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Gharelu Hinsa “घरेलू हिंसा” Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 and Graduate Students.

घरेलू हिंसा

Gharelu Hinsa

 

“पत्नी, दुर्भाग्यवश चाहे कितने भी निष्ठुर अथवा क्रूर पति के साथ विवाह बंधन में बंधी हो, हालांकि वह यह जानती हो कि उसका पति उससे नफरत करता है, हालांकि पति को उसे यातना देने में प्रतिदिन आनंद आता हो, फिर भी पत्नी उससे घृणा न करना असंभव समझती हो- वह उससे कुछ भी दावा कर सकता है तथा मानव को दी जाने वाली निकष्टतम यातनाएं उसे दे सकता है जोकि उसकी अभिरूचियों के विपरीत पाशविक यातनाओं के रूप में होती हैं।” जान स्टुअर्ट मिल

उपर्युक्त पंक्तियां ऐसी निर्दयता प्रदर्शित करती हैं जिसे विश्वभर में प्रत्येक तीन महिलाओं में से एक महिला को अपने घरों में अपने पति, पिता, भाई तथा चाचा के हाथों सहन करना पड़ता है।

घरेलू हिंसा का वर्णन ऐसी स्थिति के रूप में किया जा सकता है जब किसी रिश्तेदारी में कोई एक वयस्क दूसरे पर नियंत्रण करने के लिए शक्ति का दुरूपयोग करता हो। यह हिंसा तथा अन्य प्रकार के दुर्व्यवहार के जरिए संबंध में नियंत्रण एवं भय पैदा करता है। मूल रूप से यह शक्ति का दुरूपयोग है। दुर्व्यवहार करने वाला, पीड़ित व्यक्ति को सुविचारित धमकियों, भय तथा शारीरिक हिंसा द्वारा यातना देता है एवं नियंत्रित करता है। हालांकि पुरूष, महिला तथा बच्चे सभी के साथ दुर्व्यवहार किया जा सकता है परन्तु अधिकांश मामलों में महिलाओं को पीड़ित होना पड़ता है।

प्रत्येक देश जहां विश्वसनीय और बड़े पैमाने पर अध्ययन कराए गए हैं, उनके परिणामों से पता चलता है कि 16 से 52% महिलाओं को उनके पतियों/संगी-साथियों द्वारा यातनाएं दी जाती है। ये अध्ययन महिलाओं के विरूद्ध व्यापक हिंसा को रूग्णता तथा मौतों के एक प्रमुख कारण के रूप में इंगित करते हैं। इन शारीरिक यातनाओं में बलात्कार तथा यौन संबंधी हिंसा भी शामिल हो सकती हैं। मनोवैज्ञानिक हिंसा में मौखिक अपशब्द, उत्पीड़न, कैद तथा भौतिक, वित्तीय और व्यक्तिगत संसाधनों से वंचित किया जाना शामिल है। कुछ महिलाओं के लिए भावनात्मक दुर्व्यवहार शारीरिक यातना की अपेक्षा अधिक दर्दनाक हो सकता है क्योंकि इनसे महिलाओं की सुरक्षा तथा आत्मविश्वास में क्षीणता आती है।

घरेलु हिंसा हर संस्कृति, धर्म, वर्ग तथा प्रजाति में व्याप्त है। सामान्यतया दुर्व्यवहार की सामाजिक प्रथा द्वारा उपेक्षा कर दी जाती है और इसे विवाहित जीवन का अभिन्न अंग समझा जाता है। इसका एक उदाहरण प्रसिद्ध स्पैनिश पहेली के सार के जरिए देखा जा सकता है। प्रश्नः खच्चर तथा महिलाओं में क्या समानता है? उत्तरः दोनों पीटने से सुधरते हैं।”

इन आंकड़ों से विकासशील तथा विकसित देशों में समान रूप से प्रचलित सच्चाइयों का स्पष्ट चित्र प्रदर्शित होता है।

