते थे | कोई कपड़ा बुनता, कोई चरखा कातता , कोई गुड बनाता तो कोई टोकरी व खिलौने | यह सब उन्होंने अपने देश के व्यापार को बढ़ाने के लिए किया |

बेकारी की समस्या का दूसरा मूल कारण है भारत की बढती जनसंख्या | देश के साधन तथा उत्पादन तो आगे बढ़ते नही वरन उपभोक्तओ की संख्या निरन्तर बढती गई | अंत : प्रत्येक घर में दरिद्रता बढती चली गई | अर्थात परिवार में कमाने वालो की संख्या सीमित होती चली गई |

इसका तीसरा कारण है वर्तमान शिक्षा पद्धति , जो देश में केवल क्लर्को की संख्या को बढ़ाने में सहायक रही | चौथा कारण है सामजिक व धार्मिक परम्पराओ का होना | साधु-सन्यासियों को भिक्षा देने व दान देने के प्रवृत्ति ने भी लोगो को आलसी बना दिया है | ह्रष्ट-पुष्ट शरीर वाले लोग भी भिक्षावृति पर उत्तर आटे है | वर्णव्यवस्था के कारण भी बेरोजागारी को बढ़ावा मिला है | किसी एक वर्ग का व्यक्ति दुसरे के कार्य को नही अपनाना चाहता , भले ही उसे बेकार ही क्यों ने रहना पड़े |

बेरोजागारी के कारण युवको में फैले आक्रोश तथा असन्तोष ने समाज में अव्यवस्था व अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है | यदि इसका शीघ्र ही कोई हल नही ढूंढा गया तो इसके भयंकर परिणाम होने की सम्भावना है आज इस बढ़ते हुए बेकारी के रोग को समूल उखाड़ फेकने के लिए हमे अनेक उपाय करने होगे | सर्वप्रथम तो जनसंख्या की वृद्धि को रोकना होगा | दूसरा हमे अपनी शिक्षा पद्धति में परिवर्तन करना होगा | वह तकनीकी व व्यावहारिक होनी चाहिए | तीसरा घरेलू व लघु उद्दोगो को बढ़ावा देना होगा | चौथा हमे अपनी धार्मिक मान्यताओं में परिवर्तन लाना होगा |

भारत की सरकार ने इस समस्या के हल के लिए काफी ठोस कदम उठाए है | जैसे (i) स्नातक बेरोजगारों को सस्ते डॉ पर रुपया उधार देना (ii) 20-सूत्री कार्यक्रम की स्थापना करना तथा (iii) बड़े-बड़े उद्दोगो की स्थापना करना आदि |

 

निबंध नंबर :-02

बेरोजगारी की समस्या

Berojgari ki Samasya

बेरोजगारी देश के सम्मुख एक प्रमुख समस्या है जो प्रगति के मार्ग को तेजी से अवरूद्ध करती है। यहाँ पर बेरोजगार युवक-युवतियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। स्वतंत्रता के पचास वर्षों बाद भी सभी को रोजगार देने के अपने लक्ष्य से हम मीलों दूर हैं। बेरोजगारी की बढ़ती समस्या निरंतर हमारी प्रगति, शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है।

हमारे देश मंे बेरोजगारी के अनेक कारण हैं। अशिक्षित बेरोजगार के साथ शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है। देश के 90ः किसान अपूर्ण या अद्ध बेरोजगार हैं जिनके लिए वर्ष भर कार्य नहीं होता है। वे केवल फसलों के समय ही व्यस्त रहते हैं। शेष समय में उनके करने के लिए खास कार्य नहीं होता है।

यदि हम बेरोजगारी के कारणों का अवलोकन करें तो हम पाएँगे कि इसका सबसे बड़ा कारण देश की निंरतर बढ़ती जनसंख्या है। हमारे संसाधनों की तुलना में जनसंख्या वृद्धि की गति कहीं अधिक है जिसके फलस्वरूप देश का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। इसका दूसरा प्रमुख कारण हमारी शिक्षा-व्यवस्था है। वर्षोंे से हमारी शिक्षा पद्धति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति का आधार प्रायोगिक नहीं है। यही कारण है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भी हमें नौकरी नहीं मिल पाती है। बेरोजगारी का तीसरा प्रमुख कारण हमारे लघु उद्योगों का नष्ट होना अथवा उनकी महत्ता का कम होना है। इसके फलस्वरूप देश के लाखों लोग अपने पैतृक व्यवसाय से विमुख होकर रोजगार की तलाश मंे इधर-उधर भटक रहे हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बेरोजगारी के मूलभूत कारणों की खोज के पश्चात् इसके निदान हेतु कुछ सार्थक उपाय किए जाएँ। इसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने छात्र-छात्राओं तथा युवक-युवतियांे की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा। यह तभी प्रभावी हो सकता है जब हम अपनी शिक्षा प्रदान करें जिससे वे शिक्षा का समुचित प्रयोग कर सके। विद्वालयों में तकनीकी एवं कार्य पर अधारित शिक्षा दें जिससे उनकी शिक्षा का प्रयोग उद्योगों व फैक्ट्रियों में हो सके और वे आसानी से नौकरी पा सकें।

