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Bharat aur Veshvikaran “भारत और वैश्वीकरण ” Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 and Graduate Students.

भारत और वैश्वीकरण 

Bharat aur Veshvikaran

वैश्वीकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम थियाडोर लेविट द्वारा वर्ष 1985 में ऐसे अपार परिवर्तनों के चरित्र चित्रण हेतु किया गया था जो विगत दो-तीन दशकों के दौरान अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में हुए हैं। इन परिवर्तनों में उत्पादन क्षेत्र में हुए तीन और व्यापक आर्थिक तथा वित्तीय परिवर्तन; आर्थिक और वित्तीय उदारीकरण, दोनों, के परिणामस्वरूप वैश्विक उपयोग तथा निवेश; अवसंरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम और अर्थव्यवस्था में राज्य की नाटकीय ढंग से कम होती हुई भूमिका शामिल है।

इसमें बाजार की आर्थिक और वित्तीय ताकतें वैश्वीकरण की वर्तमान प्रभुत्वकारी प्रक्रियाएं स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुई। यह इस बात की ओर भी संकेत करता है कि किसी भी राष्ट्र को व्यापार के वे अंतरराष्ट्रीय नियम स्वीकार करने होंगे जिनका विश्व व्यापार संगठन समझौते और आई एम एफ तथा विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में उल्लेख है। वैश्वीकरण स्वयं में न तो अनिवार्यतः अच्छा है और न ही बुरा।

आर्थिक तथा वित्तीय वैश्वीकरण के वर्तमान रूप के फायदे तथा नुकसान दोनों हैं और तथाकथित “विजेता तथा पराभूत” बनाने में इसकी अहम भूमिका है।

भारत में 1991 में आर्थिक सुधार, उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण के रूप में अंतरराष्टीय मौद्रिक कोष तथा विश्व बैंक के दबाव के कारण शुरू हुआ। यद्यपि 1990 के दशक में सकल घरेलू उत्पाद 1980 के दशक के सकल घरेलू उत्पाद की अपेक्षा मामूली रूप से ही अधिक था, तथापि यह सच्चाई कायम है कि विश्व में समग्र रूप से विकास में 1990 के दशक में काफी कमी आई। इस समय भारत 10 सर्वाधिक प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यह इसकी अपेक्षाकृत स्थिर अर्थव्यवस्था की लंबे समय से कायम छवि के ठीक विपरीत है। आरंभ में सबसे बड़ा भय यह था कि आयात संबंधी प्रतिबंधों के हटने से विदेशी विनिमय भण्डार शीध्र ही समाप्त हो जाएंगें। आज हमारे पास 65 मिलियन यू एस डालर से अधिक विदेशी विनिमय उपलब्ध है जिनसे 12 महीनों से अधिक आयातों का वित्तपोषण किया जा सकता है। वर्ष 1999 में मुश्किल से दो सप्ताह के आयातों जितने मूल्य के विदेशी भण्डार उपलब्ध थे। सरकार स्थानीय भारतीयों को भारत में विदेशी विनिमय खाता धारण करने की भी अनुमति दे रही है जो पूर्ण पूंजी लेखा परिवर्तनियता की ओर एक और कदम है। आजादी के बाद पहली बार भारत के पास 1.3 मिलियन यू.एस. डालर का चालू खाता अधिशेष था जो 2001-2002 में 9.5 मिलियन यू एस डालर के पूंजीगत खाता अधिशेष के शीर्ष पर था। वस्तुतः यह सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात है और संभवतः वैश्वीकरण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

