Home » Languages » Hindi (Sr. Secondary) » Hindi Essay on “Aitihasik Sthal ki Yatra” , ”ऐतिहासिक स्थल की यात्रा” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

Hindi Essay on “Aitihasik Sthal ki Yatra” , ”ऐतिहासिक स्थल की यात्रा” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

ऐतिहासिक स्थल की यात्रा

Aitihasik Sthal ki Yatra

Best 4 Essays on “Aitihasik Sthal ki Yatra”

निबंध नंबर :- 01

भारत के हर प्रदेश और क्षेत्र में अनेकानेक ऐतिहासिक स्थल बिखरे पडे हैं। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक के इलाके में प्राचीन मन्दिरों और किलों के खण्डहर स्थान-स्थान पर देखे जा सकते हैं। कश्मीर का मार्तण्ड मंदिर नवीं शताब्दी में बना था। आज वह खण्डहरों के बीच स्थित है और हजारों की तादाद में लोग रोज उसे देखने जाते हैं।

मैंने अपने मन में इलाहाबाद का किला देखने की बात तय की। यह किला आज भी इलाहाबाद (यू.पी.) में मौजूद है, हालांकि उसकी अधिकांश शान धुंधली पड़ चुकी है। इस किले को सन् 1583 में अकबर ने बनवाया था और अपने समय में बनावट व खूबसूरती में यह बहुत सुन्दर माना जाता था। यह आगरा वाले किले से अधिक सुन्दर है। इसकी बनावट त्रिकोण जैसी है, क्योंकि यह गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। इसकी लाल पत्थर की दीवारें आगरे के किले जैसी खूबसूरत लगती हैं। इस किले में तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं और उनके ऊपर काफी ऊंची मीनारे हैं। इनमें से एक का मुंह पूर्व दिशा में गंगा की ओर है और दूसरे का दक्षिण दिशा में यमुना नदी की ओर। मुख्य प्रवेश द्वार का रुख शहर की ओर है और उसकी नक्काशी भी आगरा के किले जैसी है। यह किला पूर्वी इलाके में मुगल साम्राज्य के विस्तार का प्रतीक था और इसलिये पूर्वी सीमान्त पर निर्मित कराया गया था। उन दिनों इलाहाबाद का महत्त्व बहुत अधिक था।

जैसे ही मैंने किले में प्रवेश किया, दुर्भाग्यवश, मैंने देखा कि किले की छत का अधिकांश हिस्सा पहले से ही गायब था और उसकी अन्तर्सज्जा पहले जैसी नहीं रह गई थी। किले के मुख्य द्वार के सामने खड़े प्रसिद्ध अशोक स्तम्भ को भी मैंने देखा, जिससे यह प्रकट होता था कि किसी समय इलाहाबाद मगध साम्राज्य का एक हिस्सा था। मैंने स्तम्भ पर उभरी लिखावट को भी पढ़ने की कोशिश की। उसके ऊपर मगध सम्राट समुद्रगुप्त का यशवर्णन काव्यांजलि के तौर पर उभरा हुआ लिखा है।

मुझे पातालपुरी मन्दिर भी देखने को मिला जोकि प्रयाग का दूसरा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष है। यह पूर्व-मुस्लिम काल’ के प्राचीनतम भवनों में से एक है। यह मन्दिर नदी की ओर के मुख्य प्रवेश द्वार के निकट शस्त्रागार की उत्तरी दीवार के पास स्थित है। यह मन्दिर पृथ्वी के धरातल से नीचे है और किले की ऊंचाई बहुत अधिक है। अतः उसे काफी ऊंचाई तक उठाना पड़ा।