इस दिशा मंे सरकार निरंतर कार्य कर रही है। अपनी पंचवर्षीय व अन्य योजनाओं के माध्यम से लघु उद्योग के विकास के लिए वह निरंतर प्रयासरत है। सभी सरकारी एंव गैर सरकारी विद्यालयोें मे तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रण में लेने हेतु विभिन्न परिवार कल्याण योजनाओं को लागू किया गया है। सभी बड़े शहरों मे रोजगार कार्यालय खोले गए हैं जिनके माध्यम से युवाओं को रोजगार की सुविधा प्रदान की जाती है। परंतु विभिन्न सरकारों ने यह सवीकार किया है कि रोजगार कार्यालयों के माध्यम से बहुत थोड़ी संख्या में ही बेराजगारों को खपाया जा सकता है क्योंकि सभी स्थानों पर जितने बेकार हैं उसकी तुलना मे रिक्तियांे की संख्या न्यून है। इस कारण बहुत से लोग अंसगठित क्षेत्र में अत्यंत कम पारिश्रमिक पर कार्य करने के लिए विविश हैं।

वर्तमान में सरकार इस बात पर अधिक बल दे रही है कि देश के सभी युवक स्वावलंबी बनें। वे केवल सरकारी सेवाओं पर ही आश्रित न रहें अपितु उपयुक्त तकनीकी अथवा व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण कर स्वरोजगार हेतु प्रयास करें। नवयुवकों को उद्यम लगाने हेतु सरकार उन्हें कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान कर रही है तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण देने में भी सहयोग कर रही है। हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि बदलते परिपेक्ष्य मंे हमारे देश के नवयुवक कसौटी पर खरे उतरेेंगे और देश में फैली बेरोजगारी जैसी समस्या से दूर रहने में सफल होंगे।

 

निबंध नंबर :- 03

बेरोजगारी: एक अभिशाप

Berojgari – Ek Abhishap

प्रस्तावना

हमारे देश में बेरोजगारी एक भंयकर समस्या है, जो दिन-प्रतिदिन त्रीव गति से बढ़ती जा रही है। आज के जमाने में पढ़े-लिखे लोगों में बेरोजगारी की समस्या अधिक है। वे अपने स्कूल एवं काॅलेजों से उच्च शिक्षा प्राप्त करके, शिक्षा पर लाखों रूपये खर्च करके अच्छी नौकरी पाने की उम्मीद रखते हैं। यह अधिकाशं नौजवानों का स्वभाव है। यह ब्रिटिश सरकार की देन है।

लेकिन, वर्तमान समय में रिश्वतखोरी- धांधलेबाजी के कारण उनकी अच्छे रोजगार पाने की अभिलाषा पूरी नहीं हो पाती जिससे वे बेरोजगार होकर सड़कों पर भटकते रहते हैं। इसके अलावा नौकरियों की संख्या कम है, पढ़े-लिखे बेरोजगार अधिक हैं, इसके कारण भी समस्या अभिशाप के रूप में फल-फूल रही है।

बेरोजगारी से परेशान होकर कुछ युवक अपराध की दुनिया में शामिल होते हैं तथा लूटपात-चोरी एवं डकैती डालकर अपनी जीविका चलाने का प्रयास करते हैं। जो आज के समय के लिए निहायत चिंताजनक बात है।

बेरोजगारी के कारण युवकों में फैले आक्रोश व असन्तोष ने समाज में हिंसा, तोड़-फोड़, मारधाड़ व अनेक तरह के अपराधों में वृद्वि हुई है। इस बारे में कहा जा सकता है- खाली दिमाग शैतान का घर। नौजवान यदि खाली है, बेरोजगार है तो उस पर शैतानी प्रवृतियां कब्जा जमाएंगी ही।

