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Aapda Prabandhan Pranali “आपदा प्रबंधन प्रणाली” Complete Hindi Essay, Paragraph, Speech for Class 10, 12 and Graduate Students.

आपदा प्रबंधन प्रणाली

Aapda Prabandhan Pranali

भारत को विश्व के सर्वाधिक आपदा संभावित देशों में से एक समझा जाता है। सूखे, बाढ़, भूकंप तथा चक्रवात से प्रायः इस देश की अपार क्षति होती है और ये नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं, इनकी बारंबारता बढ़ती ही जा रही है और ये अधिकाधिक क्षति, अशक्तता, रोग तथा मौत का कारण बन गए हैं। और इस तरह इनके कारण पहले से ही निर्धन राष्ट्र के स्वास्थ्य, आर्थिक तथा सामाजिक भार में वृद्धि हो रही है।

आंकड़ों की ओर देखने से कुछ चिंताजनक निष्कर्ष सामने आते हैं और ये भारत के सामने आ रही भयावह समस्या की ओर इंगित करते हैं: 32 राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों में से 22 आपदा संभावित हैं। 1988 तथा 1997 के मध्य आपदाओं से 5,116 जाने गईं और प्रति वर्ष 24.79 मिलियन व्यक्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुए। वर्ष 1998 में आपदाओं के कारण 9,846 लोगों की मृत्यु हो गई और 34.11 मिलियन लोग प्रभावित हुए। उड़ीसा में 1999 का महा चक्रवात 10,000 से अधिक लोगों की मृत्यु का कारण बना और इससे हजारों लोग बेघर हो गए। जनवरी 2001 में गुजरात राज्य के कच्छ और उसके आस-पास के क्षेत्रों में आए भूकंप से 16,000 से अधिक जानें गईं। हजारों लोग अभी भी बेघर हैं। हजारों से ज्यादा लोग अपने जीविकोपार्जन के अनिश्चित साधन गंवा चुके हैं। देश की कुल कृषि योग्य भूमि का (28) अठ्ठाइस प्रतिशत भू-भाग सूखा संभावित क्षेत्र में है। सत्तावन (57) प्रतिशत भारत भूकंप संभावित है। भंगुर हिमालयी पवर्तमाला भूकंप (और भस्खलन तथा हिमस्खलन) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। पश्चिमी और मध्य भारत भी इनके समान ही असुरक्षित है। 76 लाख हेक्टेयर भू-भाग पर प्रति वर्ष बाद आती है। प्रत्येक वर्ष बाढ़ के कारण 1,300 से अधिक जानें जाती हैं। बाढ़ से प्रभाषित क्षेत्र हिमालयी नदियो के बेसिन के पूरे देश के अन्य भभागों की ओर तीव्रता से बढ़ रहा है। भारत, विश्व का निकृष्टतम चक्रवात-प्रभावित भाग है। प्रत्येक वर्ष बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में पांच से छह अरब कटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न होते हैं जिनमें से दो अथवा तीन विनाशकारी होते हैं और घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित करते है, जिससे वर्णनातीत क्षति होती है।

1985-95 के मध्य, आपदाओं से करीब 1883.93 मिलियन यू एस डालर की वार्षिक क्षति पहुंची है। भारतीय संविधान के अन्तर्गत आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। तथापि वृहत आपदाओं के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समूह है। इस समूह में विभिन्न नोडल मंत्रालय शामिल होते हैं। प्राकृतिक आपदाओं के लिए कृषि मंत्रालय नोडल मंत्रालय है और अन्य मंत्रालय सहायक भूमिका निभाते है।

आपदा आने पर केन्द्रीय सरकार का एक बह विषयक दल आपदा मूल्यांकन करता है और यह राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण निधि तथा प्रधानमंत्री राहत कोष से सहायता देने की सिफारिश करता है। प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में राहत तथा पुनर्वास संबंधी वित्तीय व्यय की योजनाओं का विनियमन सरकार द्वारा प्रत्येक पांच वर्षों के पश्चात गठित किए गए वित्त आयोगों की सिफारिशों द्वारा किया जाता है। दसवें वित्त आयोग, जो 1995 से 2000 की अवधि के बीच चल रहा था, के अंतर्गत प्रत्येक राज्य के पास निधि संग्रह उपलब्ध है जिसे आपदा राहत कोष के नाम से जाना जाता है और जिसे राज्य सरकार के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक राज्यीय स्तर की समिति द्वारा विनियमित किया जाता है। यह निधि संग्रह केन्द्र सरकार तथा संबंधित राज्य सरकारों के 3:1 के वार्षिक अंशदानों द्वारा गठित किया जाता है। ग्यारहवें वित्त आयोग ने मौजूदा वित्तीय व्यवस्थाओं में संशोधन किए हैं और एक राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक निधि गठित करने की सिफारिश की है।