इसके बाद मैंने अक्षयवट वृक्ष को देखा। कहते हैं कि पहले लोग इसी वट वृक्ष से लटक कर अपनी कामनाओं की पूर्ति हेतु कुएं में कूदते थे, किन्तु अकबर ने इस परम्परा को बन्द करा दिया था। वहां सबसे सुन्दर स्थान मुझे वह मण्डप लगा जिसमें मुगल सेनाध्यक्ष का निवास था। उसके स्तम्भ आज भी देखने में बड़े सुन्दर लगते हैं। उनकी बनावट बड़ी ही शानदार है।

किन्तु किले का वास्तविक वैभव अब काफी कम हो गया है, क्योंकि अंग्रेजों ने एक स्कूल के नाम पर इसका बहुत-सा हिस्सा तोड़ दिया था। अतः मुख्य प्रवेश द्वार की ऊपरी मंजिलें पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी और उसी कारण से अन्दर की मीनाकारी भी बिल्कुल बेकार हो गई थी। पुराने महल को अंग्रेजों ने ही एक शस्त्रागार में बदल दिया था।

उपर्युक्त ऐतिहासिक स्थल देखने के बाद मैं त्रिवेणी नदी के तट पर आया और उसमें स्नान किया। साथ-साथ गंगा लहरी स्तोत्र का पाठ भी करता रहा।

अगर इलाहाबाद के पुराने किले की तुलना लाल किले से की जाये तो कहा जा सकता है कि लाल किले का प्राचीन वैभव अभी भी काफी सीमा तक बरकरार है, जबकि इलाहाबाद किले का रूप खण्डहरों में बदल गया है और अपनी उपेक्षा की रामकहानी कहता प्रतीत होता है।

निबंध नंबर :- 02

एक ऐतिहासिक स्थान की यात्रा

नई जगहों की यात्राएँ हमेशा ही मनोरंजक तथा जानकारी प्रदान करने वाली होती हैं। यह हमारी जानकारी में वृद्धि करती हैं तथा हमारे अनुभव को बढ़ाती हैं। भारत ऐतिहासिक स्थानों की धरती है। दुनिया के हर कोने से लोग इन्हें देखने आते हैं। आगरा का ताजमहल इनमें से एक है जो कि सबके लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मैंने तथा मेरे दोस्तों ने वहां जाने का निर्णय लिया।

हम रेल द्वारा दिल्ली पहुंचे। दिल्ली से बस लेकर हम आगरा गए। हम शाम को वहां पहुच। हम ताजमहल के नजदीक ही एक होटल में रुके। हमने वहां अपना सामान रखा और जमहल देखने चले गए। भाग्यवश उस दिन चांदनी रात थी। ताज महल का नजारा बहुत खूबसूरत लग रहा था। यह सफेद संगमरमर से बना हुआ है। रात को पत्थर की दीवारें चमक रहा थी। यात्रियों की बहुत भीड़ थी। उनमें अनेक विदेशी भी शामिल थे.

ताज मुग़ल कला का एक नमूना है। इसे शाहजहां ने अपनी प्रिय रानी मुमताज महल की याद बनवाया था। इसे पूरा होने में 20 से भी अधिक वर्ष लगे थे। यह यमुना नदी के तट पर बना हुआ है। इस पर करोड़ों रुपये खर्चे गए थे। इसमें शाहजहां तथा मुमताज की कब्रें बनी हुई हैं। यह सच्चे प्यार की निशानी है। उसे देखने के बाद हम होटल वापिस आ गए। हमने रात होटल में ही गुजारी।

अगले दिन हम लाल किला देखने गए। यह ताज से कुछ ही दूरी पर स्थित है। यह भी शाहजहां द्वारा बनवाया था। जब शाहजहां का बेटा औरंगज़ेब कैद में था तो उसने अपने जीवन के आखिरी पल यहीं बिताए थे। हम फतेहपुर सिकरी देखने भी गए। ये इमारतें तथा स्थान हमें मुग़लकाल काल का स्मरण करवाती हैं। इन सब स्थानों को देखने के बाद हम एक हफ्ते बाद घर लौटे. यह यात्रा बहुत फलदायक थी।