आज के नौजवानों को जब नौकरी नहीं मिलती तो वे हताशा एवं कुण्ठा का शिकार हो जाते हैं। यह एक स्वाभाविक प्रवृति है।

यदि किसी परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब है और घर में पैसे की तंगी है, युवक को दौड़-धूप करने के बाद भी रोजगार प्राप्त नहीं होता तो ऐसी दशा में अधिकतर युवक आत्महत्या करने का प्रयास भी करते हैं। हताशा और कुण्ठा का परिणाम आत्महत्या के रूप में सामने आता है।

बेरोजगारी का अर्थ- बेरोजगारी का अर्थ ऐसी स्थिति से है, जब कोई इच्छुक व्यक्ति अपनी जीविका चलाने के लिए किसी आॅफिस, दुकान, फैक्ट्री, कारखाने तथा अन्य किसी स्थान पर मजदूरी की दरों पर कार्य मांगने जाता है और मालिक काम करवाने से मना कर देता है तो ऐसी दशा को बेरोजगारी कहते हैं। बेरोजगारी तब बढ़ती है जब मांग और पूर्ति का सन्तुलन बिगड़ जाता है। रोजगार मांगने वालों की संख्या दस है और पूर्ति होने की संख्या एक है। इस अवस्था में एक की पूर्ति होने पर नौ लाख बेरोजगार रह जायेंगे। ऐसे में श्रम का शोषण होगा तथा यदि सरकारी नौकरी का मामला हो तो रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और सोर्स-सिफारिश को आज के समय बढ़ावा मिलेगा।

बेरोजगारी से उत्पन्न समस्या

बेरोजगारी किसी भी देश की आर्थिक, सामाजिक, दीवालियेपन का प्रतीक है। यह एक महत्वपूर्ण समस्या है, जो देश के कोने-कोने में अपने पांव पसारती है तथा आर्थि समस्या, भ्रष्टाचार और कुण्ठा को समाज व देश में जन्म देती है।

यह एक ऐसी भयानकपूर्ण समस्या है जिसके कारण मानव की मस्तिषक शक्ति तो क्षीण होती ही है, वरन् देश की उन्नति भी रूक जाती है।

बेरोजगारी के कारण

बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण निम्न हैं-
(1) जनसंख्या में वृद्वि- देश में तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या बेरोजगारी को बढ़ावा देने का प्रमुख कारण है। वर्तमान समय मंे हमारे देश की जनसंख्या सौ करोड़ से ऊपर है। हमारा देश जनसंख्या के हिसाब से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इस प्रकार अधिक जनसंख्या होने से अन्न, आवास तथा शिक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ता है जिसके कारण बेरोजगारी मे भी वृद्वि होती है।

(2) दोषपूर्ण शिक्षा नीति- बेरोजगारी का दूसरा प्रमुख कारण दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है। वर्तमान शिक्षा, नौजवानों के मन में स्वावलम्बन या अपने धन्धे चलाने की प्रेरणा न देकर मात्र नौकर या सुविधा भोग की प्रेरणा देती है।

(3) कुटीर उधोगों की तरफ ध्यान न देना- वर्तमान समय में बड़े-बड़े या लघु उधोग तो निरन्तर खोले जा रहे हैं लेकिन छोटे कुटीर उधोगों की तरफ कोई ध्यान नही दिया जा रहा है। मशीनीकरण का उपयोग भी काफी बढ़ गया है, जिस कारण कुटीर उधोगों से जुड़ें लोग, सामान्य शिक्षा प्राप्त अनेक नवयुवक बेकार होते जा रहे है। जिस कारण बेरोजगारी मंे निरन्तर वृद्वि हो रही है।

(4) पंचवर्षीय योजनाओं की असफलता- पंचवर्षीय योजनाओं की असफलता भी बेरोजगारी बढ़ने का प्रमुख कारण है। यदपि स्वतन्त्रता के पश्चात् हमारे देश में पंचवर्षीय योजनाओं का तेजी से प्रयोग हुआ जिसके कारण अनेक बेरोजगारों को रोजगार की प्राप्ति हुई, लेकिन वर्तमान समय में पंचवर्षीय योजनाओं की असफलताओं से रोजगारी पर काफी प्रभाव पड़ा। ‘सबको शिक्षा, सबको काम‘ के सिद्वान्त पर कोई अमल न हो सका।