भारतीय मौसम विभाग (आई एम डी) चक्रवात का पता लगाने तथा संबंधित प्रयोक्ता अभिकरणों को इसकी चेतावनी देने के लिए उत्तरदायी है। चक्रवात का पता इन्सैट उपग्रह तथा दस चक्रवती संसूचन राडारों के माध्यम से लगाया जाता है। जल पत्तनों, मात्स्यिकी और उड्डयन विभागों को चेतावनी की सूचना दी जाती है। चेतावनी प्रणाली में चक्रवात एलर्ट के लिए 48 घंटे तथा चक्रवात चेतावनी के लिए 24 घंटे की व्यवस्था है। तटीय क्षेत्रों के वियोजित स्थानों में विनिर्दिष्ट केन्द्रों में इन्सैट के माध्यम से स्थानीय भाषाओं में चक्रवात की चेतावनी का प्रसार करने के लिए एक विशेष आपदा प्रणाली विद्यमान है।

बाढ़ की संभावना का अनुवीक्षण करने के लिए केन्द्रीय जल आयोग में एक बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली विद्यमान है जिसमें 13 राज्यों की 62 बड़ी नदियों को कवर किया गया है। 22 नदी बेसिनों में 55 जल मौसल विज्ञानी केन्द्र भी स्थित है। केन्द्रीय जल आयोग 60 प्रमुख नदी स्रोतों का अनुवीक्षण करता है और यह नदी स्रोतों के स्तरों की साप्ताहिक रिपोर्ट के साथ-साथ पूर्ववर्ती वर्ष की संबंधित क्षमता और पूर्ववर्ती दस वर्षों का औसत बतलाता है। राज्य सरकारों के सिंचाई विभागों द्वारा अपेक्षाकृत छोटे जल स्रोतों के अनुवीक्षण से ऐसे सूखे की अग्रिम चेतावनी दी जाती है जिसमें औसत से कम जलधारा का अवसान तथा मिट्टी की आर्द्रता तथा भूमिगत जल स्तरों में कमी शामिल होती हैं।

वर्षा के लक्षण तथा जल स्रोतों में जलस्तरों एवं फसल स्थिति संबंधी आई.एम.डी तथा सी.वी.सी से प्राप्त इन्पुटों के आधार पर राष्ट्रीय फसल मौसम प्रहरी समूह द्वारा सूखे की स्थितियों का अनुवीक्षण किया जाता है। वनस्पति तथा आर्द्रता सूचक स्थितियों के आधार पर सूखे की स्थितियों का अनुवीक्षण करने के लिए दूर संवेदी तकनीकों का भी प्रयोग किया जाता है। गंभीर सूखे की स्थिति में राज्य सरकार काम के बदले अनाज कार्यक्रमों तथा अन्य रोजगार सृजनात्मक तथा आय सृजनात्मक कार्यकलापों के माध्यम से असुरक्षित जन समूहों की सहायता करने हेतु उपयुक्त नीतिगत पैकेज देती है। काम के बदले अनाज के अधिकांश कार्यक्रमों में मौजूदा जल टैंकों को खाली करने, टैंकों को गहरा करने तथा जल संग्रह संरचनाओं का निर्माण करने की व्यवस्था होगी। कभी-कभार राज्य सरकारें सूखा-प्रभावित जिलों में ऐसे काम के बदले अनाज कार्यक्रमों में सार्वजनिक उपयोगी सेवाओं को बहाल किए जाने तथा सामाजिक अवसंरचना के सृजन को शामिल कर सकती है।

बाढ़ के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए बहुप्रयोजन बांध तथा जलाशय बनाए गए हैं। बहु प्रयोजन जलाशयों का असमय सिल्टेशन पर नियंत्रण तथा आस-पास के प्रवाह क्षेत्रों की क्षति को रोकने का प्रयास, मृदा संरक्षण की योजनाओं तथा बड़ी नदियों के प्रवाह क्षेत्रों में नदी-घाटी परियोजनाओं के माध्यम से किया जाता है। इस योजना द्वारा 17 राज्यों में व्याप्त 27 प्रवाह क्षेत्रों के 581 जल-संभरों (water-shed) को कवर किया जाता है।

