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Hindi Essay on “Aprabhavi Bal Majduri Kanoon”, “अप्रभावी बाल मजदूरी कानून” Complete Paragraph, Nibandh for Students

अप्रभावी बाल मजदूरी कानून

Aprabhavi Bal Majduri Kanoon

संकेत बिंदुबाल मजदूरी नोटिफिकेशनसरकार में इच्छा शक्ति का अभावबाल मजदूरी की रोकथाम के उपाय

10 अक्टूबर, 2006 को सरकार ने बाल मजदूरी (प्रोहिबेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 1986 के नोटिफिकेशन का जो नाटक किया, उसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति का घोर अभाव दिख रहा था। एक तो इस कानून को लागू करने के लिए खतरनाक उद्योगों की सूची बनाने में ही छह-सात साल लगा दिए और फिर जो सूची बनाई, वह भी आधी-अधूरी रही। सूची को आधा-अधूरा इस आधार पर कहा जा सकता है कि जो उद्योग वास्तव में खतरनाक हैं, जिनमें काम करते रहने से बाल मजदूरी की प्रथा पर कोई रोक मुमकिन नहीं है, वे उद्योग इस लिस्ट से गायब हैं। इस कानून में पहली गड़बड़ तो तब हुई जब इसमें प्रोहिबेशन एंड रेगुलेशन जैसी शर्त जोड़ी गई। अरे भाई, बाल मजदूरी ही गलत है, उसके रेगुलेशन की बात कहाँ से आ गई ? आपको केवल बाल मजदूरी पर रोक लगानी थी, पर आपने तो उसके नियम की व्यवस्था बना दी। कह दिया कि अगर कोई बच्चा परिवार का हिस्सा बनकर काम करता है, तो वह बाल मजदूरी नहीं है। इस तरह से तो आपने बाल मजदूरी को वैध ही ठहराया है। दूसरी अहम् बात यह है कि जिन उद्योगों को खतरनाक श्रेणी में रखा जाना था, उन्हें इस लिस्ट में नहीं जोड़ा गया। जैसे कि कालीन उद्योग, खदान और ढाबे। आप कहेंगे कि चाय के ढाबे खतरनाक उद्योग कैसे हो गए, तो जो काम-धंधे बच्चों को शिक्षा से दूर कर रहे हैं, वे सभी खतरनाक हैं। हमारे देश में 6-14 वर्ष के 10 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। वे अगर स्कूल में नहीं हैं, तो जाहिर है कि वे कहीं मजदूरी कर रहे हैं। वे या तो खेतों में काम कर रहे हैं या फिर निर्माण क्षेत्र में, ईट-भट्टों पर काम कर रहे हैं। बाल मजदूरी पर रोकथाम अफसरशाही के भरोसे नहीं हो सकती। शिक्षा ही एकमात्र तरीका है, जो इस कुप्रथा पर अंकुश लगाएगी। अफसोस इसका है कि शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की बात संविधान संशोधन के बावजूद अटकी हुई है, उसका कानून नहीं बनाया जा रहा है। इसीलिए यह कहा जा सकता है कि कमी राजनीतिक इच्छा की है।

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