(5) कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी- देश में कुशल व प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी है। अच्छी मशीन, उपकरण, खराब हो जाये तो प्रशिक्षित कारीगर नहीं मिलते। उधोग को अधिक विकसित करना हो तो विदेशी व्यक्तियों की सहायता लेनी पड़ती है। हमें अनेक सुविधा साधन के उपकरणों को विदेशों से खरीदना पड़ता है, यदि वही उपकरण देश में बनने लगे तो उसके लिए कुशल प्रशिक्षित व्यक्ति चाहियें। जिनकी कमी है।

बेरोजगारी को रोकने के उपाय

(1) बेरोजगारी को रोकने के लिए सबसे पहले जनसंख्या वृद्वि पर नियंत्रण पाना आवश्यक है।
(2) देश की शिक्षा नीति में सुधार लाना होगा। शिक्षा को रोजगार परक बनाना एक अच्छा विकास है।
(3) ऐसे कुटीर उधांेगो का विकास करना होगा जहां अधिक से अधिक मजदूरों को काम पर लगाया जा सकें। इसके लिए लघु कुटीर उधोगों को सरकार द्वारा बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
(4) पंचवर्षीय योजानाओं को सफल बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास करने चाहिये। इसके लिए ‘सबको शिक्षा, सबको काम‘ लक्ष्य बनाकर उसे पूरा किया जाना चाहिये।
(5) देश में उपलब्ध कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों को ढूंढकर उन्हें रोजगार देना होगा ताकि देश में उन्नत तकनीक विकसित हो तथा आने वाले समय में अधिकतर को काम मिल सकें।
(6) प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग की ओर सरकार को अधिक ध्यान देना चाहिये।
(7) आर्थिक एवं सामाजिक ढांचे मंे परिर्वन करना चाहिये।

उपसंहार

इन उपरोक्त बिन्दुओं द्वारा ही हमारा देश बेरोजगारी जैसी भंयकर समस्या से छुटकारा पा सकता है। इस समस्या को दूर करके किसी भी देश का आर्थिक विकास किया जाना सम्भव है, अन्यथा देश को अपराध, कुण्ठा-हताशा और हताशा के कारण आत्महत्या की घटनायें बढ़ती चली जायेगी जो देश के लिए अभिशाप साबित होंगी।

निबंध नंबर :- 04

बेरोजगारी की समस्या

Berojgari ki Samasya

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आज हमारे देश में लाखों, बल्कि करोड़ों नौजवान आजीविका की खोज में इधर-उधर भटकते देखे जा सकते हैं। उनमें से बहुसंख्यक शिक्षित वर्ग के होते हैं और अशिक्षितों की संख्या भी कम नहीं होती। वे न तो शिक्षित ही होते हैं और न ही कोई लाभप्रद रोजगार का प्रशिक्षण उन्हें मिला होता है। रोजगार कार्यालय हर दिन हजारों की संख्या में युवकों के नाम दर्ज करते हैं, किन्तु परिणाम कोई भी नहीं दिखाई देता।

भारत एक कल्याणकारी देश है और सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह देश के नागरिकों को सार्थक रोजगार प्रदान करे। किन्तु किसी भी सरकार के लिये यह कार्य सहज नहीं, क्योंकि प्रत्येक वर्ष लाखों व करोड़ों की संख्या में शिक्षित और अशिक्षित लोग रोजगार की खोज में भटकना शुरू कर देते हैं। अतः यह समस्या एक ऐसी विकट समस्या है जिसका कोई स्थायी विकल्प खोजना ही होगा।

हमारे सामने विश्व के कई देशों के ऐसे उदाहरण हैं जहां सरकारें हजारों नौजवानों को बेरोजगारी भत्ता तब तक देती हैं जब तक कि उन्हें किसी उपयुक्त स्थान पर नियक्ति नहीं मिलती, लेकिन उन देशों की आबादी भारत की आबादी जितनी विशाल नहीं है। साथ ही, उन देशों में काफी बड़ा रोजगार बाजार भी है, क्योंकि वहां के उद्योग-धन्धे विकासशील अर्थव्यवस्था पर आधारित हैं।