1960 तथा 1980 के दशकों के दौरान संरचनात्मक उपायों पर अधिक विश्वास किया गया। चूंकि संरचनात्मक उपायों से ही वांछित परिणाम नहीं निकल पाएं हैं और बाढ़ से होने वाली क्षति अभी भी जारी है इसलिए गैर संरचनात्मक उपाय जैसे कि बाढ़ का पूर्वानुमान, बाढ़ग्रस्त मैदान का विभाजन, प्रभावित गांवों की नागरिक सुविधाओं को बाद से बचाना, फसल पैटर्न में परिवर्तन लाना तथा बाढ़ प्रबंधन कार्यों में सार्वजनिक भागीदारी पर अधिक बल दिया जा रहा है। सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (डीपीएपी) 1973 से 14 राज्यों के 149 जिलों में कार्यान्वित किया जा रहा है तथा मरू विकास कार्यक्रम (डीडीपी) को 7 राज्यों के 36 जिलों में कार्यान्वित किया जा रहा है। राष्ट्रीय वर्षा संचित क्षेत्रों हेतु राष्ट्रीय जल संभर विकास परियोजना (एन डब्ल्यू डी पी आर ए) नामक एक कार्यक्रम सुखा प्रभावित क्षेत्रों में कार्यान्वित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में जल संभरों के सभी स्थानिक घटकों अर्थात सस्य भूमि, गैर सस्य भूमि तथा जलनिकास नलिकाओं के लिए एक जैविक भू-जल विज्ञानी तत्व के रूप में विकास संबंधी उपाय अपनाए गए हैं इसका उद्देश्य वर्षा के जल का संरक्षण, मृदा अपरदन पर नियंत्रण, घास के मैदान की पनरूत्पत्ति तथा उद्यान कृषि, कृषि वानिकी तथा चारागाह परिवर्धन और पशुधन प्रबंधन एवं घरेलू उत्पादन प्रणालियों सहित शुष्क भूमि कृषि प्रणाली (dry land farming system) का लक्ष्य हासिल करना है।

देश में 100 मिलियन से अधिक अवक्रमित (degreded) भूमि के ऐसे व्यापक क्षेत्र मौजद हैं जिन्हें कृषि योग्य बनाया जा सकता है। इन अवक्रमित भूखंडों के संरक्षण, पुरूत्पत्ति तथा पुनरूदभव द्वारा शेष भूमि वनों तथा चारागाहों पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सकता है। समेकित बंजर भूमि विकास को बढ़ावा देने के लिए बंजर भूमि विकास बोर्ड गठित किया गया है।

प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर सूखे से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी तथा अल्प रोजगारी की विकट समस्याएं उत्पन्न होती है। ग्रामीण निर्धन लोगों को सवेतन रोजगार प्रदान करना ग्रामीण विकास संबंधी प्रयत्नों का अखंड भाग रहा है। इस प्रयोजन के लिए प्रकल्पित जवाहर रोजगार योजना देश में ऐसा ही वृहत्तम कार्यक्रम है। रोजगार आश्वासन योजनाएं अधिकतर सूखा-संभावित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए कार्यान्वित की जाती हैं। चक्रवातों से निपटने के लिए विभिन्न उपाय जैसे कि चक्रवात आश्रय का निर्माण, तटीय क्षेत्रों में वनरोपण इत्यादि किए गए हैं। संरचनात्मक प्रशमन योजनाएं तैयार करके गंभीर आपदाओं द्वारा प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण योजनाएं शुरू की गई हैं। इन कार्यकलापों में मुख्यतया आवास तथा सार्वजनिक अवसंरचना, जन निकास तथा ग्रामीण जलापूर्ति, सड़क तथा संचार नेटवकों का विस्तार और शेल्टरबैल्ट पादपरोपण शामिल हैं।

चूंकि देश के विभिन्न भागों मे विगत समय में आए भूकंपों के दौरान व्यक्तियों की अधिकांश जानें मिट्टी पत्थर तथा ईंटों के गैर अभियांत्रिक परंपरागत भवनों के गिरने से हुई है इसलिए भूकंपीय दृष्टि से सक्रिय क्षेत्रों में रिट्रोफीटिंग के जरिए ऐसे भवनों की मरम्मत तथा सदढ़ीकरण पर विशेष बल दिया जा रहा है।

भारत राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण हेतु अन्तरराष्ट्रीय (आई डी एन डी आर) दशक के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध है, जिसे 1990 से 2000 तक मनाया गया। आई.डी.एन.डी.आर दशक के पूरा होने के बाद भारत सरकार इस दशक की भावना को बरकरार रख रही है। कृषि मंत्रालय ने राष्ट्रीय, राज्य तथा जिला स्तरों पर आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार करने हेतु एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने भारत में क्षेत्रीय आपदा प्रबंधन सहायता सुविधा केन्द्र गठित करने का निर्णय लिया है जो इस क्षेत्र के देशों के साथ मिल कर सरकारों तथा समुदायों की आपदा प्रशमन, तत्परता तथा समत्थान में क्षमता निर्माण करने में मिल कर ध्यानपूर्वक कार्य करेगा। इससे भारत के आपदा प्रबंधन कार्यक्रम को भी बल मिलेगा।