निबंध नंबर :- 03

ऐतिहासिक स्थान (जलियांवाला बाग)

Aitihasik Sthal ki Yatra Jaliyawala Bagh

 

इतिहास की किसी महान् घटना से जुड़ कर साधारण सा स्थान भी ऐतिहासिक बन जाता है। उसकी महत्ता किसी तीर्थ से कम नहीं रहती। श्री गुरु रामदास जी की पवित्र नगरी अमृतसर में स्वतन्त्रता आन्दोलन का एक ऐतिहासिक पडाव जलियां वाला बाग है। ऐसे ही स्थानों के सम्बन्ध में किसी कवि ने कहा:

 

शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा

जलियांवाला बाग आज जिस रूप में है, 1919 में ऐसा नहीं था। चौक फव्वारा की ओर से सीधे जाने पर संकरे से बाज़ार में संकरी सी गली अन्दर जाती थी। चारों और मकानों में घिरा हुआ बीच में एक खुला स्थान था। यह आज की तुलना में उस समय लगभग पांच फुट गहरा था। बाएं हाथ एक कुआं था और कुएं के सामने की ओर दाएं हाथ एक शिव मंदिर था जिस के साथ पीपल का एक पेड़ था। बाग केवल कहने को ही था। दरबार साहिब भी पास ही दाईं ओर स्थित है।

सन् 1919 की वैशाखी की घटना है। उस दिन जलियांवाला बाग में एक बहुत बड़ी जनसभा का आयोजन किया गया था, उसमें बड़े बड़े नेताओं ने भाषण देने थे। शाम का समय था। लगभग बीस हज़ार लोग उपस्थित थे। भाषण आरम्भ हो गए थे। तभी जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ बाग में आ पहुंचा । उसने आते ही सभा भंग करने का आदेश दिया । कानून का पालन करते हुए सभा भंग कर दी गई किन्तु एक ही तंग रास्ते से इतने लोगों का तत्काल बाहर निकल जाना असम्भव था। उसने गोली चलाने का आदेश तीन मिनट बाद ही दे दिया । गोली चारों ओर घमा कर चलाई गई। भागते हुए लोगों पर भी गोलियां बरसाई गई। डायर के सैनिकों के पास सोलह सौ राउण्ड थे, उन्होंने वे सारे के सारे ही दाग दिए।

इस गोली काण्ड में मरने वालों की सही संख्या का कोई पता नहीं । अनेक लोग गोलियों का शिकार हुए । अनेक भगदड़ में कुचले गए और कई व्यक्ति गोलियों से बचने के लिए कएं में कूदे और वहां डूब कर मर गए। जो घायल व्यक्ति बच सकते थे उनको किसी प्रकार की प्राथमिक सहायता दी ही नहीं गई। अनुमान है मरने वालों की संख्या हज़ारों में थी। रात के समय चारों ओर से कराहने की आवाजे गंजती थी। कुत्ते लाशों को नोचते थे। सहायता करने वाला कोई न था। अंग्रेजी राज्य में सब कुछ ठीक-ठाक था।

जनरल डायर फौजी होने के कारण हर चीज़ का इलाज गोली समझता था। उसका विचार था कि अब हिन्दुस्तानियों को सबक सिखा दिया गया है। अब वे आज़ादी की बात नहीं करेंगे।

इस हत्याकाण्ड के विरुद्ध सारे देश में हाहाकार मच गई। गांधी जी और अन्य बड़े नेता इस अत्याचार को सुन कर चुप न रह सके । जगह जगह इसके विरुद्ध भाषण हुए, लेख लिखे गए। परिणाम यह हुआ कि सारे देश में क्षोभ और असंतोष की एक लहर उठ खड़ी हुई। शासन ने भी दमनचक्र तेज़ कर दिया । अमृतसर तथा पंजाब के अन्य कई शहरों में मार्शल ला लगा दिया गया। मार्शल. ला के आधीन लोगों को पेट के बल रेंगने पर विवश किया गया, कोड़ों से पीटा गया। लगभग तीन सौ निरपराध व्यक्तियों को पकड़ कर मनमानी सज़ाएं सुनाई गई। 51 व्यक्तियों को फांसी और 46 व्यक्तियों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई। अनेक व्यक्तियों को तीन से लेकर दस वर्ष तक का कठोर कारावास दे दिया ।