  • संयुक्त राज्य अमेरीका में प्रत्येक महिला को 18 मिनट में एक बार पीटा जाता है। 3 मिलियन तथा 4 मिलियन के बीच महिलाओं की निर्ममतापूर्वक पिटाई की जाती है, परन्तु घरेलू हिंसा के 10 मामलों में से सिर्फ 1 ही की सूचना दी जाती है। यूनाइटिड किंगडम में गृह कार्यालय द्वारा दी गई हाल की एक सूचना के अनुसार तीन परिवारों में से एक परिवार यातना का शिकार होता है तथा पांच परिवारों में से एक परिवार गंभीर यातना का शिकार होता है।
  • आस्ट्रिया में 1500 तलाक के मामलों में से 59 प्रतिशत मामलों में घरेलू हिंसा विवाहित जीवन के बिखराव के एक कारण के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
  • भारत में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के रिकार्डों से 1991 से 1995 की अवधि के दौरान यातना तथा दहेज से हुईं मौतों के मामलों में 5 प्रतिशत की चिंताजनक वृद्धि प्रकट हुई। वर्ष 1995 में महिलाओं के विरूद्ध हुए सभी सूचित अपराधों में 29.2 प्रतिशत अपराधों में महिलाओं को दी जाने वाली यातनाएं शामिल थी। बांग्ला देश में, 1983 से 1985 के बीच महिलाओं की हत्या के कुल सूचित मामलों में से आधे मामले गृहों के भीतर ही घटित हुए।

संयुक्त राष्ट्र के एक हाल ही के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला है कि “शारीरिक यातना में अक्सर यौन संबंधी हिंसा तथा बलात्कार शामिल होते हैं, जिसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव किसी अजनबी द्वारा किए गए बलात्कार की अपेक्षा कहीं अधिक गंभीर होते हैं क्योंकि ऐसे आचरण में विश्वासघात निहित होता है।”

प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं के साथ घरों में दुर्व्यवहार क्यों किया जाता है? इसका उत्तर समाज में उनकी असमान स्थिति में ही समाहित है। ये अक्सर आर्थिक निर्भरता, अपने बच्चों के जीवन तथा खुद के जीवन के प्रति भय तथा कानून के समक्ष अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानता तथा आत्म विश्वास की कमी

और सामाजिक दबाव के दुष्चक्र में जकड़ी रहती हैं। ये कारक महिलाओं को लगातार ऐसा दुर्व्यवहारपूर्ण जीवन जीने के लिए बाध्य करते हैं जिनसे निकलने का उनके पास शायद ही कोई उपाय होता है। परिवार के भीतर एकांतता संबंधी मर्यादा, प्राधिकारियों को मध्यस्ता करने से रोकती है जिसके कारण महिलाएं अक्सर इस बात से इंकार करती हैं कि उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है। यह समाज के उच्चतर तथा निम्नतर वर्गों में समान रूप से व्याप्त है। यदि कोई महिला दुर्व्यवहार के आरोप का मामला दर्ज कराती है

और वह निर्विरोध तलाक चाहती है तो उसके पति के परिवार द्वारा उसे उस मामले को वापिस लिए जाने के लिए मजबूर किया जाता है।

सामाजिक पूर्वाग्रहों से भी महिलाओं के विरूद्ध घरेलू हिंसा को बल मिलता है। भारतीय फील्ड दृष्टांतों से यह निर्दिष्ट होता है कि महिलाओं को उनके पतियों के द्वारा अपनी संपत्ति के रूप में समझा जाता है, पति यह मानते हैं कि महिलाओं की अधीनस्थ भूमिका पतियों को उनके साथ दुर्व्यवहार करने का अधिकार प्रदान करती हैं ताकि वे अपनी पत्नियों को उनकी औकात में ही रख सकें। इस पृष्ठभूमि के पीछे दहेज की परम्परा निहित है, यह एक ऐसा शब्द है जिसमें दल्हन के परिवार से उपहारों तथा नकदी धनराशि की प्रत्याशा निहित होती है, कोई भी व्यक्ति इन प्रत्याशाओं द्वारा महिलाओं को होने वाली ऐसी चिंताओं तथा परिणतियों की कल्पना कर सकता है जो दहेज की अपर्याप्तता होने की वजह से महिलाओं को झेलनी पड़ते हैं।