इन सभी उपायों के बावजूद, आपदा प्रबंधन प्रणाली को और बेहतर बनाने की अत्यन्त आवश्यकता है, क्योंकि भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में यह कार्य अत्यन्त ही जटिल है। जनसंख्या दबाव, पर्यावरणिक अवनति, प्रवास, निर्धनता, निरक्षरता तथा गैर-नियोजित शहरीकरण कुछ ऐसे प्रमुख कारक हैं जो जोखिम तथा संवेदनशीलता को बढ़ाने के लिए उत्तरदायी हैं। गैर-संरचनात्मक आपदा प्रशमन संबंधी प्रयत्नों को देश में तेज किए जाने की जरूरत है। आपदा प्रशमन तथा विकास योजनाओं के मध्य की कड़ियों पर बल दिए जाने की आवश्यकता है।

सरकार को प्रभावित लोगी के लिए बीमा जैसे जोखिम न्यूनीकरण तथा जोखिम अंतरण विकल्पों की ओर कार्य करना चाहिए। सरकार को अपने विभिन्न कार्यक्रमों तथा कार्यनीतियों को विधिक तथा विधायी समर्थन भी प्रदान करना चाहिए। राष्ट्रीय, राज्य तथा जिला स्तरों पर आपदा संबंधी कार्रवाई हेतु संस्थागत ढाँचे के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता है।

इंटरनेट, जी आई एस, दूर संवेदी, उपग्रह संचार इत्यादि के रूप में सूचना प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति से जोखिम न्यूनीकरण उपायों के नियोजन एवं कार्यान्वयन में अत्यधिक सहायता मिल सकती है। जी.आई.एस से प्राकृतिक जोखिम मूल्यांकन के विश्लेषण तथा मार्गदर्शक विकास कार्यकलापों के स्तर तथा शक्ति में सुधार आ सकता है और इससे नियोजकों को प्रशमन उपायों के चयन एवं आपातिक तत्परता एवं अनुक्रिया संबंधी कार्रवाई करने में सहायता मिल सकती है। दूसरी ओर एक यंत्र के रूप में दूर संवेदी जोखिमपूर्ण क्षेत्रों का पता लगाने, ग्रहों का वास्तविक समय आधार पर परिवर्तन का अनुवीक्षण करने तथा अनेक आसन आपदाओं के बारे में पूर्व चेतावनी देने में अत्यन्त प्रभावी ढंग से योगदान कर सकता है। संचार उपग्रह आपातिक संसूचना देने तथा समय पर राहत उपाय करने के लिए अत्यन्त उपयोगी बन चुके है। जोखिम न्यूनीकरण के लिए प्राकृतिक आपदा अनुवीक्षण तथा प्रशमन तंत्रों को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी इनपुटों के साथ एकीकृत करना महत्वपूर्ण है। सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी में उपयुक्त निवेशों के लिए संसाधन आबंटन करना चाहिए। आपदा प्रशमन में नई प्रौद्योगिकिओं के विकास पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।

सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि सिविल समाज की पहलों को सुदृढ़ किया जाए और इन्हें सहायता प्रदान की जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मौजूदा संस्थागत तंत्रों द्वारा वैसी ही सेवाएं प्रदान की जाती है जिनकी उनसे प्रभावी तथा सक्षमतापूर्वक प्रदान किए जाने की प्रत्याशा है। व्यापक जनजागरूकता तथा शिक्षा अभियानों से लोगों को आपदा का सामना करने के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी।

पहले ही से संसाधन की कमी झेल रहे राज्यों में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली क्षति से सतत आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ जाती है और अक्सर ही उपलब्ध संसाधनों का भारी अपक्षय होता है जिससे राज्य विकास संबंधी कार्यकलापों से दूर हो जाते हैं। आपदा के बाद राहत प्रणाली (रिलीफ मोड) से तत्परता, रोकथाम तथा प्रशमन की ओर उन्मुख होना चाहिए क्योंकि ये अधिक लागत-प्रभावी तथा दीर्घकालिक साबित होंगे। इसे स्थानीय समुदायों, स्वैच्छिक संगठनों, समुदाय आधारित संगठनों तथा निजी क्षेत्र की सहभागिता को जुटा कर एक व्यापक अभियान के माध्यम से कार्यान्वित किया जाना होगा। भावी आपदाओं के प्रभाव को कम करने का एक मात्र प्रभावी उपाय आपदा संबंधी तत्परता एवं जागरूकता है।

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