लोगों के आंसू पोंछने के लिए सरकार ने जांच पड़ताल के लिए एक कमेटी नियुक्त कर दी। इस कमेटी ने डायर को निरपराध और निहत्थी जनता को दोषी ठहराया। ठीक है, बलवान मारे और रोने भी न दे । कांग्रेस के नेताओं ने भी अपनी ओर से जांच की। सारा दोष डायर का ही था।

इस हत्याकाण्ड ने लोगों को और भी सचेत कर दिया । मन ही मन सब सोचने लगे कि ऐसे अत्याचारी राज्य की समाप्ति होनी ही चाहिए । शहीदों का लहू व्यर्थ नहीं जाता । रंग ला कर ही रहता है।

कांग्रेस ने एक ट्रस्ट बना कर जलियां वाला बाग खरीद लिया और 1947 तक अमृतसर में होने वाली स्वाधीनता संग्राम सम्बन्धी सभी सभाएं प्रायः वहीं होती रहीं । पं.नेहरू,सुभाष चन्द्र बोस,श्री राजेन्द्र प्रसाद,मदन मोहन मालवीय, भोलाभाई देसाई,डॉ.खान साहिब,सहगल, ढिल्लों,शाहनवाज़ आदि सभी विभूतियों ने शहीदों की इस धरती की वन्दना की।

अब जलियाँ वाला बाग को भरती डाल कर ऊँचा करवा दिया गया है। बीच में लाल पत्थर का एक स्तम्भ है जिसे ‘स्वतन्त्रता की लौ’ के रूप में बनाया गया है। दाएं बाएं हाथ लाल पत्थर के ही बरामदे बनाए गए हैं। डायर की गोलियों के निशान अभी भी चारों ओर के मकानों की दीवारों पर कुएं की ओर शिव मंदिर की दीवार पर सुरक्षित हैं। अमृतसर आने वाला हर पर्यटक जलियां वाले बाग का दर्शन अवश्य करता है।

अभी भी हर वर्ष वैशाखी वाले दिन यहां शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। दूर दूर से लोग आते हैं। सभी दलों के नेता एवं विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि “स्वतन्त्रता की लौ” पर पुष्प चढ़ाते हैं। पोलीस की ओर से सलामी दी जाती है और दो मिनट का मौन धारण किया जाता है। जलियांवाला बाग देश के शहीदों का राष्ट्रीय मंदिर है।

निबंध नंबर :- 04

किसी ऐतिहासिक स्थान की यात्रा

Kisi Aitihasik Sthan Ki Yatra

प्रस्तावना – प्राचीन काल से ही मानव के हृदय में नये-नये स्थानों की यात्रा करने की लालसा रही है। वह अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त कर अपने ज्ञान भंडार को और बढ़ाने का प्रयास करता रहा है। मैं भी अपनी इस मानवीय प्रवृत्ति को न दबा सका।

और एक दिन कुछ मित्रों को लेकर एक ऐसे स्थान की यात्रा का विचार किया, जिसका ऐतिहासिक महत्व बेजोड़ है और वह स्थान है – आगरा का ताजमहल।

ताजमहल विश्व के आठ आश्चर्यों में से एक है। ताजमहल भारतीय स्थापत्य कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। इस भव्य इमारत का निर्माण लगभग चार शताब्दी पूर्व मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी पत्नी मुमताज महल की स्मृति में कराया था।