अनेक महिलाएं ऐसे कृत्यों को हिंसा के रूप में नहीं देखती है जो न्यायोचित प्रतीत होता है। “सच्चरित्र महिला” आदर्श को घेरने वाली सामाजिक संरचना में उन स्वीकार्य मानदंडों हेतु सीमाएं स्पष्टतया निर्धारित की गई है जिनके पूरे मौखिक तथा शारीरिक यातनाएं हिंसात्मक धारणा में परिणति हो जाती है। अतः पत्नी की पिटाई को तब ज्यादती पूर्ण प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जब महिलाएं द्वेष का कारण बनती हैं और पत्नी परायण कर्तव्यों का उचित रूप से निर्वाह नहीं करती। इसे उस सामान्य विश्वास द्वारा और पेचीदा बनाया जाता है कि उग्र कृत्य प्रेम की अभिव्यक्ति है और ये शायद ही महिलाओं को बेहतर सच्चरित्र बनाने की सहायता करने की आकांक्षा रखते हैं।

महिलाओं का शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य अक्सर ही स्थायी रूप से बिगाड़ दिया जाता है अथवा अक्षम बना दिया जाता है और कुछ मामलों में हिंसा के घातक परिणाम हो सकते हैं, जैसे कि भारत में दहेज के कारण होने वाली मौतों के मामलों में देखा जा सकता है। शारीरिक यातना तथा मानसिक यातना प्रायः नियमित रूप से दी जाती हैं जिनसे पीड़िता तथा उनके परिजनों की मनोदशा आहत होती है और उन पर कलंक लग जाता है। यातना देने संबंधी अनेक घटनाओं के कारण चोटें भी लगती हैं जो हल्की चोटों तथा हड़ियों के टूटने से लेकर चिरकारी अक्षमताओं तक हो सकती है। कनाडा के राष्ट्रीय सर्वेक्षण से पता चला कि पत्नी के साथ मारपीट जैसे मामलों में से 45% प्रतिशत मामलों के कारण गंभीर शारीरिक चोटें लगी और घायल महिलाओं में से 40% महिलाएं चोट लगने के पश्चात डाक्टर के पास गई। गर्भावस्था के दौरान हिंसा की, माताओं तथा उनके अजन्मे भ्रूणों, दोनों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले जोखिम के रूप में पहचान की गई है। उग्र परिवारों में बच्चे दुर्व्यवहार का भी शिकार हो सकते हैं। वे अपनी माताओं को बचाने के प्रयास में अक्सर ही चोटिल हो जाते हैं। भुगौटा, कोलम्बिया में दुर्व्यवहार की पीड़ित महिलाओं के एक अध्ययन में 49% महिलाओं ने बताया कि उनके बच्चों को भी पीटा गया। महिलाओं के साथ की गई हिंसा के परिणामस्वरूप बलात्कार करने से अथवा महिलाओं को गर्भ निरोधकों को लेने से रोकने से उनमें अवांछित गर्भ ठहर सकता है। यह अचरज की बात नहीं है कि संभवतः दुर्व्यवहार से पीडित महिलाओं में दुर्व्यवहार से अपीड़ित महिलाओं की अपेक्षा आत्महत्या करने की 12 गुणा अधिक संभावना रहती है। कुछ महिलाओं को एल्कोहल तथा नशीली दवाओं का सेवन ही एकमात्र उपाय नजर आता है। घरेलू हिंसा का परिवार पर विध्वंसकारी प्रभाव पड़ता है। माताएं अपने बच्चों की उचित रूप से देखभाल करने में असमर्थ हो जाती हैं। प्रायः वे उन बच्चों में अपनी निम्न आत्म सम्मान संबंधी भावनाएं और निराश्रयता तथा अपर्याप्तता की भावनाएं भर देती हैं। जो बच्चे अपने पिता को उनकी माताओं के साथ मार-पीट करते हुए देखते हैं उनमें इस व्यवहार की नकल करने की संभावना जागृत होती है। दुर्व्यवहार से पीड़ित महिलाओं का समाज तथा स्वयं के आत्मबोध के प्रति अल्प योगदान हो सकता है। चेन्नई में एक विकास संबंधी कार्यनीति लगभग उस समय विफल हो गई जब महिलाएं अपने पतियों द्वारा पीटे जाने की बढ़ती घटनाओं की वजह से इस कार्यनीति से बाहर जाने लगी। इससे महिलाओं की अर्जन क्षमता की क्षति होती है जिससे पूरा परिवार प्रभावित होता है।