आज उपभोक्ताओं को उच्च कोटि की विविध वस्तुएं अपेक्षाकृत विधिक रूप से कम कीमतों पर सुलभ हो जाती है। पहले केवल धनी-संपन्न तथा सुसंबद्ध भारतीयों को ही विदेशी यात्राओं अथवा उन्नत प्रगतिशील ने मार्किट (Grey Market) से विदेशी सामान मिल सकता था। सूचना तथा संचार क्रांति के इस युग में इसे आर्थिक विकास के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में समझा जाना चाहिए। वैश्वीकरण के बावजूद भारत के किसी भी उद्योग को स्पर्धा के कारण खत्म नहीं किया गया है। निश्चय ही कुछ कंपनियां दिवालिया हो गई है अथवा उनका अधिक सक्षम फौ द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया है। बहुत से भारतीय उद्योगपतियों, जो स्पर्धा से बचने के लिए लंबे समय से अभ्यस्त थे, ने आरंभिक कठिनाइयों का सामना किया परन्तु उनमें से अधिकांश उद्योगपतियों ने विश्व में श्रेष्ठतम फर्मों से स्पर्धा करना सीख लिया है। मोटे तौर पर भारतीय व्यापारिक समुदाय अपनी पुरानी विचारधारा से बाहर निकल आया है और उसने सरकार की सहायता के बगैर ही आगे बढ़ना सीख लिया है। कुछ व्यापारिक समुदायों ने वैश्विक अवसरों का उपयोग करने हेतु विदेशों में यूनिटें भी स्थापित की है।

योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों को प्रतिशतता 1993 की 36% से घटकर 1999 में 26% हो गई है। 1993-99 के दौरान प्रति व्यक्ति वास्तविक वेतनों में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 2.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई तथा शहरों में 2.7% की वृद्धि हुई।

संगठित निजी क्षेत्रों में रोजगार की विकास दर 1983-94 के दौरान 0.45% से बढ़कर 1994-2000 के दौरान 1.87% हो गई है। दूसरे शब्दों में रोजगार परिदश्यों से निजी क्षेत्र में बाजार अभिप्रेरित विकास के साथ साथ निजी क्षेत्र में सरकार को रोजगारों को कम करने की वैचारिक नीति प्रदर्शित होती है। उदारीकरण से गरीबों को संप्रेषित करने की शक्ति मिली है तथा इससे लोगों को बाजार की प्रकृति के बारे में भी जानकारी मिली है।

तथापि यह परिदृश्य उतना उज्जवल नहीं है जितना की प्रतीत होता है। अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोलने से देश में, विशेषकर उत्पादक क्षेत्रों में, पूंजी अथवा प्रौद्योगिकी का अत्यधिक प्रवाह आकर्षित करने में सफलता नहीं मिली है। औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदान की गई अनेक सुविधाओं के बावजूद आर्थिक विकास की दरों में आर्थिक सुधारों के दौरान गिरावट आई है। उदारीकरण के एक दशक में अधिकाधिक धीमी आर्थिक वृद्धि देखी गई है जिसमें 1990 के दशक के पूर्वार्द्ध के दौरान भी कमी आई है। इससे सट्टेबाजों, शेयर दलालों तथा वित्तीय संस्थाओं को आम लोगों को लूटने का भी मौका मिला है। एनरान, जो अमेरीका के पूर्ण समर्थन तथा व्यापारिक प्रतिनिधियों द्वारा ब्लैकमेल के साथ वैश्वीकरण की एक “ध्वजारोही” (Flagship) परियोजना के रूप में भारत आई, वह अब दिवालिया हो गयी है और भ्रष्टाचार के प्रकरण में फंसी हुई है।

विदेशी निवेश में वद्धि के कारण गैर कृषिगत रोजगार में ग्रामीण श्रम अवशोषित नहीं हुआ है। आधुनिक उद्योग में ज्ञान संबंधी गहनता होती है। इससे अत्यधिक शिक्षित लोगों के लिए तो रोजगार सुलभ हुए होंगे परन्तु गरीबों विशेषकर ग्रामीण भारत के कृषि में जुटे अधिशेष लोगों, के लिए किसी प्रकार रोजगार सृजित नहीं हुआ है, इसके बावजूद कि निवेश की विकास दर निजी क्षेत्रों में ऊंची रही है। नब्बे के दशक के दौरान रोजगार लोच में गिरावट दर्ज की गई है। चिंताजनक बात यह है कि रोजगार के अवसरों में केवल 0.04 प्रतिशत की वद्धि देखी गई और वर्ष 2000 में इसमें 0.15 की वास्तविक गिरावट देखी गई, शिक्षित बेरोजगारों की संख्या 2 मिलियन के आसपास रही।

