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Hindi Essay on “Asean : Purv ki Aur Dekho” , ”आसियान: ‘पूर्व की ओर देखोे’ ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

आसियान: ‘पूर्व की ओर देखोे’ 

Asean : Purv ki Aur Dekho

 

                                ’पूर्व की ओर देखोे’ नीति का सम्बन्ध ’आसियान’ ये है। आसियान के कुल 24 सदस्य हैं। स्थायी सदस्य हैं-सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, ब्रुनेई, म्यांमार, कम्बोडिया, वियतनाम, फिलीपींस और लाओस। अस्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, चीन, जापान, भारत, कोरिया तथा यूरोपीय यूनियन के देश। पाकिस्तान को भी आसियान का अस्थायी सदस्य इस शर्त पर बनाया गया है कि वह इसके मंच पर कभी द्विपक्षीय मुद्दों को नहीं उठाएगा।

                ’पूर्व की ओर देखोे’- का नारा नरसिम्हा राव सरकार ने दिया जिसका उद्देश्य आसियान देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में मजबूती प्रदान करना था। लेकिन बाद में चलकर ’लुक ईस्ट’ में कई और आयाम शामिल हो गए जैसे- ’बिम्स्टेक’ मुक्त व्यापार समझौता इत्यादि। क्षेत्रफल, जनसंख्या और बाजार के दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान का एक औसत सदस्य देश भारत की तुलना मे कम है। फिर भी नई दिल्ली और बीजिंग से लेकर टोकियो और वाशिंगटन तक सभी आसियान के प्रति आकर्षित हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि सिंगापुर, मलेशिया, फिलींपीस, थाईलैंड और इण्डोनेशिया जैसे इन छोटे और प्रगतिशील देशों ने एकजुट होकर दक्षिण पूर्व एशिया मंे एक ऐसा उन्नत बाजार विकसित कर लिया है कि आज हर विकसित देश आयात या निर्यात के लिए उनकी तरफ खिंचा चला आ रहा है। इसके अलावा आसियान देशों के पास कुल मिलाकर 50 करोड़ की आबादी, 45 लाख वर्ग कि.मी. का क्षेत्रफल, 737 अरब डाॅलर का सकल घरेलू उद्योग तथा लगभग 720 अरब डाॅलर का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार है। इन सारी बातों ने अन्तर्राष्ट्रीय जगत में आसियान को सबसे आकर्षक क्षेत्र बना दिया है।

                दूसरी तरफ भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी, विŸाीय सेवा, फार्मास्युटिकल्स, मनोरंजन और आधारभूत ढांचा क्षेत्र में नई ऊंचाइयां प्राप्त की हैं। इसके अलावा आधुनिक तकनीकी, बढ़ता घरेलू बाजार, व्यापक मानव संसाधन, वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में दक्षता जैसी चीजें भारत को जापान और अमेरिका के बराबर खड़ा कर देती हैं। अतः आसियान और भारत मिलकर अगर आगे बढ़ने का प्रयास करें तो इनके बीच कम से कम 12 अरब अमेरिकी डाॅलर का व्यापार होगा।

                थाईलैंड की पहल पर जून 1987 में बंगाल की खाडी से जुडे देशों को पारस्परिक आर्थिक सहयोग सम्वर्द्धन हेतू ’बिस्टेक’ नामक संगठन की स्थापना की गई। दिसम्बर 1997 में बिस्टेक सदस्य देशों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई, जिनमें म्यांमार को भी इस संगठन में शामिल कर लिया गया तथा इसका नाम बिम्स्टेक कर दिया गया। विदेश नीति से परेशान होकर भारत ने क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग सम्वर्द्धन हेतु बिम्स्टेक को दक्षेस के विकल्प के रूप में तैयार किया तथा नेपाल व भूटान को भी इसमे शामिल करने पर बल दिया। इसको ’पूर्व की ओर देखोे’ नीति भी नाम दे दिया गया। नेपाल व भूटान को फरवरी 2004 में बिम्स्टेक में शामिल कर लिए जाने के बाद इसकी सदस्य संख्या सात हो गई है। नेपाल व भूटान को शामिल करने के बाद बिम्स्टेक नाम अब सदस्य देशों का सूचन नहीं रह गया है। इसलिए जुलाई 2004 में सम्पन्न बैंकाक शिखर सम्मेलन में इसके संक्षिप्त नाम ’बिम्स्टेक’ को बनाए रखते हुए इसका विस्तार कर दिया गया।