आज विश्व में महिलाओं के विरूद्ध की जाने वाली हिंसा मानवाधिकारों का सबसे व्यापक उल्लंघन है। हमें इस पर विचार करने की जरूरत है कि किस तरह महिलाओं को दी जाने वाली निकृष्टतम यातनाआ को रोका जा सकता है। इसमें सभी क्षेत्रों का सहयोग अपेक्षित है चाहे वह सरकार हो, गैर सरकारी संगठन हों अथवा स्वयं महिलाएं हों। घरेलू हिंसा के विरूद्ध एक ऐसे व्यापक विधान बनाने की आवश्यकता है। जिसमें भौतिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, यौन संबंधी और वित्तीय संबंधी ऐसे सभी कयों को शामिल किया गया हों, जो महिलाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं अथवा नुकसान पहुंचाते है। इसमें विवाहित स्थिति को नजरअंदाज करके सभी आयु की महिलाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। महिलाओं द्वारा ऐसी आर्थिक क्षमताओं में भी सधार करने की आवश्यकता है जिसमें आय और परिसम्पत्तियों और पारिवारिक संपत्ति में हिस्सेदारी तक पहंच और इन पर नियंत्रण सम्मिलित हो। सरकार को प्रशिक्षण और सुग्राहिता संबंधी कार्यक्रमों का सदृढ़ीकरण और विस्तार करना चाहिए। ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन चिकित्सीय कार्मिकों, विधिक और प्रवर्तन कार्मिकों, न्यायपालिकाऔर परामर्शदात्री तथा अन्य सहायता सेवा प्रदायकों के लिए करना चाहिए। इनमें से, इस समूह द्वारा अदा की जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका तथा इस समय ऐसे कार्यक्रमों के अभाव को देखते हुए दुर्व्यवहार से पीड़ित महिलाओं की पहचान करने तथा उनके उचित उपचार के लिए चिकित्सकों को सुग्राही बनाने हेतु तैयार किए गए कार्यक्रमों की अत्यन्त आवश्यकता है। मीडिया को गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर मानव अधिकारों तथा घरेलू हिंसा को दूर करने संबंधी उनकी सार्थकता के बारे में जन जागरूकता पैदा करनी चाहिए। शिक्षा के जरिए घरेलू हिंसा को काबू करने की आवश्यकता है। घरेलू हिंसा की रोकथाम अंततः संघर्षपूर्ण संकल्प के उपाय के रूप में तथा लिंग के बारे में परम्परागत मनोवृत्तियों से संबंधित समाज के मानदण्डों को बदलने पर निर्भर करती है। इसे प्राप्त करने के लिए स्कूलों, विश्वविद्यालयों, व्यावसायिक कालेजों और अन्य प्रशिक्षण केन्द्रों के पाठ्यक्रमों में लिंग और मानव अधिकारों संबंधी संकल्पना को शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ लड़कियों के लिए अनिवार्य निःशुल्क प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के सिद्धांतों के प्रति अवश्य ही मान्यता और प्रतिबद्धता होनी चाहिए। इन हिंसा निवारक संबंधी तैयार किए गए कार्यक्रमों को राज्य तथा स्वैच्छिक क्षेत्रों, दोनों, में अवश्य ही शुरू करना चाहिए। आपराधिक न्याय प्रणाली के जरिए पुरूषों द्वारा की जाने वाली मारपीट पर काबू पाने के अलावा, ऐसे परामर्शदात्री कार्यक्रमों को तैयार करना और क्रियान्वित करना अनिवार्य है जो पुरूषों में लैंगिक सुग्राहिता जागृत करेंगे, हिंसक व्यवहार के मानदण्डों को तय करेगें तथा यथाअपेक्षित चिकित्सीय परामर्श प्रदान करेंगें। रोकथाम और कार्यकलापों हेतु एक समग्रतावादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए पुरूषों से संबंधित बनाए गए कार्यक्रमों में निहित कमियों को दर किए जाने की आवश्यकता है। व्यापक चिकित्सीय और मनोवैज्ञानिक सेवाएं प्रदान करना महत्वपूर्ण है। इन कार्यक्रमों द्वारा दुर्व्यवहार के पीड़ितों के लिए व्यापक चिकित्सीय और मनोवैज्ञानिक परिचर्या तथा सहायक सेवाओं को अवश्य ही एकीकृत किया जाना चाहिए। विभिन्न संगठनों द्वारा कुछ सीमा तक तत्काल चिकित्सीय परिचर्या मुहैय्या कराई जाती है परन्तु चिकित्सीय परामर्श, सहायक समूहों, और पारिवारिक चिकित्सा जैसी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर कम ही ध्यान दिया गया है। ये महिलाओं और उनके परिवार के कल्याण, पुनर्सजन और संपोषणीयता में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सभी निवारक कार्यक्रमों में हिंसा से प्रभावित बच्चों की आवश्यकताओं पर बेहतर तरीके से ध्यान दिया जाना अपेक्षित है। इसके अतिरिक्त सैद्धान्तिक और व्यावहारिक, दोनों, दृष्टियों से बाल-बच्चों वाली महिलाओं तक अधिक पहुंच रखने वाले आश्रय स्थलों का अवश्य निर्माण किया जाना चाहिए; उदाहरणार्थ, बाल परिचर्या सुविधाएं प्रदान करने के जरिए। हालांकि कुछ आश्रय स्थलों में बच्चों को रखने की अनुमति की व्यवस्था है, लेकिन इसे प्रोत्साहित नहीं किया जाता। चूंकि अपेक्षित सेवाओं का दायरा व्यापक है इसलिए किसी एक ही एजेन्सी द्वारा इन सेवाओं की प्रदानगी करना व्यावहारिक नहीं है। राज्य की एजेन्सियों, गैर सरकारी संगठनों तथा निगमित क्षेत्रों के बीच और अधिक सहयोग अनिवार्य है। समन्वित, स्वैच्छिक तथा सरकारी प्रयासों के ऐसे कुछ ही दृष्टांत मौजूद है जैसे कि पलिस स्टेशनों में अवस्थित परामर्शदात्री कक्ष। एक समन्वित सार्वजनिक अनुक्रिया हेतु प्रभावी नेटवर्किंग से सेवाओं के दायरे में विस्तार हो सकता है तथा मौजूदा संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकता है। सेवाओं तथा कार्यक्रमों की कवरेज को ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार किए जाने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू हिंसा झेल रही महिलाओं के लिए शिकायत निवारण तंत्र या तो काफी कम है अथवा है ही नहीं। इसके अतिरक्त, सभी महिला पुलिस स्टेशन मुख्यतया शहरी क्षेत्रों में ही अवस्थित है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऐसे तंत्र स्थापित किए जाने की आवश्यकता है।