वैश्वीकरण की एक सर्वाधिक सामान्य यक्त्ति है व्यापार के प्रति उदारता की नीति तथा व्यापार में देश की भागीदारी। इस युक्ति द्वारा व्यापार में भारत की वैश्विक हिस्सेदारी केवल 0.7 प्रतिशत है। साथ ही भारत में वार्षिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का अंतप्रवाह केवल 3-4 मिलियन अथवा कुल अंतर्ग्रवाह का 0.3-0.4 प्रतिशत है। यह विदेशी संस्थागत निवेश के संबंध में भी सत्य है।

विकसित देश वैश्वीकरण की प्रक्रिया पर नियंत्रण रखते हैं तथा भारत जैसे विकासशील देश ‘हार-जीत’ की स्थिति में पहुंचकर ही रह जाते हैं। इसका विकसित देशों द्वारा अपनाई गई प्रव्रजन नीतियों द्वारा अंदाजा लगाया जा सकता है। विभिन्न देशों के भर्तीकर्ता सर्वश्रेष्ठ सुचना प्रौद्योगिकी के व्यावसायियों की सेवा किराए पर लेने के लिए एकत्र हुए। भारतीय फर्मे इस निर्गमन को रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकीं। उद्योग बेहतरीन प्रतिभा खो देते हैं और उनकी उच्च गुणवत्ता वाले निर्यात सृजित करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। जब विकसित देशों की अर्थव्यवस्था मंद पड़ जाती है, जैसा कि अमेरीका में डाट काम संकट के बाद हुआ, तो ये प्रवासी श्रमिक इस प्रक्रिया में अनेक समस्याओं का सामना करते हुए अपने देश में लौटने के लिए विवश हो जाते हैं।

उत्तर उदारीकरण अवधि में भी राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए निवेश में की गई भारी कटौती के कारण कृषि के विकास में अत्यधिक गिरावट देखी गई है। इससे निर्धनता में वृद्धि हई है। वैश्वीकरण के पूर्व, अर्थात विशेषकर 1989-1991 के बीच 35.37 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा के नीचे थे। सुधार की अवधि के पश्चात अर्थात् जुलाई 1995 से दिसम्बर, 1997 तक ग्रामीण भारत में गरीबी रेखा से नीचे 36.47 प्रतिशत लोग थे। खेती की अधिकता से भारग्रस्त, जिसके ग्राहक कम ही होते हैं, होने के कारण भारत के छोटे स्तर के किसान वैश्वीकरण के शिकार हुए हैं। कर्नाटक में आलू की खेती करने वाले किसानों के बारे में कुछ सूचनाएं मिली है जिन्होंने अपनी फसलों के खरीदारों को खोजने में नाकाम रहने के कारण आत्महत्या कर ली। सरकार द्वारा विश्व व्यापार संगठन की प्रतिबद्धता के अनुरूप आयात किए जाने हेतु कृषि उत्पाद के परिणाम संबंधी ब्यौरे अभी तैयार किए जाने हैं। इससे छोटे स्तर के किसानों के लिए अनिश्चितता पैदा हो गई है। अनेक मुख्य फसलों की कीमतें गिर गई हैं क्योंकि सरकार द्वारा अनेक मदों पर से परिमाणात्मक प्रतिबंध उठा लिए गए हैं। कपास की कीमतें 60 यू एस डालर प्रति 100 कि.ग्रा. से घटकर 20 यू एस डालर प्रति 100 कि.ग्रा. रह गई है जबकि धान की कीमतें 16 य एस डालर प्रति 100 कि.ग्रा. से घटकर आधी रह गई है। सस्ते आयातों द्वारा किसानों के उत्पाद बाजार से बाहर खदेड़ दिए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय निगमों का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापारों पर नियन्त्रण होता है और भारत के लंबे समय से संरक्षित अधिकांशतः सीमान्त किसानों के लिए उनके साथ प्रतिस्पर्धा करना कठिन है। भारतीय खाद्य निगम ने भण्डारण स्थान की कमी के कारण अनाजों को खरीदना बन्द कर दिया है। सरकार की अधिशेष खाद्यान्नों को सब्सिडी पर निर्यात करने की नीति है जबकि देश में लाखों लोग भूखे रह जाते हैं।