भारत में जनसंख्या की समस्या सरकार के लिए एक बहुत बड़ा सरदर्द बनी हुई है। हर वर्ष हजारों नए स्कूल खोलना जरूरी हो रहा है। इसके अलावा गांव के नौजवानों के सामने बेकारी की समस्या अधिक विकट रूप में है क्योंकि या तो उनके माता-पिता भूमिहीन होते हैं या फिर जितनी जमीन उनके पास होती है उससे परिवार के सभी सदस्यों का पर्याप्त गुजारा नहीं हो पाता। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में जो शिक्षा-प्रणाली चलाई जा रही है उसके अन्तर्गत शिक्षित युवकों को रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर शहरों में शरण लेनी होती है। कभी-कभी गांव में खेती करने के पेशे को लेकर उनके अन्दर हीन भावना का विकास भी हो जाता है।

शहरी नौजवानों को नए उद्योगों में खपाया जा सकता है या अपनी निजी औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने में उनकी सहायता की जा सकती है। इस प्रकार उन्हें लाभदायक रोजगार दिया जा सकता है। ग्रामीण नौजवानों को भी शिक्षित व प्रशिक्षित करना होगा, तभी कोई तालमेल बिठाया जा सकता है। सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि हमारी शिक्षा-पद्धति सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती।

महात्मा गांधी ने कहा था कि प्रत्येक विद्यार्थी को व्यावसायिक प्रशिक्षण स्कूल या कालेज में अध्ययन के दौरान ही प्राप्त कर लेना चाहिये, ताकि शिक्षा समाप्त करने के ठीक बाद वे उस व्यवसाय को अपनाने योग्य हो जाएं। इस प्रकार वे आत्मनिर्भर हो जायेंगे और सामान्यतया समाज-कल्याण में सहायक भी होंगे।

हमारी सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास पर विशेष बल दे रही है। वह ग्रामीण नौजवानों की बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिये विशेष रूप से प्रयत्नशील है। भविष्य में कोई भी औद्योगिक इकाई पांच लाख से अधिक आबादी वाले कस्बे में नहीं खोली जाएगी। इस प्रकार सरकारी सहायता से गांवों में शीघ्र ही नए उद्योग-धन्धे स्थापित किए जाने की योजना है। विभिन्न बैंक भी अपनी शाखाएं गांवों में खोल रहे हैं।

सरकार बेरोजगारी की इस समस्या को गांधीवादी सिद्धान्तों पर हल करने के प्रयत्न कर रही है। इसके साथ-साथ भूमि-सुधार की बहुत अधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है। हर नए परिवार के पास. यदि वे कृषि का व्यवसाय चुन रहे हों, कृषि योग्य पर्याप्त जमीन होनी चाहिये और वह जमीन उन्हें सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जानी चाहिये। सरकार को चाहिए कि उन्हें कृषि सम्बन्धी अन्य सभी आवश्यक सुविधाएं और साधन भी उपलब्ध कराए, ताकि वे नई प्राप्त की हुई जमीन से अच्छी फसल उगा सकें।

कहा जाता है कि पूंजीवादी देशों में बेकारी की समस्या का अनुपात बेहद चौकाने वाला होता जा रहा है, लेकिन समाजवादी देशों में बेकारी की समस्या ही नहीं है। इसका स्पष्ट कारण यह है कि समाजवादी देशों में नियोजित अर्थव्यवस्था पर बल दिया जाता है।

सरकार को चाहिये कि देश में जितने भी बड़े उद्योग हैं, उन्हें राष्ट्रीयकृत कर दे और कृषि सम्बन्धी सुधार करे। छोटी औद्योगिक इकाइयों को लगाने पर जोर दिया जाना चाहिये तथा ग्रामीण नवयुवकों को उन इकाइयों को चलाने हेतु उपयुक्त प्रशिक्षण देने के बाद ऋण की व्यवस्था करनी चाहिये। इस संदर्भ में ग्रेजुएट स्कीम तथा अन्य ऐसी निजी रोजगार योजनाओं को भी अपेक्षाकृत अधिक व्यावहारिक व प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

आज भारत में हड़ताल तथा तालाबन्दी की बीमारी सभी उद्योगों में फैली हुई है। बैंकों में तथा दूसरे कार्यालयों में आए दिन हड़तालें होती हैं जिससे उनका कार्य स्थगित होता रहता है। जनता में एक बार फिर असन्तोष की भावना घर कर गई है। लोगों को इस बात की आजादी है और लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हैं कि वे सामाजिक अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज उठाएं, लेकिन सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह इन समस्याओं का उपयुक्त समाधान करे और हर वर्ष स्कूल-कॉलेज से निकल रहे लाखों-करोड़ों नवयुवकों को रोजगार प्राप्त कराने की कुछ ठोस योजनाएं तैयार करे।