घरेलू हिंसा का एक अन्य सर्वाधिक सामान्य रूप बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करना है। चूंकि यह भी घरों की दीवारों के भीतर तक ही सीमित रहता है इसलिए इस पर सीमित ध्यान दिया जाता है और इसके बारे में कम ही सूचना दी जाती है। पत्नी के साथ मार-पीट के समान ही बच्चों के साथ मार-पीट बहुत से देशों तथा संस्कृतियों में एक स्वीकार्य तौर तरीका है। ऐसे मामलों में यह कहावत ‘यदि बच्चों को पीटा न जाए तो बच्चे बिगड़ जाते हैं, इस सीमा तक व्यापक प्रतीत होती है। अनेकों बार बच्चों की गलती भी नहीं होती, अधिकतर प्रायः ऐसा होता है कि बच्चा केवल अनुचित समय में अनुचित जगह पर उपस्थित होता प्रतीत होता है अथवा यह अनुचित अवसर पर कोई बात प्रकट कर देता है। बच्चों की पिटाई सर्वदा पिता के मूड में बदलाव और मनोदशा के परिणामस्वरूप होती है। कुछ व्यक्ति बच्चे पर तब गुस्सा उतार देते हैं जब वे अपनी स्वयं की सांसारिक उलझनों में निस्सहाय महसूस करते हैं। कुछ देशों ने ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लिया है और इनसे संबंधित रिपोर्ट पुलिस में करने के परिणामस्वरूप ऐसे बच्चे की उनके माता-पिता द्वारा देखभाल करना बंद करवा दी जाती है और राज्य द्वारा उसकी देखभाल की जाती है। इस बात पर प्रायः प्रश्नचिह्न ही लगा रहता है कि अंततः वह बच्चे के लिए कितना उपयोगी सिद्ध होगा, विशेषकर उसके भावनात्मक विकास के संबंध में। वस्तुतः कुछ मामलों को जरूरत से ज्यादा सनसनीखेज बना दिया जाता है, माइकल जैक्सन प्रकरण ऐसा ही एक मामला है।