भारतीय सरकार ने पहले ही टैरिफ शुल्क कम कर दिया है और कुछ मामलों में इसे डब्ल्यू.टी.ओ करके अनरूप अपेक्षित स्तरों से भी कम कर दिया है। इससे भारतीय उद्योग के विभिन्न इकाइयों की प्रतिस्पर्धात्मक प्रवृत्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। दूसरी ओर विकासशील देश सरकार को उद्योग के संरक्षण के लिए आयातों पर परिमाणात्मक प्रतिबंधों को हटाने हेतु दबाव डाल रहे हैं।

अधिक संपन्न देश अपने घरेलू उद्योग तथा रोजगारों को बचाने के लिए एण्टी डम्पिंग शुल्क लगा देते हैं। भारतीय सरकार कुछेक ऐसे आयातों पर इसे लागू करने में असमर्थ हैं जिनसे भारतीय उद्योग पर प्रभाव पड़ रहा है। वर्ष 1987 से 1991 तक कोई भी एण्टी डम्पिंग कार्रवाई शुरू नहीं की गई और इनमें से कुछ मामलों को 1996 में ही उठाया गया। क्रियाविधियों में अब सुधार हुआ है किन्तु ये विकसित देशों की गति से काफी पीछे हैं। भारतीय उद्योग को चीन जैसे देशों से भी खतरे का सामना करना पड़ रहा है जिन्होंने भारतीय बाजारों को सस्ती वस्तुओं से पाट दिया है।

विकसित देशों के बाजारों तक विकासशील देशों की पहंच सुलभ करने की बात उतनी ही भ्रामक रही है जितनी की अन्य प्रतिबद्धताएं। विकासशील देशों के निर्यातों को उच्च टैरिफ अथवा दृढ़ स्वास्थ्यकर तथा पादप स्वास्थ्यकर कार्यवाइयों के बहाने से अवरूद्ध कर दिया गया है। विकासशील देशों से आयातों के प्रति सुग्रह्यता का स्तर ऐसा है कि छोटे-छोटे बागवानी संबंधी उत्पाद अवरूद्ध हो जाते हैं। उदाहरणार्थ भारत से यूरोप में कटफ्लावर के निर्यात पर भारी आयात शुल्क लगता था जिससे उदीयमान घरेलू फूल उद्योग को भारी आघात लगता था।

परिमाणात्मक प्रतिबंध, तकनीकी मानदण्ड, घरेलू उत्पादन के लिए सब्सिडी, प्रक्रियात्मक विलंब और उसके परिणामस्वरूप आयातों इत्यादि में लागत वृद्धि जैसे गैर-शुल्क (टैरिफ) अवरोधों से हमारे आयात लगातार प्रभावित हो रहे हैं। फिक्की द्वारा किया गया एक नवीन अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि भारत द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका को किया जाने वाला निर्यात इन युक्तियों द्वारा प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है। विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री, निकोलस स्टर्न के अनुसार “विकासशील देशों को प्रतिवर्ष विकसित देशों द्वारा विभिन्न विधियों द्वारा लगाए गए व्यापारिक अवरोधों के कारण 100 बिलियन से अधिक की क्षति होती है।”