सरकार को शिक्षा-प्रणाली में भी सुधार करना चाहिये ताकि सामाजिक आवश्यकताओं की दृष्टि से वह अधिकाधिक उपयोगी हो सके। जो भी नई शिक्षा-पद्धति तैयार की जाए वह रोजगार व व्यवसायों की दृष्टि से संभावनायुक्त होनी चाहिये। हमें चाहिये कि हम जापान तथा विश्व के विकसित देशों की प्रणाली का अध्ययन करें और अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने व युवकों को तुरन्त रोजगार उपलब्ध कराने में उन्हें आधार बनायें। शिक्षा-पद्धति का एक ऐसा रूप सामने आना चाहिये कि सभी नए पढ़े-लिखे युवकों को अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद रोजगार मिल सके। अगर उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण पहले से ही प्राप्त होगा तो उन्हें उपयुक्त व्यवसायों में खपाना आसान होगा।

अतः सरकार को समस्या के स्थायी समाधान की दृष्टि से प्रयत्नशील होना चाहिये और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रोजगार की नई योजनाएँ अपनानी चाहिये और अपनी गतिविधियां तीव्र करनी चाहिए।

निबंध नंबर :- 05

बेरोज़गारी : समस्या और समाधान

Berojgari – Samasya aur Samadhan

बेकारी की समस्या और अभिप्राय

आज भारत के सामने जो समस्याएँ फण फैलाए खड़ी हैं, उनमें से एक चिंतनीय समस्या है-बेकारी। लोगों के पास हाथ हैं, पर काम नहीं है। प्रशिक्षण है, पर नौकरी नहीं है।

आज देश में प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित दोनों प्रकार के बेरोजगारों की फौज़ जमा है। फैक्ट्रियों, सड़कों, बाजारों में भीड ही भीड है। शहरों में हजारों बेकार मजदूरों के झुंड पर झुंड नज़र आ जाते हैं। रोजगार कार्यालयों में करोड़ों बेकार यवकों के नाम दर्ज हैं। सौ नौकरियों के लिए हज़ारों से लाखों तक आवेदन-पत्र जमा हो जाते हैं।

बेकारी के कारण

बेकारी का सबसे बड़ा कारण है-बढ़ती हुई जनसंख्या। दूसरा कारण है, भारत में विकास के साधनों का अभाव होना। देश के कर्णधारों की गलत योजनाएँ भी बेकारी को बढ़ा रही हैं। गाँधी जी कहा करते थे-“हमारे देश को अधिक उत्पादन नहीं, अधिक हाथों द्वारा उत्पादन चाहिए।” उन्होंने बड़ी-बड़ी मशीनों की जगह लघु उद्योगों को प्रोत्साहन दिया। उनका प्रतीक था-चरखा। परंतु अधिकांश जन आधुनिकता की चकाचौंध में उस सच्चाई के मर्म को नहीं समझे। परिणाम यह हुआ कि मशीनें बढ़ती गईं, हाथ खाली होते गए। बेकारों की फौज़ जमा हो गई। आज के अधिकारी कंप्यूटरों और मशीनों का उपयोग बढ़ाकर रोजगार के अवसर कम कर रहे हैं। बैंक, सार्वजनिक उद्योग नई नौकरियाँ पैदा करने की बजाय अपने पुराने स्टाफ को ही जबरदस्ती निकालने में जुटे हुए हैं। यह कदम देश के लिए घातक सिद्ध होगा। आज भारत को पुनः पैतृक उद्योग-धंधों, व्यवसायों की आवश्यकता

समाधान

प्रत्येक समस्या का समाधान उसके कारणों में छिपा रहता है। यदि ऊपर-कथित कारणों पर प्रभावी रोक लगाई जाए तो बेरोज़गारी की समस्या का काफी सीमा तक समाधान हो सकता है। व्यावसायिक शिक्षा, लघु उद्योगों को प्रोत्साहन, मशीनीकरण पर नियंत्रण, कंप्यूटरीकरण पर नियंत्रण, रोजगार के नए अवसरों की तलाश, जनसंख्या पर रोक आदि उपायों को शीघ्रता से लागू किया जाना चाहिए।

 

