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Hindi Essay, Biography on “Maharana Pratap”, “महाराणा प्रताप” Complete Hindi Nibandh for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

महाराणा प्रताप

Maharana Pratap

प्रस्तावना : राष्ट्रपुरुष महाराणा प्रताप ने उस समय स्वतंत्रता-स्वाधीनता का एक महान् आदर्श स्थापित किया था जब मुग़ल साम्राज्य के बढ़ते वर्चस्व के सामने भारत के सभी छोटे-बड़े राज्य नतमस्तक होते जा रहे थे। आपने तरह-तरह के कष्ट सहते हुए, त्याग और बलिदान की कठिन राहों पर चलते हुए, अपना मस्तक गर्व से उन्नत रखा था तथा आने वाली पीढियों का मार्ग प्रशस्त किया था। इसीलिए आप स्वतंत्रता के अनन्य पुजारी कहलाए थे।

वंश परिचय व घोषणा : राष्ट्रपुरुष महाराणा प्रताप महाराणा संग्राम सिंह के पोते और महाराणा उदय सिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे। अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के प्रमुख सरदारों के बल पर आपने मेवाड़ का राजसिंहासन प्राप्त किया था। आपने मेवाड़ के काँटों से भरे ताज को स्वीकार करते हुए भरी सभा में घोषणा की थी, “जब तक मैं सम्पूर्ण मेवाड़ को अपने राज्य का अंग नहीं बना लेता, मुगल दासता से स्वतन्त्र नहीं करा लेता, तब तक मैं न तो राजभवन में रहूँगा, न राजसी ताज और वेशभूषा धारण करूगा, न मैं चाँदी – सोने के बर्तनों में खाऊँगा और न पलंग शयन ही करूगा। झोंपड़ी में रह कर मिट्टी के बर्तनों में रूखा-सूखा खाकर निरन्तर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करता रहूँगा।”

हल्दी घाटी का युद्ध : आपने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार न कर उससे लोहा लेने के लिए अरावली पर्वत माला के जंगलों की शरण ली थी। वहाँ पर भी मुगल सेनाएँ आपका निरन्तर पीछा करती रही थीं । आपने हल्दी घाटी के मैदान में मुगल सेना का सामना किया। उसका नेतृत्व शहजादा सलीम कर रहा था। जोधपुर नरेश मानसिंह उसे सहयोग दे रहा था। घमासान युद्ध हुआ। आप घायल हो गए। विजय की आशा न रही । तब प्रमुख सरदारों के परामर्श पर घायलावस्था में आपको रणभूमि से पलायन करना पड़ा। इस युद्ध और भागमभाग में आपका प्रिय घोड़ा चेतक भी घायल होकर दम तोड़ गया। तब अनुज शक्ति सिंह के घोड़े पर सवार होकर ही युद्धभूमि से दूर सुरक्षित स्थान पर पहुँच सके थे।

छापामार युद्ध : आर्थिक स्थिति खराब होने पर भी, जंगली कंदमूल खाकर और कभी भूखे-प्यासे रह कर भी मुग़लों से संघर्ष की तैयारी करने लगे। एक दिन जब घास-फेंस से बनी रोटी का टुकड़ा। भी एक जंगली बिलाव उनके बच्चे के हाथ से छीन कर ले गया और वह रोटी-रोटी कहता बिलखने लगा तब आप कमजोर पड़ कर मुग़ल सम्राट अकबर को संधि के लिए पत्र लिख बैठे; किन्तु मुगल सम्राट के दरबारी कवि पृथ्वीराज के कारण वह क्षणिक दुर्बलता दूर हो गई। उधर अपने दानवीर सचिव भामाशाह से अपार धन-सम्पत्ति पाकर सैनिक एकत्रित करने लग गए। तब आपने छापामार युद्ध की विधि से मुगलों के छक्के छुड़ाने शुरू कर दिए। मुगल सम्राट अकबर ने जब देखा। महाराणा प्रताप को हराना सम्भव नहीं, तो उसने मुगल सैनिकों को। युद्ध बन्द करने का आदेश दे दिया। इस समय तक महाराणा प्रताप। ने मेवाड़ का अधिकांश पराधीन भाग स्वतंत्र करा लिया था।

उपसंहार : निरन्तर संघर्ष व जंगलों में भूखे-प्यासे फिरते रहने से आप का स्वास्थ्य भी जवाब दे गया था। आपने अंतिम समय में प्रमुख सरदारों के सामने अपने पुत्र अमरसिंह से दु:खद स्वर में कहा था, “मेरा छोड़ा अधूरा काम हर मूल्य पर पूर्ण होना चाहिए ।” इस प्रकार आप का जीवन स्वतंत्रता की एक सुलगती मशाल बन कर राष्ट्र के लिए समर्पित रहा था।

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