यात्रा – शाला की वार्षिक परीक्षायें समाप्त हुई। हम सभी ने आगरा जाने वाली ट्रेन का आरक्षण करा कर सोमवार का दिन प्रस्थान के लिए निश्चित किया। ट्रेन के समय पर हम सभी स्टेशन पहुंच गये। प्लेटफार्म का दृश्य देखने ही लायक था। कहीं से चाय-पान तो कहीं से ठंडा-गरम, चना-मूँगफली की आवाज आ रही थी। ट्रेन आई।

हम सभी ने अपने-अपने निर्धारित स्थान ग्रहण किये। रास्ते का सफर आपसी गपशप, देश-विदेश की चर्चा, पत्रिकाओं के पन्ने पलटने में बीता। दूसरे दिन सुबह हम लोग आगरा पहुँच गये। वहाँ एक होटल में ठहरे और तैयार होकर ताजमहल देखने पहुँच गये।

ताजमहल की स्थिति – ताजमहल आगरा नगर में पुण्य सलिला यमुना के किनारे स्थित है। इस ऐतिहासिक भवन का प्रवेश द्वार अत्यंत आकर्षक है। प्रवेश-द्वार से भवन के भीतर प्रवेश होने पर सुन्दर फव्वारे एवं मनोहर उद्यान दृष्टिगोचर होते हैं। उद्यान के सामने एक विशाल चबूतरे पर यह भव्य प्रासाद स्थित है। इसके चारों ओर अत्यंत विशाल गगनचुंबी मीनारें हैं। प्रवेश द्वार पर कुरान की आयतें अंकित हैं।

इस सुन्दर इमारत के निर्माण में देश के अनेक उत्कृष्ट शिल्पकारों का क्रियात्मक योगदान रहा है। शाहजहाँ द्वारा निर्मित इस ऐतिहासिक भवन के निर्माण में सहस्रों मुद्राएँ खर्च हुईं एवं हजारों कारीगरों का परिश्रम समाहित का है। लगभग 20 वर्षों के अथक परिश्रम के पश्चात् विश्व के इस ऐतिहासिक स्मारक का निर्माण हुआ। मुमताज महल की पावन स्मृति का प्रतीक एवं शाहजहाँ एवं मुमताज महल के दाम्पत्य-प्रेम की यह निशानी आज भी समस्त विश्व के आकर्षण का केन्द्र बनी चाँदनी रात में ताजमहल का दृश्य वर्णनातीत रहता है। पुण्य सलिला यमुना की विशाल तरंगों के मध्य ताजमहल का प्रतिबिंब पूर्णिमा की चाँदनी के समय देखते ही बनता है।

ताजमहल के आंतरिक भाग में स्थित शाहजहाँ एवं मुमताज महल की समाधि जीवन की क्षणभंगुरता की ओर दर्शकों का ध्यान आकृष्ट करती हैं। शाहजहाँ एवं मुमताज महल की कब्रों पर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं। संगमरमर पर बेल बूटे बने हुए हैं तथा पच्चीकारियाँ की गई हैं। ताजमहल का गुम्बज 375 फीट ऊंचा है।

उपसंहार – ताजमहल भारतीय स्थापत्य कला की सर्वोत्कृष्ट कृति है; विश्व के आठ आश्चर्यों में से एक है। शाहजहाँ एवं मुमताज महल के पावन प्रेम का प्रतीक है। विश्व के पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।

सचमुच ताजमहल को देखकर मन आनंद के सागर में हिलोरें लेने लगता है। यात्रा समाप्त कर दूसरे दिन हम लोग अपने घर आ पहुँचे, परंतु यात्रा का वह आनंद भुलाया न जा सका। हमारी वह एक अविस्मरणीय यात्रा थी।

About

The main objective of this website is to provide quality study material to all students (from 1st to 12th class of any board) irrespective of their background as our motto is “Education for Everyone”. It is also a very good platform for teachers who want to share their valuable knowledge.

Leave a Reply

Your email address will not be published.