घर में बच्चों के प्रति हिंसा न केवल माता-पिता द्वारा ही की जाती है अपितु उनके ऐसे रिश्तेदारों द्वारा भी की जाती है जो परिस्थितियों के कारण अपने संगे संबंधियों के बच्चे की देखभाल करने के लिए विवश होते हैं। जो बच्चे घरों में नौकरों के रूप में कार्य करते हैं उन्हें इसके निकृष्टतम रूप का सामना करना पड़ता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें अनेक विधान लागू होते हैं, लेकिन खतरा बना ही रहता है क्योंकि इसके मूल कारण बदले नहीं है।

घरेलू हिंसा का सबसे कम सूचित और उजागर रूप पुरूषों के प्रति हिंसा है। चूंकि अधिकांश समाजों में पुरूषों से शिकायत की आशा नहीं की जाती है और यह समझा जाता है कि वह अपना बचाव खुद करने में समर्थ है, इसलिए समाज या तो इसे गंभीरतापूर्वक नहीं लेता अथवा पुरूषों को यह कहने से निरूत्साहित करता है क्योंकि किसी महिला द्वारा उसके साथ किए गए दुर्व्यवहार को स्वीकार करने से उसके सम्मान को ठेस पहुंचती है।

व्यापक अनुसंधान के अभाव और परिवार में होने वाली हिंसा का खुलासा न करने के कारण दुर्व्यवहार के इस रूप की वास्तविक हद की जानकारी शायद ही कभी हो पाए। विडम्बना यह है कि विश्वव्यापी प्रभावशाली आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक प्रगति के बावजूद, विश्व भर में कई मिलियन महिलाओं को अपने खुद के घरों के भीतर ही हिंसा का सामना करना पड़ता है- यह एक ऐसा दुखद अपराध है जिस पर तत्काल ध्यान दिए जाने और जिससे प्रभावशाली ढंग से निपटने की आवश्यकता है।

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