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Hindi Essay, Moral Story “Ab pachtaye hot kya, jab chidiya chug gai khet” “अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियां चुग गई खेत” Story on Hindi Kahavat

अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियां चुग गई खेत

Ab pachtaye hot kya, jab chidiya chug gai khet

एक किसान परिवार था। थोड़ी खेती थी। किसानिन बहुत मेहनतिन थी। किसान बहुत आलसी था। जैसे-तैसे किसानिन ने कह-सुनकर किसान से खेत जुतवा लिए थे। जब खेत में फसल के अंकुर फूटे और खेत में से छांट-छांटकर घास काटने का समय आया, तो किसान नदारद रहने लगा। वह गांव के कुछ निकम्मे लोगों की सोहबत में पड़ गया। किसानिन ने पूरे-पूरे दिन लगकर खेतों की घास को काटकर निराई की।

घर में किसान की बूढ़ी मां थी, जो केवल घर में झाड़ू लगा लेती थी और इधर-उधर पड़ी हुई चीजों को सही जगह रख देती थी। किसानिन ही सुबह-शाम खाना बनाती थी। बर्तन मांजना, कपड़े धोना और पानी भरना अकेली किसानिन को ही करना पड़ता था। थोड़ा-बहुत कहने-सुनने पर कभी-कभी किसान थोड़ा पानी भरवा देता था।

जब खेत के पौधे बड़े होने लगे, तो खेत में चार बल्लियां गाड़कर एक मचान बना दिया। उस पर बैठा-बैठा खेतों को देखता रहता और उसी पर लेटा रहता। किसानिन भी समय-समय पर देखभाल करती रहती।

कुछ दिन बाद खेत में बालियां आने लगीं। बालियों में दाने बनने लगे और देखते-देखते बालियों के ड़ाने पकने लगे। शुरू के दिनों में किसानिन ने बहुत मेहनत की थी। अब किसान की बारी थी। किसानिन ने खेत के मचान पर एक कनस्तर टांग दिया था। उसे बजाने के लिए एक डंडा भी वहां रख दिया था।

किसान खेत की रखवाली के लिए घर से जाते समय पहले राम की चौपाल पर ताश खेलने बैठ जाता था। एक-दो घंटे बैठने के बाद वह खेतों पर जाता और मचान पर जाकर लेट जाता। लेटते ही नींद आ जाती। जब आंख खुलती, तो थोड़ा कनस्तर बजाता जिससे खेत में बैठी हुई चिड़ियां उड़ जाती।

जैसे ही खेत पकने की स्थिति में आया, वैसे-वैसे वह चौपाल में ताश खेलने में अधिक समय लगाने लगा। उसके खेत पर चारों तरफ की उड़ाई हुईं चिड़ियां आकर बैठने लगीं और दानों को चुन-चुनकर खाने लगीं।

इस बीच किसानिन गर्भावस्था की उस स्थिति में पहुंच गई थी कि खेतों पर जाना, ऊंची-नीची जगहों पर चलना, सब कुछ बंद हो गया था। अब फसल की रखवाली पूरी तरह से किसान के ऊपर आ पड़ी थी। उधर चिड़ियां फसल के दानों को जमकर चुगती रहतीं। दिन चढ़े उठता, तो खेतों की ओर घूमता हुआ चला आता। जब फसल कटने का समय आया, तो किसानिन के कहने पर गांव के दो आदमियों को लेकर किसान फसल काटने पहुंचा। साथ में गए आदमियों ने फसल देखी और सोच में पड़ गए। उसमें से एक ने कहा, “भैया, इन बालियों में दाना एक भी नहीं है। इस फसल में कुछ नहीं निकलने वाला। तुमको हमारी मजदूरी और देनी पड़ेगी। नहीं तो बाद में कहोगे कि मैं कहां से दूं। इसमें तो कुछ निकलेगा ही नहीं।

“दांय चलाने के बाद भूसा ही मिलेगा। घर में पूछ लेना। सोच-विचार कर लेना। हम चलते हैं।” इतना कहकर दोनों आदमी चले आए।

उस किसान का चेहरा फक्क-सा रह गया। सूखा-सूखा-सा मुंह लटकाए घर की ओर चल दिया। वह रोता-सा मुंह बनाए किसानिन के पास जा पहुंचा। वहां पहुंचकर उसने रोना शुरू कर दिया। किसानिन साहसी औरत थी। जो उससे मजदूर आदमियों ने कहा था, उसने अपनी पत्नी को सब कुछ बता दिया था और किसान रो-रोकर अपनी गलतियों की क्षमा मांगता रहा, पछताता रहा। किसानिन बहुत गंभीर होकर अपने पति के आंसू पोंछते हुए बोली-

अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियां चुग गई खेत।’

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