                ’बिम्स्टेक’ सदस्य देशों की आबादी 1.3 अरब तथा सकल घेरलू उत्पाद लगभग 250 अरब डाॅलर है। लेकिन इन देशों के बीच आपसी व्यापार बहुत कम है। उम्मीद की जाती है कि बिम्स्टेक द्वारा मुक्त व्यापार समझौता करने के बाद आपसी व्यापार को काफी बढ़ावा मिलेगा। चूंकि ’बिम्स्टेक’ में सार्क और आसियान दोनों के सदस्य हैं, इसलिए बिम्स्टेक इन दोनों संगठनों के बीच पुल का काम भी कर सकता है। लेकिन भारत दोनों के सदस्य हैं, इसलिए बिम्स्टेक इन दोनों संगठनों के बीच पुल का काम भी कर सकता है। लेकिन भारत-थाईलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता अपेक्षाकृत भारत के पक्ष में नहीं भी हो सकता है। क्योंकि थाईलैंड बड़े पैमाने पर किफायती विनिर्माण में बहुत आगे है और वहां शुल्क भारत के मुकाबले बहुत कम है। इसके अलावा थाईलैंड के खुले बाजार में दूसरे देशों से मुक्त व्यापार समझौते के तहत आया हुआ माल भारत के बाजार में प्रवेश नहीं कर सकता है। इस आंशका से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात होने वाली वस्तुओं पर 40ः स्थानीयता की शर्त लगाई गई है।

                ’पूर्व की ओर देखोे’ नीति के पहले चरण मे एशिया के साथ वाणिज्यिक एवं संस्थानात्मक संबंधों को स्थापित एवं विकसित करने पर अधिक बल दिया गया। जबकि इस  नीति के दूसरे चरण मे भारत राजनीतिक साझेदारी, रोड़ एवं रेल के द्वारा भौतिक संयोजन, मुक्त व्यापार व्यवस्था तथा रक्षा सहयोग पर अधिक बल दे रहा है। भारत ने पूर्वाेŸार राज्यों के विकास की जो रणनीति बनाई थी उसके लिए ’पूर्व की ओर देखोे’ नीति ने एक नया विकल्प उपलब्ध करा दिया है। इस क्षेत्र में मुक्त व्यापार तथा एशिया के अन्य देशों के साथ भौतिक संयोजन उपलब्ध हो जाने से कई तरह के लाभ की संभावना का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

                ’पूर्व की ओर देखोे’ नीति के दूसरे चरण मंे इसका विस्तार करके इसमें आॅस्ट्रेलिया से लेकर चीन तक को शामिल कर लिया गया है। साथ ही इन देशों का इरादा चीन के आर्थिक विकास का लाभ पूरे उपमहाद्वीप को उपलब्ध कराने में कोलकता को लीवर की तरह इस्तेमाल करने का है। बिम्स्टेक के सदस्य देशों में कोलकता की स्थिति काफी महत्वपूर्ण है। भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड और श्रीलंका के केन्द्र में यह स्थित है। सार्क और बिम्स्टेक के माध्यम से अगर मुक्त व्यापार व्यवस्था स्थापित हो जाती है तो इसका लाभ न केवल कोलकता को मिलेगा बल्कि उपमहाद्वीप के सम्पूर्ण पूर्वी क्षेत्र के विकास में भी यह मददगार साबित होगा। यही वजह है कि बीजिंग भी चाहता है कि इसके तीव्र विकासशील दक्षिण-पूर्वी राज्य का संबंध भारत, म्यामांर और बांग्लादेश के साथ हो जाए। भारत चीन के इस प्रयास के प्रति काफी अन्यमनस्क रहा है। लेकिन अब समय आ पहुंचा है जब चीन और भारत के बीच सिक्किम तथा उŸारी बंगाल से होकर व्यापार की अनुमति भारत दे सकता है।

                सिक्किम, तिब्बत के साथ व्यापार मार्ग खोलने के लिए केन्द्र पर दबाव भी बना रहा है। हालांकि इस मामले में पश्चिम बंगाल शांत है। अभी तक उत्तरी बंगाल और इसका संकरा भौतिक स्थल जिससे होकर पूर्वाेतर के राज्य भारत से जुड़े हुए हैं काफी संवेदनशील देखा जाता रहा है। लेकिन अब कोलकता तथा नई दिल्ली में ऐसे राजनीतिक दबाव डाले जा रहे हैं कि सिलिगुड़ी और उत्तरी बंगाल के कलिमपांेग का भारत, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और चीन के बीच व्यापार एवं आवागमन की धुरी के रूप मे रूपांतरण कर दिया जाए। कोलकता तिब्बत के लिए सबसे नजदीकी पोर्ट है तथा चीन ल्हासा तक रेल लाइन बिछाने का कार्य कर ही रहा है जो कि 2007 तक पूरा हो जाएगा। अतः कोलकता, चीन के लिए आंतरिक क्षेत्र की भूमिका अदा कर सकता है।

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