निबंध नंबर :- 06

बेरोजगारी की समस्या

Berozgari ki Samasiya

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आज विश्व के लगभग हर एक देश के सामने कुछ समस्याएँ विद्यमान हैं। उन्हीं समस्याओं में से एक है-बेराजगारी की समस्या। कहीं कम तो कहीं ज्यादा, यह समस्या समूचे विश्व में विद्यमान है। भारत जैसे विकासशील देश के सामने तो यह भयंकर रूप में उपस्थित है। कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला यह देश आज जिन गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, उनमे बेकारी की समस्या प्रमुख है लोगों के पास हाथ हैं काम करने की इच्छा है लेकिन काम नहीं है। राजनेताओं के पास लंबे-चौडे वायदे हैं, भविष्य के लिए आकर्षक योजनाएँ हैं परन्तु ये सब जनता को लुभाने के लिए है जिनका प्रयोग चुनाव जीतने या जनता को भ्रमित करने के लिए किया जाता है।

बेकारी या बेरोजगारी की समस्या के कई रूप हैं लोगों की अपनी योग्यता के अनुरूप काम न मिलना, लोगों को अंशकालिक कार्य मिलना, एक ही कार्य में आवश्यकता से अधिक लोगों का कार्यरत रहना, मौसमी काम मिलना-ये सब बेरोजगारी के रूप हैं। आज देश के नगरों में रोजगार कार्यालयों में करोडों बेकार युवक-युवतियों के नाम दर्ज हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

बेकारी की समस्या के अनेक कारण है जिसमें जनसंख्या का तेज गति से बढ़ना सर्वप्रमुख है। आज में जनसंख्या जिस गति से बढ़ती जा रही है उसे देखकर तो लगता है कि बेकारी की समस्या कभी सुलझ ही न पाएगी क्योंकि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में रोजगार प्राप्त करके अवसरों का विकास नहीं किया जा सकता। एक बड़ी औद्योगिक इकाई को खड़ा करने में कई वर्ष लग जाते हैं तब तक उसमें कार्य करने को इच्छुक बेरोजकारी की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

बेकारी की समस्या का दूसरा कारण है-देश की कमजोर अर्थव्यवस्था और विकास के साधनों का अभाव। भारत एक विकासशील देश है। विश्व को उन्नत देशों की तुलना में यह निर्धन देश है। धन की कमी के कारण रोजगार के अवसरों पर त्वरित गति से विकास नहीं किया जा सकता। भारत की अधिकांश परियोजनाएँ शीघ्र पूरी हो सकें। अनेक बार ये योजनाएँ अधूरी ही रह जाती हैं।

सरकारी नीतियाँ भी बेरोजगारी को बढ़ाने में पीछे नहीं है। स्वाधीनता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी हम उन्नत राष्ट्रों की श्रेणी में स्थान नहीं पा सके। हमारे पडोसी चीन को हमसे बाद स्वतंत्रता मिली मगर विकास की दौड में हमसे बहुत आगे निकल गया और हम कछुए की गति से चलते रहे। गांधीजी ने एक बार कहा था।

हमारे देश को अधिक उत्पादन नहीं अधिक हाथों द्वारा उत्पादन करना चाहिए। उनका आश्य था कि बड़ी-बड़ी स्वचालित मशीनों से उत्पादन भले ही बढ़ जाए अधिक हाथों को काम नहीं मिल पाता। इसलिए देश के कुटीर उद्योग कम पूँजी से, छोटे स्थान में, कम लोगों द्वारा शुरू किए जा सकते हैं। आज देश के बड़े-बड़े कारखानों में अनेक लघ उद्योगों को नष्ट कर दिया है तथ उनसे कार्यरत असंख्य लोग बेरोजगार हो गए हैं। कर्नाटक तथा आंध्र तथा तमिलनाडू में अनेक बुनकरों ने बेरोजगारी से तंग आकर आत्महत्या तक की है। फिर सरकार ने विदेशी कंपनियों को भारत में अपने उद्योग लगाने की छूट देकर बची-खुची कसर भी पूरी कर दी है। जो थोड़े बहुत स्वदेशी लघु-उद्योग बचे थे, वे भी तबाह हो गए।

शिक्षित युवक में बाबूगिरी करने की भावना भी बेराजगारी को बढ़ाने में सहायक हुई है। ये युवक हाथ से काम करने में अपना अपमान समझते हैं और सफेदपोश बने रहकर दफ्तरों में थोड़े वेतन पर कार्य करना पसन्द करते हैं। आज की शिक्षा भी रोजगारोन्मुखी नहीं है इसलिए प्रतिवर्ष लाखों शिक्षित बेरोजगार * बढ़ रहे हैं।