आय की विषमताएं बढ़ गई है। 1992 में निम्नतम 40 प्रतिशत घरेलू व्यय की राष्ट्रीय घरेलू व्यय में 20.6 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। तथापि 1997 में उनका अंश घटकर 19.7 प्रतिशत रह गया है। इसके विपरीत राष्ट्रीय घरेलू व्यय में शीर्ष 10 प्रतिशत घरेलू व्यय का शेयर उसी अवधि के दौरान 28.4 प्रतिशत से बढ़कर 33.5 प्रतिशत हो गया। आय की अत्यधिक असमानताओं के लिए नब्बे के दशक के सुधारात्मक उपायों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिसमें एक ओर सामान्य लोगों को रोजगार के अवसरों से वंचित किया गया तथा दूसरी ओर उद्योगपतियों, व्यवसायियों तथा कंपनी कार्यपालकों को संपन्न बनाया गया।

उदारीकरण उपायों ने निजी कम्पनियों और एकाधिकार रखने वाले घरानों को धीमा औद्योगिक विकास होने के बावजूद भारी लाभ अर्जित करने में समर्थ बनाया है। वर्ष, 2000 में क्षेत्र की सबसे बड़ी निजी कंपनी, रिलायन्स इंडस्ट्रीज के शुद्ध लाभों में 41.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। टाटा स्टील के शुद्ध लाभों में 49.7 प्रतिशत, ग्रासिम इंडस्ट्रीज के शुद्ध लाभों में 43.3 प्रतिशत तथा हिन्दुस्तान लीवर के शुद्ध लाभों में 27.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 50 प्रतिशत काला धन अधिकांशतः शीर्ष 3 प्रतिशत लोगों के हाथों में होता है। वर्ष 1990-91 में इसके जी.डी.पी के 35 प्रतिशत होने का अनुमान है। इस तरह उदारीकरण के दशक के दौरान काले धन में प्रत्यक्ष वृद्धि हुई है।

वैश्विकरण की चुनौतियों के अन्तर्गत यथासाध्य भारग्रस्त अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य परिचर्या तथा शैक्षणिक व्यय का भार वहन करने में असमर्थ है। स्वास्थ्य क्षेत्र में, जनस्वास्थ्य संबंधी व्यय जो 1990 में 1.3 प्रतिशत था, 1999 में घटकर 0.9 प्रतिशत हो गया। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बजटीय आबंटन के स्थिर अथवा हासमान होने पर, जैसे कि अधिकांश राज्य सरकारों के साथ स्थिति है, क्षयरोग, मलेरिया, दष्टिहीनता नियंत्रण तथा एच आई वी/एड्स सहित अधिकांश स्वास्थ्य कार्यक्रम विश्व बैंक के ऋणों पर निर्भर हैं। इन ऋणों पर 79 प्रतिशत केन्द्रीय स्वास्थ्य बजट के निर्भर होने के कारण ऐसे रोगों से निपटने हेतु पर्याप्त धन का अभाव है। इसके कारण जनसंख्या का 65 प्रतिशत भाग निजी अस्पतालों/क्लिनिकों से उपचार कराए जाने के लिए विवश है। चिकित्सीय उपचार, ग्रामीण ऋण ग्रस्तता के दूसरे सर्वाधिक सामान्य कारण के रूप में सामने आया है।