बेरोजगारी की समस्या अपराधी वृत्ति को जन्म देती है। – कहानी है-वुभुक्षित किं न करोति पाप’-अर्थात् भूखा व्यक्ति

अपराध नहीं करता। आज देश में जिस प्रकार की अनुशासनहीनता, हिंसा तस्करी, लूटपाट, चोरी, डाका जैसी असामाजिक बुराइयाँ व्याप्त है उनके पीछे कहीं न कहीं बेरोजगारी का हाथ आवश्यक है। छात्रों में असंतोष कर तो सर्वप्रमुख कारण बेरोजगारी ही है।

यद्यपि भारत जैसे विकासशील देश में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या को हल करना सरल नहीं है तथापि जनसंख्या पर रोक लगाकर, कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास करके शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाकर पढ़े लिखे युवकों को कृषि या हाथ से काम करने को प्रोत्साहित करके, विदेशी कंपनियों पर अंकुश लगाकर इस समस्या समाधान में कुछ सफलता मिल सकती है।

 

बेरोजगारी की समस्या

निबंध नंबर :- 07

 

प्रस्तावना

रोजगार का अर्थ है जीवन के भरण-पोषण के लिए काम करना। रोजगार का न मिलना ही बेरोजगारी कहलाती है। हमारे देश में लाखों योग्य और कार्य करने के इच्छुक युवा काम की तलाश में भटक रहे हैं। इससे इनमें असंतोष और हताशा व्याप्त है।

 

कारण

जनसंख्या में तीव्र वृद्धि इस समस्या का प्रमुख कारण है। बेरोजगारी की समस्या का दूसरा प्रमुख कारण है – शिक्षा प्रणाली। हमारी शिक्षा प्रणाली इस तरह की नहीं है कि वह पढ़ाई के दौरान ही विद्यार्थियों को किसी कार्य में दक्ष कर दे, जिससे वह पढ़ाई के उपरांत स्वतः अपने पैरों पर खड़ा हो जावे।

देश में लघु उद्योगों की बुरी हालत ने भी बेरोजगारी को बढ़ाया है। नये नये आविष्कारों के कारण अब मनुष्य का काम मशीनें करने लगी हैं। इससे मानव श्रमशक्ति की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हुई है।

 

दुष्परिणाम

बेरोजगारी की समस्या के कुपरिणाम अब चारों ओर परिलक्षित होने लगे हैं। देश के राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास पर इसका बुरा असर पड़ा है। बेकारी से त्रस्त अनेक युवक प्रायः बेईमानी, भ्रष्टाचार. चोरी-डकैती, लूट-पाट, गुंडागर्दी जैसी समाज विरोधी गतिविधियों के चक्रव्यूह में फँस जाते हैं और समाज के लिए बोझ बन जाते हैं।

बेरोजगारी लोगों को और अधिक गरीब बनाती है, जिससे उनमें मानसिक विकृतियाँ बढ़ती जाती हैं। देश के विकास में बेरोजगारी एक बड़ी बाधा है।

 

निवारण के उपाय

बेरोजगारी की समस्या से निपटना बहुत कठिन कार्य है। इस पर काबू पाने के लिए जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाना होगा। इसके लिये गाँवगाँव छोटे परिवार के महत्व के लिए चेतना जगानी होगी। सैद्धांतिक शिक्षा के स्थान पर रोजगारमूलक शिक्षा प्रणाली लागू करनी होगी।

युवकों में श्रम के प्रति सम्मान और स्वरोजगार के लिये आत्मविश्वास पैदा करना होगा। स्वरोजगार के लिए बैंकों को बेरोजगारों को कम ब्याज पर धन देने की व्यवस्था करनी होगी। गाँवों में कृषि से सम्बन्धित उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। जो माल छोटे उद्योग बना रहे हों, उनके उत्पादन पर बड़े उद्योगों में प्रतिबंध लगाना चाहिये।

 

उपसंहार

भारत जैसे गरीब देश में बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है। सरकार और समाज को प्राथमिकता के आधार पर इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिये। अन्यथा देश अस्थिरता, अराजकता, भ्रष्टाचार और हिंसा के कठिन दौर में घिरता जावेगा।

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