विश्व बैंक के दबाव से अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा संबंधी राज्य की जिम्मेवारी कम हो रही है। सरकार ने प्रारंभिक शिक्षा की अवधि 8 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दी है। संविधान के अनुच्छेद 45 में स्पष्ट रूप से यह घोषणा की गई है कि प्राथमिक शिक्षा की अवधि 8 वर्षों की होगी। न केवल इसे ही बदला गया है वरन नए शुरू किए गए सर्व शिक्षा अभियान अथवा शिक्षा रोजगार योजना में प्राथमिक शिक्षा को कम करके तीन वर्ष कर दिया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1992 में सरकार ने प्रति प्राथमिक स्कूल 3 शिक्षक नियुक्त करने की प्रतिबद्धता की थी किन्तु विश्व बैंक द्वारा प्रायोजित जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम बहग्रेड शिक्षण में एक ही शिक्षक द्वारा एक साथ 5 वों को देखने की अनुमति दी गई है। डी.पी.ई.पी की आधारभूत मान्यताओं में से एक मान्यता यह है कि एक गैर-औपचारिक केन्द्र, वयस्क शिक्षा वर्ग तथा बहुग्रेड वर्ग द्वारा किसी नियमित स्कूल को अपने नियमित शिक्षकों को प्रतिस्थापित किया जा सकता है। आई एम एफ के दबाव से 2001 के 93 वें संशोधन विधेयक द्वारा बच्चों की शिक्षा संबंधी जिम्मेवारी माता-पिताओं को सौंपी गई है जिससे शिक्षा माता-पिताओं की जिम्मेवारी बन गई है न कि राज्यों की। गरीब लोग अपने बच्चों को शिक्षित करने के प्रति उत्सुक रहते हैं किन्तु साधनों के अभाव के कारण ऐसा नहीं कर पाते हैं।

भारत में महिलाओं, विशिष्टगणों तथा उच्च मध्यम वर्ग को वैश्विक नेटवर्क के प्रभाव से लाभ पहुंचा है। अन्तरराष्ट्रीय प्लेटफामों के व्यवसाय उद्यमों में अधिक महिलाएं कार्यरत हैं और अन्तरराष्ट्रीय नेटवर्क के परिणामस्वरूप उनको कॅरिअर के अधिक अवसर प्राप्त हुए हैं। वस्तुओं तथा पूंजी के मुक्त संचलन इस वर्ग के लिए सहायक है। चूंकि वैश्वीकरण द्वारा प्रौद्योगिकीगत इनपुट प्रदान किया जा रहा है, इसलिए महिलाओं की उपेक्षा की जा रही है क्योंकि वे सामान्यतया रोजमर्रा के कार्यों में ही व्यस्त रहती हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य करने की स्वीकृति विरले ही मिलती है। महिलाएं और अधिक रोजगार पाने में समर्थ तो होती हैं परन्तु वे जिस रोजगार से जुड़ती हैं उसकी प्रकृति अत्यधिक अनियत होती है अथवा ऐसी होती है जिसे करना पुरूष पसंद नहीं करते अथवा वे ऊंचे अथवा बेहतर रोजगार पाने की चाह में छोड़ देती हैं। वैश्वीकरण ने उन्हें एक ऐसी अत्यधिक विरोधाभास की स्थिति में ला खड़ा किया है जिसमें उन पर आर्थिक रूप से स्वतंत्र वेतनभोगी कर्मियों का लेबल तो चिपका हुआ है परन्तु वे सही अर्थ में अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का उपयोग करने में समर्थ नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य पदार्थों की आकाश छूती हुई लागतों और निर्यात अभिमुखी फसलीय पद्धतियों ने महिलाओं की खाद्य तथा पोषणीयता तक गिरती हुई पहुंच में योगदान दिया है। अपेक्षित संतोषजनक सार्वजनिक वितरण प्रणाली न होने से भ्रष्टता बढ़ गई है और इससे उन गृहिणियों के लिए अत्यधिक समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं जो गृहस्वामिनी हैं।

भारत जैसे विकासशील देश मूक दर्शक नहीं बने रह सकते हैं। वैश्वीकरण की शर्ते एक समान होनी चाहिए। यह समानता तथा न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है न कि आर्थिक श्रेष्ठता पर। यदि संपन्न औद्योगिकृत देश अपने हितों का संरक्षण कर सकते हैं तो विकासशील देशों को ऐसा करने में शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। एक स्वतंत्र राष्ट्र राज्य होने के नाते हमारा कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि हम अपने देश के लिए हितों की उतरोत्तर वृद्धि करें और जोखिमों को यथासंभव अल्प करें।

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